जिंदगी जिंदाबाद

सत्य की रक्षा के लिए नौकरी छोड़ी, अब वकील बन बिना फीस लड़ते हैं मानवाधिकार की लड़ाई

यह कहानी एक ऐसे इंसान की है जिसने सत्यमेव जयते की सार्थकता सिद्ध करने के लिए अपने सुनहरे वर्तमान और भविष्य की कुर्बानी दे दी। न सिर्फ कोटा के प्रतिष्ठित इंस्टीट्यूट की जमी -जमाई नौकरी छोड़ी, बल्कि पेशा हीं बदल दिया ‌‌। रिश्वतखोर भ्रष्ट पुलिस अधिकारी का सच उजागर करने का प्रण लिए वकालत की पढ़ाई की । वकील बने और लंबी कानून लड़ाई लड़ उस भ्रष्टाचारी को सलाखों के पीछे भिजवाया। अब समाज के लिए देश के करप्ट सिस्टम और भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ मानवाधिकार की जंग लड रहे हैं। यह कहानी सत्य के राह पर चलने वाले मानवाधिकार के कर्मठ और निर्भीक सेनानी सुबोध कुमार झा की।

जिंदगी में कभी कभी ऐसे टर्निंग प्वाइंट आते हैं जहां सब कुछ बदल जाता है। मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ।

कोटा के एक बड़े कोचिंग संस्थान में मैं गणित का शिक्षक था। अच्छी पगार मिल रही थी। मन भी रम गया था। इसी वक्त गांव आना पड़ा और गांव में मेरी मोटरसाइकिल चोरी हो गई। फिर थाने जा रपट लिखाई। इंश्योरेंस क्लेम किया । इन सब के बाद थानेदार ने मोटी रिश्वत मांगी। मैंने जब रिश्वत देने से मना किया तो मुझे उल्टे धमकाने लगा। बस यही टर्निंग पॉइंट था मेरे जीवन का। इस घटना ने मेरी आत्मा को झकझोर दिया। मुझे लगा कि न जाने मेरे जैसे कितने लोग ऐसे भ्रष्ट अधिकारियों के चुंगल में फंसते होने। मुझे इस अधिकारी को एक्सपोज़ करना चाहिए। फिर मैंने संकल्प कर लिया कि मैं इस भ्रष्ट पुलिस अधिकारी का असली चेहरा कानून के सामने लाऊंगा कहते हैं मानवाधिकार के वरिष्ठ अधिवक्ता सुबोध कुमार झा ।

लोग कहते थे पागल

वो आगे कहते हैं कि संकल्प करना तो आसान था पर इस संकल्प पर चलना उतना ही कठिन। धमकियां मिलती। कोई भी आदमी भय से इस पुलिस वाले के खिलाफ कुछ भी बोलना नहीं चाहता था। मैंने कोटा की नौकरी छोड़ दी और खुद के न्याय के लिए शुरू कर दी मुहिम। लोग मुझे पागल कहते। कई लोग यह समझाते कि कहां इन सब चक्करों में फंसे हो। रिश्वत ही तो मांग रहा था, दे देते। कोई कहता पुलिस वाले से क्यों पंगा मोल लिया! मैं सबकी सुनता पर किसी को कुछ कहता नहीं। मैं अपने प्रण को पूरा करने में जुटा रहता है। मैंने धीरे-धीरे उस पुलिस वाले के खिलाफ सबूत और कागजात इकट्ठे किए। कोर्ट में केस फाइल किया और खुद ही उस केस की वकालत भी की। इसी बीच मानवाधिकार के लिए जन- जन के बीच जा कर जागरूकता कार्यक्रम भी चलाता रहता।
इन सब में बहुत वक्त निकल गया। मेरी माली हालत भी खराब हो गई। खाली जेब के साथ हौसलों के दम पर मैं इस मुहिम को बढ़ाता रहा।

ईश्वर के घर अंधेर नहीं

कभी मन में निराशा का भाव भी आता पर कुछ ही देर में वह आशा में बदल जाता। कहते हैं न कि भगवान के घर में देर है अंधेर नहीं फिर वो दिन भी आया जब कोर्ट का फैसला मेरे हक़ में आया। वह रिश्वतखोर पुलिस अधिकारी सलाखों के पीछे जा चुका था। मैंने पहला प्रण तो पूरा कर लिया पर इसके साथ ही मुझे लोगों के लिए भी कुछ करना था। मैं मानवाधिकार कार्यकर्ता के तौर पर कार्य कर लोगों के लिए आवाज उठाने लगा। फिर शुभचिंतकों की सलाह पर मानवाधिकार के लिए एक वकील के रूप में वकालत भी शुरू कर दी।

नहीं लेते फीस

एस के झा बताते हैं कि मानवाधिकार के मामलों में राय देने की मैं कोई फीस नहीं लेता। जरूरत पड़ती है तो खुद के पैसे से मदद भी कर देता हूं। कई वैसे लोग भी होते हैं जिन्हें गलत मामलों में फंसा दिया जाता है और उनका बेलर भी कोई नहीं मिल पाता बेल के लिए भी पैसे नहीं होते ऐसे लोगों को मैं मुफ्त कानूनी मदद करता हूं और जरूरत पड़ने पर इन्हें जहां तक संभव हो सके आर्थिक मदद भी करने की कोशिश करता हूं।मानवाधिकार अधिवक्ता एस. के. झा के द्वारा अबतक 14 वर्षों में लगभग 7000 से अधिक मामलों को राष्ट्रीय एवं राज्य मानवाधिकार आयोग में भेजा जा चुका है, जिसमें कई मामलों में महत्वपूर्ण निर्णय भी हुए हैं।

एस.के.झा बताते हैं कि मेरी कोशिश के बाद साल 2018 से जेल में सजा काट रहे अमेरिकी नागरिक क्विंग डेविड दुह्यन को जेल से रिहाई करवाकर अमेरिका भेजा गया। इस कार्य में 50 हजार रूपये से अधिक की राशि भी मुझे खुद से लगानी पड़ी। जब वह रिहा हुआ तो मुझे दुआ दी यही मेरी असली कमाई है। मैं चाहता हूं कि किसी बेगुनाह को गुनाहगार न बनाया जाए। अगर उसे फंसाया गया है तो उसे तुरंत न्याय मिले।


यहां भी हुई जीत

वे आगे बताते हैं कि बिहार के मुजफ्फरपुर में उन दिनों चमकी बुखार ने अपना कहर बरपाया हुआ था। रोज बच्चे गाल का ग्रास बन रहे थे । मुजफ्फरपुर सहित बिहार के कई जिलों में चमकी बुखार से मरने वाले बच्चों का मृत्यु प्रमाण-पत्र समय से नहीं बन पाता था, जिस कारण सरकार द्वारा मिलने वाली मुआवजे की राशि से उनके परिवार वालों को वंचित होना पड़ता था। इसके लिए मेरे द्वारा मानवाधिकार आयोग के समक्ष याचिका दाखिल की गयी। यह सुनवाई तीन वर्षों तक चली। उसके बाद बिहार मानवाधिकार आयोग के आदेशानुसार पूरे बिहार के मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल तथा सभी सदर अस्पतालों को आदेश दिया गया कि चमकी बुखार से मरने वाले मरीजों का तत्काल मृत्यु प्रमाण-पत्र बनाया जाये, साथ-ही-साथ चमकी बुखार को जड़ से ख़त्म करने की दिशा में हो रहे अनुसन्धान को और तीव्र किया जाये। यह एक बड़ा फैसला था। इसके बाद चमकी बुखार को खत्म करने की दिशा में काफी प्रयास हुए।


विदेशी बंदियों की वतन वापसी

सुबोध कुमार झा यह भी कहते हैं कि मेरी कोशिशों से अबतक देश के विभिन्न जेलों में बंद कुल 18 विदेशी नागरिकों की वतन वापसी कराई जा चुकी है, जिसमें अमेरिका, बांग्लादेश, अफगानिस्तान, ब्रिटेन, नाइजीरिया, उज्बेकिस्तान एवं रूस जैसे देशों के नागरिक शामिल है।

एस के झा एक वाकया बताते हैं कि बांग्लादेशी महिला जो कि मानव तस्करी का शिकार हो गयी थी और विदेशी अधिनियम में बिहारशरीफ जेल में बंद थी। हमारी पहली से उसे जेल से बाहर निकला गया, जो वर्तमान में बिहार प्रशासनिक सुधारात्मक संस्थान, हाजीपुर में रह रही है। इसके वतन वापसी के लिए मैंने बांग्लादेश की सरकार एवं बांग्लादेश के राजदूत से लगातार संपर्क बनाया है। उम्मीद है कि बहुत ही जल्द बांग्लादेशी महिला रिया आफरीन रूपा की वतन वापसी हो जाएगी।

हथकड़ी लगाने हेतु अनुमति लेना आवश्यक

अधिवक्ता एस. के. झा ने पुलिस के द्वारा अभियुक्तों को हथकड़ी लगा दिए जाने के मामले को लेकर लम्बी लड़ाई लड़ी, जिसपर बिहार मानवाधिकार आयोग ने बिहार पुलिस को निर्देश दिया कि किसी भी अभियुक्त को बिना किसी युक्तियुक्त कारण को स्पष्ट किये हुए हथकड़ी नहीं लगाना है, तथा सम्बंधित न्यायालय से हथकड़ी लगाने हेतु अनुमति लेना आवश्यक है।

ट्रांसजेंडरों के मानवाधिकार के लिए पहल

ट्रांसजेंडरों के मानवाधिकार के लिए भी इन्होंने पहल की , इसके बाद अधिवक्ता एस. के. झा के ही प्रयास से पुरे देश में ट्रांसजेंडरों की समस्याओं के निवारण के लिए जिला स्तर पर एक ए.डी.एम. रैंक के पदाधिकारी को नियुक्त किया गया है। एस के झा के प्रयासों का नतीजा है कि विदेशी बंदी सजा अवधि पूर्ण होने के पश्चात जो किसी कारणवश अपनी वतन वापसी नहीं कर पाते हैं, उनके लिए पूरे बिहार प्रदेश में संशीमन केंद्र की स्थापना की जा रही हैं। इसके लिए मानवाधिकार अधिवक्ता एस. के. झा ने बिहार मानवाधिकार आयोग में तीन वर्षों तक मुकदमा लडाई लड़ी है।

यह भी रही महत्वपूर्ण जीत

मानवाधिकार अधिवक्ता एस. के. झा के द्वारा सदर अस्पताल मुजफ्फरपुर में एंटीजेन किट कालाबाजारी का मामला, एस. के. एम. सी. एच. में नरमुंड का मामला, मुजफ्फरपुर आई हॉस्पिटल का मामला,, सुनीता किडनी कांड का मामला एवं नंदना गैस कांड का मामला को काफी प्रमुखता से मानवाधिकार आयोग में उठाया गया, जिसमें उन्हें सफलता भी मिली।
एस के झा उपभोक्ताओं के अधिकार के को लेकर भी अलख जगा रहे हैं। उपभोक्ता आयोग में अधिवक्ता एस. के. झा 500 से अधिक मामलों में निःशुल्क पैरवी कर रहे हैं, जिसमें 300 से अधिक मामलों का निपटारा भी हो चुका है।

परिवार ने दिया साथ

एस के झा कहते हैं कि सामाजिक व्यस्तता बाद भी मेरी कोशिश रहती है कि परिवार को ठीक से समय दे पाऊं ।जब भी मुझे समय मिलता है बच्चों के साथ वक्त बिताना पसंद करता हूं। मेरे माता-पिता ने भी संघर्ष के दौरान मुझे खुब हिम्मत दी है।

पत्नी का हर कदम पर बड़ा सहयोग

एस के झा बताते हैं कि जीवन के हर बुरे दौर में पत्नी ने मुझे हमेशा हिम्मत दिया है। आर्थिक परेशानी के दौर में भी वह मेरा हौसला कभी कम नहीं होने देती। उनकी कोशिशों से ही मेरा यह अभियान लगातार सुचारू रूप से चल पा रहा है।

चंपारण की माटी से मिलती है ऊर्जा

एस के झा का जन्म पूर्वी चंपारण के देवापुर नामक गांव में हुआ था। मैट्रिक तक की पढ़ाई गांव में ही हुई इसके बाद उच्च शिक्षा के लिए मुजफ्फरपुर के आरडीएस कालेज में दाखिला लिया। एस के झा कहते हैं कि मैं यह मानता हूं कि मेरी इस जुझारू प्रवृत्ति के पीछे चंपारण की पावन माटी का योगदान है। यह वही माटी है जिसने मोहनदास गांधी को बापू बना दिया। मुझे चंपारण के इतिहास से उर्जा मिलती है।

कर दिया है शरीर दान

एस के झा ने अपना शरीर दान किया है। वो मानते हुए कि मृत्यु के बाद भी शरीर किसी कार्य में आ जाए यही सबसे बड़ा धर्म है। इस कारण उन्होंने शरीर दान करने की पहल की है।

सपना एक फोरम बनाने का

सुबोध कुमार झा कहते हैं कि आज भी हजारों वैसे लोग हैं जिन्हें मामूली या फिर झूठे आरोपों में फंसा दिया गया है और उनके पास आगे मुकदमा लड़ने के पैसे नहीं हैं अपनों ने भी किनारा कर लिया है। वो जेल की सलाखों के पीछे सालों से कैद हैं। मैं ऐसे लोगों के लिए देश व्यापी वकीलों का एक समूह बनाना चाहता हूं । इस समूह से जुड़े लोग इन की पैरवी निशुल्क करें । फिलहाल पावन संकल्प की इस यात्रा को सुबोध कुमार झा आगे बढ़ाने और झूठे मुकदमे में फंसाए गए लोगों की आवाज बन उन्हें न्याय दिलाने की अपनी यात्रा पर अनवरत गतिमान हैं।

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विवेक चंद्र
उम्मीदों के तानों पर जीवन रस के साज बजे आंखों भींगी हो, नम हो पर मन में पूरा आकाश बसे..
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