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‘सत्य’ की राह, हौसलों से ‘जीत ’ पटना के डॉक्टर सत्यजीत की यह कहानी पढिए… 

मेरी कहानी में सुख का राग भी है तो दुःख के करूण स्वर भी, जिम्मेदारियों का एहसास भी और उन्मुक्त होकर जीवन के रंगों को मुट्ठियां भींच भर लेने के पल भी। देश की माटी से परदेश की जमीं तक यादों के सतरंगी सुर अब भी जेहन में  यूं  ताजा हैं जैसे कल की बात हो। शांति सेना के कैंप से लेकर ब्रिटेन की सरजमीं और खाड़ी युद्ध तक की। अब भी याद है मुझे ।

बाबूजी की वो सीख जिसने मुझे आदमी बनाए रखा,  स्वामी सहजानंद सरस्वती जी का वह जीवन मंत्र  संघर्ष: एवं जीवनस्य सार: ( संघर्ष ही जीवन का सार है) भी , जिसने मेरे हौसले को फौलाद बना दिया। 

यूं तो संघर्ष बचपन से ही मेरे हिस्से आया था। जन्म के बाद से ही बार- बार पीएमसीएच अस्पताल का बिस्तर ही ठिकाना  बनता रहा।
तब से अब तक लड़ता ही तो आ रहा हूं। कभी नियति से, कभी वक्त से, तो कभी खुद से, एक योद्धा की तरह। सोचता हूं जो भी कमाया, बनाया, बचाया वह मनुष्यता के काम आएं। मैं रहूं न रहूं मेरे कर्म एक बहादुर सिपाही की तरह निडरता के साथ फिजा में घुलते हुए हर अंतिम आदमी के चेहरे पर मुस्कान बिखेर सकें। बचा सकें बच्चों की खिलखिलाहट ,   बन सकें दादी मां के झुर्रिदार चेहरों की बीच तैरती हुई प्यारी सी हंसी। बस इतनी सी ही ख्वाहिश है मेरी। यह संभव हो सका तो मैं समझूंगा की मैंने वो वादा पूरा कर दिया जो मैंने बाबूजी से किया था। स्वामी जी से किया था और किया था खुद की आत्मा से। बस इसी कोशिश में चरैवेति -चरैवेति का मंत्र लिए इस उम्र में भी चलता जा रहा हूं मनुष्यता के पथ का एक  पथिक बन। कहते हैं रूबन मेमोरियल अस्पताल के संस्थापक  डॉ. सत्यजीत कुमार सिंह।
स्वामी जी के विचारों की संगत ने मुझे गढ़ा 
  डॉक्टर सत्यजीत पुराने दिनों की याद ताजा कर कहते हैं मेरा जन्म पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल में हुआ। पिताजी वकील थे। माता जी गृहणी। हमारा पुस्तैनी गांव पटना जिले के बिहटा का अमहारा रहा है।
यहां स्वामी सहजानंद सरस्वती जी ने अपना आश्रम बनाया था। यहीं से वे समाज-सुधार और किसान आंदोलन की दिशा तय करते थे। गांव की संगत में स्वामी सहजानंद सरस्वती के विचारों से संगत हो गई।
स्वामी सहजानंद सरस्वती
मुझे लगता है कि मुझे गढ़ने और आत्मबल मजबूत करने में इन विचारों का अनमोल योगदान रहा है।
बचपन से लेकर अब तक की अनगिनत  यादें हैं,  अनगिनत किस्से हैं। किसे साझा करूं, किसे छोड़ दूं।  इन यादों में दादाजी की कहानी भी है।
दादाजी के हौसले से प्रेरणा 
मैं मानता हूं कि मेरे दादाजी  श्री वासुदेव नारायण सिंह मेरे लिए प्रेरणा स्त्रोत रहें हैं। जब जीवन में अंधेरा गहराने लगे तब भी उम्मीद का दामन थाम उसे रौशन किया जा सकता है। यह मैंने दादाजी से सीखा है। दरअसल किस्सा यूं है कि हमारे गांव अमहारा में भयानक महामारी फैली। इस महामारी में हमारे परिवार के कई सदस्यों की मौत हो गई। एक तरह से कहें तो दादाजी और  उनके बड़े भाई का लड़का बचा था बस। काफी दर्दनाक था सब कुछ।
दादाजी गांव छोड़ पटना आ गए। पटना में खड़क विलास प्रेस में काम सीखा। यह उन दिनों काफी प्रसिद्ध प्रेस था।
आजादी के आंदोलन में भी इस प्रेस की महत्वपूर्ण भूमिका रही।यहां से बिहार बंधु नामक अखबार निकलता था।
दादाजी ने यहां छपाई और प्रेस के काम से जुड़ी बारिकियां सीखीं। फिर वे शिलांग चले गए। कुछ समय तक वहां काम किया फिर पूर्णिया आएं और यहां काम किया। दादाजी ने चालिस साल तक शादी नहीं की। इसलिए की उन्हें  भतीजे की परवरिश करनी थी। वे मानते की अगर शादी के बाद मेरी पत्नी इसे ठीक से नहीं रखेगी तो मेरे भाई की आत्मा को चोट पहुंचेगी। पूर्णिया में दादाजी अर्जुन लाल प्रेस में काम करते थे। यहां कमाकर दादाजी ने सौ बीघा जमीन खरीदी।
गहरी थी पिताजी की सोच 
मेरे पिताजी पेशे से वकील थे पर उनकी सोच काफी गहरी थी। पिताजी की शुरूआती पढ़ाई बिहटा स्कूल से हुई। यहीं वें स्वामी जी के संपर्क में आए। इसका उनपर काफी प्रभाव पड़ा। अपने जीवन काल में पिताजी समाजिक कार्यों से जुड़े रहे। उनकी राजनीतिक चेतना भी काफी मजबूत थी। वे पटना विश्वविद्यालय सिनेट के मेंबर और कालेज के सेक्रेटरी रहे। कम्यूनिस्ट मूवमेंट के भी पिताजी सेक्रेटरी थे।
घर आते विदेशी मेहमान
पिताजी के सामाजिक और राजनीतिक सरोकार
और विचारधारा के कारण उन दिनों हमारे घर में विदेशी डेलिगेट भी मेहमान के तौर पर आते रहते। हम बच्चों को भी कभी कभार इनसे बात करने का मौका मिल जाता। पटना में रहकर हमारा परिवार दुनिया  के विचारों और संस्कृतियों से ताल्लुक रखता था। मुझे यह अच्छी तरह याद है कि पिताजी के समय में हमारे घर में कभी किसी दूसरे परिवार की शिकायत या किसी कमी की चर्चा हुई हो। हम उन दिनों घर में विदेशी नीति, भारतीय दर्शन, कार्ल मार्क्स के सिद्धांत की चर्चा खाने की मेज पर करते।
बीमारी वाला बचपन और पीएमसीएच का बेड 
आपको लगता होगा आज मैं डॉक्टर हूं, और मेरा नाता अस्पताल से है। ऐसा नहीं है। अस्पताल से मेरा नाता बचपन से ही जुड़ा रहा है। उन दिनों हम बाकरगंज के दलदली में रहा करते थे। मैं बचपन में काफी बीमार रहता था। इस कारण 9 साल की उम्र तक मैं स्कूल भी नहीं है जा पाया था। मुझे बार-बार टाइफाइड होता। पीएम सीएच के बच्चा वार्ड से उन दिनों मेरा अस्थाई घर ही बन गया था और अस्पताल का बिस्तर दुनिया। डॉक्टर आते मेरी जांच करते।वार्ड की सिस्टर कभी मुझे उबला अंडा खिलाती तो कभी संतरा देती। इलाज के दौरान ही मेरे शरीर में खून बनना बंद हो गया। वहां के डॉक्टर और नर्स मुझे रक्त देते। इन सब को देखकर डॉक्टर का पेशा बचपन से प्रभावित करने लगा था। संयोग ऐसा कि बचपन में जिस पीएमसीएच में भर्ती होता वही से डॉक्टरी की पढ़ाई भी की।
पुनपुन नदी
पुनपुन नदी और बाढ़ में राहत कार्य 
डॉ .सत्यजीत कुमार आगे कहते हैं कि पिता को समाजिक कार्यों को करना खुब भाता। वे हमें भी बचपन से ही समाजिक कार्यों में भागीदारी के लिए प्रेरित करते।  मेरे गांव के थोड़ी दूर पर पुनपुन नदी बहती है। तब लगभग हर साल पुनपुन नदी में बाढ़ आ जाती। नदी के पास के  बाशिंदे इससे प्रभावित होते। मुझे याद है कि मेरी उम्र लगभग 13 साल तब रही होगी। मैं भी उस दौरान राहत कार्य में जुड़ा था। बाद में हर साल में इस कार्य में जुड़ा रहता था। 1967 में उत्तर बिहार में भयानक बाढ़ आयी थी। उस वक्त हम लोगों से  अनाज और कपड़े इक्ट्ठा करते और फिर पीड़ितों के बीच बांटते। यह सब पिताजी की ट्रेनिंग थी। वे कहते लोगों के दुःख में काम आना ही जिंदगी है। मैं भी मानता हूं जीना इसी का नाम है। हम इंसान हैं और हमारे अंदर की करूणा ही हमें इंसान बनाती है। दुःख इस बात का है कि इन दिनों तेजी से मानवीय मूल्यों का हरास हो रहा है,  संवेदना मर रही हैं। इसे बचाए रखना जरूरी है।
डॉक्टर बनने का सपना और पिता का वो आदेश 
डॉ सत्यजीत कहते हैं कि मैंने बचपन से ही सोच रखा था डॉक्टर का पेशा अपनाना है। पिताजी की गिनती पटना के बेहतर वकील के रूप में होती थी। मैं वकालत करता तो कई सहुलियते मिल जाती पर मैंने ऐसा नहीं किया। पिताजी से कहा कि मुझे डॉक्टरी का पेशा अपनाना है। उन्होंने इजाजत तो दी पर एक शर्त रख दी। शर्त यह कि मैं अपने गांव के मरीजों को सही दवा और बेहतर इलाज में हमेशा मददगार रहूंगा और इस पेशे की गरिमा बरकरार रखूंगा। मैंने पिताजी का आदेश स्वीकार किया और इस पेशे में आया।
जंग के दौरान मुक्ति वाहिनी की सेवा 
मैं पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल में पढ़ाई कर रहा था। जुनियर डॉक्टर के रूप में समाजिक कार्यों में भी मदद करता था। हमारा थर्ड इयर रहा होगा। 1971 में   मुक्तिवाहिनी और पाकिस्तान के बीच लड़ाई शुरू हो गई। भारत मुक्ति वाहिनी का साथ दे रहा था। बिहार की लंबी सीमा बंगलादेश ( तब के पूर्वी पाकिस्तान) से मिलती थी। यहां भी इसका असर दिख रहा था। सीमा से सटे इलाकों में जंग का  असर था।
ऐसे में जब मुझे इस बात की जानकारी हुई तो मैंने कॉलेज के साथियों के सीमा पर जा  वहां जाकर मेडिकल कैम्प लगाकर सेवा करने की योजना बनाई।
इसके लिए मैं सबसे पहले तात्कालिक प्राचार्य डॉ. गोविंदाचार्य से मिला और आग्रह किया कि हमें जाने की आज्ञा प्रदान करें। मैंने उनसे कहा लड़ाई चल रही है ऐसे में जो रिफ्यूजी बीमार या घायल होंगे हम उनके लिए कैंप लगाएंगे। सैनिकों की मदद भी करेंगे। डॉ. गोविंदाचार्य मेरी बातों से काफी प्रभावित हुए। मुझे शाम को बुलाया और बिहार के तात्कालिक गवर्नर डीके बरूआ के यहां ले गए। हमारे प्राचार्य ने गवर्नर साहब से मेरा परिचय कराते हुए कहा कि इनकी योजना युद्ध के दौरान मेडिकल कैंप लगाने की है।
फिर गवर्नर साहब ने मुझसे पुछा कैसे और क्या करना है। मैंने योजना बतलाया उन्होंने तत्काल अपने एडीसी को बुलवा कर मुझे दो सौ रूपए दिलवाएं और कहा डॉक्टर कल सुबह आकर आप चिट्ठी ले जाना। मेरी खुशी का ठीकाना नहीं रहा। मैंने दोनों को धन्यवाद दिया और आगे की तैयारी में जुट गया।
जब बस हो गई चार घंटे लेट 
हम जरूरत के सामान और  तैयारियों के साथ लेटर लेकर लेकर  किसनगंज के लिए बस पकड़ने निकले ।पता चला बस चार घंटे लेट है। टीम में हम 6  लोग थे। अब हमें लंबा इंतजार करना था। कहते हैं न अच्छा काम करो तो ईश्वर आपकी मदद करते हैं तभी वहां हमें मैडम सूरी जो हमारे कॉलेज की प्रोफेसर थीं उनके पति मिल गए।वे BSF में कमांडेंट थे, फिर क्या था हम सभी BSF के वैन में बैठकर सिल्लीगुड़ी पहुंचे। वहां डीएम से मिलकर राज्यपाल का लेटर दिया। उन्होंने हमारी सराहना करते हुए मदद करने की बात कही। हमें रेडक्रास की ओर से काफी मदद मिली, बीएमपी का  ट्रक, दो ड्राइवर, दो खलासी और हम छह दोस्त कैंप लगाने निकल गए।
कैंप में डॉ. गोपाल प्रसाद हमारे सिनियर थे। दिसंबर 71 तक यह कैम्प चला। अलग अलग प्लाटून का बैच आता रहता, हम उनका इलाज करते, उन्हें जरूरी दवाइयां देते।
वापस लौटने पर हमने गवर्नर साहब को सब कुछ बताया वह काफी खुश हुए। हम तीन माह वहां रहे थे। कालेज में इस काम के लिए हम सबों की खुब तारिफ हुई। कॉलेज क ओर से  मुझे एक उपाधि और स्पेशल ब्लेजर दिया गया।
 पिताजी का खत और भविष्य की चिंता 
मुक्तिवाहिनी की सेवा के बाद मन खुब उत्साहित था। पिताजी भी खुश थे पर उन्होंने इसे जताया नहीं। एक रोज घर में मेरे नाम एक चिट्ठी लिख छोड़ी। मैंने खत पढ़ा। उसमें उन्होंने लिखा था कि आप अच्छा काम कर रहे, लेकिन पढाई करोगे तभी अच्छा करोगे। अभी इस काम की जिम्मेदारी किसी को दे दो। पिताजी के ख़त में मेरे भविष्य को लेकर चिंता साफ दिख रही थी फिर मैंने भी ज्यादा वक्त पढ़ाई पर लगाना शुरू कर दिया।
रांची में पहली नौकरी 
MS करने के बाद मेरी नौकरी बिहार सरकार के स्वास्थ्य विभाग में लग गई। मेरी नियुक्ति  रांची के निकट बुरमू प्रखंड में हुई।
पत्नी पास के मार्डन मिशन अस्पताल में काम करने लगी। मुझे ms किए दो साल हो चुके थे, मैं सर्जन बनना चाहता था। इसके लिए जुलाई 1978 को मैं इंग्लैंड चला गया।
इंग्लैंड में पढ़ाई भी, नौकरी भी
यहां इंग्लैंड में मैंने रेजिडेंट डॉक्टर के तौर पर नौकरी कर ली। इसके साथ ही लंदन यूनिवर्सिटी से FRCS किया और यूरोलॉजी में डिप्लोमा किया। frcs करने के बाद रेजिडेंट डॉक्टर की नौकरी छोड़ दी। पढ़ाई के दौरान मैं दिन में पढ़ाई करता और नाइट सिफ्ट में नौकरी करता।
डॉ सत्यजीत बताते हैं कि साउथ पॉल में हम एक सिख परिवार के किरदार के रूप में रहते थे। मुझे जहां frcc की ट्रेनिंग के लिए भेजा गया वहीं मुझे नौकरी भी मिल गई यूरोलॉजी रजिस्टार की।
प्रतिकात्मक तस्वीर
स्कॉटलैंड का शांत टापू और “मेरी मैक्डोनल्ड ‘
मैंने स्कार्ट लैंड के एक टापू में रजिस्टार का काम कुछ दिनों के लिए किया था।यह शांत टापू समंदर के बीच में स्थित है यह एक धार्मिक जगह भी है।वे हमें वहां का वाकया सुनाते हैं।
मेरे पास इस टापू पर एक 70 साल की महिला इलाज के लिए आई। मैंने उनका इलाज किया, दवा दी और उन्हें सोमवार को जांच के लिए बुलाया। उन्होंने मुझसे हिंदी में पूछा आप कहां से आए हो भारत से?
मैंने आश्चर्य से उनकी ओर देखते हुए कहा, हां लेकिन! आप हिंदी कैसे जानती हैं।
फिर उन्होने बताया कि जबलपुर में उन्होंने आदिवासी बच्चों के साथ काम किया है। उन्होंने अपनी कहानी बताई। फिर उनसे हमारे परिवार का गहरा संबंध हो गया। मैं उस टापू से ग्लास्को वापस आया , फिर लंदन आ गया। पर मेरी मैक्डोनल्ड मैम से हम जुड़े रहे। वो हमारे बच्चों के जन्मदिन पर स्पेशल केक भेजती रहती। चार साल बाद मेरे कंसल्टेंट ने बताया की मेरी मैम बीमार हैं। पता चला उन्हें कैंसर हो गया। हमने सीधे गाड़ी निकाली और खुद ड्राइव किया। फिर जहाज पकड़ पांच घंटे में मेरी मैम के घर तक पहुंचें।
पता चला कि वें तीन माह से बिस्तर से नहीं उठीं थीं।
हमें देख वो मुस्कुरा कर उठ बैठी और पत्नी से कहा कि मुझे चपाती सब्जी बना कर दो। मेरी पत्नी ने उन्हें चपाती बनाकर खिलाया। इसके बाद मेरी ने दुनिया को अलविदा कह दिया।
यह वाक्या बताते बताते डॉ सत्यजीत की आंखें नम हो जाती है, खुद को संभालते हुए वें आगे कहते हैं।
 उनसे मुझे और मेरे परिवार को विदेशी धरती पर इतना स्नेह मिला की शब्दों में बयां करना मुश्किल है। उन्होंने भारत में आदिवासी समाज के लिए काफी काम किया था।
भारत से उन्हें खूब लगाव  था। वो हमारे परिवार की सदस्य की तरह हो गई थीं। एक अभिभावक की तरह परिवार के हर सदस्य की खोज खबर लेती। उन्हें स्नेह देतीं। सच कहूं तो मेरी इंसानियत की मिसाल थीं। ताउम्र वो दूसरों की खुशी के लिए जीती रहीं।  मैंने तय किया है कि अपने नर्सिंग कालेज का नाम उनके नाम पर रखूंगा। यह उनके प्रति मेरी श्रद्धांजलि होगी।
लंदन में मकान खरीदा , दिल बिहार
लौटने को बेचैन
डॉ.सत्यजीत बताते हैं कि मैं अपने काम में आगे बढ़ रहा था। 1990 में मैं कंसल्टेंट के तौर पर काम करने लगा। नार्थ लंदन में कलीनिक  खोल   प्राइवेट  प्रैक्टिस भी करता। पैसे अच्छे आने लगे। लंदन में मकान भी ले लिया। बच्चे अच्छे स्कूल में पढ़ने लगे।
लेकिन पिताजी के मोटिवेशन से वापस लौटने की इच्छा मजबूत होने लगी। सोचा भारत लौट जाता हूं, पर जिस सम्मान और गर्व से हम वहां जीवन जीते थे उसमें पैसे बहुत बच नहीं पाते। सोचा पहले कुछ पैसे बचाएं जाएं। 1992 में पत्नी और बच्चे लौट आएं। मैंने सउदी अरबिया के अमेरिकन हॉस्पिटल में नौकरी कर ली। इसके पीछे सोच यह रही कि वहां की सैलरी बहुत ज्यादा थी, और मुझे पैसों की जरूरत भी।  मैंने सोचा था कि दो साल बाद बिहार लौट आऊंगा पर यह हो नहीं सका। माता जी भी एक साल स्कार्ट लैंड में रहीं। पिताजी मुझे वापस आने को प्रेरित करने रहे।  मां वहां के स्थानीय लोगों से मिलती-जुलती और बातें करतीं। हालांकि भाषा संबंधी कुछ मुश्किलें आतीं पर जब दिल जुड़ता है तो बाक़ी बाधाएं खुद बौनी हो जातीं हैं।
पटना से संदेशा जाता’ बिहार लौट आओ’
इधर पत्नी डॉ विभा ने त्रिपोलिया अस्पताल में गाइनोकोलॉजिस्ट का काम शुरू कर लिया था। पटना के डॉक्टर एके सेन और पी .गुप्ता मुझसे जब भी बात करते, कहते पटना आ जाओ। एक दिन मेरी पत्नी ने मुझसे कहा “आप पटना आ जाएं, यहां आप ज्यादा खुश रहेंगे। ” दिल को यह बात छू गई।
खाड़ी युद्ध, प्रतिकात्मक तस्वीर
सउदी अरब की जंग और मेरा फैसला 
मैंने नौकरी छोड़ी, पटना आया, तब कुवैत और इराक के बीच लड़ाई शुरू हो चुकी थी। मुझे लगा कि कुवैत के अमेरिकन अस्पताल में कुछ दिन नौकरी कर पैसा जमा करना जरूरी है। इधर अखबार और टीवी में जंग की खबरें सुर्खियों में रहती। दुविधा का समय था मेरे लिए। मैं लंदन गया, मकान किराए पर था। टीवी पर कुवैत में जंग की भयावह तस्वीरें आ रही थीं, न्यूक्लियर बम की चर्चा काफी तेजी से होने लगी थी।
ऐसे में हर किसी ने मुझे सलाह दी कि वापस न जाओ। लोग भाग रहे थे। मेरे मन में तूफान सा उमड़ रहा था। लोन बहुत सारे थे, उन्हें चुकाना था। मैंने सोचा इसे चुकाने में पांच साल इंग्लैंड में काम करने पर लग जाएंगे। मैं अगले दिन किसी से बिना कुछ कहे चुपचाप सउदी एम्बेसी गया और सऊदी जाने का वीजा लिया। फिर टिकट। टिकट देने वाली लड़की ने कहा आप बहुत बहादुर हो। लंदन से जेद्दा के इस एयरबस में सिर्फ 15 लोग थे। मैंने मन की हिम्मत को और बलवान बनाया और कहा ‘ करना है तो करना है ‘
बेटा मां से कहता  ‘पापा सलामत लौट आएंगे ‘
मैंने सउदी के अमेरिकन अस्पताल में नौकरी ज्वाइन कर ली। जंग गहराता जा रहा था। बम के धमाके सुनाई देते। हमें बम से बचने के लिए मौके ड्रील कराया जाता। भारत जाने के लिए तब फ्लाइट भी बंद थी। पत्नी काफी घबराती थी। बेटा उसे समझाता था। मां परेशान मत हो पापा सलामत लौट आएंगे।
पटना लौटना और रतन क्लीनिक की शुरुआत 
मैं यह मानता हूं कि जो लोग बड़े सपने देखते हैं उन्हें भय नहीं रोकता है। मैं 1996 के अगस्त में पटना लौटा। हमने पटना के कंकड़बाग में माता जी के नाम पर रतन स्टोन क्लीनिक खोला।  तब हर कोई मुझे सलाह देता था कि यह नहीं चलेगा पटना में। मैंने इसमें नई तकनीक का इस्तेमाल किया था।  मुझे लगता कि मैं जब पटना आया हूं तो कुछ अलग करना है। लोगों के नकारात्मक बातों से पिताजी भी काफी घबरा गए थे। बैंक कर्ज देने को तैयार नहीं था। पत्नी ने जेंडर गिरवी रखा। धीरे धीरे जब  सालों बाद आर्थिक हालात ठीक हुए तो मैं जेवर छुड़वा पाया। तब वही लोग मेरी सराहना करने लगे जो मुझे नसीहत देते थे।
 फ़िर बना रुबन मेमोरियल हॉस्पिटल 
तीन साल बाद बड़े भाई के बेटे रुबन का निधन हो गया। मैंने भाई कर्नल एके सिंह के साथ मिलकर रुबन की याद में गांधी मैदान के पास रुबन मेमोरियल हॉस्पिटल शुरू किया।
यहां यहां यूरोलॉजी के साथ-साथ अन्य बीमारियों का इलाज भी शुरू हुआ।
हमने शुरू में तीन बेड से रत्न स्टोन क्लीनिक की शुरुआत की थी जो बाद में 45 बेड का हुआ और2014 में पाटलिपुत्र कालोनी स्थित हमारे अस्पताल में 214 बेड के हो गए।
आज यहां सभी स्पेशलिटी मौजूद हैं। ट्रामा, इमरजेंसी, सब कुछ।
पहला लेजर सर्जरी का रिकॉर्ड 
रूबन अस्पताल ने कई रिकॉर्ड कायम किए हैं। हमने बिहार में पहला लेजर सर्जरी किया। रोबोटिक सर्जरी से पहला सफल किडनी ट्रांसप्लांट भी रूबन अस्पताल में ही हुआ। कभी मैं रत्न स्टोन क्लीनिक में अकेला डॉक्टर था आज हमारे अस्पताल में 150 चिकित्सक कार्य कर रहे हैं जिसमें 50 सुपर स्पेशलिस्ट हैं। इस अस्पताल में एक छत के नीचे सभी जांच उपलब्ध हैं।
इस बिजनेस को अच्छे नजरिए से देखने की जरूरत 
समाज के हर क्षेत्र के कार्य का अपना महत्व है। चिकित्सा कार्य लोगों की भावनाओं से सीधा जुड़ा हुआ है। एक अस्पताल के संचालक के लिए पूंजी की जरूरत होती है। यह एक बिजनेस है। हम भारत में अस्पताल के बिजनेस को लूट की तरह देखते हैं यह ग़लत हैं। हम बिजनेस शब्द को हेय दृष्टि से देखेंगे तो देश आगे नहीं बढ़ेगा। डॉक्टरी एक संवेदनशील पेशा है जिसे इस पेशे पर गर्व होगा वह बेइमानी नहीं करेगा। मैं 1996 में अपने सुखद जीवन को छोड़कर बिहार इस लिए नहीं आया कि बहुत आमदनी होगी। मैं यहां के लोगों को स्वस्थ बनाने और उनके साथ आगे बढ़ने के लिए आया। मैं यह कतई नहीं कहता कि मैं दया कर रहा हूं। मैं इलाज कर पैसा कमा रहा हूं और इसे अस्पताल को बढ़ाने में लगा रहा हूं।मेरा शौक मेरा शान सब मेरा अस्पताल है। मेरा जीवन मेरे सपने और मेरी अमीरी सब मेरा अस्पताल ही है। मैं ईमानदारी से अपने पेशे को जीना चाहता हूं।
स्वामी सहजानंद सरस्वती आश्रम में अनोखा विद्यालय 
मैं स्वामी सहजानंद सरस्वती आश्रम बिहटा का सेक्रेट्री भी हूं। यह आश्रम 1927 में स्वामी जी ने शुरू किया था। तब वे किसान आंदोलन चला रहे थे। आज इस आश्रम में हम एक अनोखा विद्यालय भी संचालित कर रहे हैं। स्वामी सहजानंद सरस्वती जी के आदर्श पर चलने वाले इस विद्यालय में 150 छात्र है। यहां शिक्षा बिल्कुल मुफ्त है। इसके साथ ही सप्ताह में दो दिन आयुर्वेद चिकित्सा की सेवा भी आश्रम में दी जाती है।
कई सामाजिक संगठनों से जुड़े 
मैं कई सामाजिक संगठनों से भी जुड़ा हुआ हूं। यह मुझे बेहतर करने की प्रेरणा देता है। मैं IPPNW, ICAN से जुड़ा हूं। हमने जादूगोड़ा में खनन मजदूरों के बच्चों पर अध्ययन किया और यूरेनियम से हो रहे उनके सेहत के दुष्प्रभाव को वैश्विक पटल पर रखा। परमाणु वार के खिलाफ हमने हिरोशिमा में भी कार्यक्रम किए। पटना इफ्टा का अध्यक्ष रहा हूं , पटना लिटरेरी फेस्टिवल का भी में अध्यक्ष हूं। कई अन्य सांस्कृतिक संस्थाओं को मैं मदद करता रहा हूं।
स्वामी सहजानंद सरस्वती मेडिकल कॉलेज जल्द
बिहार में अब भी डॉक्टर और नर्स की कमी है यहां डॉक्टर और  नर्स की और अधिक जरुरत है।‌
हम पटना के नौबतपुर में स्वामी सहजानंद सरस्वती मेडिकल कॉलेज स्थापित करने की मुहिम में जुटे हैं यहां 700 बेड का अत्याधुनिक अस्पताल होगा। विकासशील देश में शिक्षित लोगों की यह जिम्मेदारी है कि वे ईमानदारी से सत्य के साथ समाज के रचनात्मक काम में भागीदार बनें।
नौजवान डॉक्टरों से अपील 
वे नौजवान डॉक्टर को सलाह देते हुए कहते हैं कि आप अपने डॉक्टर मित्रों के साथ मिलकर मल्टीस्पेशलिटी अस्पताल खुद बनाएं और मैनेज करें। हम जिस समाज में है उसी के औसत आमदनी के अनुरूप सेवा का पैसा लें। हर देश के लोगों की औसत आमदनी अलग-अलग है पर हर देश को एक ही तरह की बेहतर स्वास्थ्य सेवा की जरूरत है।
रूबन कारपोरेट नहीं अपना ब्रांड 
रूबन कार्पोरेट हॉस्पिटल नहीं है यह बिहार का अपना ब्रांड है। हमने अब तक हजारों लोगों को सेवाएं दी है। उनका विश्वास कायम किया है। आने वाले दिनों में हम इसे और भी प्रभावशाली बनाएंगे। हम हमेशा तकनीक, सहानुभूति और सेवा को साथ लेकर चलते हैं।
वहीं व्यक्ति दूसरों को खुशी दे सकता है जो पहले खुद को खुश करे। बदलाव प्रकृति का नियम है। हमें परंपरा और संस्कृति को साथ लेकर चलना होगा। इस विचार को बल देने की जरूरत है कि आप खुद की उन्नति के साथ सबकी उन्नति के वाहक भी है। मन में सबकी प्रगति का भाव रचा – बसा रहना चाहिए। 
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सूई धागे से महिलाएं गढ़ रही किस्मत, ‘किशनगंज’ से ‘सिंगापुर’  पहुंचा इनके हाथों बनाया खेता आर्ट , 

बिहार के सीमांचल का जिला किशनगंज, इसकी पहचान चाय बागानों से तो है हीं, यह कई संस्कृतियों की संगम भूमि भी है । संस्कृतियों के इस संगम को और चटखदार करती है यहां के शेरशाहबादी समूदाय के महिलाओं की अनोखी कढ़ाई ‘ खेता कला ‘ । पीढ़ियों के संजोए खेता कला के हुनर से अब किशनगंज को एक कलात्मक पहचान मिलने लगी है। खेता कढ़ाई से बनी सामग्रियों
की मांग कैसे दुनिया भर में होने लगी  और कैसे इससे संवर रहा है इन महिलाओं का जीवन, पढ़ें यह कहानी 

हम किशनगंज  शहर से  अर्राबाड़ी  गांव जा रहे। यह गांव यहां से करीब 18 किलोमीटर की दूरी पर है। कुछ दूर बढ़ते ही हमें हरे- हरे चाय के बागान दिखने लगे। जाड़े की सुनहरी धूप में चाय की पत्तियां खिलखिला रहीं थीं। बड़े चाय बागानों में बीच- बीच में कसैली के पेड़ सीना ताने खड़े हैं। किनारे बहती नदी की जलधारा इस इलाके को और उर्वर करती है। कुछ ही देर में हम अर्राबाड़ी  गांव पहुंच गए।

आंखों में चमक और  तेज चलते हाथ 

पक्की सड़क के ठीक बगल में बसे इस गांव के मुहाने पर एक छोटे से टीन के खुले शेड में झुर्रिदार हथेलियां सूई धागे- थाम फुर्ती और संजीदगी से कपड़ों के तह पर बारिक खुबसूरत डिजाइन गढ़ रही हैं।  53 साल की सलमा खातून  हैं।   इन्हें खेता आर्ट के द्वारा एक चादर तैयार करने का आर्डर मिला है।  सलमा की बूढ़ी आंखें चमक रही हैं और  हाथ मशीन से भी तेज चल, कपड़े की परतों पर डिजाइन गढ़ रहे हैं।

 सलमा यहां अकेली नहीं हैं ।आसपास के गांव की लगभग तीस  शेरशाहबादी समूदाय की महिलाएं यहां अपने- अपने असाइनमेंट  बनाने में मगन है। सभी अलग -अलग उम्र की हैं।
किसी ने लाल और कत्थई रंग के धागों से बर्फीकार डिजाइन उकेरा है तो किसी ने गहरे हरे धागे से कोणीय पैटर्न।
पहली नजर में ही ये डिजाइन हमारी आंखों को  इतने भा जाते हैं कि हम इसकी कीमत पूछते हैं।   उत्तर मिलता है 15 हजार कम से कम।
एक चादर की कीमत 15 हजार! यह कीमत हमें थोड़ी चौकाती है! पास खड़े असराफुल बताते है कि यह कीमत हमें आसानी से मिल जाती है। निर्यातक इससे भी महंगे दामों पर इसे बेचते हैं।
अब इस आर्ट को समझने- जानने की हमारी बैचैनी और बढ़ गई है। हम खेता कढ़ाई कला का इतिहास और इसके वैश्विक मंच तक पहुंचने की कहानी जानना चाहते थे।
मैंने पति को मक्के की खेती के लिए पैसे दिए 
हम गांव के अंदर एक घर में दाखिल होते हैं। फूस और कच्ची मिट्टी से बने घर के आंगन में  बैठी  हाजरा खातून दोनों हाथों  से खेता कढ़ाई में लगी है। हमें  देख वे रूकती हैं। पास रखें मचिया हमारी और बढ़ाते हुए वो हमें बैठने का इशारा करती है।  टूटी -फूटी हिंदी में बात करते हुए वह गर्व से बताती है कि
इस बार मक्के की खेती के लिए जब पति के पैसे कम पड़ गए तो उसने इस आर्ट से कमाए पैसे पति को दिए। वे आगे कहती हैं कि मैं इस कढ़ाई से हर माह लगभग पांच से सात हजार तक कमा ले रही हूं।
मेरे पति खेती करते हैं। पहले सिर्फ उनकी कमाई से परिवार चलता था अब मैं भी कमा रही, वह भी घर का काम निपटाने के बाद। मैं हर रोज सुबह और शाम दो घंटे खेता कढ़ाई करती हूं, वह भी अपने घर में ही बैठकर।
क्या है खेता कढ़ाई कला ?
खेता कला बिहार के   किशनगंज जिले में शेरशाहबादी समुदाय की महिलाओं द्वारा की जाने वाली एक प्राचीन कढ़ाई कला है। इसमें मुख्य रूप से कपड़ों की परतों पर विशिष्ट शैली में ग्रामीण जीवन से संबंधित चित्र सूई -धागों की कढ़ाई द्वारा बनाए जाते हैं। इस कला में  पहले कपड़ों को एक के उपर रख परतें बनाई जाती है, फिर इन परतों  पर  हाथ से  बारिक सिलाई की जाती है। ये सिलाई इस तरह से होती है कि इनपर खास पैटर्न की डिजाइन उभर आती है।
खेता कला में खास ज्यामितीय पैटर्न
खेता कढ़ाई कला द्वारा एक साथ सिलकर बनाई जाने वाली चादरें और रिवर्सिबल रजाई भी शामिल है। इन सब में  एक खास  ज्यामितीय पैटर्न देखने को मिलता है। यह पैटर्न   इसकी खुबसूरती ओर मजबूती को बढ़ा देता है।
इस कला में मुख्य रूप से खेत, नदी, पक्षी, मछली, पत्ते आदि के डिज़ाइन होते हैं। डिजाइन के लिए लगे टांकों की खासियत है कि वे बहुत महीन और दोहराव आधारित होते हैं।  एक छोटा  टेबल क्लॉथ  बनाने में भी कई दिनों के वक्त और एकाग्रता की जरूरत पड़ती है।
असराफुल हक
सौ साल पुरानी चादर, जस की तस 
 खेता कला के व्यवसाय से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले असराफुल हक  हमें अपनी मां के बक्से से एक पुराना चादर लाकर हमें दिखाते हैं। इसे वे कई बड़े एक्जीबिशन में भी दिखा चुके हैं। वे बताते हैं कि इसे मेरी मां को उनकी मां (मेरी नानी) ने दिया था और  नानी को उनकी मां ने। इससे ही इसकी अंदाजा लग जाएगा कि यह सौ साल से ज्यादा पुराना है। इस चादर की चमक अब भी बरकरार है। वे इसके दूसरी तरफ का हिस्सा दिखाते हुए कहते हैं कि इसमें सामने की ओर दूसरा कपड़ा लगा है और पीछे दूसरा। सामने की ओर एक पैच जिसे भी सिलकर डिजाइन में बदला गया है को दिखाकर  असराफुल  हक हमें बताते हैं कि दरअसल इसे पहले घर के पुराने, बचे कपड़ों को जोड़कर बनाया जाता था।
कहीं कपड़ा फटा हो तो उसके उपर पैच लगा सिलाई कर उसे भी डिजाइन में बदल दिया जाता था। इसे विरासत के तौर पर एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी को सौंपती थी। दूल्हन के शादी के वक्त मां अपने मिले चादर को अपनी बेटी को सौंपती है। इसे हमारे समाज में एक मूल्यवान संपत्ति की तरह देखते हैं।
मान्यता यह है कि इससे घर में समृद्ध आती है। वे हमसे कहते हैं कि अब तक जो रिसर्च हुए हैं उनमें यही अनुमान लगता है कि यह  कला लगभग 150 वर्ष से पुरानी  है।
यह सिर्फ हमारे समुदाय की महिलाएं ही बनाती हैं।
जानकार बताते हैं कि किशनगंज पहले अविभाजित बंगाल का हिस्सा था। इसलिए इस कला पर बंगाल की कांथा कढ़ाई का  प्रभाव भी  है।  इसमें असम की ज्यामितीय कढ़ाई की झलक भी मिलती है।  बिहार की सुजनी  कला से भी इसे छोड़कर देखा जा सकता है वहां भी कपड़े की परतों का इस्तेमाल होता है।
सीखने का कोई औपचारिक तरीका नहीं
कला की सबसे खास बात यह है कि इसे सीखने का कोई औपचारिक तरीका नहीं है। न कोई किताब, न कोई स्कूल। मां अपनी बेटी को सिखाती है, दादी अपनी पोती को। शादी-ब्याह, पर्व-त्योहार और पारिवारिक आयोजनों के लिए बनाए जाने वाले कपड़ों के साथ-साथ यह कला पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती रही है।
विदेशों तक बनी पहुंच 
आज खेता कला द्वारा उत्पादित वस्तुएं देश ही नहीं विदेशों तक पहुंच रही हैं।  असराफुल कहते हैं कि हमने देश के साथ विदेशों के एग्जीबिशन में खेता कला की प्रदर्शनी लगाई है। आज हमारे साथ कई निर्यातक जुड़े हैं। वे हमसे उत्पाद खरीदते हैं और उसे विदेशों में बेचते हैं। हाल ही में यहां की महिलाओं ने  सिंगापुर के लिए एक रजाई बनाई थी।
ऐसी मिली पहचान 
इस कला को पहचान देने की अहम कड़ी में तजगारा खातून   का नाम भी जुड़ा है। आज वह मास्टर ट्रेनर के तौर पर महिलाओं को इस कला के से जुड़ने लिए उत्साहित करती हैं। दरअसल किस्सा यूं है कि असराफुल  एक स्वयंसेवी संगठन द्वारा एक स्कूल का संचालन किया करते थे। एक रोज संस्था के अधिकारी स्कूल की जांच करने आए। पास ही उनकी मां तजगारा खेता आर्ट की चादर बना रही थी। उन अधिकारी की नजर उस पर गई। उन्हें इसमें संभावना नजर आई। कुछ सेंपल लेने के बाद वे दिल्ली लौट गए। फिर वहां अपने एक दोस्त से इसका जिक्र किया जिनकी  संस्था वस्त्र मंत्रालय के साथ काम करती थी। फिर मंत्रालय में यह सेंपल दिखाया गया। मंत्रालय ने मदद की और गैर-सरकारी संगठन के सहयोग से दिल्ली के एग्जीबिशन में खेता आर्ट को मिल गई जगह। यही से शुरू हो गई इस आर्ट के गुमनामी से निकल पहचान बनाने की कहानी।
आसान नहीं रहा सफर 
तजगारा बताती हैं कि महिलाओं को जोड़कर समूह बनाना आसान नहीं था। शुरू में किसी को यकीन ही नहीं होता था कि इससे पैसे भी कमाएं जा सकते हैं। जब मेरे बेटे ने इसकी पहल शुरू की तो काफी विरोध  हुआ। उसके पिता ने भी जमकर विरोध किया। दरअसल सब  इसे महिलाओं का काम मानते थे और मेरे पति को लगता कि बेटा इन सब के फेर में पड़कर अपना भविष्य चौपट कर रहा। मैंने उसका साथ दिया आज हमरा समाज उसकी तारीफ करता है।
जिला प्रशासन चाहता है इसे ब्रांड बनाना
हम खेता आर्ट के बारे में अब  बहुत कुछ जान समझ चुके थे। अब हम इसे लेकर जिला प्रशासन का पक्ष जानना चाहते थे, इसके लिए हमने  किसनगंज के जिला पदाधिकारी विशाल राज से बातचीत की। वे इस कला को लेकर काफी सकारात्मक और उत्साहित दिखे। जिला पदाधिकारी विशाल राज  कहते हैं कि
“हम पूरी ऊर्जा से कोशिश कर रहे हैं कि खेता कला को मजबूत वैश्विक पहचान मिले। इसके लिए मार्केटिंग एक अहम हिस्सा है, हमने इसके लिए योजनाएं बनाई हैं, हमारा यह प्रयास है कि इसे ब्रांड के तौर पर उभारा जाए।”
विशाल राज, जिला पदाधिकारी, किशनगंज thebigpost.com से बात करते हुए
वे आगे कहते हैं कि जो लोग इस खेता कढ़ाई कला से जुड़े हुए हैं जिला प्रशासन की कोशिश रहेगी कि उन्हें इसका बेहतर आर्थिक लाभ मिल सके।
“आज ऑनलाइन  बाजार का जमाना काफी तेजी से बढ़ रहा है इस आर्ट को आनलाइन बाजारों से जोड़ने पर भी काम चल रहा है।हम नई पीढ़ी को इस कला से जोड़ने की पहल भी जल्द शुरू करने वाले हैं। हम चाहते हैं कि आने वाले समय में खेता आर्ट को लेकर नई पीढ़ी में गर्व का भाव हो।”
बांटी गई सिलाई मशीन 
  किशनगंज के उद्योग केन्द्र के महाप्रबंधक अनिल कुमार मंडल   thebigpost.com से कहते हैं कि हमने इस कला से जुड़ी महिलाओं के बीच सिलाई मशीनें बांटीं है। वैसे तो यह कला हाथों से की जाती है पर सिलाई मशीन से कपड़े को जोड़ने का काम कम वक्त में किया जा सकता है। इस कला को उद्योग के रूप में विकसित होने की पूरी संभावना है।
अनिल कुमार मंडल, महाप्रबंधक, उद्योग केन्द्र, किशनगंज
जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी प्रहलाद कुमार    कहते हैं “हमारे जिला पदाधिकारी भी इस कला व्यापक पहचान दिलाने में काफी रूचि ले रहे हैं।
प्रहलाद कुमार, जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी
कला संस्कृति विभाग की तरफ से हम इसके प्रचार हेतु कुछ खास आयोजन करने पर विचार कर रहे हैं। इस आयोजन में कलाकारों का सम्मान और इस कला को आम लोगों के बीच प्रचारित करने की कोशिश होगी।”
कुंदन कुमार सिंह, जिला सूचना जनसंपर्क अधिकारी, किशनगंज
डिजिटल और अन्य समाचार माध्यमों द्वारा इस कला का प्रचार प्रसार के बारे में जिले के सूचना जनसंपर्क अधिकारी कुंदन  सिंह कहते हैं हम समय समय पर डिजिटल माध्यमों पर इस आर्ट को प्रचारित करने का कार्य कर रहें हैं। इस कला को लेकर लोगों के बीच काफी जागरूकता आई है।
बहरहाल जिंदगी तमाम  गिले- शिकवे से बेपरवाह रंग बिरंगे तागों से रंग बिरंगे कपड़ों के टूकडों पर कभी  नदी – तो कभी पंछियों को  धागों से आकार देती इन शेरशाहबादी महिलाओं के आंखों में उम्मीद का रंग साफ दिखता है, इन्हें हौसला है कि  इनके इस हुनर को एक दिन दुनिया भर में मजबूत पहचान जरूर मिलेगी।  
( इस कहानी को वरिष्ठ फिल्म निर्माता राजेश राज के साथ विवेक चंद्र ने कवर किया है। thebigpost.com की कोशिश समाज की सकारात्मक कहानियों को सामने लाने की है। आप हमें आर्थिक सहयोग कर इस मुहिम को मजबूती दे सकते हैं।  हमारा संपर्क सूत्र: 7488413830 )
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आपके दिल में भी रहता है एक ‘सेंटा’ महसूस कीजिए उसे

लाल ड्रेस, सफेद दाढ़ी और उड़ता हुआ रथ—सेंटा क्लॉज सिर्फ एक किरदार नहीं, बल्कि बचपन की सबसे खूबसूरत भावना है।  आज  के  बढ़ते एकाकीपन के दौर में हमारे अंदर छुपे ‘सेंटा’ की तलाश करता यह आलेख 

ठंडी सर्द रात… खामोश आसमान… और दूर कहीं घंटियों की मधुर-सी आवाज़। बच्चों की आंखें नींद में होते हुए भी किसी अनकहे इंतज़ार में चमकती हैं। लाल रंग की पोशाक, सफेद घनी दाढ़ी, चेहरे पर सुकून भरी मुस्कान, कंधे पर उपहारों की थैली और रेनडियरों द्वारा खींचा गया उड़ता हुआ रथ—सेंटा क्लॉज की यह छवि सिर्फ एक कहानी नहीं, बल्कि बचपन की सबसे सुरक्षित और सुंदर भावना है। यह वह एहसास है, जिसमें डर नहीं, सिर्फ भरोसा है; जिसमें स्वार्थ नहीं, सिर्फ प्यार है।

संत निकोलस बने सेंटा 

सेंटा क्लॉज का इतिहास चौथी सदी के संत निकोलस से जुड़ा माना जाता है। संत निकोलस अपनी दयालुता और जरूरतमंद बच्चों की गुप्त मदद के लिए प्रसिद्ध थे। वे बिना नाम बताए, बिना किसी अपेक्षा के, बच्चों और गरीब परिवारों के लिए उपहार और सहायता छोड़ जाया करते थे। समय के साथ यही निस्वार्थ भावना लोककथाओं में ढलती गई और संत निकोलस, सेंटा क्लॉज बन गए—एक ऐसा पात्र, जो देना जानता है, जताना नहीं।

लाल ड्रेस क्यों पहनते हैं सेंटा 

समय बदला, देशों की सीमाएं बदलीं, लेकिन सेंटा का संदेश नहीं बदला। लाल ड्रेस गर्मजोशी और अपनापन है, सफेद दाढ़ी अनुभव और करुणा का प्रतीक है, और उड़ता हुआ रथ यह बताता है कि अच्छाई किसी दीवार या दूरी को नहीं मानती। रेनडियर उस सहयोग का प्रतीक हैं, जो खुशी की यात्रा में बिना थके साथ चलते हैं।

गिफ्ट में छुपी मुस्कान 

सेंटा क्लॉज द्वारा गिफ्ट बांटना सिर्फ खिलौनों तक सीमित नहीं है। यह बच्चों के मन में यह विश्वास जगाता है कि उनकी अच्छाई देखी जाती है, कि कोई है जो उन्हें खास मानता है। सेंटा सिखाता है कि किसी को खुश करने के लिए बहुत बड़ा होना जरूरी नहीं—कभी-कभी एक छोटा-सा तोहफा या एक सच्ची मुस्कान किसी का पूरा बचपन रोशन कर सकती है।
सेंटा का बच्चों से प्रेम हमें यह याद दिलाता है कि बच्चे सिर्फ भविष्य नहीं, बल्कि हमारा वर्तमान भी हैं। उनकी मासूम हंसी, उनके सवाल और उनके सपने दुनिया को बेहतर बनाने की ताकत रखते हैं। आज जब बचपन मोबाइल स्क्रीन और प्रतिस्पर्धा के दबाव में सिमटता जा रहा है, सेंटा क्लॉज की कहानी हमें मानवीय मूल्यों की ओर लौटने का संदेश देती है।

अपने भीतर के सेंटा को जगा लें

सेंटा क्लॉज किसी एक धर्म या देश तक सीमित नहीं है। वह एक विचार है—बिना शर्त देने का, बच्चों को समझने का और उनकी आंखों में उम्मीद ज़िंदा रखने का।

अगर हर बड़ा अपने भीतर का थोड़ा-सा सेंटा जगा ले, तो शायद हर बच्चा यह महसूस कर सके कि दुनिया अब भी एक खूबसूरत और सुरक्षित जगह है।

 

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“सर्वे भवन्तु सुखिनः ”  को आत्मसात करते हुए संपन्न हुआ संत माइकल्स हाई स्कूल , पटना का 51वाँ वार्षिक खेल-कूद महोत्सव

आंखों में जीत का सपना, नजर लक्ष्य पर, कड़ा अनुशासन और मन में ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ का राग ले जब खिलाड़ी मैदान में उतरे तो जाड़े की नर्म धूप और सिंदूरी हो दर्शकों की तालियों पर खिलखिलाने लगी। आम और खास सभी एक हो खेल और खिलाड़ियों की धुन में खो गए। बीच-बीच में गूंजतीं तालियां इस महोत्सव को और भी गुलजार कर देती। मौका था ‘संत माइकल्स हाई स्कूल’ पटना के विशाल खेल मैदान में आज 51वाँ वार्षिक खेल-कूद महोत्सव 2025 का। एक रिपोर्ट पढ़िए…

‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ के आदर्श वाक्य को आत्मसात करते हुए सेंट माइकल्स हाई स्कूल, पटना के विशाल खेल मैदान में आज 51वाँ वार्षिक खेल-कूद महोत्सव 2025 भव्यता, उत्साह और अनुशासन के उत्कृष्ट संगम के साथ आयोजित हुआ। लगभग 3,500 विद्यार्थियों की अप्रतिम भागीदारी और हजारों अभिभावकों एवं दर्शकों की गरिमामयी उपस्थिति ने पूरा वातावरण उत्साह, ऊर्जा, सौहार्द और उमंग से भर दिया।

इन विशेष अतिथियों रही उपस्थिति 

कार्यक्रम की शोभा बढ़ाने हेतु बतौर मुख्य अतिथि माननीय न्यायमूर्ति सत्यव्रत वर्मा (पटना उच्च न्यायालय) उपस्थित रहे।
विशिष्ट अतिथि के तौर पर
आईएएस: श्री कुमार रवि, श्री हिमांशु शर्मा, श्री यशपाल मीणा, श्री शेखर आनंद
आईपीएस: श्री कार्तिकय शर्मा, श्री रवि रंजन की उपस्थिति रही।सभी  विशिष्ट अतिथियों ने प्रतिभागियों के उत्साहवर्धन हेतु प्रेरक संबोधन भी दिया।

प्रधानाचार्य फादर ए. क्रिस्तु सावरिराजन एस.जे. ने सभी अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि 

खेल न केवल शरीर को मजबूत बनाते हैं, बल्कि नेतृत्व, अनुशासन, साहस और टीमवर्क जैसी अमूल्य जीवन-सीख भी प्रदान करते हैं।”

ऐसा रहा उद्घाटन समारोह का क्षण

कार्यक्रम की शुरुआत टॉर्च रिले, ध्वजारोहण, भव्य मार्च-पास्ट, और एथलीट ओथ के साथ हुई।
मार्च-पास्ट का नेतृत्व वैभव आर्य (रेड), इशिका हरलालका (ग्रीन), शिवानी राज (गोल्ड) और प्रज्ञान (ब्लू) ने किया।
स्कूल कैप्टन मिशेल स्कारलेट जे को ध्वज सौंपा गया।

रंगारंग प्रस्तुतियों ने जीता दर्शकों का दिल

स्कूल के नन्हे-मुन्ने और वरिष्ठ विद्यार्थियों द्वारा प्रस्तुत—
जुम्बा डांस, Hues of Love, Butterfly Blooms & Hoops Delight, Flower Dance,
Stars of Unity Drill, कराटे और योग प्रदर्शन किया ।   प्रस्तुति के दौरान  तालियों की गूँज के बीच समानता और सौहार्द का अद्भुत संदेश फिजा में गूंज गया।

ये रही मुख्य खेल स्पर्धाएँ

रोमांच से भरी स्पर्धाओं में शामिल रहे:
100 मीटर, 75 मीटर स्प्रिंट
4×100 मीटर रिले
बाधा दौड़
800 एवं 1000 मीटर साइकिल रेस
टग ऑफ वॉर जिसमें खिलाड़ियों का जोश चरम पर पहुँचा।

एक नज़र प्रतियोगिता के परिणाम पर 

🏆 टीम चैंपियन — रेड हाउस | 528 अंक
🥈 ब्लू हाउस — 478
🥉 ग्रीन हाउस — 471
🏅 गोल्ड हाउस — 458

बेस्ट एथलीट – मुख्य वर्ग
सब-जूनियर (Boy): आदित्य राज | (Girl): नित्या अदिति
जूनियर (Boy): सौरभ कुमार | (Girl): आरात्रिका सिन्हा
इंटर (Boy): अरहम आसिफ | (Girl): ज्ञानवी
सीनियर (Boy): एबिल सुजन एवं शाश्वत वैभव आर्य | (Girl): अनिशा तिर्की

राष्ट्रीय गान के साथ हुआ समापन 

पुरस्कार वितरण, राष्ट्रीय गान और धन्यवाद प्रस्ताव (डॉ. मारी डिक्रूज़) के साथ कार्यक्रम गरिमामय तरीके से संपन्न हुआ।

मुख्य अतिथि ने विद्यार्थियों को संदेश दिया—
“जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलता का मूल मंत्र है— खेल भावना, टीमवर्क और निरंतर प्रयास।”

इस मौके पर विद्यालय के प्रधानाचार्य फादर ए. क्रिस्तु सावरिराजन ने कहा कि

सर्वे भवन्तु सुखिनः — यह महोत्सव सद्भाव, अनुशासन और एकता की भावना को सदैव प्रज्वलित रखे।”

यह खेल पर्व केवल पदकों की प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण, नेतृत्व क्षमता, भाईचारा और अनुशासन का उत्सव बनकर सभी के हृदय में अमिट छाप छोड़ गया।

 

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चटखदार ‘अचार’ की मजेदार कहानी ,आज जान ही लीजिए

सुबह के नाश्ते का गर्मागर्म पराठा हो या फिर लंच के चावल दाल की थाली, जबतक अचार का चटखारा न हो सभी जायकों का स्वाद फीका- फीका लगता है। अचार आ जाए तो भूख और खाने की स्पीड दोनों बढ़ जाती है।
हर भारतीय रसोई में एक कोना होता है — जहाँ धूप में सूखते हुए अचार के जार चमकते हैं। उनके भीतर सिर्फ मसाले नहीं, बल्कि पीढ़ियों की यादें, परंपराएँ और ममता सिमटी होती है। अचार, यानी स्वाद का वो खजाना जो भोजन को बनाता है संपूर्ण। तो चलिए आज इस चटखदार अचार की कहानी जानते हैं। यह पहली बार  कहां बना और कैसे यह हम भारतीय की थाली से लेकर दिल तक को चटखदार बना, कर रहा है उसपर राज…

सबसे पहली बार अचार यहां बना था

अचार बनाने की परंपरा लगभग चार से पाँच हज़ार साल पुरानी  है। इतिहासकार मानते हैं कि इसका आरंभ  मेसोपोटामिया (आज का इराक क्षेत्र)  में हुआ, जब लोगों ने पहली बार सब्ज़ियों और फलों को नमक में डालकर लंबे समय तक सुरक्षित रखने की कला खोजी। वहीं से यह ज्ञान मिस्र, यूनान और फिर भारत तक पहुँचा।

भारत में अचार की कहानी

भारत में अचार का ज़िक्र  वैदिक ग्रंथों  में मिलता है। संस्कृत में इसे “आचार्यक”  कहा गया, और आयुर्वेद ने इसे पाचनशक्ति बढ़ाने वाला औषधीय आहार  बताया। नींबू, अदरक, आम और लहसुन के अचार को औषधियों में गिना गया। अचार सिर्फ भोजन का साथी नहीं था, बल्कि स्वास्थ्य और स्वाद का मेल था।

मुगल दरबार से आम घरों तक

मुगल काल में अचार ने शाही व्यंजन  का रूप लिया। अकबर, जहाँगीर और शाहजहाँ के दौर में  केसर, सिरका और मसालों से बने विदेशी अचार महलों की थालियों में परोसे जाते थे। धीरे-धीरे यह कला आम लोगों तक पहुँची, और हर प्रांत ने अपने मौसम और स्वाद के अनुसार अचार को नया रूप दिया। बिहार और उत्तर प्रदेश के गाँवों में आज भी गर्मी के दिनों में आम के अचार की खुशबू घर-आँगन में फैलती है।

मौसम, माँ और मिट्टी के बर्तन

भारतीय परिवारों में अचार बनाना एक संस्कार जैसा काम रहा है। मिट्टी के घड़ों में अचार डालकर धूप में पकाया जाता — हर दिन उसे उलट-पुलट कर धूप दिखाना एक अनुष्ठान बन जाता था। गर्मियों में आम का अचार, सर्दियों में गाजर-गोभी-शलगम का, और बरसात में नींबू या हरी मिर्च का — हर मौसम का अपना स्वाद।

दुनिया के अचार भी रोचक हैं 

– जापान में “त्सुकेमोनो

– चीन में “पाओकाई

– यूरोप में “gherkin pickle”

– और अमेरिका में “dill pickle” हर देश ने अपने तरीके से अचार को अपनाया — ताकि मौसम बदलने पर भी स्वाद बरकरार रहे।

अचार का आधुनिक रूप

आज अचार सिर्फ घरों में नहीं, बल्कि बड़े उद्योगों और निर्यात का हिस्सा बन चुका है। भारतीय अचार — खासकर आम, नींबू और लहसुन — अब अमेरिका, यूरोप और मध्यपूर्व में भी भारतीय स्वाद का दूत बन चुके हैं।


अचार की सीख भी सीख लीजिए 

अचार सिर्फ स्वाद नहीं, समय और संवेदना का प्रतीक है। यह सिखाता है कि —

“हर चीज़ को समय के साथ बदलने दो, बस उसमें थोड़ा धैर्य का नमक,  और बहुत सारा प्यार डाल दो — वही जिंदगी का असली स्वाद है।”

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…इत्ता सा टुकड़ा चांद का

कभी रात के आसमान में नज़र डालिए — चांद हर रात पूरा नहीं होता। कभी आधा, कभी चौथाई, कभी बस इत्ता सा टुकड़ा। फिर भी उसकी चमक कम नहीं होती। वो हर रूप में सुंदर लगता है, क्योंकि वो जानता है कि “अधूरापन भी अपनी जगह खूबसूरत होता है।

 

ज़िंदगी भी कुछ ऐसी ही है। हमें हमेशा लगता है कि कुछ और चाहिए — थोड़ा और पैसा, थोड़ा और नाम, थोड़ा और प्यार, थोड़ा और वक्त। लेकिन इस “थोड़ा और” की दौड़ में हम “जो है” उसे जीना भूल जाते हैं।

जो है, वही सबसे सुंदर है

हम अक्सर सोचते हैं कि हमारी ज़िंदगी अधूरी है, लेकिन शायद यही अधूरापन हमें इंसान बनाता है। सोचिए — जिस फूल में कांटे न हों, वो कितनी जल्दी मुरझा जाएगा। हमारी परेशानियाँ, हमारी छोटी खुशियाँ, हमारी सीमाएँ — यही हमारी पहचान हैं।

कई बार हमारे पास जो कुछ है, वही किसी और का सपना होता है। आपका घर, आपकी नौकरी, आपकी मुस्कान — किसी और के लिए खुदा की सबसे बड़ी दुआ हो सकती है। फिर क्यों हम शिकायतों में वक्त गँवाएँ, जब हमारे पास आभारी होने की इतनी वजहें हैं?

संतोष हार नहीं, समझ है

संतोष का मतलब ये नहीं कि आप आगे बढ़ना छोड़ दें। इसका अर्थ है — कदम बढ़ाते हुए भी मन को शांति में रखना। क्योंकि जो व्यक्ति हर हाल में मुस्कराना जानता है, उसे कोई भी हालात छोटा नहीं कर सकते।

ज़रा सोचिए — जब चांद अधूरा होता है, तब भी आसमान उसी का होता है। जब आप थोड़े परेशान होते हैं, तब भी ज़िंदगी आपकी होती है। बस फर्क इतना है कि चांद अपनी चमक नहीं छोड़ता… तो फिर हम क्यों छोड़ें?

खुशी तलाशनी नहीं, महसूस करनी  है

खुशी किसी मंज़िल का नाम नहीं, वो तो हर रोज़ के छोटे-छोटे पलों में छिपी होती है। सुबह की एक गर्म चाय, किसी बच्चे की हँसी, किसी पुराने दोस्त का संदेश, या अपने माता-पिता की आंखों की चमक — यही तो वो छोटे टुकड़े हैं, जिनसे मिलकर *पूरा चांद* बनता है।

अगर हम हर दिन इन छोटी-छोटी खुशियों को महसूस करने लगें, तो ज़िंदगी हमें किसी बड़ी सफलता से भी ज़्यादा संतोष दे जाएगी।

और अंत में…

अगली बार जब आसमान में चांद अधूरा दिखे, तो शिकायत मत कीजिए। बस मुस्कराइए और सोचिए — “इत्ता सा टुकड़ा चांद का भी कितना खूबसूरत है। क्योंकि शायद उसी टुकड़े में आपकी ज़िंदगी की पूरी रोशनी छिपी हो।

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रेत सी फिसलती जिंदगी में ‘मन की उलझन’ सुलझा, ‘All Is Well’ का तराना भरने वाली डॉ. बिन्दा की कहानी

वे खामोश  होंठों को मुस्कुराना सिखातीं है, नम आंखों में भरतीं हैं जिंदगी के ख्वाब। टूटे हुए दिल में सजा देतीं हैं उम्मीद। अब तक जीवन से मायूस हजारों लोगों को निराशा के भंवर से निकला आशा का उजास भर, जीवन से प्यार करने का हुनर सिखलाया है। कहानी, उम्र की बंदिशों को bye  कह , समय और समाज के दिल में Love you zindagi का सुर और साज सजाने वाली। जानी-मानी क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट

डॉ. बिन्दा सिंह की…

हम  पटना में हैं, पटना एक ऐतिहासिक शहर जो इन दिनों महानगर बनने दौड़ लगा रहा है। शाम का वक्त है। ट्रेफिक के शोर के बीच हम शहर के प्रसिद्ध बोरिंग रोड स्थित डॉ. बिन्दा सिंह के आवास की ओर बढ़ते हैं। बड़े से गेट के बाहर नेम प्लेट लगा है। इतने में गार्ड गेट खोलता है और हम अंदर दाखिल होते हैं। यह डॉक्टर बिन्दा सिंह का घर है और क्लीनिक भी। हम अपनी नजरें इधर उधर दौड़ाने की कोशिश करें इससे पहले ही दरवाजा खुलता है और दो मरीज (शायद वे पति-पत्नी) हों बाहर आते हैं। डॉ.बिन्दा खुद उन्हें छोड़ने बाहर तक आती है। फिर मुस्कुराते हुए हमें अंदर क्लीनिक में आने का इशारा करती है। क्लीनिक बडे़ ही क़रीने से सजा है। सूर्यमुखी के बड़े बड़े फूल खिलखिला रहे हैं। समाने समारोहों में मिलीं ढेरों स्मृति चिन्ह रखें हुए हैं।
डॉक्टर बिन्दा बड़े ही आदरभाव से हमारा सत्कार करतीं हैं।

सूरज मुखी के फ़ूल की तरह उनके चेहरे पर आत्मविश्वास की ताजगी खिलखिला रही हैं। बढती उम्र की सीढ़ियां चढ़ कर भी कोई थकान नहीं, कोई बोझिल पन नहीं, किसी तरूण सा उत्साह उनमें दिखता है।

हमरी बातचीत शुरू होती है। हम उनके बचपन के किस्से जानना चाहते थे। वो हमें बताती हैं

मेरा जन्म बिहार में हुआ। पिताजी श्री लक्ष्मण सिंह  सेना में अधिकारी थे। उनका बराबर तबादला होता रहता। पिताजी के तबादले के साथ ही हम सब भी अपना बोरिया – बिस्तर ले एक शहर से दूसरे शहर शिफ्ट होते रहते। इसी क्रम में देश के कई शहरों को देखने -जानने का मौका मिला।

हम जब तक शहर के मिजाज में अपना मिजाज घोलने की कोशिश करते तब तक पिताजी तबादले का पैगाम ले आते और हम उस शहर के शरबती मिजाज को टाटा -बाय- बाय कह फिर नए शहर से फ्रेंडशिप करने चल पड़ते।

शहर -दर -शहर की आपाधापी के बीच पटना ने मुझे अपना बनाया। कॉलेज की पढ़ाई, से लेकर कॉलेज में पढाना , शादी और करियर सब इसी शहर की आबोहवा में घुल -मिल आकार पाते रहे।

अब तो पटना शहर मेरी हर सांस में उस तरह घुल गया है जैसे बगिया से आती हवा में फूलों की खुशबू।

पिताजी सेना में थे तो घर में सेना वाला अनुशासन शुरू से ही था। सबको हर काम अनुशासन और समय पर करना होता। मां  होरीला सिंह  भी अनुशासन में विश्वास रखती। हम सभी भाई बहन बचपन से ही फौजी परिवार के इस गुण से गुणी हो गए थे। पिताजी और माताजी लड़कियों के आजादी की पक्षधर रहे। हम बहनों और भाइयों के बीच कोई भेदभाव नहीं होता। हमें पूरी आजादी मिली। पढ़ाई लिखाई से लेकर खेलकूद तक।

अपनी बनाई पेंटिंग के साथ डॉ.बिन्दा सिंह

पेंटिंग का शौक

डॉ बिन्दा हमें कुछ पेंटिंग दिखाते हुए बताती है कि मुझे पेंटिंग का शौक बचपन से ही रहा। बचपन में कागज पर चित्र बनाती और उसमें पेंसिल से लाल-पीली -नीले रंग भरती। बढ़ती उम्र के साथ, इस शौक ने कैनवास पर जगह बनायी। मेरी पेंटिंग में अक्सर जिंदगी के रंग आपको देखने को मिलेंगे। अब भी जब वक्त मिलता है मैं रंगों की इस दुनिया में डूब जाती हूं।,

सच कहूं तो रंग ही तो हैं, जो जीवन को चटखदार बनाए रखता है। आप जब भी मायूस हो प्रकृति को निहारिए, हरे भरे पेड़, खुबसूरत फूल और रंग बिरंगी तितलियां और भंवरों का क्रंदन आपमें एक नई उर्जा भर देंगे।

यहां से हुई पढ़ाईं 

वे आगे बताती है कि कॉलेज की मेरी पढ़ाई पटना वूमेंस कॉलेज से हुई। उन दिनों भी यह कॉलेज बिहार का सबसे महत्वपूर्ण कालेजों में से एक था। यहां नामांकन होना और पढ़ना एक गर्व की अनुभूति देता था। मैंने स्नातक के बाद पीजी क्लीनिक साइकोलॉजी में की। फिर पीएचडी किया। पीएचडी के दौरान  पति का काफी सहयोग मिला।

कॉलेज की छात्र राजनीति में इंट्री

पढ़ाई के दौरान हीं कॉलेज की राजनीति में मेरा मन लगने लगा। लीडरशिप क्वालिटी मुझमें बचपन से थी। उसका उपयोग मैंने यहां किया। मैं कॉलेज में कैबिनेट की मेंबर चुनी गईं थीं।

मन में डॉक्टर बनने की चाहत

डॉक्टर बिंदा सिंह कहती हैं कि मन में हमेशा डॉक्टर बनने की चाहत थी। दिक्कत यह कि मेरा मन साइंस सब्जेक्ट में थोड़ा भी नहीं लगता था। मैं जो भी करती उसे दिल से करती। साइंस में मन रमता नहीं था तो आर्ट लेना पड़ा। फिर आगे चलकर मुझे लगा की साइकोलॉजी में मैं अच्छा कर सकती हूं और इससे लोगों की सेवा भी की जा सकेगी। मैंने अपने शोध के दौरान काफी मेहनत किया। मैं मेंटल डिसऑर्डर लोगों के पास जा उनकी केस स्टडी करती। झुग्गियों और मलिन बस्तियों में जा वहां के लोगों का मेंटल हेल्थ देखती। इन सब से मुझे काफी जानकारी मिली ‌ ।

जब बदमाशों ने किया हमला

डॉक्टर बिन्दा हमें एक पुराना वाक्या बताते हुए कहती हैं। पढ़ाई खत्म होने के बाद मैंने पढ़ाना शुरू किया था। उस वक्त पटना के एक नामी कॉलेज में मैं क्लास लेती थी। क्लास में कुछ बदमाश लड़के, क्लास की लड़कियों को परेशान करते। वो उनसे बदतमीजी से पेश आते। जब मुझे यह बात पता चली तो मैंने इसका विरोध किया। इसके बाद क्लास में उनकी गुंडागर्दी बंद हो गई। फिर प्लान बना उन सब ने मुझ पर हमला कर दिया। मुझे चोट आई। यह मामला उन दिनों काफी सुर्खियां में रहा। मैंने अगर हिम्मत दिखा उनका विरोध नहीं किया होता तो उनकी क्लास में उन बदमाशों की मनमर्जी चलती रहती और लड़कियां प्रताड़ित होती रहती।

सम्मान के पल

बाढ़ से मिली सीख 

डॉ बिन्दा सिंह कहती हैं कि हमें पढ़ाई के दौरान पटना  में आयी बाढ़ का मंजर आज भी उसी तरह याद है। तब पटना शहर में बाढ़ का पानी प्रवेश कर गया था। हमारे मकान में भी पानी अंदर चला गया। इससे हम लोगों के कितने ही सामान खराब हो गए। फिर बाढ़ का पानी थमने पर हमने सोफ़ा को धूप में सुखाया। कितनी ही फोटो फ्रेम पानी के कारण खराब हो गई। हम इन्हें धूप में सुखाते और शीशा से भींगा पेपर हटा दूसरा चिपकाते।

इस बाढ़ ने भी हमें काफी कुछ सिखाया। विपदा के बाद आप फिर कैसे श्रृजन करते हैं मैंने बाढ़ से यह सीखा।

मैं यह मानतीं हूं कि बुरा से बुरा लम्हा भी आपको कुछ अच्छी सीख देकर जाता है।

लोग कहते हैं मैं मां पर गई

मैं पढ़ाई के बाद खुद से पैसे भी कमाने लगी थी और इन सब में मेरी मां का काफी अहम योगदान है। मेरी मां काफी प्रोग्रेसिव विचारों वाली महिला थी। मां ने मुझे आगे बढ़ने का खुब हौसला दिया। पीएचडी के दौरान भी मां का समर्थन मिला।

मेरे रिश्तेदार कहते हैं कि मैं मां पर गई हूं। यह मुझे गर्व से भर देता है। मेरे आत्मविश्वास को और मजबूत करता है।

मां ने मुझे हिम्मत न हारने और जमीन से जुड़े रहने की सीख दी। एक मध्यमवर्गीय परिवार के कारण मुझे हर छोटी-छोटी चीजें भी बचपन के दौरान मां ने सीखाया। आज इन सब का असर मेरी कार्यकुशलता पर पड़ता है।

याद खुबसूरत पुराने दिनों की

विशिष्ट बना शादी समारोह

डॉ. बिन्दा सिंह कहती हैं, बचपन बीता, स्कूल लाईफ बीता, फिर कालेज की पढ़ाई पूरी हुई। इन सब के बाद वह वक्त भी आया जो हर लड़की के जीवन में बेहद खास होता है। शादी की बेला। तब की शादियों में आज की तरह प्री-वेडिंग का न तो प्रचलन था, न शादी से पहले आप दुल्हे से दिन रात बतिया सकते थे। व्हाट्सएप्प, सोशल मीडिया तो सोच में भी नहीं था।

फिर एक सामान्य लड़की की तरह मेरी भी शादी तय  हुई। मेरे भी मन में विवाह के सतरंगी सपने आकार ले रहे थे।

मेरी शादी इन्द्र कुमार सिंह, जी के साथ हुई ।वें शासकीय अधिवक्ता थे। मेरे ससुर जी उन दिनों बिहार के अहम राजनीतिक चेहरे थे। इस कारण मेरी शादी बेहद भव्य रही। तात्कालिक मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर, उनके मंत्रिमंडल के सदस्य, जगन्नाथ मिश्रा जी समेत तमाम राजनीतिक हस्तियां मेरी शादी में मौजूद थे। ससुराल भी नौकर चाकरों से भरा। कुछ ही दिनों में मैंने ससुराल में सबका दिल जीत लिया। ससुर जी के कई पार्टी सम्मेलन और चुनाव के दौरान मैंने कई काम भी संभाले। खास तौर पर जब भी हेलिपैड बनाने की जरूरत होती थी तो मुझे इसकी जिम्मेदारी दी जाती। उन दिनों यह सब काफी मुश्किल था। तब मोबाइल का जमाना नहीं था। उस वक्त हमारे घर बिहार के की राजनीतिक हस्तियों का आना- जाना हुआ करता था।

बिता लम्हा : पति स्वर्गीय इन्द्र कुमार सिंह के साथ डॉ. बिन्दा सिंह

जब ससुराल में खोला क्लीनिक

मेरा ससुराल काफी सम्पन्न था , खासतौर पर आर्थिक और सामाजिक रूप से। मेरी नौकरी उन दिनों लेक्चर के रूप में सुंदरवती महिला कालेज भागलपुर में हुई, पर मेरी बेटी काफी छोटी थी, सो मैंने वहां नौकरी छोड़ दी। फिर घर में ही क्लीनिक खोला। शुरू में इक्का-दुक्का पेशेंट आते थे फिर तादाद बढ़ती चली गई।

यादें साथ हैं…

पति के सहयोग रहा अनमोल

जब मैंने अपना क्लीनिक खोलने की बात की तो परिवार में इसके लिए सहमति बना पाना काफी मुश्किल था। पहले तो छोटी बच्ची होने का हवाला दिया गया। फिर कहा गया कि इसकी जरूरत क्या है। पैसे की ऐसी कोई दिक्कत तो है नहीं! इन सब बातों के वावजूद मैंने संकल्प कर लिया था कि मुझे क्लीनिक खोलना है। यह बात मैंने अपने पति को बतायी। उनसे काफी समर्थन मिला। मेरे पति इन्द्र कुमार सिंह वकालत के साथ साथ वें व्यवसाय से भी जुड़े थे। वैसे मैं कहूं तो मैंने आज जो भी काम किया, समाजसेवा कर पायी, इसमें मेरे पति का योगदान काफी अहम रहा है। उन्होंने मेरा हमेशा समर्थन किया, मेरा हौसला बढ़ाया।

कुछ वर्षो पहले उनका निधन हो गया। हमें उनकी कमी हमेशा खलती है। वे मुझे मजबूती देते थे। मेरा उत्साह वर्धन करते थे। जब मेरा कालम अखबारों में छपने लगा तो मुझसे ज्यादा मेरे पति को उसका इंतजार होता। अखबार आते ही वे झट से पन्ना पलट मेरा आलेख पढ़ते फिर मुझे दिखाते। अब इस उत्साह की कमी लगती है।

पति के साथ जीवन के तमाम उतार – चढ़ाव का साथ रहता है। वे बच्चों सा हमेशा उत्साह से भरे रहते थें।
बेटे- बेटियों की पढ़ाई, उनकी शादी सब उन्होंने उसी उत्साह के साथ किया। हर वक्त उनकी यादें मेरे दिल में धड़कती हैं, पर जीवन तो जीना पड़ता है न, भावनाओं को दबा, मन को मजबूत कर।

वो बीते दिन

मीडिया की भूमिका अहम 

वो अखबारों का दौर था। अखबार प्रायः हर घर में सुबह- सबेरे दस्तक देते। खबरिया चैनल उन दिनों धीरे धीरे बढ़ रहे थे। अखबार का तब एक अलग ही सम्मान होता।

सन् 2000 में दैनिक हिन्दुस्तान में मेरा एक कालम शुरू हुआ। नाम था मन की उलझन। यह कालम काफी लोकप्रिय हो गया। इसमें मैं लोगों के सवालों का जबाब देती। बिहार, बंगाल, झारखंड, उड़िसा तमाम जगहों से खत आते। लोग अपने मन की उलझनों का जबाब चाहते थे।

मैं पूरी इमानदारी से इनका जबाब देती। यह कालम लंबे समय तक चला। इसने मुझे देश भर में एक मजबूत पहचान दी।
इसके बाद उस वक्त की प्रसिद्ध पत्रिकाओं में भी अलग-अलग नाम से मेरे कालम आने लगे। इनमें सरिता, सरस सलिल, मुक्ता आदि पत्रिकाएं शामिल थीं। इसके साथ हीं प्रभात खबर में भी मेरा कालम शुरू हुआ।


फिर दूरदर्शन, समाचार चैनल, एफ एम रेडियो पर मेरे ढेरों शो आने लग गए। दैनिक भास्कर जब पटना से प्रारंभ हुआ तो वहां भी मेरे लेख प्रकाशित होने लगे। मीडिया के जरिए लोगों को जागरूक करने की यह पहल अब भी चल रही है। इस
का असर भी दिखता है।

बस खुद से रखें उम्मीद

डॉ बिन्दा कहतीं हैं कि किसी दूसरे से उम्मीद रखना दुख का कारण बनता है। आप खुद अपने आप से उम्मीद रखें। दूसरों से नहीं। दूसरों से उम्मीद रखने पर अंत में निराशा ही हाथ आती है।

पूर्व केंद्रीय मंत्री अश्विनी चौबे और अन्य के साथ डॉ.बिन्दा सिंह

डर के आगे जीत है

डॉ. बिन्दा कहतीं हैं कि सफर रास्ते का हो या फिर जिंदगी का आपको खुद पर यकीन रखना सबसे जरूरी है। अपने अंदर के डर को निकाल फेंकिए। हो सकता है पहली बार सफलता नहीं मिले ऐसे में अपने काम की समीक्षा कर फिर से जुट जाएं। जीत पाने के लिए मन के डर को बाहर निकालना बहुत जरूरी है।

 

ओरिएंटेशन कार्यक्रम के दौरान

आत्मबल मजबूत रखें 

डॉ .बिन्दा सिंह बताती है कि अब तक 200 कॉलेज और 100स्कूलों में ओरियंटेशन कार्यक्रम अपने कार्यक्रम कर चुकी हैं। कई कार्पोरेट दफ्तरों में भी वे लोगों को जागरूक करने जाती रहती है। डॉ बिन्दा बताती है कि इन दिनों फास्ट लाइफ का प्रभाव काफी ज्यादा मेंटल हेल्थ पर पड़ रहा है। अवसाद की समस्या का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है। अब तो बच्चों में भी इसे लेकर परेशानियां बढ़ रही हैं। मेरी कोशिश लोगों को जागरूक करने की होती है। मैं उन्हें यह बताती हूं कि आपका मानसिक स्वास्थ्य बेहतर होना कितना ज़रूरी है, और इसे कैसे दुरूस्त रखा जाए।

कोविड के दौरान भी काउंसिल

डॉ. बिन्दा आगे कहती हैं कि हम सब ने कोरोना जैसी महामारी देखी। इस महामारी ने लोगों की शारीरिक के साथ मानसिक परेशानियां भी दी। मुझे लगा कि इस दौरान लोगों को मानसिक मजबूती की जरूरत है। मैं कोरोना में फ्री काउंसिल देती थी। मैं उस दौरान किसी भी वक्त काउंसिल करने के लिए तैयार रहती थी वह भी निशुल्क।

डॉ. बिन्दा सिंह को समाजिक योगदान के लिए कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों से सम्मानित किया जा चुका है।

मानसिक स्वास्थ्य पर किताबें प्रकाशित

डॉ बिन्दा सिंह के लेख जहां देश के नामी अखबारों में जगह बातें हैं वहीं उनकी कई किताब भी प्रकाशित हो चुकी है। मन की उलझन और डॉक्टर मैं क्या करूं काफी लोकप्रिय हैं। ये किताबें सरल भाषा में मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करती है। डॉ. बिन्दा बताती है कि ग्रामीण इलाकों में भी मेरे किताब के पाठक हैं, खासतौर पर महिलाएं।

थकान मिटा देती, ‘पंखुड़ी’ और ‘कोको’ की नन्ही हंसी

डॉ बिन्दा सिंह कहती हैं मेरे बच्चे मुझे खुब प्यार देते हैं। बेटी सुगंधा सिंह, पूजा सिंह और बेटे संदर्भ सिंह के साथ दामाद  प्रशांत रवि, दीपक,  बहू ऐश्वर्या   के साथ पारिवारिक दुनिया खुशियों के साथ चल रही है। नातिन पंखुड़ी और कोको की नन्हीं हंसी उम्र की सारी थकान मिटा देती है। इन बच्चों को भी मेरा संग- साथ अच्छा लगता है।

पल खुशियों के: परिवार के सदस्यों के साथ डॉ. बिन्दा

फिलवक्त डॉ. बिन्दा सिंह पूरी शिद्दत के साथ समाज में सकारात्मक ऊर्जा भरने की पहल में जुटी है। वो कहती हैं

मेरी कोशिश यह कि निराशा की निशा के बदले उम्मीद वाली भोर की मुलायम सी किरण लोगों के मन में जगह बनाए। लोग हंसते -मुस्कुराते,जिंदगी को गले लगाते हुए , प्यार से प्यारा सा ये गीत गुनगुनाता उठें…
” इत्ती सी हंसी
इत्ती सी खुशी
इत्ता सा टुकड़ा चाँद का,
ख्वाबों के तिनकों से
चल बनाएं आशियाँ!!

हमारी बातचीत खत्म हो चुकी है। हम उसने विदा लेते हैं, हमें एक अनमोल चीज यहां से तोहफे में मिल गई वह है जिंदगी को जीने, समझने और बांटने का खुबसूरत नजरिया….,

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‘डॉक्टर हृदय’ में पिता की स्मृतियां: पढ़ें डॉ. अरुण शाह के मनोभाव

डॉ. अरुण शाह प्रसिद्ध बाल रोग विशेषज्ञ हैं। इसके साथ ही वे समाजसेवा का अलख भी जगा रहे हैं। उम्र की थकान को हमेशा पीछे छोड़ जिंदगी के गीत गाने वाले डॉ. शाह ने अपने दिवंगत पिता स्वर्गीय हरिराम शाह जी की यादों को अपनी भावनाओं में कुछ यूं समेटा है कि हर एक पुत्र को उसे जरूर पढ़ना – सुनना और गुनना चाहिए – यह आलेख पढ़िए….

पिताजी, माताजी और भाई के साथ डॉक्टर अरूण शाह

आपकी बहुत याद आती है बाबूजी! प्रतिपल – प्रतिक्षण। जी करता है आपके कमरे के बाहर जा जोर-जोर से आपको पुकारूं, और आप कहें – अरे क्यों इतना शोर मचा रहे हो, आ रहा हूं न!  फिर बाहर आ, ठीक उसी तरह आप मेरे सर पर प्यार से हाथ फेरें, जैसे बचपन में फेरते थे और मैं आपके इस उन्मुक्त स्नेह की बरखा में चुपचाप भींगता रहूं। बाबूजी, हर सुबह ऐसा लगता है कि आप  पूजा कर रहे हों और आपके गाए भजन हमारे कानों को पावन । मैं झट से उठ बैठता हूं और हाथ जोड़ आपके भजन के स्वर में अपना स्वर मिलाने लगता हूं।

मैं वक्त-बेवक्त आपके ठौर पर आपकी राह देखता हूं। यह जानते हुए भी कि आप अब सदेह हमसे दूर चले गए हैं। बहुत दूर।,

चार पीढ़ियों को आशीर्वाद

आपकी दी हुई हिम्मत, उम्मीद और स्नेह को हम सब ने बड़े करीने से संभाल रखा है। आपकी यादें घर के हर कमरे – हर दर-ओ-दीवार पर मुस्कराहट बन चस्पा हैं। हम सब आपको बहुत याद करते हैं बाबूजी, आपकी नटखट परपोती अब भी अपनी तुतली आवाज में आपको पुकार लेती है। जानते हैं, अब वो स्कूल भी जाने लगी है।

हम सब पल-पल आपको याद करते हैं। बेटे, पोते, पोतियां सब के लिए आप ही तो हिम्मत थे बाबूजी। मां भी बहुत याद करती है आपको। आपके बिना अजीब सा एक खालीपन लगता है। एक ऐसा सुनापन जिसकी भरपाई कभी नहीं हो सकती।

वो उमंग भरे दिन: जन्मदिन पर बाबूजी

र जाता हूं तो देर तक आपकी उस कुर्सी के पास बैठ उसे निहारता रहता हूं जिस पर आप बैठा करते थे। वो कुर्सी अब खाली पड़ी है। आपका चश्मा… आपकी कलम… आपका नोटबुक सब वैसे ही रखे हैं करीने से, बस आप नहीं हो बाबूजी…!

बचपन की यादों की लंबी फेहरिस्त है। कैसे बचपन में मेरी छोटी-सी परेशानी भी आपके लिए बड़ी चिंता बन जाती थी और आप उसका समाधान ढूंढते। मुझे अब भी याद है, वही सात साल की उम्र रही होगी मेरी, जब मुझे चोट लगी और पैर में प्लास्टर लगने के बाद इंफेक्शन हो गया था। आप मुझे बेहतर इलाज के लिए तब पहलेजा घाट से पटना स्टीमर से ले जाते। मैं चल नहीं पाता तो मुझे कांधे पर बिठाकर आप ले चलते।तब डॉक्टर ने यह कह दिया था कि पांव काटने होंगे। आप बिना विचलित हुए इलाज में लगे रहे और मेरे दोनों पांव को सलामत रहे।

जमाना बचपन का: बाबूजी के साथ हम भाई-बहन

सच में, आप एक योद्धा थे बाबूजी…। कितनी बहादुरी से आपने जीवन के अंधेरे वक्त से लड़ाई लड़ी।

जीवन के हर उतार-चढ़ाव में आप स्थिर भाव से भरे रहते। ग़म में मुस्कुराते रहते। अंदर से मोम होकर भी बाहर फौलाद सा सख़्त बने रहते आप बाबूजी। मेरी खुशी में आप हर वक्त अपनी खुशी ढूंढते।

खुशियों बांटते चलें

स्कूल के वक्त आपने मेरे लिए कितनी प्यारी-सी साइकिल खरीदी थी। जब मैं घंटी बजाता हुआ साइकिल चलाता तो आप मुझे देख मुस्कुरा उठते।

बचपन में मैं रूठने का नाटक करता और आप मुझे मनाते। सोचता हूं, मैं फिर रूठने का नाटक करूं और आप फिर मुझे मनाने आ जाओ बाबूजी। जब मेरा दाखिला दरभंगा मेडिकल कॉलेज में हुआ तो आपने मेरे लिए एक स्कूटर खरीदा था। मैं उस स्कूटर से हर छुट्टी वाले दिन आपसे मिलने आता। जाते वक्त जरूरी सामानों की गठरी बांधते हुए आप मां से कहते – पूछ लो कि कुछ और जरूरी तो नहीं। जब मैं डॉक्टर बन गया तो आपने ही मेरी पहली कार खरीदी। जब आप शहर के काम से जाते और वापस लौटते तो आप हम सब बच्चों के लिए कुछ न कुछ चीजें लाना कभी नहीं भूलते।

समाज सेवा में भागीदारी

संत पुरुष थे आप बाबूजी

सादा जीवन, सुंदर विचार, ईमानदारी और खूब मेहनत – यही आपके जीवन का मंत्र था। आपसे हमने भी जीवन का यह मंत्र सीखा। खाने में भी सादा खाना, बस दाल-रोटी आपको पसंद आती। न कोई घमंड, न कोई दिखावा – बस अपनी धुन में मगन। अपने काम में खूब मेहनत, खूब ईमानदारी। यही वजह रही जिससे आपका प्रतिष्ठान उत्तर बिहार का सबसे प्रतिष्ठित और भरोसे वाला प्रतिष्ठान बन गया। 

मां के जन्मदिन पर बाबूजी का उत्साह

सब परिवार के लिए

अपने लिए आपने कभी कोई चाहत नहीं रखी बाबूजी। अंतिम दिन तक परिवार के लिए ही जुटे रहे। खुद सादा लिबास पहनते और हम सब के लिए ब्रांडेड कपड़े सिलवाते। खुद के सपनों को छोड़ हमारे सपनों में रंग भरते। हमारी छोटी-छोटी खुशियां पूरी करते। आप थे तो लगता कि हम सब महफूज हैं। हर परेशानी में लगता – बाबूजी हैं न, रास्ता निकाल लेंगे। लगता कोई है जो हमारा ख्याल रखता है।

आशीर्वाद बना रहे

आशीर्वाद साथ हमारे 

आज मैं जो कुछ भी हूं बाबूजी, सब आपके आशीर्वाद से ही संभव हुआ है। आपके ही मार्गदर्शन से हम सबने मंजिल पाई है। आपके पोते-पोतियां सब आपके बताए रास्ते पर चलते-बढ़ते हुए देश और दुनिया में अपनी पहचान बना रहे हैं। हम सब आपके आदर्श पर चल रहे हैं। आप लंबे वक्त तक हमारे साथ रहें, हमारी छांव बने रहें। मैंने सुना था कि कैसे बचपन में जब आप ढाई साल के थे, उस वक्त ही आपके सर से पिताजी का साया उठ गया था। पिता के बिना जीवन कितना कठिन होता है।

आप कठिनाई से लड़ते हुए बड़े हुए थे बाबूजी। कभी आपने हौसला नहीं खोया।

तब भी जब मैं हमेशा बीमार रहा करता था, और तब भी जब मेरी 15वीं सर्जरी का ऑपरेशन होना था। डॉक्टर ने काफी खतरा बताया, आप मुझमें हिम्मत भरते रहे। खुद चिंतित होकर भी परेशानी की लकीरें चेहरे पर न आने दीं। इसी विश्वास की वजह से मेरी सर्जरी कामयाब रही। आपकी संयमित जीवन शैली आपको स्वस्थ रखती थी, यदा-कदा कभी बुखार हो जाता और मैं आपकी तबीयत के बारे में पूछता तो आप कहते – अच्छा हूं, सब ठीक है। वो तो मां कह देती कि दो दिन से बुखार में हैं और तब मैं आपको गोलियां खिलाता। हजारों यादें जुड़ी हुई हैं आपसे बाबूजी।

आपने सीखाया स्वाद जिंदगी का 

आपसे मैंने हमेशा सीखा है कि जीवन का स्वाद कैसे लेकर जीना है – यह आपने ही मुझे सिखाया। समाज की सेवा को ईश्वर की सेवा मानना। यही धर्म कहा था आपने।

मुझे वो बातें भी याद हैं जब परिवार में लोगों की संख्या बढ़ने पर मैंने एक अलग घर की चाहत की थी और आपने न सिर्फ इसकी सहमति दी बल्कि मुझे मकान खरीदने में आर्थिक मदद भी की। आपको पुराने गीत कितने पसंद थे। हमेशा मुकेश, लता, किशोर के गाने आप सुनते-गुनगुनाते रहते थे। बाद में आपकी बेटियों ने आपको एक सारेगामा कारवां दिया था कि आपको मन का संगीत सुनने में आसानी हो।

आज मैं जब भी गीत गाता-गुनगुनाता हूं तो लगता है आप पास बैठे मेरा यह गीत सुन तालियां बजा रहे हैं।

बाबूजी, जब आप 80 की दहलीज पार कर गए, तब मैं हर हफ्ते जब भी मिलने आता कोशिश यही रहती कि आपको नन्हा सा बच्चा बना वैसे हंसा पाऊं, जैसे बचपन में आपने हमें हंसाया था। आपसे खूब बातें होती हम सब की। शाम की वो चाय और गप्पों की महफ़िल। आप सिर्फ एक पिता नहीं थे, आप मित्र भी थे, एक मार्गदर्शक भी, एक शिक्षक भी।

वो बेरहम वक्त

अभी तो आप एकदम स्वस्थ थे। आराम से खुद का सारा काम खुद करते। अचानक आप बीमार हुए और हम सब को छोड़ गए। 19 तारीख तक आप कर्मयोगी की तरह कार्य करते रहे। 20 तारीख को आपकी तबियत बिगड़ी हम सब ने आपको अस्पताल में भर्ती कराया और 21 तारीख को आप हमें छोड़ परलोक प्रस्थान कर गए। 

इस माया लोक से सबको विदा तो होना ही है। आप भी इस दुनिया से विदा हो गए।  सुकून यही कि हम सब हमेशा आपके बताए रास्ते पर चल रहे हैं। आपने तीन-तीन पीढ़ियों को गोद में खिलाया, उन्हें आशीष दिया। आप हमारी बगिया के बागवान बने रहे। बाबूजी, आपको टहलना खूब भाता था। सुबह-सबेरे हरी दूब पर चलकर मैं आपके पदचिन्हों को महसूस करना चाहता हूं।

गीता कहती है आत्मा अमर है, वह मरती नहीं। आप भी अमर हैं बाबूजी। हमारे पास ही तो हैं। घर के मंदिर के दीप की उजास बनकर, पलाश के ढेर सारे खिलते हुए फूल में मुस्कान बनकर, बारिश की नन्हीं बूंद में शीत बनकर, सूरज की पहली किरण में चमक बनकर। नीले-नीले अंबर में तारों की टिमटिमाहट बनकर आप हमें आज भी रास्ता बता रहे हैं।

जब भी कभी मन थकान से विचलित होता है, मैं आपकी ढेरों यादों को समेट गले लगा लेता हूं।
पावन हो उठता है मन। सांसें पुराण का मंत्र गा उठतीं हैं-

पिता स्वर्गः पिता धर्मः पिता हि परमं तपः।

पितरि प्रीतिमापन्ने सर्वा हि प्रीयते प्रजा॥”

यादें साथ हैं

मेरी आंखों के कोर से कुछ बूंदें टपक पड़ती हैं..। मैं आपकी ऊर्जा खुद में महसूस करता हूं, कदमों में हौसला भर आता है  , मैं चल पड़ता हूं उस मार्ग पर जिसे आपने अपने जीवन का मार्ग कहा था – सत्य का मार्ग कहा था। मोक्ष का मार्ग कहा था।

कोटि-कोटि प्रणाम बाबूजी!!!

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‘मसान’ में चल रही शिक्षा की साधना , अनोखे ‘अप्पन पाठशाला’ की कहानी पढ़िए

मृत्यु के शोक और मसान में जलती चिता के पास एक साधक सालों से अपनी साधना में लीन हैं।यह कोई तंत्र साधक नहीं, न तंत्र साधना हो रही है। यह ज्ञान की साधना है। विद्या की साधना और यह साधक है युवा सुमित कुमार।
सुमित यहां चला रहे हैं उन बच्चों के लिए अनोखा स्कूल जो कभी मसान से फल और पैसा चुनते थे।आज कहानी अप्पन पाठशाला की….

शाम का वक्त है, हम बिहार की स्मार्ट सिटी मुजफ्फरपुर के सिकंदरपुर स्थित चमचमाते मरीन ड्राइव से गुजर रहे हैं। थोड़ा आगे बढ़ने पर मुक्तिधाम का गेट दिखाई दिखता है।शहर का सबसे प्रमुख श्मशान घाट। हमारे कानों में घंटे की आवाज के साथ’राम नाम सत्य है ‘का एक स्वर सुनाई देता है । जीवन की नश्वरता और ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार करने का स्वर, जो शायद अंतिम यात्रा और मुक्तिधाम जैसी जगहों पर ही स्वीकार्य होता है। हम मुक्तिधाम पहुंच चुके हैं थोड़ी दूर पर ढलते सूरज की परछाई में चिंता की लपटें उठ रहीं हैं, आसमान में धूंए का गुब्बारा। मेरे मन में कबीर की पंक्ति अनायास उभरने लगती है

सांस सांस सब सांस है,सांस बिना सब सून,

कबीर सांस न कीजिए, सांस जाएगा तीन “

जीवन की इस अंतिम पड़ाव वाले स्थल पर एक और आवाज हमें सुनाई दे रही है ‘क’ से कलम ‘ख’ से खरगोश। बच्चों का एक झुंड और उन्हें पढ़ाते युवा। यह मुक्ति धाम में चलने वाली पाठशाला है। अप्पन पाठशाला। ‘अप्पन’ बज्जिका का एक शब्द है जिसका मतलब ‘अपना’ होता है।

हम थोड़ी देर यही खड़े हो पढ़ाई में रहें बच्चों को देखते हैं। बच्चे’ ग ‘ से ‘गमला’ ‘ घ’ से घर पढ़ रहे हैं । पास फैले मृत्यु के शोक के इन बच्चों की आंखों में जीवन के सपने हैं। सृजन के सपने हैं।

हमारी मुलाकात इस पाठशाला के संस्थापक सुमित     कुमार से होती है।
सुमित बताते हैं कि मैं एक दिन परिचित की अंतिम यात्रा में यहां आया था। इस दौरान कुछ बच्चों पर नजर पड़ी जो यहां से मिठाई, पैसा, कपड़े आदि चुन रहे थे। मुझे यह दृश्य बड़ा विचलित कर गया। सोचा यह कैसी विडम्बना है कि आज भी हमारे बच्चे इस तरह से जीने को मजबूर हैं। फिर कुछ दिन तक इन बच्चों की दिनचर्या देखी और फिर शुरू की एक कोशिश इन्हें पढ़ाने की 8 बच्चों के साथ शुरू हुआ हमारे इस अप्पन पाठशाला में अब 140 बच्चे हैं। इनमें से 110 नियमित आते हैं। शाम ढलती जा रही थी, चिंता की लपटें और तेज हो आई थी, इधर हमारे मन में इस अनोखे स्कूल को लेकर जिज्ञासा भी बढ़ रही थी। हमने वहां कुछ बच्चों से बातचीत की।

नन्ही आंखें में हैं बड़े-बड़े सपने 

सबमें अनूठा आत्मविश्वास। सबके अपने सपने । कोई डॉक्टर बनना चाहता है तो कोई जज। किसी को फिल्मी दुनिया में जा नाम कमाना है तो कोई शिक्षक बन शिक्षा की रौशनी बटना चाहता है।हम सुमित कुमार से फिर मुखातिब होते हैं। सुमित कहते हैं। यह सब आसान नहीं था।

पहले न बच्चे पढ़ने के लिए तैयार थे न उनके अभिभावक इन्हें भेजने के लिए। वो कहते पढ़कर क्या होगा?

ऐसे तो मेरा बच्चा दो पैसा कमाकर लाएगा। मैं और मेरे दोस्त ने इन लोगों को बहुत समझाया। फिर किसी तरह ये तैयार हुए।

 इस पाठशाला की शुरुआत मार्च 2017 में की। तब से लगातार यह चल रहा है।पाठशाला का नाम अप्पन इसलिए रखा गया ताकि बच्चों को अपना लगे।


जब पाठशाला की शुरुआत हुई तब धीरे-धीरे बच्चों को बैठने का आदत लगाई ,फिर पढ़ना शुरू किया। जब पाठशाला में बच्चे नियमित आने लगे तो फिर चिंता यह हुई कि इनका नामांकन कहां हो। मैंने पहल कर बगल के सरकारी स्कूल में नामांकन कराने के लिए बच्चों और बच्चों के अभिभावकों को मैंने प्रेरित किया। अब हर साल लगभग 35- 40 बच्चों का बगल के सरकारी प्राथमिक विद्यालय ,मध्य विद्यालय और उच्च विद्यालय में नामांकन हम लोग कराते हैं। इन 8 सालों में लगभग 300 से अधिक बच्चों का नामांकन बगल के सरकारी के विद्यालयों में कराया गया है।

कक्षा एक से ग्यारहवीं तक के बच्चे 

सुमित आगे बताते हैं कि अप्पन पाठशाला में
कक्षा एक से लेकर 11वीं तक के छात्र-छात्राएं पढ़ते हैं। उन्होंने यहां पढ़ने वाले बच्चों को उनके माता-पिता के कार्य शैली के आधार पर चार वर्गों में बांटा गया है
1. वह बच्चे जो पहले मुक्तिधाम में पार्थिव शरीर से फल पैसा या अन्य वस्तुएं उठाते हैं
2. वैसे बच्चे जिनकी मां घरों में चौक बर्तन की काम करती है
3. वह बच्चे जो कचरा चुनने का काम करते थे
4. आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े बच्चे ।

खुद की कमाई का एक हिस्सा यहां खर्च 

इन सभी बच्चों के लिए ड्रेस, बैग ,कॉपी ,किताब ,पेंसिल ,रबर कटर, बैठने के लिए आसनी और ठंड में स्वेटर ,कंबल का व्यवस्था सुमित खुद करते हैं। जब हमने उनसे यह पूछा कि इसके लिए पैसे कहां से आते हैं तो सुमित कहते हैं, मैं इसके लिए अलग काम करता हूं। मेरा कंसल्टेंसी का काम है इससे हुई आमदनी का 90 फीसदी हिस्सा मैं यहां खर्च करता हूं। कभी कभी कुछ लोग आर्थिक मदद करते हैं।

वुशु का प्रशिक्षण भी ले रहे यहां के बच्चे

इस अप्पन पाठशाला के बच्चे आत्मरक्षा के लिए वुशु( मार्शल आर्ट ) का प्रशिक्षण ले रहे हैं । इनमें ज्यादातर लड़कियां शामिल हैं।सुमित कहते हैं कि इस प्रशिक्षण का उद्देश्य महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराधों को ध्यान में रखते हुए किया गया है, वे स्वयं की रक्षा में समर्थ हो सकें तथा वे शारीरिक एवं मानसिक रूप से सशक्त बनें और दूसरे को जागरूक करें और सिखाएं ।
एक छात्र अपने घर के आस-पास कम से कम 10-10 बच्चों यह को सिखाएंगे और यह प्रक्रिया लगातार चलती रहेगी। यह प्रशिक्षण फिलहाल सप्ताह में दो दिन पाठशाला चल रहा है इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में दो मुख्य शिक्षक सुनील कुमार और अजीत सिंह के
सहयोग किया जा रहा है।

ऑर्गेनिक फॉर्मिंग भी यहां सीख रहे 

सुमित कुमार कहते हैं कि अप्पन पाठशाला में पढ़ने वाले बच्चों को पढ़ाई के साथ-साथ ऑर्गेनिक फॉर्मिंग भी सिखाई जा रही है. बच्‍चे पढ़ाई के साथ-साथ जैविक खेती का  व्यवहारिक ज्ञान सीख रहे हैं.
जिससे आने वाले भविष्य में ये स्वावलंबी बन सके । ये बच्‍चे आने वाले समय में किसानों को जैविक खेती के लिए भी जागरूक करेंगे।

सुंदर होगा समाज 

सुमित का मानना है कि ये बच्चे हम यहां इन्हें बस किताबी ज्ञान ही नहीं देते, इन्हें बेहतर इंसान बनने की प्रेरणा भी देते है। इनमें से कई वैसे बच्चे थे जो शुरू में नशे की चपेट में थे। अब वो नशामुक्ति का अलख जगा रहे हैं। पढ़-लिखकर ये खुद की किस्मत तो रौशन करेंगे ही अपने समाज को भी उजियारा प्रदान करेंगे। इससे हमारा समाज सबल होगा।

इस यात्रा में इनका मिला सहयोग

सुमित बताते हैं कि पाठशाला की इस यात्रा में कई लोगों का सहयोग मिला। मेरे माता-पिता ने मुझे हिम्मत दी। मेरे भाई और मेरे मित्र का भी इसमें बड़ा योगदान है। मैं अपने भाई अमित कुमार अपने मित्रों का, मुजफ्फरपुर के पूर्व सांसद अजय निषाद का, मुक्तिधाम प्रबंधन कार्यकारी समिति का और समाज के कुछ प्रबुद्ध लोगों का इस कार्य में सहयोग के लिए शुक्रगुजार हूं।

आर्थिक सहयोग की जरूरत

सुमित आगे कहते हैं कि काफी लोग हमारे प्रयास की सराहना तो करते हैं पर आर्थिक मदद काफी कम लोग करते हैं। मैं खुद की मेहनत से इसे चला तो यह हूं पर इस पाठशाला को और मजबूत करने के लिए हमें आर्थिक सहयोग की जरूरत है। अगर हमें आर्थिक सहयोग मिलेगा तो हम इसे और भी बेहतर ढंग से चला पाएंगे।

शाम ढलती जा रही है। बच्चे पढ़ाई के बाद घर लौट रहे हैं।
बाहर लगा स्ट्रीट लाइट जल उठता है। हम कांधे पर बस्ता लिए धीरे धीरे अपने घर की और लौटते इन बच्चों को निहार रहे हैं।

हम सुमित से विदा लेते हैं। रात हो आई है, पर इस अंधेरे में भी अप्पन पाठशाला की रौशनी, सितारों सा इस मसान में फैली लगती है। रौशनी हमारे मन में भी फ़ैल रही है। हम अप्पन पाठशाला की कहानी, सुमित और बच्चों के विश्वास भरी यादों को समेटे निकल पड़ते हैं। गाड़ी के रेडियो में मुकेश की आवाज में गीत बज रहा है।
“इक दिन बिक जाएगा, माटी के मोल
जग में रह जाएँगे, प्यारे तेरे बोल
दूजे के होंठों को, देकर अपने गीत,
कोई निशानी छोड़, फिर दुनिया से डोल।”

( नोट: thebigpost.com समाज की प्रेरक कहानियों को सामने लाने की पहल है। इस मिशन को मजबूत करने के लिए हमें आपके सहयोग की ज़रूरत है। 📞 आर्थिक मदद के लिए संपर्क करें: 7488413830)

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बंदिशों के पिंजरे तोड़, मुंबई लोकल से ‘Mohi Pure’ तक की ‘रेखा’, इस राजस्थानी लड़की की बहादुर कहानी पढ़िए

वह अपने नन्हे-नन्हे कदमों से सितारों को छू लेना चाहती थी। नन्ही हथेलियों में जुगनू की चमक समेट मन को रोशन कर लेना चाहती थी। वह अरावली की पहाड़ियों से आई हुई ठंडी हवा के झोंकों के साथ रेस लगाना चाहती थी। तब उसे कहाँ पता था कि बचपन की उस गुड़िया के होश  संभालते ही उसकी उम्मीद की रेखा से बड़ी लोहे की कंटीली रेखाएँ लगा दी गई हैं, ताकि उसके सपनों को नियति की क्रूरता और रस्म मानकर कुर्बान किया जा सके। इन सबके बाद भी उसने अपने सपनों को “लव यू” कहा, मन में हौसलों का चट्टान भरा, आँखों में उम्मीद की चमक और आशाओं के पंख पहनकर राजस्थान के अपने गाँव में ‘मैदान मार ‘लड़कियों की किस्मत बदली।  इन सब के बावजूद खुद की किस्मत भी उससे आँख-मिचौली खेलती रही। हाथ पीले कर मुंबई आयी तो ससुराल में भी  दुनिया रसोई घर तक ही सिमटी रही।  उसकी आँखें भीगती रहीं, पर सपनों को आँसुओं के सैलाब में बहने न दिया। वह मुंबई लोकल की राह पकड़ ज़िंदगी को ढूँढने निकल पड़ी। जनरल डब्बों की खाक छानते, तजुर्बों के पन्ने समेटते, रुकते-चलते हुए एक मुकाम बनाया। जलवा ऐसा कि  सासू माँ भी बेस्ट फ्रेंड बन चाय की प्यालियाँ खनका कर गप्पों की शाम बिताने लगी। बाल विवाह, पर्दा प्रथा और लड़कियों पर लगी तमाम बंदिशों के खिलाफ मुखर आवाज़ बन स्त्री मुक्ति का अलख जगाने वाली इस स्त्री के मन में एक कथाकार भी बसता है और एक उद्यमी भी। इनकी किताब ‘मुंबई लोकल’ जल्द आने वाली है। इनके ब्रांड  Mohi Pure के स्वाद के दीवाने पंकज त्रिपाठी तक हैं।
आज पढ़ें कहानी — दर्द से भरे दामन को उम्मीद के उजास से रौशन कर जिंदादिली की इंद्रधनुषी रेखाएँ खींचने वाली रेखा सुथार की–
  
प्रकृति के बीच महलों वाला गाँव
मेरा जन्म राजस्थान के अरावली की पहाड़ियों से घिरे एक छोटे से गाँव ‘घाणेराव’ में हुआ था। गाँव छोटा तो था पर बेहद खूबसूरत। नक्काशीदार मंदिरों की दीवारें, ऊँचे-ऊँचे खूबसूरत महल और राजवाड़े। विदेशी मेहमानों का आना-जाना, उनके कैमरे में कैद होती गाँव की कहानियाँ — सब कुछ था मेरे इस गाँव घाणेराव में।
बचपन में पढ़ाई-लिखाई के लिए मेरा दाखिला गाँव के ही स्कूल में कराया गया। हम बच्चों की टोली हरे-भरे जंगलों के बीच से पेड़ों को निहारते हुए स्कूल आती- जाती। यहाँ तक तो सब खूबसूरत था, पर मेरे गाँव की इस खूबसूरती के साथ ही एक स्याह पक्ष भी था। परंपरा के नाम पर रूढ़ियों की जड़ें मज़बूत थीं।
एक उम्र के बाद लड़कियों को पाबंदियों की परिधि में बाँध दिया जाता। वह अपने गाँव से बाहर कभी अकेली कदम नहीं निकाल सकतीं। बचपन में ही लड़की ब्याह दी जाती। बहुओं को चेहरे के आगे लंबा घूँघट ताने रखने का फरमान था।  अगर कोई गुस्ताख़ी हो गई तो सज़ा भी डरावनी।
यह बताते हुए रेखा सुथार का गला भर आता है। वह खुद को सँभालते हुए हिम्मत की मुस्कान होंठों पर भरती हैं और हमें आगे का वाकया बताती हैं। साहित्यिक मिजाज रखने वाली रेखा सुथार  Mohi Pure की फाउंडर हैं और जी-जान से देशभर में शुद्ध तेल और घी मुहैया कराने की पहल कर रही हैं।
माता पिता और खेल ने मुझे संवारा
रेखा आगे बताती हैं कि आज जो कुछ भी वे हैं उसमें उनके माता-पिता और खेल में उनकी रुचि का बड़ा योगदान है। वह कहती हैं कि पग-पग रूढ़िवादी विचारों से लैस इस गाँव में उनके माता-पिता ने उन्हें खुद के पंख फैला उड़ने की आज़ादी दी। गाँववालों के ताने मिले, पर इसकी परवाह न करते हुए वे उन्हें खुद का आकाश गढ़ने का हौसला देते रहे। पिता नरेंद्र प्रसाद परिहार जीवन बीमा कंपनी में कार्यरत थे। माँ कमला परिहार गृहणी थीं। माँ भले कम पढ़ी-लिखी थीं, पर ज़िंदगी के तजुर्बे ने उन्हें काफी व्यवहारिक बना दिया था। रेखा कहती हैं कि उनके माता-पिता ने उन्हें बंदिशों वाले गाँव में खुलकर जीने की आज़ादी दी। वह स्कूल में सॉफ्टबॉल खेलती थीं। उनका यह खेलना स्कूल के कई शिक्षकों को पसंद नहीं आता था। तब इसमें  है। हमारे दूसरे  पीटी टीचर भी शामिल थे। वह थोड़ी ज़िद्दी थीं — खेलना है तो खेलना है। काफ़ी समझाने पर स्कूल के प्रिंसिपल ने स्कूल में लड़कों के साथ लड़कियों की टीम शुरू की। धीरे-धीरे वे बाहर भी खेलने जाने लगीं।
अपने पिता के साथ रेखा सुथार
जब पीटी टीचर चुपचाप मेरी क्लास में आ गए
रेखा हमें स्कूल का एक खूबसूरत वाकया बताते हुए कहती हैं — “एक बार हमारी क्लास चल रही थी। हम सभी बच्चे पढ़ाई कर रहे थे। अचानक पीटी सर आए और मेरा नाम लेकर पुकारने लगे। मेरी धड़कनें तेज़ हो गईं। मुझे लगा कोई ग़लती हो गई। फिर उन्होंने सबके सामने मेरी पीठ थपथपाते हुए कहा कि इस लड़की ने स्कूल का मान बढ़ाया है। यह खरा सोना है, ठोक-पीटकर आगे निकली है।” उनका चयन तब नेशनल लेवल पर सॉफ्टबॉल के लिए हुआ था। इससे पहले वह स्टेट लेवल पर सॉफ्टबॉल जीत चुकी थीं।
 
नेशनल ट्रेनिंग कैंप, पीरियड का पेन और माँ की वो बात
रेखा सुथार  कहती हैं कि उनकी किस्मत की रेखाएँ हर वक्त उनका इम्तिहान लेती रही हैं। ऐसा ही एक वाकया नेशनल ट्रेनिंग कैंप के दौरान हुआ। दरअसल फाइनल चयन के लिए इस कैंप से 45 लड़कियों में से 16 लड़कियों को चुनना था। जिस दिन उनका परफॉर्मेंस था, उसी दिन उन्हें पीरियड आ गया। उनका पीरियड काफी पेनफुल होता था। उन्हें लगा कि ऐसी हालत में वे परफॉर्मेंस नहीं दे पाएँगी। नेशनल का फाइनल सिलेक्शन आज के ही टेस्ट के बाद होना था। उन्होंने सोच लिया कि वे नहीं कर पाएँगी। दर्द काफी तेज़ था। उन्होंने मम्मी को फोन कर यह बात कही। मम्मी ने कहा —
“पीरियड तो हमेशा आएँगे, यह टाइम वापस नहीं आएगा।”
फिर माँ 30 किलोमीटर दूर अस्पताल गईं, डॉक्टर से दवा पूछी और फोन पर लिखवाया। रेखा ने दवा मँगाई, खुद को मज़बूत किया और सबसे बढ़िया परफॉर्मेंस देकर सेलेक्ट हो गईं।
स्कूटर आएगी, ब्याह कर लो
 रेखा बताती हैं कि मैं बारहवीं में थी. इसी वक्त मेरा ब्याह कर दिया गया. हमारे गांव में बड़ी बहन के साथ छोटी बहन का भी ब्याह कर दिया जाता था. हाँ, शादी के काफी सालों बाद गौना होता, तब लड़की अपने ससुराल जाती. मेरी शादी भी बहन की शादी के वक्त कर दी गई. मैंने मना किया तो फिर मुझे स्कूटर खरीद कर देने की बात मेरे भाई ने बताई. मैंने सोचा, चलो शादी करने से स्कूटर चलाने की आजादी मुझे मिल जाएगी, तो ठीक है, कर लेते हैं शादी.
स्कूटर तो नहीं आई, हाँ मैंने पापा का बुलेट बाइक चलाना सीख लिया. गांव और आसपास में बुलेट चलाया करती. मेरे बुलेट मोटरसाइकिल चलाने देख गांव के कुछ रूढ़िवादी लोग ताने भी देते, पर मुझे तो रफ्तार चाहिए थी. खुलकर जीना था, खुद की जिंदगी. शादी के बाद मैंने CAT का एग्जाम दिया. फिर MBA कर ली. मैंने अंग्रेजी साहित्य से  स्नातक किया है।
ससुराल की बंदिशें मुझे नहीं आयी रास
रेखा बताती हैं कि मैं मायके में खूब आजादी के साथ रहती. दूसरी लड़कियों को भी पाबंदियों से निकाल, पढ़ाई-लिखाई की ओर बढ़ने में मदद करती. मेरी किस्मत ने मेरा खूब इम्तिहान लिया है. आखिर वह दिन भी आया जब गौना के बाद मेरे कदम ससुराल की दहलीज पर पड़े. हर लड़की की तरह मेरे आंखों में भी ससूराल और शादीशुदा जिंदगी को लेकर ढेरों ख्वाब बसे थे. मेरे ससूराल वाले मुंबई में रहते थे. मुझे लगा था कि इस महानगर में और पंख फैला उड़ सकूँगी, पर हुआ इसका उल्टा.
“मुझे उस वक्त मेरा ससूराल वैसा नहीं लगा जैसा मैं सोचकर आयी थी। हर आम परिवार की तरह यहां भी बहू के लिए वो बंदिशें थी जो उस वक्त चला करती थीं। 
मुंबई शहर में तो था, पर मुझे घर से निकलने की आजादी नहीं थी. यह सब मुझे बेचैन करता”
मुझे हमेशा साड़ी का पल्लू  ताने  रहना होता था. किसी जरूरी काम के लिए भी मैं नीचे चौराहे की दुकान पर नहीं जा सकती थी. घर का सारा काम तो मुझे करना था ही, वह भी साड़ी में रह कर. मैं सलवार सूट भी नहीं पहन सकती थी. आप सोचिए, जो लड़की एक खिलाड़ी रही, खूब आजादी से, उसे आज के जमाने में इतनी बंदिशें अचानक आ जाए तो उसके मन पर क्या बीतेगी. मैं अपने पति से इन सबको लेकर बात करती. पति सपोर्ट भी करना चाहते पर इससे बहुत कुछ बदला नहीं ।
“उस वक्त  मेरी आंखें बार-बार गंगा-यमुना होतीं। मन समंदर सा नमकीन और देह जलती असहाय ताप की पीड़ा से। “
मैं मन ही मन ईश्वर से सवाल करती, ये मेरे साथ क्या हो रहा है।
‘मुंबई लोकल ‘वाले दिन
हिम्मती दिल और मुंबई लोकल का सफर
मैं ससूराल में काफी तनाव में रहती. फिर मैंने सोचा, इस अंधेरे को मुझे ही दूर करना होगा, कोई मेरे लिए नहीं आएगा. फिर एक दिन मैंने कह दिया कि मुझे जॉब करने जाना है.
“इतना सुनते ही प्रतिरोध पर प्रतिरोध. ये लड़की जॉब करेगी? हमारी प्रतिष्ठा का क्या? क्या जरूरत है जॉब करने की? इस तरह के हजारों सवाल. मैंने गांधी जी की तरह सत्याग्रह वाला रास्ता चुना.”
मैं उनका विरोध तो करती, पर इसका तरीका अहिंसक होता. मैं कोई अपशब्द या हिंसा अपनी बात को मनवाने के लिए नहीं कहती—करती. बड़ी मुश्किल से मुझे नौकरी करने की इजाज़त मिली, पर इसके साथ ही घर का सारा काम निपटा कर मुझे जाना था और आकर फिर सारा काम करना था. मैंने यह चुनौती स्वीकार की.
जॉब करने निकली, पर जॉब ढूंढनी थी
मैं घर से नौकरी करने तो निकल गई, पर सच यह था कि  मुझे नौकरी ढूंढनी थी।  मैंने सोचा पहले मुंबई को जान लूं। नौकरी तो मिल ही जाएगी। . स्टेशन पहुंची,  लोकल टिकट लिया और लोकल ट्रेन में चल निकली—आठ घंटे अलग-अलग जगहों पर बिताए. ।मुंबई लोकल में समय बिताना.
सच कहूँ तो मुंबई लोकल का समय मेरे जीवन का वह अनुभव था जिसमें मैं कितने ही लोगों के जीवन को करीब से देख पाती थी. उनके सपने, उनकी उदासी, उनका संघर्ष—सब कुछ मैंने जाना समझा. एक आम आदमी के हिस्से की खालिस जिंदगी से मुझे मुंबई लोकल ने रूबरू कराया.”
वह आगे बताती है कि मुंबई लोकल ट्रेन यात्रा के दौरान की कहानियों को मैंने आकार दिया, और अब यह जल्द ही ‘मुंबई लोकल’ के नाम से छप कर आने वाली है.
...और नौकरी मिल गई
रेखा सुथार आगे बताती हैं कि मुंबई लोकल के राह में हीं मुझे मेरी पहली नौकरी भी मिली. इस दौरान मेरी मुलाकात एक ऐसी महिला से हुई जिन्हें अपने ब्लॉग के लेखों के अनुवाद के लिए एक व्यक्ति की जरूरत थी. मैंने उनके प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया. इस दौरान मुझे 7,500 रुपये मिलते. इसके बाद ICICI बैंक में मेरी नौकरी लग गई।
सोशल मीडिया ने मुझे लेखक बना दिया
रेखा आगे कहती हैं कि सोशल मीडिया का भी मेरे जीवन में काफी योगदान है. मैं अपने जीवन के घटनाक्रम को कभी-कभार कुछ पंक्तियों में लिखकर सोशल मीडिया पर डाल देती. इन पर अच्छी प्रतिक्रिया आती. फिर सोशल मीडिया फ्रेंड लोग कहने लगे, आप लिखती क्यों नहीं? ऐसे में धीरे-धीरे मैंने लिखना शुरू कर दिया—साहित्य की छात्रा होने का फायदा भी मिला. मैं इसके लिए सोशल मीडिया के अपने मित्रों का आभार व्यक्त करती हूँ. इन सब ने मेरा हौसला बढ़ाया.
साहित्य जगत की उभरती रेखा
रेखा सुथार अपने ब्लॉग लेखन और कथा कहानियों के सृजन में खूब डूबी रहती हैं. वो कहती हैं, मेरी रचना मेरी जीवन की दृष्टि है. यह हर आम लड़की और महिला की कहानी होती है. इसमें गम की दहलीज पर खुशियों को पाने की चाहत छुपी हुई है. रेखा साहित्यिक गोष्ठियों और संवादों में एक जाना-पहचाना नाम बन चुकी हैं. उनके कई पॉडकास्ट इंटरव्यू भी प्रसारित हो चुके हैं.
सफर हीं तो जिंदगी है
दुनिया को समझने के लिए सोलो ट्रैवल
 रेखा को दुनिया को नजदीक से जानना बहुत पसंद है। वो प्रकृति से भी खूब प्यार करती हैं वें बतातीं हैं कि
शादी के बाद मैंने सोलो ट्रैवल करना भी शुरू किया और कई सारे ट्रैक पूरे किए। घूमने फिरने का शौक हमेशा से रहा। पहले परिवार के साथ जाती थी फिर धीरे धीरे अकेले घूमने नए लोगों से मिलने और उनके जीवन को समझने की कोशिश करने लगी।
इन्ही अनुभवों की एक किताब जल्द लाने वाली हूं।
अनमोल यादें: जब बीस साल बाद मिलीं लक्ष्मी मैम
जब मिलने मुंबई आ गई लक्ष्मी मैम 
रेखा सुथार कहती हैं कि हमारे स्कूल के शुरुआती दिनों में लक्ष्मी मैम हमारी पीटी टीचर हुआ करती थी। वे बहुत ही अनुशासित थी। हमसे भी अनुशासन की उम्मीद रखती। मुझे खेल की बारिकियों को सीखने में लक्ष्मी मैम का बहुत योगदान रहा है।

रेखा, लक्ष्मी मैम से जुडा एक ताजा वाक्या बड़े ही उत्साह से सुनाने लगती हैं। हमारे स्कूल के वक्त ही लक्ष्मी मैम का तबादला हो गया था।
बीस साल बाद मुझे एक कॉल आया – एक पुरानी मगर बेहद करीबी आवाज़ सुनाई पड़ी सामने से – “हैलो,रेखा बात कर रही हो क्या ?”
मुझे आवाज़ पहचानने में ज़्यादा देर नहीं लगी मैंने तुरंत चहकते हुए कहा – “लक्ष्मी मैम”
खूब देर बातचीत के बाद वो बोली – “मैं मुंबई में हूं और आज रात की ट्रेन से शिरडी जा रही अगर तुम्हारे पास टाइम हो तो स्टेशन पर मिलने आना”
मैं उनके बताए वक्त से पहले पहुची स्टेशन।
मैं देर तक उनसे गले लगी रही..

आँखों में हम दोनों के पानी था,और चेहरे पे मुस्कान हम दोनों के थी।

मैंने स्कूल में मेरे साथ पढ़ी कई लड़कियों के नाम बताए की वो भी मुंबई में ही रहती है,लेकिन ये जानकर हैरानी हुई मुझे की उन्हें उनमें से कोई याद नहीं आ रही थी।
मैंने पूछा उनसे कि “फिर मैं कैसे याद रह गई आपको?”
वो बोली “तू भुलाने वालों में से नहीं है बेटा तेरी बातें तो मैं आज भी जिस स्कूल में पढ़ाती हूं वहा के बच्चों से करती रहती हूं।मैं नहीं जानती मेरी वो कौनसी बात थी जिसने मैम को आज भी मुझसे जोड़े रखा बस इतना जानती हूं की

मुझे जब भी अपनी कमाई के बारे में पूछा जाएगा तो मैं इन किस्सों का खजाना सामने रख दूंगी।

दादी की बीमारी और गाड़ी चला उन्होंने अस्पताल पहुँचाना
रेखा एक गुजरा हुआ लम्हा याद कर कहती हैं, मेरी दादी सास काफी रूढ़िवादी विचारों की हैं. वो मुझे हमेशा घूंघट में ही देखना चाहती थीं. एक बार मैं दादा, ससुर और दादी सास के साथ गांव में थी. अचानक दादी की तबीयत बिगड़ गई. तबीयत काफी ज्यादा खराब होने लगी. हमारे पास गाड़ी तो थी, पर ड्राइवर नहीं था. काफी खोज करने पर भी कोई ड्राइवर नहीं मिला. ऐसे में मैंने सोचा कि जान बचाना अभी सबसे जरूरी है—यह घूंघट नहीं. मुझे गाड़ी चलानी आती थी. मैंने गैरेज से कार निकाली, दादीजी को गोद में उठाकर सीट पर रखा और अस्पताल लेकर गई. दादी का इलाज हुआ और दादी की तबीयत ठीक हो गई. दादी ने तब मुझे खूब आशीर्वाद दिया.
खुशियों के पल: सासू मां के साथ रेखा सुथार
सास बन गई अच्छी दोस्त
रेखा आगे बताती हैं कि नौकरी के बाद धीरे-धीरे सब कुछ बदलने लगा. ससूराल वाली परंपरा भी बदल गयी।. मेरी सास जो कभी परंपराओं को मानने को कहतीं, आज वो मेरी अच्छी दोस्त हैं. हम हर शाम साथ साथ चाय की चुस्की लेते हुए गप्पों वाली शाम बिताते हैं.
साथ जीवन साथी का: अपने पति भरत सुथार के साथ रेखा
पति का योगदान अहम
रेखा कहती हैं कि मेरी इस संघर्ष यात्रा में मेरे पति भरत सुथार का अहम योगदान रहा है. उन्होंने मेरे हौसले को हमेशा मजबूत बनाए रखने में मदद की. आज भी वो मेरे हर फैसले का स्वागत करते हैं.
 पहल शुद्ध देशी घी और तेल उपलब्ध करवाने की
रेखा आज अपने स्टार्टअप Mohi Pure से देश भर में शुद्ध देसी घी और सरसों तेल उपलब्ध करवाने की नायाब पहल कर रही हैं. रेखा कहती हैं कि राजस्थान में तेलहन की फसल काफी अच्छी होती है. हमारे गांव में भी काफी अच्छी सरसों की उपज होती थी. संकट यह था कि हमारे गांव में तेल निकालने की मशीन नहीं थी. लोगों को दूर दूसरे गांव इस काम के लिए जाना पड़ता था. मेरे दादाजी को यह बात काफी नागवार लगती. फिर उन्होंने तेल मिल लगाया. अब गांव वालों को तेल निकलवाने दूर नहीं जाना पड़ता था. दादाजी की विरासत को मेरे पिताजी ने आगे बढ़ाया. अब पिताजी इसे चलना नहीं चाहते थे. मील चलाने वाले केयरटेकर ने भी नौकरी छोड़ दी. ऐसे में यह मील बंद होने के कगार पर आ गया.
इन मशीनों के बीच यादों वाला बचपन
वह आगे बताती हैं कि मेरे दादाजी काफी कम उम्र में परलोक चले गए.मेरे दादाजी के सपने को मेरे पापा ने करीब 40 साल पहले पूरा किया—जब उन्होंने लोहे की घाणी लगाकर सरसों का तेल निकालना शुरू किया. मैंने अपना पूरा बचपन गेहूँ पीसने, मसाले कूटने और तेल निकालने वाली उन्हीं मशीनों के बीच बिताया. तब के समय में शुद्ध अनाज, मसाले और तेल बहुत आसानी से मिल जाते थे, इसलिए उनकी उतनी अहमियत महसूस ही नहीं होती थी. पर धीरे-धीरे जैसे-जैसे वक्त बदला, ये परंपराएँ और कारोबार बंद होने लगे, और हम बड़ी कंपनियों के रेडीमेड खाने-पीने के सामान की ओर खिंचते चले गए. कंपनियों ने अपनी ज़रूरतें पूरी करने के लिए न जाने कितने केमिकल्स मिलाए, और हम जानते-बूझते भी उन्हें अपनाते गए—क्योंकि वो सस्ते थे. लेकिन उस सस्तेपन ने हमें बहुत महँगी बीमारियों के हवाले कर दिया.
कभी सोचा नहीं था कि तेल की घाणी चलाऊंगी
रेखा कहती हैं कि सच कहूँ तो मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि मैं ये काम शुरू करूँगी. मैं शहर में अपनी नौकरी में खुश थी. लेकिन एक दिन अचानक पापा ने बताया कि वो सारी मशीनें बेचकर वहाँ कंस्ट्रक्शन का काम शुरू करने वाले हैं. ये सुनते ही मेरा मन भारी हो गया. मेरे मन में कोई ठोस वजह नहीं थी, लेकिन इतना जरूर महसूस हुआ कि ये परंपरा बंद नहीं होनी चाहिए.
मैंने इस बारे में अपने दोस्तों से बात की, खुद बहुत सोचा, और धीरे-धीरे मन में एक निर्णय आकार लेने लगा. तब तक मैंने अपनी नौकरी भी छोड़ दी थी. एक दिन पापा से लंबी बातचीत हुई. उन्होंने बताया कि कैसे उन्होंने रात-दिन मेहनत करके ये घाणी लगाई थी, कैसे कठिन समय में यही घाणी हमारे परिवार का सहारा बनी. और अब जब वो और मेरे भाई अपनी-अपनी नौकरी में व्यस्त हो गए हैं, तो इस कारोबार को संभालने वाला कोई नहीं है. इसलिए उन्हें यही सही लगा कि इसे बंद कर दिया जाए.
उस रात मैं सो नहीं पाई. अगली सुबह मैंने पापा से कहा— “मुझे नहीं पता ये कितना प्रैक्टिकल है… लेकिन पापा, ये घाणी आप बंद नहीं करेंगे. ये वैसे ही चलेगी जैसे हमेशा से चलती आई है.”
पापा चौंके और बोले— “लेकिन इसे चलाएगा कौन?”
मेरी आँखों में थोड़ी देर की खामोशी थी, फिर मैंने बिना हिचकिचाए कहा— “मैं.”
कुछ पल की खामोशी के बाद उन्होंने मेरी आँखों में देखा और पूछा— “मैनेज कर लेगी?”
मेरी आँखें भर आईं, मैंने बस इतना ही कहा— पता नहीं… लेकिन जिस उम्र में आपने कर लिया था, उसी खून की बेटी हूँ मैं… कोशिश जरूर करूँगी.”
उस वक्त पापा चुप हो गए. और फिर धीमे से बोले— “ठीक है रेखा. अगर तूने इरादा कर लिया है तो मैं तुझे रोकूँगा नहीं. लेकिन एक बात हमेशा याद रखना—शुद्धता और मिलावट के बीच सिर्फ़ एक अंतर है—विश्वास का. लोगों का विश्वास कभी टूटने मत देना.”
अच्छा चल रहा बिजनेस 
आज उस बात को करीब 6-7 महीने हो गए हैं. हमारी घाणी के साथ बगल के गाँव में मामाजी की और दो घाणी होने की वजह से अच्छी खपत हो जाती है. तेल के साथ ही मैंने अपने गाँव और आसपास के गाँवों में परंपरागत तरीके से बने बिलोना घी को भी इस मुहिम से जोड़ा है. पिछले कुछ महीनों में मैंने कई लोगों तक ये उत्पाद पहुँचाए हैं. पंकज सर और कई सेलिब्रिटीज़ को ये घी और तेल सिर्फ़ इसलिए दे पायी हूँ, क्योंकि मुझे मेरे प्रोडक्ट पर पूरा भरोसा है कि वे एक बार इसे खाएँगे तो अगली बार फिर से ज़रूर माँगेंगे.
ब्रांड नहीं विश्वास 
रेखा  सुथार कहती हैं कि मेरे लिए कोई “अमीर” या “साधारण” ग्राहक नहीं है—सभी के लिए दाम और गुणवत्ता एक समान है. मेरा उद्देश्य सिर्फ़ इतना है कि अधिक से अधिक लोग शुद्धता से जुड़ें और उस भरोसे को महसूस करें, जो हमारी पीढ़ियों ने बनाया है. आज Mohi Pure सिर्फ़ एक ब्रांड नहीं है—ये मेरे दादाजी के सपने, मेरे पापा की मेहनत और मेरे अपने संकल्प की कहानी है.
ये सिर्फ़ सरसों का तेल नहीं है—ये पीढ़ियों की विरासत है, जो मैंने सिर्फ़ एक मकसद से आगे बढ़ाई है— “खुद को खुद से बेहतर करना.”
इसलिए Mohi Pure में आपको वही शुद्धता मिलेगी जो पहले हमारे घरों की रसोई में मिलती थी—बिना किसी मिलावट, बिना किसी समझौते के.
ऐसे रखा ब्रांड नेम
रेखा आगे कहती हैं कि जब मैंने तेल मिल को चालू करने और इसे एक ब्रांड नेम देने की पहल शुरू की तो सबसे पहले हमें एक नाम चाहिए था. ऐसे में एक रोज मैं और मेरी सास नाम पर दिमाग लगा रहे थे. फिर मैंने सासू मां से कहा, क्यों न आपके ही नाम पर इसका नाम रखा जाए. उनका नाम मोहिनी है. मोहिनी नाम से हमें डोमेन नहीं मिला, तो फिर इसे मैं ने उनके ही नाम से मोही कर दिया और शुद्धता की गारंटी के लिए पीयोर जोड़ दिया. ऐसे हमें मिला हमारे ब्रांड का नाम.
सेलिब्रिटी की बना पसंद 
रेखा के ब्रांड Mohi Pure के स्वाद के दीवाने मुंबई में फिल्मी हस्तियां  भी हैं. पंकज त्रिपाठी भी इनके शुद्ध देसी घी का स्वाद ले चुके हैं. रेखा कहती हैं कि हमारे प्रोडक्ट में शुद्धता के साथ प्यार भी शामिल होता है. यह हमारा टैगलाइन भी है.
रेखा सुथार नयी पीढ़ी से कहतीं हैं –
‘बदलाव ‘के लिए हिंसा की जरूरत नहीं. मैं लोगों से खास तौर पर लड़कियों से यह कहना चाहूँगी कि आप खुद पर विश्वास रखो, हालात खुद बदल जाएंगे. आप खूब उड़ो, पर गलत राहों में नहीं. बदलाव के लिए झगड़ों और हिंसा की जरूरत नहीं है. अहिंसक तरीके से भी क्रांति लायी जा सकती है. आप खुद पर यकीन करेंगे तो दुनिया आप पर यकीन करेगी. चलते रहिए, बढ़ते रहिए—अपनी राह।” 
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