शिक्षक सिर्फ बच्चों को पढ़ाते नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी गढ़ते है। इसलिए जब किसी शिक्षक की समस्या की बात होती है, तो उसके पीछे सिर्फ एक व्यक्ति का सवाल नहीं, बल्कि पूरी शिक्षा व्यवस्था का सवाल खड़ा होता है। आनंद पुष्कर इसी सोच के साथ सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव मैदान में हैं। शिक्षकों के बीच उनकी पहचान शिक्षक हितों से जुड़े सवालों को उठाने और उनकी आवाज को आगे तक पहुंचाने की कोशिश के रूप में बनती रही है। उनकी इस यात्रा के पीछे एक मजबूत पारिवारिक विरासत भी है। समाजवाद के मजबूत स्तंभ और शिक्षक नेता स्वर्गीय केदार नाथ पाण्डेय की।
आज पढ़िए सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से जदयू उम्मीदवार आनंद पुष्कर की कहानी…
पिता से मिली शिक्षक हितों की सीख
केदार नाथ पाण्डेय बिहार के शिक्षक राजनीति में एक जाना-पहचाना नाम रहे। बिहार विधान परिषद में शिक्षक प्रतिनिधि के रूप में उन्होंने लंबे समय तक शिक्षकों से जुड़े सवालों को सदन और सार्वजनिक मंचों पर उठाया।
उनकी राजनीति का केंद्र शिक्षक और उनके अधिकार रहे। वेतन, सेवा शर्त, सम्मान और शिक्षकों की समस्याओं को लेकर उनकी सक्रियता ने शिक्षक समुदाय के बीच एक अलग पहचान बनाई। वें तब भी सारण का विधानपरिषद में प्रतिनिधित्व कर रहे थे जब 2022में उनका निधन हो गया। तब साये की तरह पिता के साथ रहने वाले
आनंद पुष्कर के लिए यह सिर्फ पिता की राजनीतिक विरासत नहीं है।
नीतीश कुमार जी के साथ आनंद पुष्कर
वे इसे शिक्षकों के हित और समस्या के लिए खड़े होने की जिम्मेदारी के रूप में देखते हैं।आनंद पुष्कर thebigpost com से कहते हैं कि
मैं कार्पोरेट सेक्टर में अच्छी नौकरी कर रहा था। पैकेज भी अच्छा था । पिताजी के निधन के बाद सब कुछ छोड़कर मैं सिर्फ इसलिए शिक्षकों के बीच लौटा कि पिताजी के विचारों को आगे बढ़ा सकूं। शिक्षकों की आवाज बन उनकी तरह सरकार तक पहुंचाने की हिम्मत और ताल ठोककर सच को सच कहने की ताकत रख सकूं।
वें यह भी कहते हैं कि बचपन से पिताजी को शिक्षकों के हित के लिए लड़ते देखा है मुझे आज खुशी है कि मैं उस लड़ाई को पिताजी के जाने के बाद एक सैनिक के रूप में आगे बढ़ा सकूं।
बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से मुलाकात ,शिक्षकों के हित पर चर्चा
पिता की विरासत, आज के समय की आवाज
समय बदला है और शिक्षकों की चुनौतियां भी बदली हैं। आज शिक्षक के सामने वेतन और सेवा सुरक्षा के साथ-साथ स्थानांतरण, पदोन्नति, पुरानी पेंशन, कार्यस्थल की परिस्थितियां और भविष्य की सुरक्षा जैसे सवाल हैं।
आनंद पुष्कर का कहते है कि शिक्षकों की पुरानी लड़ाइयों की भावना को बनाए रखते हुए आज की समस्याओं के लिए नई आवाज तैयार करनी होगी।
यही मेरे चुनावी अभियान का मूल संदेश भी है। वें आगे कहते हैं कि शिक्षकों के तबादले को लेकर मैंने शिक्षा मंत्री से मिलकर इसकी त्रुटियों को ठीक करने का अनुरोध भी किया है। पुरानी पेंशन लागू करवाना मेरी प्राथमिकता में शामिल हैं साथ ही शिक्षकों का प्रमोशन भी।
बिहार के शिक्षा मंत्री के साथ
चुनाव से पहले भी शिक्षक मुद्दों से जुड़े रहने का दावा
आनंद पुष्कर इससे पहले भी सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ चुके हैं। इस चुनावी सफर में उन्हें पिछली बार दूसरा स्थान मिला था।
लेकिन उनके अनुसार चुनाव परिणाम के बाद भी शिक्षकों के मुद्दों से उनका जुड़ाव कम नहीं हुआ। वे लगातार शिक्षकों की समस्याओं और उनके अधिकारों से जुड़े सवाल उठाते रहे।
उनका कहना है कि
“शिक्षक प्रतिनिधित्व केवल विधान परिषद क कुर्सी तक सीमित नहीं होना चाहिए। असली प्रतिनिधित्व तब है, जब शिक्षक की समस्या सामने आए तो उसकी आवाज बनने वाला कोई मौजूद हो। “
वें आगे कहते हैं कि
“के.के पाठक के वक्त जब शिक्षक परेशान थे तो सारण जीते हुए प्रतिनिधि बस शोभा की वस्तु बने हुए थे। मैंने शिक्षकों के बीच जा उनकी समस्या सुनी और फिर तात्कालिक मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी से मिलकर इसे ठीक करने का सुझाव दिया। इसका असर भी सबने देखा।”
संकल्प-पत्र में शिक्षक केंद्र में
आनंद पुष्कर के चुनावी संकल्प-पत्र में शिक्षकों की विभिन्न श्रेणियों के मुद्दों को शामिल किया गया है। नियमित और नियोजित शिक्षकों की सेवा शर्तों से लेकर वेतनमान, पदोन्नति, पेंशन, स्थानांतरण, भविष्य निधि और अवकाश जैसी सुविधाओं कई विषय इसमें रखे गए हैं। नए शिक्षकों की समस्याओं के साथ-साथ वित्त रहित विद्यालयों और महाविद्यालयों, संस्कृत विद्यालयों, मदरसों और अल्पसंख्यक संस्थानों में कार्यरत शिक्षकों के सवालों को भी एजेंडे में शामिल किया गया है।
हर शिक्षक की आवाज बनने की कोशिश
आनंद पुष्कर की राजनीति का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि वे शिक्षक समुदाय को अलग-अलग श्रेणियों में देखने के बजाय उनके साझा हितों को सामने रखने बात करते हैं। उनके एजेंडे में विश्वविद्यालय शिक्षकों से लेकर शारीरिक शिक्षकों तक के मुद्दे शामिल हैं। वेतनमान, सेवा सुरक्षा और सम्मान के साथ शिक्षा व्यवस्था में शिक्षकों की भूमिका को मजबूत करने की बातें भी उनके संकल्प-पत्र में दिखाई देती हैं। अब विरासत को परिणाम में बदलने की चुनौती केदार नाथ पाण्डेय ने शिक्षक हितों के लिए जिस आवाज को अपनी राजनीतिक पहचान बनाया, आनंद पुष्कर उसी आवाज को आगे ले जाने की कोशिश कर रहे हैं।
जदयू उम्मीदवार आनंद पुष्कर के सामने चुनौती पिता की विरासत, अपने अनुभव और शिक्षकों के बीच सक्रियता को एक ऐसी राजनीतिक ताकत में बदलने की चुनौती तो है पर वे इसे बखुबी निभाते भी दिख रहे हैं।
‘सेवा का संकल्प ‘
सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र का चुनाव इसी कसौटी पर आनंद पुष्कर की अगली राजनीतिक पारी तय करेगा।
किसी विरासत की सबसे बड़ी परीक्षा यह नहीं कि उसे कितनी बार याद किया जाता है, बल्कि यह है कि उसे कितनी ईमानदारी से आगे बढ़ाया जाता है। आनंद पुष्कर के लिए केदार नाथ पाण्डेय की विरासत इसी परीक्षा का नाम है—और इस परीक्षा के केंद्र में हैं सारण के शिक्षक । सारण के शिक्षकों के सुख-दुख में खड़े रहने का दावा करने वाले आनंद पुष्कर को शिक्षकों का प्यार और भरोसा कितना मिल पाता है यह तो चुनाव के रिजल्ट से पता चलेगा। बहरहाल जोर शोर से मुद्दों को उठाकर शिक्षकों को हक दिलाने के वायदे के साथ आनंद पुष्कर इस चुनावी मैदान में मजबूती से डटे हुए हैं।
यदि इरादे मजबूत हों तो साधारण शुरुआत भी असाधारण मंजिल तक पहुंचा सकती है। भारत की दवा उद्योग की दुनिया में रमेश जुनेजा इसका जीवंत उदाहरण हैं। कभी मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव (MR) के रूप में शहर-शहर घूमकर डॉक्टरों से मिलने वाले रमेश जुनेजा ने एक ऐसी कंपनी खड़ी की, जिसने लाखों लोगों तक किफायती दवाइयां पहुंचाईं और भारतीय फार्मा उद्योग में अपनी अलग पहचान बनाई।
साधारण परिवार से बड़े सपनों की शुरुआत
रमेश जुनेजा का जीवन किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत एक मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव के रूप में की। उन दिनों वे बसों और ट्रेनों से लंबी यात्राएं करते, डॉक्टरों और दवा विक्रेताओं से मिलते और दवाइयों की जानकारी देते थे। यह संघर्ष ही आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी पूंजी बना।
संघर्ष ने सिखाया बाजार का असली सच
मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव रहते हुए उन्होंने करीब से देखा कि देश के अनेक मरीज महंगी दवाइयां खरीदने में सक्षम नहीं हैं। डॉक्टर अच्छी दवा लिखते थे, लेकिन आर्थिक तंगी के कारण कई मरीज इलाज पूरा नहीं कर पाते थे। यही अनुभव उनके जीवन का निर्णायक मोड़ बना।
जन्म हुआ एक बड़े विचार का
रमेश जुनेजा ने तय किया कि ऐसी दवाइयां बनाई जाएं जो गुणवत्ता में बेहतर हों, लेकिन आम लोगों की पहुंच से बाहर न हों। इसी सोच के साथ वर्ष 1995 में उन्होंने अपने साथियों के साथ Mankind Pharma की स्थापना की।
भरोसा बना सबसे बड़ी ताकत
शुरुआत आसान नहीं थी। सीमित संसाधनों और कड़ी प्रतिस्पर्धा के बीच कंपनी ने डॉक्टरों, मेडिकल स्टोरों और मरीजों का विश्वास जीतने पर जोर दिया। गुणवत्ता और उचित कीमत ने कंपनी को तेजी से आगे बढ़ाया।
आज भारत की अग्रणी फार्मा कंपनियों में शामिल
आज मैनकाइंड फार्मा देश की प्रमुख दवा कंपनियों में गिनी जाती है। कंपनी का कारोबार हजारों करोड़ रुपये का है और इसके उत्पाद भारत ही नहीं, कई अन्य देशों में भी उपलब्ध हैं। यह सफलता केवल व्यवसाय की नहीं, बल्कि एक ऐसे विचार की जीत है जो आम लोगों के लिए बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से शुरू हुआ था।
युवाओं के लिए पांच बड़ी सीख
शुरुआत छोटी हो सकती है, लेकिन सोच बड़ी होनी चाहिए।
संघर्ष से घबराने के बजाय उससे सीखिए।
ग्राहक की वास्तविक जरूरत को समझना सफलता की सबसे बड़ी कुंजी है।
गुणवत्ता और भरोसा किसी भी ब्रांड की सबसे बड़ी पहचान होते हैं।
लगातार मेहनत और धैर्य से असंभव दिखने वाले लक्ष्य भी हासिल किए जा सकते हैं।
द बिग पोस्ट की बात
रमेश जुनेजा की कहानी बताती है कि सफलता केवल पूंजी से नहीं, बल्कि दृष्टि, ईमानदारी और निरंतर प्रयास से मिलती है। यदि आपका उद्देश्य समाज की किसी वास्तविक समस्या का समाधान करना है, तो एक छोटा विचार भी करोड़ों लोगों के जीवन में बदलाव ला सकता है।
26 वर्षीय वेंकट रमना बचपन से एक दुर्लभ बीमारी के कारण बिस्तर तक सीमित रहे। लेकिन सीखने की ललक, परिवार के विश्वास और AI की ताकत ने उन्हें डिजिटल मार्केटिंग प्रोफेशनल बना दिया।
बिस्तर बन गया बचपन की दुनिया
जेन जी को अक्सर सोशल मीडिया और रील्स की पीढ़ी कहा जाता है। लेकिन इसी पीढ़ी में कुछ ऐसे युवा भी हैं, जो विपरीत परिस्थितियों को अपनी ताकत बना लेते हैं। 26 वर्षीय वेंकट रमना की कहानी ऐसी ही प्रेरणा देती है।
वेंकट रमना जन्म से ऑस्टियोजेनेसिस इम्परफेक्टा नामक दुर्लभ बीमारी से पीड़ित हैं। इस बीमारी में हड्डियां इतनी कमजोर होती हैं कि मामूली दबाव भी फ्रैक्चर का कारण बन सकता है। बचपन का अधिकांश समय उन्होंने बिस्तर पर बिताया।
जब स्कूल नहीं जा सके, तो घर बन गया विद्यालय
स्कूल जाना उनके लिए संभव नहीं था। ऐसे में उनकी मां और दादी ने ही शिक्षक की भूमिका निभाई। घर पर पढ़ाई शुरू हुई और बाद में उन्होंने ओपन स्कूल से अपनी शिक्षा पूरी की।
यह सफर आसान नहीं था, लेकिन परिवार ने कभी उन्हें यह महसूस नहीं होने दिया कि वे दूसरों से अलग हैं।
मोबाइल बना जिंदगी बदलने का माध्यम
जहां बहुत से लोग मोबाइल को केवल मनोरंजन का साधन मानते हैं, वहीं वेंकट रमना ने उसे सीखने का माध्यम बनाया।
उन्होंने इंटरनेट के जरिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), डिजिटल मार्केटिंग और अन्य डिजिटल स्किल्स सीखीं। लगातार अभ्यास करते रहे और खुद को नई तकनीकों के अनुरूप तैयार किया।
मेहनत ने दिलाई नई पहचान
उनकी मेहनत रंग लाई। आज वे एक निजी कंपनी में डिजिटल मार्केटिंग लीड के रूप में कार्यरत हैं और अपने कौशल के दम पर सम्मानजनक आय अर्जित कर रहे हैं।
यह उपलब्धि बताती है कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती और सफलता के लिए परिस्थितियों से ज्यादा जरूरी है दृढ़ संकल्प।
मां ने दिया हौसला
वेंकट रमना की सफलता के पीछे उनकी मां और दादी का अटूट विश्वास रहा। उन्होंने बेटे की बीमारी को उसकी कमजोरी नहीं बनने दिया, बल्कि हर कदम पर उसका मनोबल बढ़ाया।
कई बार परिवार का भरोसा ही वह ताकत बन जाता है, जो किसी व्यक्ति को असंभव लगने वाली मंजिल तक पहुंचा देता है।
जेन जी की एक अलग तस्वीर
यह कहानी उन लोगों की सोच भी बदलती है, जो पूरी जेन जी को केवल मोबाइल और सोशल मीडिया से जोड़कर देखते हैं।
नई पीढ़ी का एक चेहरा ऐसा भी है, जो तकनीक का उपयोग सीखने, आगे बढ़ने और समाज के लिए प्रेरणा बनने में कर रहा है।
The Big Post की बात
हर इंसान की जिंदगी में चुनौतियां होती हैं। फर्क सिर्फ इतना होता है कि कोई उन्हें अपनी किस्मत मान लेता है और कोई उन्हें अपनी ताकत बना लेता है। वेंकट रमना ने दूसरा रास्ता चुना। इसलिए उनकी कहानी सिर्फ एक युवक की सफलता नहीं, बल्कि उम्मीद, साहस और आत्मविश्वास की ऐसी मिसाल है, जो हर युवा को यह संदेश देती है—
“शरीर की सीमाएं आपके सपनों की सीमा नहीं तय कर सकतीं।”
जब धरती हरियाली की चुनरी ओढ़ती है, बादल शिव-स्तुति में ॐ नमः शिवाय की धुन गाते हैं और प्रकृति रिमझिम बारिश के साथ भक्ति में सराबोर हो जाती है तब सावन हमें भी भीतर के शिव को जगाने का संदेश देता है। आइए, इस पावन माह में मन, विचार और जीवन को शिवमय बनाएं।
सावन है आत्मपरिवर्तन का उत्सव
सावन आते ही प्रकृति जैसे नवजीवन से भर उठती है। रिमझिम बारिश, मिट्टी की सोंधी महक, हरियाली से ढकी धरती और मंदिरों में गूंजता “हर-हर महादेव” का उद्घोष वातावरण को भक्तिमय बना देता है। लेकिन सावन का वास्तविक अर्थ केवल व्रत, पूजा और जलाभिषेक तक सीमित नहीं है। यह अपने भीतर झांकने, स्वयं को बेहतर बनाने और शिव के आदर्शों को जीवन में उतारने का अवसर है।
शिव इसलिए हैं सबसे खास
भगवान शिव की सबसे बड़ी विशेषता उनकी सहजता और सरलता है।
वे ऐसे देवाधिदेव हैं जिन्हें प्रसन्न करने के लिए किसी वैभव या आडंबर की आवश्यकता नहीं होती। श्रद्धा से अर्पित किया गया एक लोटा जल, कुछ बेलपत्र, धतूरा, आक के फूल और निष्कलुष मन की भक्ति ही उन्हें प्रिय है।
यही कारण है कि उन्हें भोलेनाथ कहा जाता है। वे भक्त के धन, पद या प्रतिष्ठा को नहीं, बल्कि उसके भाव को स्वीकार करते हैं। शिव का दरबार राजा और रंक, दोनों के लिए समान रूप से खुला है। उनका संदेश स्पष्ट है—ईश्वर तक पहुंचने का मार्ग दिखावे से नहीं, बल्कि सच्ची श्रद्धा और सरल हृदय से होकर जाता है।
शिव के आदर्श, जो जीवन को बदल सकते हैं
महादेव का जीवन हमें अनेक अमूल्य सीख देता है। समुद्र मंथन का विष स्वयं पीकर उन्होंने संसार को बचाया। यह त्याग का सर्वोच्च उदाहरण है। उनके मस्तक पर विराजमान चंद्रमा शीतलता का संदेश देता है, जटाओं में बहती गंगा पवित्रता का और ध्यानमग्न स्वरूप आत्मसंयम का।
शिव हमें सिखाते हैं—
– शक्ति हो तो उसका उपयोग संरक्षण के लिए करें। -क्रोध आए तो उसे विवेक से नियंत्रित करें। -सफलता मिले तो अहंकार से दूर रहें। -दूसरों के दुःख को कम करने का प्रयास करें। -प्रकृति और सभी जीवों का सम्मान करें।
सच्ची पूजा मन की होती है
शिवलिंग पर जल चढ़ाना आस्था का प्रतीक है, लेकिन उससे भी बड़ी पूजा है अपने भीतर के क्रोध, ईर्ष्या, अहंकार और द्वेष को धो देना। यदि हमारे शब्द मधुर हो जाएं, व्यवहार विनम्र हो जाए और विचार सकारात्मक हो जाएं, तो यही शिव की सबसे प्रिय आराधना है।
मंदिर में जल चढ़ाने के साथ यदि हम किसी प्यासे को पानी पिला दें, किसी दुखी के चेहरे पर मुस्कान ला दें और किसी जरूरतमंद का हाथ थाम लें, तो यही शिवत्व की सच्ची अनुभूति है।
इस सावन एक संकल्प जरुर लें
इस बार सावन में केवल व्रत रखने का संकल्प न लें, बल्कि—
# एक बुरी आदत छोड़ें।
# प्रतिदिन कुछ समय आत्मचिंतन करें।
# किसी जरूरतमंद की सहायता करें।
# एक पौधा लगाकर उसकी देखभाल करें।
#माता-पिता, गुरुजनों और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करें।
#अपने व्यवहार में शांति, करुणा और सादगी को स्थान दें।
यही छोटे-छोटे संकल्प जीवन को बड़ा और सुंदर बनाते हैं।
जब मन में उतरेंगे महादेव...
सावन तभी सार्थक होगा, जब शिव केवल मंदिरों में नहीं, हमारे चरित्र में भी दिखाई देंगे। जब हमारे भीतर करुणा होगी, व्यवहार में सरलता होगी, विचारों में शांति होगी और कर्मों में लोककल्याण का भाव होगा, तभी सच्चे अर्थों में महादेव हमारे मन में उतरेंगे।
आइए, इस सावन केवल “हर-हर महादेव” का उद्घोष ही न करें, बल्कि हर दिन अपने भीतर के अहंकार को त्यागकर प्रेम, सेवा, क्षमा और सद्भाव का दीप जलाएं।
याद रखिए, शिव पूजा के लिए केवल एक लोटा जल पर्याप्त हो सकता है, लेकिन शिवत्व को पाने के लिए निर्मल मन, पवित्र विचार और कल्याणकारी कर्म आवश्यक हैं।
जब मन में उतरें महादेव, तभी सच्चा होगा सावन।
हर-हर महादेव!
भाई, यह तो बिल्कुल No Cap है!”, “उसका Aura देखो!”, “She totally Slayed!”, “Let Him Cook!”—अगर ये शब्द आपको किसी दूसरी दुनिया की भाषा लगते हैं, तो घबराइए मत। यह शब्दकोश उस पीढ़ी का है, जिसे दुनिया
Gen Z के नाम से जानती है।
अक्सर सोशल मीडिया पर Gen Z का मजाक उड़ाया जाता है। कहा जाता है कि यह पीढ़ी मोबाइल से बाहर नहीं निकलती, जल्दी ऊब जाती है और वास्तविक दुनिया से कट चुकी है। लेकिन जब इस पीढ़ी को करीब से देखा जाए, तो एक बिल्कुल अलग तस्वीर सामने आती है। यह पीढ़ी सवाल पूछती है, नए रास्ते बनाती है, तकनीक को अवसर में बदलती है और समाज को पहले से अधिक संवेदनशील बनाने की कोशिश करती है।
डिजिटल नहीं, ‘डिजिटल-समझदार’ पीढ़ी
Gen Z इंटरनेट पर पैदा नहीं हुई, लेकिन इंटरनेट के साथ बड़ी हुई। यही कारण है कि वह तकनीक को केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं मानती, बल्कि सीखने, कमाने, संवाद करने और दुनिया बदलने का औजार भी समझती है। आज हजारों युवा अपने मोबाइल से ही कारोबार खड़ा कर रहे हैं, लाखों लोगों को ज्ञान दे रहे हैं और अपने हुनर से दुनिया में पहचान बना रहे हैं।
सफलता का नया अर्थ
इस पीढ़ी के लिए सफलता केवल बड़ी नौकरी या मोटी तनख्वाह नहीं है। वे ऐसा काम करना चाहते हैं जिसमें अर्थ भी हो और आनंद भी। वे मानसिक शांति, परिवार, यात्रा, रचनात्मकता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को भी उतना ही महत्व देते हैं जितना आर्थिक सफलता को।
संवेदनशीलता इसकी सबसे बड़ी ताकत है
Gen Z खुलकर कहती है कि मानसिक स्वास्थ्य भी स्वास्थ्य का ही हिस्सा है। तनाव, अकेलापन या अवसाद जैसी समस्याओं पर चुप रहने के बजाय बातचीत करना इस पीढ़ी ने सामान्य बनाया है। यह बदलाव आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक सकारात्मक विरासत है।
विविधता में विश्वास
यह पीढ़ी लोगों को उनके नाम, भाषा, पहनावे या पृष्ठभूमि से नहीं, बल्कि उनकी प्रतिभा और व्यक्तित्व से पहचानना चाहती है। समान अवसर और सम्मान इनके लिए केवल नारे नहीं, बल्कि जीवन के मूल्य हैं।
सीखना की ललक जीवनभर
Gen Z डिग्री मिलने के बाद पढ़ाई बंद नहीं करती। वह हर दिन कुछ नया सीखती है—कभी किसी ऑनलाइन कोर्स से, कभी पॉडकास्ट से, कभी किसी विशेषज्ञ के वीडियो से, तो कभी अपनी गलतियों से। यही सीखने की भूख उसे लगातार आगे बढ़ाती है।
समस्या नहीं, समाधान खोजने वाली सोच
जलवायु परिवर्तन हो, शिक्षा हो, महिला सुरक्षा हो, पशु संरक्षण हो या सामाजिक न्याय—Gen Z केवल बहस नहीं करती, बल्कि डिजिटल अभियानों, स्वयंसेवा, स्टार्टअप और नवाचार के माध्यम से समाधान खोजने की कोशिश करती है।
उनकी भाषा भी सकारात्मक है
‘Aura‘ आत्मविश्वास का प्रतीक है। ‘Slay‘ उत्कृष्ट प्रदर्शन का उत्सव है। ‘GOAT’ किसी क्षेत्र के सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति के लिए सम्मान है। ‘No Cap‘ सच बोलने का दावा है। यानी जिन शब्दों को कई लोग केवल इंटरनेट स्लैंग समझते हैं, उनमें भी आत्मविश्वास, उत्साह और अभिव्यक्ति की नई संस्कृति छिपी है।
हर पीढ़ी को समझने की जरूरत
जिस तरह कभी रेडियो सुनने वाली पीढ़ी को टीवी पसंद करने वाले बच्चे समझ नहीं आते थे, उसी तरह आज Gen Z भी कई लोगों को अलग लगती है। लेकिन इतिहास बताता है कि नई पीढ़ियां केवल फैशन नहीं बदलतीं, वे समाज की दिशा भी बदलती हैं।
और अंत में यह भी
Gen Z को केवल उसके मोबाइल, रील्स या नए शब्दों से मत आंकिए। उसके भीतर एक ऐसा युवा भारत है जो तेज है, तकनीक से लैस है, सीखने को उत्सुक है, सामाजिक रूप से जागरूक है और दुनिया को पहले से बेहतर बनाने का सपना देखता है।
हो सकता है उसकी भाषा नई हो, लेकिन उसके सपने बहुत पुराने हैं—एक बेहतर समाज, बेहतर अवसर और बेहतर भविष्य के।और सच कहें तो… यह बात बिल्कुल “No Cap” है।
सेंट माइकल्स हाई स्कूल, पटना ने ऑल इंडिया एंग्लो-इंडियन एसोसिएशन द्वारा 1 अगस्त 2026 को आयोजित अंतर-विद्यालयी तैराकी प्रतियोगिता में शानदार प्रदर्शन करते हुए 345 अंकों के साथ ओवरऑल चैंपियन बनने का गौरव हासिल किया। प्रतियोगिता में शहर के लगभग 17 प्रतिष्ठित विद्यालयों ने भाग लिया, जिनके बीच सेंट माइकल्स के तैराकों ने अपने उत्कृष्ट प्रदर्शन से सभी का ध्यान आकर्षित किया।
विद्यालय के खिलाड़ियों ने कुल 18 पदक जीतकर विद्यालय का गौरव बढ़ाया। इनमें 3 स्वर्ण, 8 रजत और 7 कांस्य पदक शामिल हैं। इसके अलावा रिले स्पर्धा में बालिका टीम ने प्रथम तथा बालक टीम ने द्वितीय स्थान प्राप्त कर टीम भावना और उत्कृष्ट समन्वय का परिचय दिया।
स्वर्ण पदक विजेता
– भाव्या – 50 मीटर फ्री स्टाइल
– भाव्या – 100 मीटर फ्री स्टाइल
– अमोघ – 25 मीटर बैक स्ट्रोक
रजत पदक विजेता
– आन्या त्रिवेदी – 50 मीटर फ्री स्टाइल
– पियूष – 50 मीटर फ्री स्टाइल
– अमोघ – 50 मीटर फ्री स्टाइल
– आन्या त्रिवेदी – 100 मीटर फ्री स्टाइल
– पियूष – 100 मीटर फ्री स्टाइल
– आर्या भारती – 25 मीटर बैक स्ट्रोक
– पियूष – 25 मीटर बैक स्ट्रोक
– आन्या मल्होत्रा – 25 मीटर ब्रेस्ट स्ट्रोक
कांस्य पदक विजेता
– आन्या मल्होत्रा – 25 मीटर फ्री स्टाइल
– लक्ष्यिता – 25 मीटर फ्री स्टाइल
– वैभव – 25 मीटर फ्री स्टाइल
– आन्या मल्होत्रा – 50 मीटर फ्री स्टाइल
– लक्ष्यिता – 25 मीटर बैक स्ट्रोक
– आन्या त्रिवेदी – 25 मीटर ब्रेस्ट स्ट्रोक
– अमोघ त्रिवेदी – 100 मीटर फ्री स्टाइल
विद्यालय के प्राचार्य फादर ए. क्रिस्टु सावरिराजन, एस.जे. ने सभी विजेता खिलाड़ियों को हार्दिक बधाई देते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की। उन्होंने कहा कि विद्यार्थियों की यह उल्लेखनीय उपलब्धि उनकी कड़ी मेहनत, अनुशासन और प्रशिक्षकों के समर्पित मार्गदर्शन का परिणाम है। उन्होंने प्रशिक्षकों एवं अभिभावकों के सहयोग की भी सराहना करते हुए विश्वास व्यक्त किया कि सेंट माइकल्स के विद्यार्थी भविष्य में भी राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विद्यालय और राज्य का नाम रोशन करेंगे।
खेल भावना, अनुशासन और उत्कृष्ट प्रदर्शन का शानदार संगम उस समय देखने को मिला जब सेंट माइकल्स हाई स्कूल द्वारा आयोजित 16वें सेंट इग्नेशियस ऑफ लोयोला इंटर-स्कूल फुटबॉल टूर्नामेंट का तीन दिवसीय आयोजन भव्य समापन के साथ संपन्न हुआ।
27 से 29 जुलाई तक आयोजित इस प्रतिष्ठित प्रतियोगिता में बिहार के 17 विद्यालयों की टीमों ने भाग लेकर अपनी प्रतिभा का उत्कृष्ट प्रदर्शन किया।
इनके बीच रहा फाइनल मुकाबला
टूर्नामेंट का फाइनल मुकाबला सेंट माइकल्स हाई स्कूल की टीम ‘ए’ और टीम ‘बी’ के बीच खेला गया, जिसे विद्यालय एवं विभिन्न स्कूलों के हजारों विद्यार्थियों और खेल प्रेमियों ने उत्साहपूर्वक देखा। रोमांचक मुकाबले में सेंट माइकल्स टीम ‘ए’ ने शानदार प्रदर्शन करते हुए विजेता ट्रॉफी अपने नाम की, जबकि टीम ‘बी’ उपविजेता रही।
फादर इग्नेशियस अब्राहम रहे मुख्य अतिथि
समापन समारोह के मुख्य अतिथि फादर इग्नेशियस अब्राहम, एस.जे., प्रसिद्ध शिक्षाविद् एवं संगीतकार थे। विद्यालय के बैंड द्वारा उनका भव्य स्वागत किया गया तथा पुष्पगुच्छ भेंट कर सम्मानित किया गया।
फेयर प्ले भावना ही किसी भी खेल की वास्तविक पहचान : फादर ए. क्रिस्टु
विद्यालय के प्रधानाचार्य फादर ए. क्रिस्टु सवरीराजन, एस.जे. ने अपने स्वागत भाषण में खिलाड़ियों की मेहनत, अनुशासन और टीम भावना की सराहना करते हुए कहा कि “फेयर प्ले और खेल भावना ही किसी भी खेल की वास्तविक पहचान हैं।” उन्होंने प्रतियोगिता में भाग लेने वाले सभी खिलाड़ियों को भविष्य के लिए शुभकामनाएँ भी दीं।
कार्यक्रम के अंत में वाइस प्रिंसिपल (हाई स्कूल) डॉ. मारी ऐनी डी’क्रूज़ ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए मुख्य अतिथि, विद्यालय प्रबंधन, रेफरी, शिक्षक समन्वयकों, खेल शिक्षकों तथा सभी प्रतिभागी विद्यालयों का आभार व्यक्त किया। राष्ट्रगान के साथ समारोह का समापन हुआ।
इन्हें मिला प्रमुख पुरस्कार
विजेता ट्रॉफी: सेंट माइकल्स हाई स्कूल, टीम ‘ए’, पटना
उपविजेता ट्रॉफी: सेंट माइकल्स हाई स्कूल, टीम ‘बी’, पटना
सर्वश्रेष्ठ फेयर प्ले टीम: लोयोला हाई स्कूल
व्यक्तिगत वर्गों में भी खिलाड़ियों ने उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हुए सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी, सर्वश्रेष्ठ गोलकीपर, सर्वश्रेष्ठ डिफेंडर, सर्वश्रेष्ठ स्कोरर, सर्वश्रेष्ठ प्लेमेकर एवं सर्वश्रेष्ठ उभरते खिलाड़ी सहित कई प्रतिष्ठित पुरस्कार अपने नाम किए। फाइनल मुकाबले के ‘प्लेयर ऑफ द मैच’ का सम्मान यामीन अहमद एवं नैतिक को संयुक्त रूप से प्रदान किया गया।
विद्यालय प्रबंधन ने कहा कि इस प्रकार की प्रतियोगिताएँ विद्यार्थियों में नेतृत्व क्षमता, अनुशासन, टीमवर्क तथा स्वस्थ प्रतिस्पर्धा की भावना विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। प्रतियोगिता का सफल आयोजन विद्यालय की खेल संस्कृति और उत्कृष्ट प्रबंधन का परिचायक रहा।
स्वस्थस्य स्वास्थ्य रक्षणम्, आतुरस्य विकार प्रशमनम्।” के मंत्र के साथ पटना का राजकीय आयुर्वेदिक कालेज एवं अस्पताल सेवा के सौ साल का सफर पूर्ण करने जा रहा है। इस अस्पताल और कालेज का इतिहास गौरवशाली रहा है। हम इसके वर्तमान को भी स्वर्णिम बनाने और वैश्विक पहचान दिलाने की कोशिश कर रहे हैं। हम आयुर्वेद के भारतीय चिकित्सा पद्धति की मूल भावना और सिद्धांत को कायम रखते हुए बदलते ज़माने के अनुसार नये प्रयोग भी कर रहे हैं। हम यहां से आयुर्वेद के वैश्विक पटल को और प्रखर करने की कोशिश में जुटे हैं। शताब्दी वर्ष में “इंटरनेशनल सिम्पोजियम कम सेंटेनरी कमेमोरेशन इसी पहल की एक कड़ी है। कहतीं हैं इस महाविद्यालय की प्राचार्या डॉ .उमा पाण्डेय।
डॉ. उमा पाण्डेय
वें आगे कहती हैं कि हम इस कालेज के शताब्दी वर्ष समारोह के माध्यम से दुनिया को, ऐसे समय में जब हमारी जीवन शैली हमें तन और मन दोनों से बीमार कर रही है यह संदेश भी देना चाहते हैं कि आयुर्वेद ही स्वस्थ जीवन का मार्ग है। आज देश और प्रदेश की सरकार ने इसपर काफी ध्यान दिया है। प्रधानमंत्री जी की अगुवाई में आयुर्वेद ने काफी ऊंचाई पाई है।
क्यों खास है इंटरनेशनल सिम्पोजियम
राजकीय आयुर्वेदिक महाविद्यालय एवं अस्पताल, पटना अपने स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में 25 एवं 26 जुलाई 2026 को “इंटरनेशनल सिम्पोजियम कम सेंटेनरी कमेमोरेशन” का आयोजन करेगा। इस दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का मुख्य विषय “Ayurveda and Global Healthcare Futures: Integrating Traditional Wisdom with Evidence-Based Health Systems” रखा गया है।
इस संगोष्ठी का उद्देश्य आयुर्वेद की पारंपरिक चिकित्सा पद्धति को आधुनिक वैज्ञानिक प्रमाणों पर आधारित स्वास्थ्य प्रणाली के साथ जोड़ते हुए भविष्य की वैश्विक स्वास्थ्य व्यवस्था पर सार्थक संवाद स्थापित करना है।
दुनिया भर से आएंगे विशेषज्ञ
सम्मेलन में भारत सहित विभिन्न देशों के विशेषज्ञ, चिकित्सक, शोधकर्ता, शिक्षाविद, स्नातकोत्तर एवं स्नातक छात्र तथा स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े पेशेवर भाग लेंगे।
यहां होगा आयोजन स्थल
आयोजन का शुभारंभ सरकारी आयुर्वेदिक महाविद्यालय एवं अस्पताल, कदमकुआँ तथा ज्ञान भवन, अशोका कन्वेंशन सेंटर, गांधी मैदान, पटना में होगा। कार्यक्रम का आयोजन महाविद्यालय की संगोष्ठी आयोजन समिति द्वारा किया जा रहा है, जिसे बिहार सरकार के स्वास्थ्य विभाग और भारत सरकार के आयुष मंत्रालय का सहयोग प्राप्त है।
रील मेकिंग से लेकर फैशन शो तक
राजकीय आयुर्वेदिक महाविद्यालय एवं अस्पताल, पटना के शताब्दी वर्ष समारोह के अंतर्गत विद्यार्थियों की प्रतिभा को मंच प्रदान करने के लिए विभिन्न सांस्कृतिक, शैक्षणिक एवं रचनात्मक प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाएगा। महाविद्यालय प्रशासन ने छात्रों से 12 जुलाई 2026 तक नामांकन करने की अपील की है। कार्यक्रमों में 15 जुलाई को रील मेकिंग, 17 जुलाई को योग प्रतियोगिता, 18 जुलाई को श्लोक वाचन, 20 जुलाई को स्टूडेंट पार्लियामेंट, 22 जुलाई को स्टैंड-अप कॉमेडी, 23 जुलाई को फैशन शो, 24 जुलाई को रंगोली एवं आयुर्वेदोक्त पथ्याहार प्रतियोगिता तथा 25 जुलाई को क्विज प्रतियोगिता और पोस्टर प्रेजेंटेशन का आयोजन होगा। महाविद्यालय प्रशासन के अनुसार शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित ये प्रतियोगिताएं विद्यार्थियों की रचनात्मकता, ज्ञान, संस्कृति और प्रतिभा को नई पहचान देने के साथ-साथ उन्हें अपनी क्षमता प्रदर्शित करने का अवसर प्रदान करेंगी।
भाग लेने के लिए पंजीकरण निःशुल्क
आयोजन समिति ने बताया कि पोस्टर एब्स्ट्रैक्ट जमा करने तथा पंजीकरण की अंतिम तिथि 10 जुलाई 2026 निर्धारित की गई है, जबकि 15 जुलाई को पोस्टर चयन की सूचना जारी की जाएगी। सम्मेलन में भाग लेने के लिए पंजीकरण पूरी तरह निःशुल्क है, हालांकि सभी प्रतिभागियों के लिए पूर्व पंजीकरण अनिवार्य होगा।
सम्मेलन के दौरान शोधकर्ताओं और युवा वैज्ञानिकों को अपने शोध प्रस्तुत करने का अवसर मिलेगा। उत्कृष्ट पोस्टर प्रस्तुति को “Government Ayurvedic College Centenary Best Poster Award” से सम्मानित किया जाएगा।
अपने शताब्दी वर्ष में आयोजित यह अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयुर्वेद की समृद्ध विरासत को वैश्विक मंच पर नई पहचान दिलाने तथा पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के समन्वय से भविष्य की स्वास्थ्य सेवाओं को नई दिशा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।
पांच टर्म से वें BIA के अध्यक्ष हैं। बिहार के सबसे बड़े मार्केट कॉम्प्लेक्स खेतान सुपर मार्केट के निर्माता हैं। बिहार के बड़े व्यवसायियों में शामिल हैं और इन सब से बढ़कर हैं एक मुकम्मल इंसान, जिन्होंने इस घोर बाज़ारवादी समय में भी अपनी संवेदनाओं को हानि-लाभ के पलड़ों से बचाए रखा है। आज कहानी श्री राम को अपना आदर्श मानने और उस पर चलने-बढ़ने वाले राम लाल खेतान की।
कहां से शुरू करूं? बहुत सी बोसीदा यादें हैं, बचपन की भी और इस शहर पटना की भी। नन्हीं उम्र में पटना से जो रिश्ता जुड़ा, वह अब तक कायम है।
दादाजी, दादीजी ,पिताजी और माताजी के परलोकवासी हो जाने के बाद पटना ही तो है, जिसकी गोद में बैठकर अब भी मैं बालपन वाली ज़िद कर बैठता हूं। यह शहर मुझे अपनों का एहसास दिलाता है, अपनेपन का एहसास दिलाता है और एहसास दिलाता है उस वजूद का, जिसे हम ज़िंदगी कहा करते हैं।
ग़म में इस शहर ने हीं ढाढ़स बंधाया है, सुख-दुख में एक जैसा बने रहना सिखाता है। सच कहूं तो मुझे मेरी ज़िंदगी की यात्रा इस शहर की यात्रा जैसी लगती है।
वो बचपन के दिन
मेरा जन्म 5 अप्रैल 1960 को हुआ था। जन्म के दिन रामनवमी थी। तब हमारा परिवार पटना सिटी के हीरा नंद साह गली में रहता था। जन्म के दिन रामनवमी होने के कारण मेरा नाम भी प्रभु राम से जुड़ गया—रामलाल। परिवार धर्म-कर्म में खूब आस्था रखता था। जन्म के बाद हर जन्मदिन पर घर में नौ दिनों का अखंड रामायण पाठ होता रहा।मैं भी हमेशा श्री राम का नन्हा बालक बनकर उनके बताए रास्ते पर चलने की कोशिश करता हूं। वैसे हमलोग मूल रूप से राजस्थान के रामगढ़ के हैं। हमारी कुल देवी सती दादी झुंझनू है।
ऐसा रहा बचपन
मेरे पिताजी मोतीलाल खेतान व्यवसायी थे। माताजी सरला देवी खेतान गृहिणी और सामाजिक महिला थीं। पिताजी का जन्म 28 जुलाई 1035 को पटना में हीं हुआ था। मेरा ननीहाल झारखंड के साहेबगंज में है। नानाजी मुरारी लाल भरतीया प्रसिद्ध व्यवसाई रहे हैं।
माताजी-पिताजी के प्यार के साथ मुझे दादाजी प्रयाग नारायण खेतान और दादी भगवती देवी खेतान का भी खूब दुलार मिला। मुझे अपने परदादा -दादी , केदारमल खेतान,मोरी देवी खेतान को भी देखने का सौभाग्य मिला है।
दादाजी लाड़-प्यार में ही ज़िंदगी की सीख भी सिखा देते थे। दादाजी धोती -कुर्ता और सर पर टोपी पहना करते थे। मैंने
बचपन के नन्हें कदम गिरते-संभलते हुए जब थोड़े मजबूत हुए और मैं शब्दों की भाषा में संवाद करने लगा, तो मेरी शिक्षा-दीक्षा की चिंता परिवार में शुरू हुई। फिर क, ख, ग के प्रारंभिक ज्ञान के बाद मेरा दाखिला पटना सिटी के सेंट जॉन एकेडमी में कराया गया। यह पादरी की हवेली में चला करता था।
अब घर से निकलकर रिक्से में बैठ स्कूल जाना अब मेरी दिनचर्या में शामिल हो गया। स्कूल में मेरे कई बाल सखा बने।
हम अपने दोस्तों के साथ भोलेपन में दुनिया की अचरज भरी बातें किया करते—कभी रेडियो की, कभी टमटम की, तो कभी गोलघर की ऊंचाइयों पर हम सभी दोस्त एक-दूसरे का ज्ञानवर्धन करते रहते।
सभी जल्दी बड़े होना चाहते थे, जिससे पढ़ाई-लिखाई से मुक्ति और मस्ती की शुरुआत हो सके। कभी-कभी हम टीचर के गुस्से से बचने के लिए मन ही मन भगवान जी से गुहार भी लगा लेते। उस वक्त शिक्षक अधिकार के साथ बच्चों की बेंत से पिटाई भी कर देते थे।
तब स्कूलों में ब्लैकबोर्ड और चॉक से टीचर पढ़ाते थे। हम बच्चों के पास टीन और मिट्टी के बने स्लेट होते थे। तब स्कूलों में बस्ता-बैग के साथ टीन की छोटी पेटियां ले जाने का प्रचलन था।
यादें विकास विद्यालय की
पांचवीं के बाद मेरा दाखिला रांची के विकास विद्यालय में कराया गया। यह एक बोर्डिंग स्कूल है। इसके विशाल कैंपस में मुझे अपने घर, शहर और मोहल्ले की गलियां खूब याद आतीं। इस स्कूल की तब काफी साख थी। हमें पढ़ाई के साथ-साथ खेल और कलात्मक गतिविधियां भी सिखाई जाती थीं। दिन भर तो कट जाता, पर रात का पहर हीरानंद साह गली की यादों में बीतता। मां की भी खूब याद आती।
विकास विद्यालय में मेरी आठवीं तक की पढ़ाई हुई। फिर स्वास्थ्य समस्या की वजह से मैं पटना लौट आया।
उस वक्त 1971 की जंग चल रही थी। पेट में कुछ समस्या आई थी। पीएमसीएच में मेरी सर्जरी हुई।तबीयत ठीक होने के बाद मेरा दाखिला पटना के बुद्ध मूर्ति के पास एक स्कूल में कर दिया गया।
फिर से अपनी गलियां, अपना शहर और अपने लोग।
हीरानंद साह गली में हम सब बच्चे चोर-सिपाही जैसे खेल खेलते। मेरे भाई श्याम लाल खेतान, बहन विनीता, सुनीता, अनीता—सब परिवार में एक-दूसरे का ख्याल रखते थे।
मैं रिक्शे पर साइकिल लाद ले गया
उन दिनों पटना शहर में मोटरसाइकिल और मोटरगाड़ियों की भीड़ नहीं थी। मैं घर ( राजेन्द्र नगर) से स्कूल पैदल ही जाया करता। फिर कुछ दिनों बाद दोस्तों की साइकिल देख, मैंने भी मां से साइकिल खरीदने की ज़िद कर डाली। मां ने पिताजी से आग्रह किया और फिर मेरी खूबसूरत बीएसए एसएलआर साइकिल 600 में खरीदी गई। उस वक्त मैं ठीक से साइकिल चलाना भी नहीं जानता था। मैं साइकिल रिक्शे पर लेकर घर गया था।
दिल में बसी है हीरानंद साह गली
उस वक्त पटना सिटी से पटना जाने के लिए टमटम चला करता था। फटफटिया गाड़ी भी चलती थी। पटना सिटी के हीरानंद साह गली की बहुत सी यादें हैं। यह गली इतनी संकरी थी कि जब पिताजी ने कार खरीदी तो वह घर तक नहीं आ पाती थी। हमारे घर में तब एक रेडियो भी था। जब यह बजता तो हम सब भाई-बहन बड़े ध्यान से इसकी ओर देखते। हमें बड़ा आश्चर्य लगता कि इस डब्बे से आवाज कैसे आती है। हमें लगता जरूर इसके अंदर कोई आदमी बैठा होगा।
तब समाज में सादगी के साथ अपनापन भी था। मुहल्ले के एक-दो घरों के फोन और फ्रिज से पूरे मुहल्ले का काम चलता ही नहीं, दौड़ता था।
फोन आने पर लोगों को सम्मान के साथ बुलावा भेजा जाता, तब फोन पर बातों के साथ आने वाला व्यक्ति चाय, शर्बत का आनंद भी उठाता। इसी तरह अगर कोई अतिथि बाहर से आता तो फ्रिज वाले घर से बेहिचक लोग ठंडा पानी और बर्फ मांग लेते। तब न मांगने वाले में हिचक होती, न देने वाले में घमंड। छोटी से बड़ी जरूरतें इस सामाजिक समरसता से आराम से पूरी हो जाती थीं। तब किसी परिवार की समस्या उसकी समस्या न होकर पूरे मुहल्ले या समाज की समस्या होती थी। अब हम सोशल मीडिया पर तो हैं, पर व्यक्तिगत जीवन में अनसोशल होते जा रहे हैं। आज समाज की छोड़िए, परिवार का हर सदस्य अपने मोबाइल फोन में मगन दिखता है। अब परिवार के सदस्यों के बीच न खुलकर बातें होती हैं, न ही रिश्तेदारों का आना-जाना। वह मीठा अपनापन गुम हो चुका है।
मैं एक और किस्सा सुनाता हूं। पिताजी ने जब एम्बेसडर कार खरीदी और वे उससे पटना सिटी से पटना जाते, तो हमारे पड़ोस के लोग अधिकार के साथ उस पर सवार हो जाते। उन्हें पिताजी और दादाजी भी पूरा सम्मान देते। आज हम किसी की गाड़ी में लिफ्ट मांगने से पहले हजार बार सोचेंगे, न जाने गाड़ी वाला कैसा व्यवहार करे।
एक थान से बनता सब भाई -बहन का कपड़ा
हम पांचों भाई-बहनों को जब कपड़े की जरूरत पड़ती, तो एक रंग के थान से ही सबका कपड़ा लिया जाता और हम टेलर के पास जाकर उसका नाप दे आते। कपड़ा बनने पर हम सभी एक बैंड पार्टी के सदस्य लगते।
बाबूजी ने लिया नया मकान
1971 में हम पटना सिटी के मकान को छोड़कर पटना के राजेंद्र नगर आ गए। यहां पिताजी ने डॉ. शिव नारायण सिंह जी का मकान खरीदा। आज तक हम उसी मकान में रह रहे हैं। मुझे याद है, इसी साल पटना में बाढ़ आई थी और पूरा पटना नगर डूब गया था। तब मुहल्ले में नाव चल रही थी। मुझे याद है घर के अंदर तक बाढ़ का पानी प्रवेश कर गया था। हमारी चार गाड़ियां भी पूरी तरह से नष्ट हो गई।
1976 में मैट्रिक पास करने के बाद मेरा एडमिशन वाणिज्य महाविद्यालय, पटना में हुआ। यहां से 1978 में मैं छात्र संघ चुनाव में वाइस प्रेसिडेंट के पद के लिए चुनावी मैदान में भी उतरा, पर जीत हासिल नहीं हो पाई। सन 1980 में मैंने स्नातक की पढ़ाई पूरी की।
बिहार कै पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी के साथ रामलाल खेतान
बिजनेस सीखाने के लिए समोसे का लालच
पिताजी का सीमेंट से बिजली के खंभे बनाने का बिजनेस था। बंकाघाट में 1965 में इसका कारखाना लगा था। साथ ही स्टेशन रोड पर एक खेतान मशीनरी नामक दुकान थी।
यह दुकान ही उस वक्त सीमेंट खंभे वाले बिजनेस का दफ्तर भी बना हुआ था।
वें बताते हैं कि मेरे दादाजी और पिताजी चाहते थे कि मैं बिजनेस की बारीकियां सीखूं। उन दिनों इसके लिए पिताजी ने नायाब तरीका निकाला। उन्होंने मुझसे कहा कि अगर तुम फैक्ट्री जाओगे तो एक रुपए रोज मिला करेंगे। इसके साथ स्कूटर और तेल का खर्च भी मिलेगा।
मुझे लगा यह जेब खर्च निकालने के लिए अच्छा अवसर है और मैंने हामी भर दी। मैं रोज फैक्ट्री जाने लगा। मुझे पिताजी एक रुपए भी दे देते।
इधर दादाजी ने भी मुझे लालच दिया, उन्होंने यह शर्त रखी कि अगर फैक्ट्री के बाद तुम दूकान पर भी शाम में आ जाता करोगे तो मैं रोज तुम्हें मारवाड़ी आवास गृह में एक समोसा खिलाऊंगा। दादाजी की चाल भी कामयाब हो गई और मैं समोसे के लिए शाम को दूकान पर भी बैठने लगा। मुझे बाद में समझ आया कि पिताजी और दादाजी की यह चालबाजी मुझे बिजनेस की बारिकियां सीखाने के लिए थी। बाद में मुझे इससे काफी फायदा मिला और मैं बिजनेस अच्छे से संभाल पाया।
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन जी के साथ अपने आवास पर चर्चा के दौरान
स्टील फैक्ट्री का संभाला काम
दादाजी के पारिवारिक रिश्ते बिजनेसमैन से भी काफी मधुर थे। मशहूर वेदांता ग्रुप के फाउंडर अनिल अग्रवाल और उनके पिताजी द्वारका प्रसाद अग्रवाल अक्सर दादाजी से मिलने आया करते थे।
1982 में पिताजी ने स्टील की एक फैक्ट्री पटना सिटी में खरीदी। इस फैक्ट्री का पूरा काम मैं देखता था। 90 के दशक में स्टील निर्माण में बड़ी कंपनियां आने लगीं। इस कारण हमें घाटा लगने लगा और वह फैक्ट्री बंद हो गई।
बाद में हमने बिहार की पहली प्लास्टिक हाउसहोल्ड की फैक्ट्री लगाई। इसके बाद 2005 में पहली प्लास्टिक फर्नीचर यूनिट भी लगाई। इसका नाम हाईटेक प्लास्टिक है। भाई श्याम लाल ने मुंबई में 2010 में प्लास्टिक ड्रम की फैक्ट्री शुरू की। मुंबई के गोरेगांव को उन्होंने अपना निवास स्थान बनाया।
जीवन साथी का साथ
वे आगे बताते हैं कि 1984 में मैं विवाह के बंधन में बंधा और कोलकाता की संगीता खेतान जीवन संगिनी बनीं। संगीता के पिता मक्खन लाल जी सर्राफ कोलकाता के प्रतिष्ठित व्यक्ति में शामिल थे। संगीता के परिवार में पांच भाई और पांच बहन शामिल थे।
रंग उमंग के : परिवार के सदस्यों के साथ
संगीता का मेरे जीवन के तमाम उतार-चढ़ाव, सुख-दुख में अनमोल सहयोग मिला।खास तौर से तब भी जब मैं 1987 में बुरी तरह से बीमार हो गया था। तब उन्होंने मेरी पूरी देखभाल का जिम्मा खुद उठाया था। इसी तरह 2000 में भी जब मेरी सर्जरी हैदराबाद के AIG HOSPITAL में डॉ. डीएन रेड्डी और DOCTOR G.V ROY के द्वारा हुई । मां के निधन के बाद सारे घर का कामकाज संगीता ने अच्छे से संभाल लिया।
मीठी हंसी: नाती- नातिन और जुड़वां पोते -पोती के अनमोल पल
बच्चो के प्यार से मिट जाती सारी थकान
बच्चों के बारे में बताते हुए राम लाल खेतान कहते हैं कि हमारी दो बेटियां और एक बेटा है। बड़ी बेटी डॉ. नेहा, छोटी डॉ. नूपुर और बेटा नितीश हैं। सभी अपने करियर में अच्छा कर रहे हैं, यह देखकर मुझे खुशी होती है।
पटना का खेतान मार्केट
ऐसे तैयार हुआ अनोखा खेतान मार्केट
हमने पटना में एक बेहतर आधुनिक मार्केट कॉम्प्लेक्स बनाने की सोची, जो अपनी डिजाइन और गुणवत्ता में देश में स्थान रखता हो। इसके लिए हमरे छोटे भाई शयाम लाल खेतान द्वारा रत के तमाम बड़े मार्केट कॉम्प्लेक्स का मुआयना किया, उनकी वास्तुकला देखी और इसके बाद खेतान मार्केट का डिजाइन तैयार हुआ।
खेतान मार्केट के निर्माण में तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव जी का अमूल्य सहयोग हमें मिला। आज भी यह मार्केट कॉम्प्लेक्स बिहार का सबसे बड़ा मार्केट है। इसमें कुल 1208 दुकानें हैं।
फैक्ट्री में इंदिरा गांधी का कार्यक्रम
जब हमारी फैक्ट्री में आईं इंदिरा गांधी
राम लाल खेतान पुरानी तस्वीर दिखाते हुए कहते हैं कि हमारे फतुहा वाली फैक्ट्री में इंदिरा गांधी जी आई थीं, तब वह प्रधानमंत्री थीं। वे आगे कहते हैं कि उस पद पर रहते हुए भी उनमें गजब की सादगी और व्यवहार कुशलता दिखती थी।
मुझे याद है कि वह अपना छाता खुद हाथ में पकड़े थीं। हमारी बहन सुनीता को भी उन्होंने गोद में लेकर काफी देर तक दुलारा। आज छोटे से पद पर जाकर लोग अहंकार से भर जाते हैं। तब और अब लोगों की सोच में काफी परिवर्तन आ गया है। राजनीति का मिजाज भी इतने सालों में काफी बदल गया।
प्रसिद्ध कथावाचक मोरारी बापू के सानिध्य में
धार्मिक कार्यों में रम गए पिताजी
पिताजी कभी राजनीति में नहीं रहे, लेकिन राजनेताओं से उनके संबंध काफी मधुर हुआ करते थे। हमारे घर तब बड़े-बड़े राजनेताओं का आना-जाना लगा रहता था। पिताजी वनबंधु परिषद के अध्यात्मिक सत्संग समिति के अध्यक्ष रहे। इस संस्था को उन्होंने काफी ऊंचाई दी।
इसके साथ ही वे बिहार चेंबर ऑफ कॉमर्स के अध्यक्ष पद पर भी रहे।
पिताजी की रुचि प्रारंभ से ही धार्मिक कार्यों में काफी ज्यादा रहा करती थी। वे सामाजिक कामों में भी पूरा समय देते थे।
1990 में माताजी के देहांत के बाद पिताजी पूरी तरह से धार्मिक कार्यों में रम गए। पिताजी ने पटना में नामी संतों को बुलाकर उनका कार्यक्रम करवाया। इसमें मोरारी बापू,किरीट भाई, बाबा रामदेव आदि शामिल हैं।
उन्होंने मां के देहावसान के बाद पटना सिटी के अपने भवन को तुड़वाकर वहां पर मां की याद में सरला देवी खेतान सरस्वती देवी विद्यालय खोला। इस स्कूल में बच्चों को मुफ्त शिक्षा दी जाती थी।
वे आगे बताते हैं कि पिताजी को बाबा भूतनाथ नामक तांत्रिक में गहरी आस्था थी। वे उनके आध्यात्मिक गुरु भी थे। पिताजी ने बाबा को मंदिर बनाने के लिए जमीन दी थी। आज का भूतनाथ रोड उन्हीं के नाम पर है।
लालू जी से पारिवारिक रिश्ते
राम लाल खेतान बताते हैं कि लालू जी से मेरे पारिवारिक रिश्ते रहे हैं। मेरी बेटी उनकी बेटी के साथ पढ़ाई किया करती थीं। उनके परिवार से काफी पुराना संबंध रहा है, पर यह संबंध राजनीतिक नहीं है।
व्यक्तिगत तौर पर लालू प्रसाद जी नरम दिल के आदमी हैं।
व्यवसायी भाइयों की परेशानी दूर करना मेरा कर्तव्य
राम लाल खेतान कहते हैं कि BIA से मेरा काफी पुराना रिश्ता रहा है। मैं यहां शुरू में 2005 में ट्रेजरर बनाया गया था। इसके बाद सेक्रेटरी जेनरल और फिर वाइस प्रेसिडेंट तब प्रेसिडेंट बना यह मेरा पांचवां टर्म है।BIA के इतिहास में मैं हीं ऐसा हूं जो चार पदों पर रहा।
मेरी कोशिश रहती है कि बिहार में उद्योग-धंधों का विकास हो। इसके साथ ही हमारे व्यवसायी भाइयों को बिजनेस में जो दिक्कतें आ रही हैं, उनका समाधान निकाल सकूं।
मैं BIA को बिजनेसमैन और सरकार के बीच का सेतु बनाए रखना चाहता हूं।
देखिए, बिहार के लोग काफी मेहनती हैं। यहां बाजार भी उपलब्ध है। बिजनेस यहां काफी आगे बढ़ सकता है, पर सरकार को भी इसके लिए हम सब की समस्याओं से अवगत होना पड़ेगा।
बिहार में बिजनेस को बढ़ावा देने की सरकारी योजना बनाने से पहले जमीन पर उसका अवलोकन भी जरूरी है।
नीतीश जी के शासनकाल में सड़क और बिजली दोनों की हालत काफी बदली है। बिहार की नई सरकार से भी हमें काफी उम्मीदें हैं।
मिल चुके हैं कई सम्मान
रामलाल खेतान को 2007 में भाभा साह सम्मान , 2010 में भारतीय विकास रत्न सम्मान , 2011 में इंदिरा गांधी शिरोमणि सम्मान , समेत कई सम्मान से नवाजा गया है।
52 बार देखी फिल्म शोले
राम लाल खेतान बताते हैं कि मुझे ग़ज़ल सुनने के साथ ही फिल्मों का शौक भी रहा है। मैंने शोले फिल्म 50 बार देखी।
एक बार हम दोस्तों के साथ सत्यम – शिवम् सुंदरम फिल्म देखने पटना से मुजफ्फरपुर चले गए थे। मुझे मुगले आजम फिल्म का एक-एक संवाद अब भी याद है।
युवाओं को संदेश
बिजनेस में धैर्य की जरूरत पड़ती है। जो युवा इस क्षेत्र में आना चाहते हैं, उन्हें आइडिया के साथ धैर्यवान भी होना चाहिए। हम बड़ों को चाहिए कि अपने धार्मिक त्योहारों , देवताओं की जानकारी अपने बच्चों को भी दें।
अगर कहीं कोई गड़बड़ी हो तो हमें लोगों से शिकायतों की जगह मिलकर व्यवस्था को ठीक करने की जरूरत है।
ग़ज़ल सुनने का शौक रखने वाले राम लाल खेतान हमें जगजीत सिंह की ग़ज़ल की लाइनें सुनाते हैं—
“इस पुरानी बेवफ़ा दुनिया का रोना कब तलक आइए मिल-जुल के इक दुनिया नई पैदा करें।” वे कहते हैं हमें मिल-जुल कर एक नई दुनिया बनाने की जरूरत है, जो लालच, भय, भूख और ईर्ष्या से दूर सबकी मुस्कुराहटों को साथ लेकर खिलखिलाता हो।
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मेडिकल कॉलेज ने मना कर दिया… लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी कानूनी लड़ाई लड़ी आज वह सफल डॉक्टर हैं। आज की कहानी डॉ गणेश बरैया की….
प्रतिभा होने के बाद भी कई बार सामाजिक सोच और व्यवस्थाएं किसी व्यक्ति के सपनों के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा बन खड़ी हो जाती हैं।
तब ज्यादातर लोग हिम्मत खो देते हैं ।
ऐसी ही बाधाओं को तोड़कर ,
अपनी पहचान बनाने वाले शख्स हैं डॉ. गणेश बरैया।डॉ गणेश बरैया का जन्म गुजरात के भावनगर जिले के एक साधारण किसान परिवार में हुआ । जन्म से हीं संघर्षों ने दामन थाम लिया। पता चला कि
उन्हें ड्वार्फिज्म (बौनेपन) की समस्या है, जिसके कारण उनकी ऊंचाई केवल लगभग तीन फीट ही रह गई।,
स्कूल के दिनों में सहपाठी खूब चढ़ाते और रिश्तेदारों और अनजान लोगों से भी तानें सुनने पड़ते।
नहीं टूटने दिया आत्मविश्वास
इन परिस्थितियों के बाद भी उनके अंदर का आत्मविश्वास को टूटने की जगह मजबूत होता रहा । गणेश ने समझ लिया था कि अगर उन्हें समाज में अपनी पहचान बनानी है, तो पढ़ाई ही उनका सबसे बड़ा हथियार है।
सीमित संसाधनों और आर्थिक तंगी के बावजूद उन्होंने पढ़ाई में ध्यान देना शुरू किया। और देखा डॉक्टर बनने का सपना उनकी मेहनत रंग लाई जब उन्होंने NEET परीक्षा पास कर ली। यहां तक तो सब ठीक था पर संघर्ष अभी थमा नहीं था।
सपनों की दहलीज पर पहुंच लगा झटका
NEET पास करने के बाद जहां उनका सपना पूरा होने के करीब था, वहीं उन्हें मेडिकल कॉलेज में प्रवेश देने से मना कर दिया गया। कारण था उनकी शारीरिक स्थिति और कम ऊंचाई।
यह उनके लिए एक बड़ा झटका था। जिस लक्ष्य के लिए उन्होंने वर्षों तक मेहनत की, वह अचानक अधूरा नजर आने लगा।
लड़ी न्याय की लंबी लड़ाई
लेकिन गणेश ने हार नहीं मानी। उन्होंने इस फैसले को अदालत में चुनौती दी और न्याय के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी।
आखिरकार, सुप्रीम कोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया और स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति को उसकी शारीरिक स्थिति के आधार पर उसके सपनों से वंचित नहीं किया जा सकता। इसके बाद उन्हें MBBS में प्रवेश मिला।
मेडिकल कॉलेज की चुनौतियां भी अलग मुश्किल
मेडिकल कॉलेज का सफर भी आसान नहीं था। उपकरणों और सुविधाओं का उपयोग उनकी ऊंचाई के कारण कठिन था। कई बार उन्हें अतिरिक्त प्रयास करना पड़ता था, लेकिन उन्होंने हर चुनौती का सामना धैर्य और दृढ़ता से किया।
धीरे-धीरे उनकी मेहनत और लगन ने सबका नजरिया बदल दिया।
आज समाज के लिए बने हैं प्रेरक
आज डॉ. गणेश बरैया एक सफल डॉक्टर के रूप में कार्य कर रहे हैं और विशेष रूप से गरीब एवं जरूरतमंद मरीजों की सेवा कर रहे हैं।
उनकी कहानी यह बताती है की शारीरिक संरचना से बड़ी ताकत आपके खुद के आत्मविश्वास की है।