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दादाजी ने समोसे का लालच दे business सीखाया , आज हैं BIA प्रेसिडेंट, राम लाल खेतान के सफलता की कहानी पढ़िए

वें पिछले पांच टर्म से वे BIA के अध्यक्ष हैं। बिहार के सबसे बड़े मार्केट कॉम्प्लेक्स खेतान मार्केट के निर्माता हैं। बिहार के बड़े व्यवसायियों में शामिल हैं और इन सब से बढ़कर हैं एक मुकम्मल इंसान, जिन्होंने इस घोर बाज़ारवादी समय में भी अपनी संवेदनाओं को हानि-लाभ के पलड़ों से बचाए रखा है। आज कहानी श्री राम को अपना आदर्श मानने और उस  पर चलने-बढ़ने वाले राम लाल खेतान की।

हां से शुरू करूं? बहुत सी बोसीदा यादें हैं, बचपन की भी और इस शहर पटना की भी। नन्हीं उम्र में पटना से जो रिश्ता जुड़ा, वह अब तक कायम है।

दादाजी, पिताजी और माताजी के परलोकवासी हो जाने के बाद पटना ही तो है, जिसकी गोद में बैठकर अब भी मैं बालपन वाली ज़िद कर बैठता हूं। यह शहर मुझे अपनों का एहसास दिलाता है, अपनेपन का एहसास दिलाता है और एहसास दिलाता है उस वजूद का, जिसे हम ज़िंदगी कहा करते हैं।

ग़म में इस शहर ने  हीं ढाढ़स बंधाया है, सुख-दुख में एक जैसा बने रहना सिखाता है। सच कहूं तो मुझे मेरी ज़िंदगी की यात्रा इस शहर की यात्रा जैसी लगती है।

वो बचपन के दिन

मेरा जन्म 5 अप्रैल 1960 को हुआ था। जन्म के दिन रामनवमी थी। तब हमारा परिवार पटना सिटी के हीरा नंद साह गली में रहता था। जन्म के दिन रामनवमी होने के कारण मेरा नाम भी प्रभु राम से जुड़ गया—रामलाल। परिवार धर्म-कर्म में खूब आस्था रखता था। जन्म के बाद हर जन्मदिन पर घर में रामायण पाठ होता रहा।मैं भी हमेशा श्री राम का नन्हा बालक बनकर उनके बताए रास्ते पर चलने की कोशिश करता हूं।

ऐसा रहा बचपन 

मेरे पिताजी मोतीलाल खेतान व्यवसायी थे। माताजी सरला देवी खेतान गृहिणी और सामाजिक महिला थीं। माताजी-पिताजी के प्यार के साथ मुझे दादाजी का भी खूब दुलार मिला। दादाजी लाड़-प्यार में ही ज़िंदगी की सीख भी सिखा देते थे। बचपन के नन्हें कदम गिरते-संभलते हुए जब थोड़े मजबूत हुए और मैं शब्दों की भाषा में संवाद करने लगा, तो मेरी शिक्षा-दीक्षा की चिंता परिवार में शुरू हुई। फिर क, ख, ग के प्रारंभिक ज्ञान के बाद मेरा दाखिला पटना सिटी के सेंट जॉन एकेडमी में कराया गया। यह पादरी की हवेली में चला करता था।

अब घर से निकलकर स्कूल जाना अब मेरी दिनचर्या में शामिल हो गया। स्कूल में मेरे कई बाल सखा बने।

हम अपने दोस्तों के साथ भोलेपन में दुनिया की अचरज भरी बातें किया करते—कभी रेडियो की, कभी टमटम की, तो कभी गोलघर की ऊंचाइयों पर हम सभी दोस्त एक-दूसरे का ज्ञानवर्धन करते रहते।

सभी जल्दी बड़े होना चाहते थे, जिससे पढ़ाई-लिखाई से मुक्ति और मस्ती की शुरुआत हो सके। कभी-कभी हम टीचर के गुस्से से बचने के लिए मन ही मन भगवान जी से गुहार भी लगा लेते।

उस वक्त स्कूलों में ब्लैकबोर्ड और चॉक से टीचर पढ़ाते थे। हम बच्चों के पास टीन और मिट्टी के बने स्लेट होते थे। तब स्कूलों में बस्ता-बैग के साथ टीन की छोटी पेटियां ले जाने का प्रचलन था।

रांची स्थित विकास विद्यालय

यादें विकास विद्यालय की 

पांचवीं के बाद मेरा दाखिला रांची के विकास विद्यालय में कराया गया। यह एक बोर्डिंग स्कूल है। इसके विशाल कैंपस में मुझे अपने घर, शहर और मोहल्ले की गलियां खूब याद आतीं। इस स्कूल की तब काफी साख थी। हमें पढ़ाई के साथ-साथ खेल और कलात्मक गतिविधियां भी सिखाई जाती थीं। दिन भर तो कट जाता, पर रात का पहर साह गली की यादों में बीतता। मां की भी खूब याद आती।

विकास विद्यालय में मेरी आठवीं तक की पढ़ाई हुई। फिर स्वास्थ्य समस्या की वजह से मैं पटना लौट आया।
उस वक्त 1971 की जंग चल रही थी। पेट में कुछ समस्या आई थी। पीएमसीएच में मेरी सर्जरी हुई।तबीयत ठीक होने के बाद मेरा दाखिला पटना के बुद्ध मूर्ति के पास एक स्कूल में कर दिया गया।
फिर से अपनी गलियां, अपना शहर और अपने लोग।
हीरानंद साह गली में हम सब बच्चे चोर-सिपाही जैसे खेल खेलते। मेरे भाई श्याम लाल खेतान, बहन विनीता, सुनीता, अनीता—सब परिवार में एक-दूसरे का ख्याल रखते थे।

मैं रिक्शे पर साइकिल लाद ले गया 

उन दिनों पटना शहर में मोटरसाइकिल और मोटरगाड़ियों की भीड़ नहीं थी। मैं घर से स्कूल पैदल ही जाया करता। फिर कुछ दिनों बाद दोस्तों की साइकिल देख, मैंने भी मां से साइकिल खरीदने की ज़िद कर डाली। मां ने पिताजी से आग्रह किया और फिर मेरी खूबसूरत बीएसए एसएलआर साइकिल खरीदी गई। उस वक्त मैं ठीक से साइकिल चलाना भी नहीं जानता था। मैं साइकिल रिक्शे पर लेकर घर गया था।

पटना के राजेंद्र नगर की पुरानी तस्वीर, तब वह कुछ ऐसा दिखता था

 दिल में बसी है हीरानंद साह गली 

उस वक्त पटना सिटी से पटना जाने के लिए टमटम चला करता था। फटफटिया गाड़ी भी चलती थी। पटना सिटी के हीरानंद साह गली की बहुत सी यादें हैं। यह गली इतनी संकरी थी कि जब पिताजी ने कार खरीदी तो वह घर तक नहीं आ पाती थी। हमारे घर में तब एक रेडियो भी था। जब यह बजता तो हम सब भाई-बहन बड़े ध्यान से इसकी ओर देखते। हमें बड़ा आश्चर्य लगता कि इस डब्बे से आवाज कैसे आती है। हमें लगता जरूर इसके अंदर कोई आदमी बैठा होगा।

तब समाज में सादगी के साथ अपनापन भी था। मुहल्ले के एक-दो घरों के फोन और फ्रिज से पूरे मुहल्ले का काम चलता ही नहीं, दौड़ता था।

फोन आने पर लोगों को सम्मान के साथ बुलावा भेजा जाता, तब फोन पर बातों के साथ आने वाला व्यक्ति चाय, शर्बत का आनंद भी उठाता। इसी तरह अगर कोई अतिथि बाहर से आता तो फ्रिज वाले घर से बेहिचक लोग ठंडा पानी और बर्फ मांग लेते। तब न मांगने वाले में हिचक होती, न देने वाले में घमंड। छोटी से बड़ी जरूरतें इस सामाजिक समरसता से आराम से पूरी हो जाती थीं। तब किसी परिवार की समस्या उसकी समस्या न होकर पूरे मुहल्ले या समाज की समस्या होती थी। अब हम सोशल मीडिया पर तो हैं, पर व्यक्तिगत जीवन में अनसोशल होते जा रहे हैं। आज समाज की छोड़िए, परिवार का हर सदस्य अपने फोन में मगन दिखता है। अब परिवार के सदस्यों के बीच खुलकर बातें होती हैं, न ही रिश्तेदारों का आना-जाना। वह मीठा अपनापन गुम हो चुका है।

वो पुराने दिन: तब कुछ ऐसा था पटना

मैं एक और किस्सा सुनाता हूं। पिताजी ने जब कार खरीदी और वे उससे पटना सिटी से पटना जाते, तो हमारे पड़ोस के लोग अधिकार के साथ उस पर सवार हो जाते। उन्हें पिताजी भी पूरा सम्मान देते। आज हम किसी की गाड़ी में लिफ्ट मांगने से पहले हजार बार सोचेंगे, न जाने गाड़ी वाला कैसा व्यवहार करे।

एक थान से बनता सब भाई -बहन का कपड़ा 

हम पांचों भाई-बहनों को जब कपड़े की जरूरत पड़ती, तो एक रंग के थान से ही सबका कपड़ा लिया जाता और हम टेलर के पास जाकर उसका नाप दे आते। कपड़ा बनने पर हम सभी एक बैंड पार्टी के सदस्य लगते।

बाबूजी ने लिया नया मकान 

1975 में हम पटना सिटी  के मकान को छोड़कर पटना के राजेंद्र नगर आ गए। यहां पिताजी ने डॉ. शिव नारायण सिंह जी का मकान खरीदा। आज तक हम उसी मकान में रह रहे हैं। मुझे याद है, इसी साल पटना में बाढ़ आई थी और राजेंद्र नगर डूब गया था। तब मुहल्ले में नाव चल रही थी।
1978 में मैट्रिक पास करने के बाद मेरा एडमिशन वाणिज्य महाविद्यालय, पटना में हुआ। यहां से 1978 में मैं छात्र संघ चुनाव में वाइस प्रेसिडेंट के पद के लिए चुनावी मैदान में भी उतरा, पर जीत हासिल नहीं हो पाई। सन 1980 में मैंने स्नातक की पढ़ाई पूरी की।से

बिहार कै पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी के साथ रामलाल खेतान

बिजनेस सीखाने के लिए समोसे का लालच

पिताजी का सीमेंट से  बिजली के खंभे बनाने का बिजनेस था। फतुहा में इसकी फैक्ट्री थी। साथ ही स्टेशन रोड पर एक मशीनरी पार्ट की दुकान थी। यह दुकान ही उस वक्त सीमेंट खंभे वाले बिजनेस का दफ्तर भी बना हुआ था।
वें बताते हैं कि मेरे दादाजी और पिताजी चाहते थे कि मैं बिजनेस की बारीकियां सीखूं। उन दिनों इसके लिए पिताजी ने नायाब तरीका निकाला। उन्होंने मुझसे कहा कि अगर तुम फैक्ट्री जाओगे तो एक रुपए रोज मिला करेंगे। इसके साथ स्कूटर और तेल का खर्च भी मिलेगा।
मुझे लगा यह जेब खर्च निकालने के लिए अच्छा अवसर है और मैंने हामी भर दी। मैं रोज फैक्ट्री जाने लगा। मुझे पिताजी एक रुपए भी दे देते।


इधर दादाजी ने भी मुझे लालच दिया। उन्होंने यह शर्त रखी कि अगर फैक्ट्री के बाद तुम दुकान पर भी शाम में आ जाया करोगे तो मैं रोज एक समोसा तुम्हें खिलाऊंगा।
दादाजी की चाल भी कामयाब हो गई और मैं समोसे के लिए शाम को दुकान पर भी बैठने लगा। मुझे बाद में समझ आया कि पिताजी और दादाजी की यह चालबाजी मुझे बिजनेस की बारीकियां सिखाने के लिए थी।
बाद में मुझे इससे काफी फायदा मिला और मैं बिजनेस अच्छे से संभाल पाया।

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन जी के साथ चर्चा के दौरान

स्टील फैक्ट्री का संभाला काम 

1982 में पिताजी ने स्टील की एक फैक्ट्री खरीदी। इस फैक्ट्री का पूरा काम मैं देखता था। 90 के दशक में स्टील निर्माण में बड़ी कंपनियां आने लगीं। इस कारण हमें घाटा लगने लगा और वह फैक्ट्री बंद हो गई।
बाद में हमने बिहार की पहली प्लास्टिक हाउसहोल्ड की फैक्ट्री लगाई। इसके बाद 2005 में पहली प्लास्टिक फर्नीचर यूनिट भी लगाई। इसका नाम हाईटेक प्लास्टिक है।

जीवन साथी का साथ

वे आगे बताते हैं कि 1984 में मैं विवाह के बंधन में बंधा और कोलकाता की संगीता खेतान जीवन संगिनी बनीं। मेरे जीवन के तमाम उतार-चढ़ाव, सुख-दुख में उनका अनमोल सहयोग मिला।
खास तौर से तब भी जब मैं 1987 से बुरी तरह से बीमार हो गया था। तब उन्होंने मेरी पूरी देखभाल का जिम्मा खुद उठाया था। इसी तरह 2000 में भी जब मेरी सर्जरी हैदराबाद में हुई।मां के निधन के बाद सारे घर का कामकाज संगीता ने अच्छे से संभाल लिया।

बच्चो के प्यार से मिट जाती सारी थकान

बच्चों के बारे में बताते हुए राम लाल खेतान कहते हैं कि हमारी दो बेटियां और एक बेटा है। बड़ी बेटी डॉ. नेहा, छोटी डॉ. नूपुर और बेटा नितीश हैं। सभी अपने करियर में अच्छा कर रहे हैं, यह देखकर मुझे खुशी होती है।

पटना का खेतान मार्केट

ऐसे तैयार हुआ अनोखा खेतान मार्केट

हमने पटना में एक बेहतर आधुनिक मार्केट कॉम्प्लेक्स बनाने की सोची, जो अपनी डिजाइन और गुणवत्ता में देश में स्थान रखता हो। इसके लिए हमने भारत के तमाम बड़े मार्केट कॉम्प्लेक्स का मुआयना किया, उनकी वास्तुकला देखी और इसके बाद खेतान मार्केट का डिजाइन तैयार हुआ।
खेतान मार्केट के निर्माण में तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव जी का अमूल्य सहयोग हमें मिला। आज भी यह मार्केट कॉम्प्लेक्स बिहार का सबसे बड़ा मार्केट है। इसमें कुल 1208 दुकानें हैं।

जब हमारी फैक्ट्री में आईं इंदिरा गांधी

राम लाल खेतान पुरानी तस्वीर दिखाते हुए कहते हैं कि हमारे फतुहा वाली फैक्ट्री में इंदिरा गांधी जी आई थीं, तब वह प्रधानमंत्री थीं। वे आगे कहते हैं कि उस पद पर रहते हुए भी उनमें गजब की सादगी और व्यवहार कुशलता दिखती थी।
मुझे याद है कि वह अपना छाता खुद हाथ में पकड़े थीं। हमारी बहन को भी उन्होंने गोद में लेकर काफी देर तक दुलारा। आज छोटे से पद पर जाकर लोग अहंकार से भर जाते हैं। तब और अब लोगों की सोच में काफी परिवर्तन आ गया है। राजनीति का मिजाज भी इतने सालों में काफी बदल गया।

प्रसिद्ध कथावाचक मोरारी बापू के सानिध्य में

धार्मिक कार्यों में रम गए पिताजी

पिताजी कभी राजनीति में नहीं रहे, लेकिन राजनेताओं से उनके संबंध काफी मधुर हुआ करते थे। हमारे घर तब बड़े-बड़े राजनेताओं का आना-जाना लगा रहता था। पिताजी वनबंधु परिषद के अध्यक्ष रहे। इस संस्था को उन्होंने काफी ऊंचाई दी।
इसके साथ ही वे बिहार चेंबर ऑफ कॉमर्स के अध्यक्ष पद पर भी रहे।
पिताजी की रुचि प्रारंभ से ही धार्मिक कार्यों में काफी ज्यादा रहा करती थी। वे सामाजिक कामों में भी पूरा समय देते थे।
माताजी के देहांत के बाद पिताजी पूरी तरह से धार्मिक कार्यों में रम गए। पिताजी ने पटना में नामी संतों को बुलाकर उनका कार्यक्रम करवाया। इसमें मोरारी बापू, किरीट भाईबाबा रामदेव आदि शामिल हैं।
उन्होंने मां के देहावसान के बाद पटना सिटी के अपने भवन को तुड़वाकर वहां पर स्कूल खोला। इस स्कूल में बच्चों को मुफ्त शिक्षा दी जाती थी।
वे आगे बताते हैं कि पिताजी को बाबा भूतनाथ नामक तांत्रिक में गहरी आस्था थी। वे उनके आध्यात्मिक गुरु भी थे। पिताजी ने बाबा को मंदिर बनाने के लिए जमीन दी थी। आज का भूतनाथ रोड उन्हीं के नाम पर है।


लालू जी से पारिवारिक रिश्ते

राम लाल खेतान बताते हैं कि लालू जी से मेरे पारिवारिक रिश्ते रहे हैं। मेरी बेटी उनकी बेटी के साथ पढ़ाई किया करती थीं। उनके परिवार से काफी पुराना संबंध रहा है, पर यह संबंध राजनीतिक नहीं है।
व्यक्तिगत तौर पर लालू प्रसाद जी नरम दिल के आदमी हैं।

व्यवसायी भाइयों की परेशानी दूर करना मेरा कर्तव्य 

राम लाल खेतान कहते हैं कि BIA से मेरा काफी पुराना रिश्ता रहा है। मैं यहां शुरू में ट्रेजरर बनाया गया था। इसके बाद सेक्रेटरी और फिर वाइस प्रेसिडेंट और पांच टर्म से प्रेसिडेंट हूं।
मेरी कोशिश रहती है कि बिहार में उद्योग-धंधों का विकास हो। इसके साथ ही हमारे व्यवसायी भाइयों को बिजनेस में जो दिक्कतें आ रही हैं, उनका समाधान निकाल सकूं।
मैं BIA को बिजनेसमैन और सरकार के बीच का सेतु बनाए रखना चाहता हूं।

देखिए, बिहार के लोग काफी मेहनती हैं। यहां बाजार भी उपलब्ध है। बिजनेस यहां काफी आगे बढ़ सकता है, पर सरकार को भी इसके लिए हम सब की समस्याओं से अवगत होना पड़ेगा।

बिहार में बिजनेस को बढ़ावा देने की सरकारी योजना बनाने से पहले जमीन पर उसका अवलोकन भी जरूरी है।
नीतीश जी के शासनकाल में सड़क और बिजली दोनों की हालत काफी बदली है। बिहार की नई सरकार से भी हमें काफी उम्मीदें हैं।

52 बार देखी फिल्म शोले 

राम लाल खेतान बताते हैं कि मुझे ग़ज़ल सुनने के साथ ही फिल्मों का शौक भी रहा है। मैंने शोले फिल्म 50 बार देखी।
एक बार हम दोस्तों के साथ फिल्म देखने पटना से मुजफ्फरपुर चले गए थे। मुझे मुगले आजम फिल्म का एक-एक संवाद अब भी याद है।

युवाओं को संदेश

बिजनेस में धैर्य की जरूरत पड़ती है। जो युवा इस क्षेत्र में आना चाहते हैं, उन्हें आइडिया के साथ धैर्यवान भी होना चाहिए। अगर कहीं कोई गड़बड़ी हो तो हमें लोगों से शिकायतों की जगह मिलकर व्यवस्था को ठीक करने की जरूरत है।
ग़ज़ल सुनने का शौक रखने वाले राम लाल खेतान हमें जगजीत सिंह की ग़ज़ल की लाइनें सुनाते हैं—

“इस पुरानी बेवफ़ा दुनिया का रोना कब तलक
आइए मिल-जुल के इक दुनिया नई पैदा करें।”
वे कहते हैं हमें मिल-जुल कर एक नई दुनिया बनाने की जरूरत है, जो लालच, भय, भूख और ईर्ष्या से दूर सबकी मुस्कुराहटों को साथ लेकर खिलखिलाता हो।

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मिलिए 3 फीट के डॉक्टर गणेश से, और इनके हौसले को भी सलाम कीजिए

कद महज तीन फीट,सपना

डॉक्टर बनने का,

मेडिकल कॉलेज ने मना कर दिया…
लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी
कानूनी लड़ाई लड़ी
आज वह सफल डॉक्टर हैं।
आज की कहानी डॉ गणेश बरैया की….

प्रतिभा होने के बाद भी कई बार सामाजिक सोच और व्यवस्थाएं किसी व्यक्ति के सपनों के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा बन खड़ी हो जाती हैं।
तब ज्यादातर लोग हिम्मत खो देते हैं ।
ऐसी ही बाधाओं को तोड़कर ,
अपनी पहचान बनाने वाले शख्स हैं  डॉ. गणेश बरैया।डॉ गणेश बरैया का जन्म गुजरात के भावनगर जिले के एक साधारण किसान परिवार में हुआ । जन्म से हीं संघर्षों ने दामन थाम लिया। पता चला कि
उन्हें ड्वार्फिज्म (बौनेपन) की समस्या है, जिसके कारण उनकी ऊंचाई केवल लगभग तीन फीट ही रह गई।,
स्कूल के दिनों में सहपाठी खूब चढ़ाते और रिश्तेदारों और अनजान लोगों से भी तानें सुनने पड़ते।

नहीं टूटने दिया आत्मविश्वास

इन परिस्थितियों के बाद भी उनके अंदर का आत्मविश्वास को टूटने की जगह मजबूत होता रहा । गणेश ने समझ लिया था कि अगर उन्हें समाज में अपनी पहचान बनानी है, तो पढ़ाई ही उनका सबसे बड़ा हथियार है।
सीमित संसाधनों और आर्थिक तंगी के बावजूद उन्होंने पढ़ाई में ध्यान देना शुरू किया। और देखा डॉक्टर बनने का सपना उनकी मेहनत रंग लाई जब उन्होंने NEET परीक्षा पास कर ली। यहां तक तो सब ठीक था पर संघर्ष अभी थमा नहीं था।

सपनों की दहलीज पर पहुंच लगा झटका

NEET पास करने के बाद जहां उनका सपना पूरा होने के करीब था, वहीं उन्हें मेडिकल कॉलेज में प्रवेश देने से मना कर दिया गया। कारण था उनकी शारीरिक स्थिति और कम ऊंचाई।
यह उनके लिए एक बड़ा झटका था। जिस लक्ष्य के लिए उन्होंने वर्षों तक मेहनत की, वह अचानक अधूरा नजर आने लगा।

 

लड़ी न्याय की लंबी लड़ाई

लेकिन गणेश ने हार नहीं मानी। उन्होंने इस फैसले को अदालत में चुनौती दी और न्याय के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी।
आखिरकार, सुप्रीम कोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया और स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति को उसकी शारीरिक स्थिति के आधार पर उसके सपनों से वंचित नहीं किया जा सकता। इसके बाद उन्हें MBBS में प्रवेश मिला।

मेडिकल कॉलेज की चुनौतियां भी अलग मुश्किल

मेडिकल कॉलेज का सफर भी आसान नहीं था। उपकरणों और सुविधाओं का उपयोग उनकी ऊंचाई के कारण कठिन था। कई बार उन्हें अतिरिक्त प्रयास करना पड़ता था, लेकिन उन्होंने हर चुनौती का सामना धैर्य और दृढ़ता से किया।
धीरे-धीरे उनकी मेहनत और लगन ने सबका नजरिया बदल दिया।

आज समाज के लिए बने हैं प्रेरक

आज डॉ. गणेश बरैया एक सफल डॉक्टर के रूप में कार्य कर रहे हैं और विशेष रूप से गरीब एवं जरूरतमंद मरीजों की सेवा कर रहे हैं।
उनकी कहानी यह बताती है की शारीरिक संरचना से बड़ी ताकत आपके खुद के आत्मविश्वास की है।

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शहद से जिंदगी में मिठास भरने वाली ‘HONEY GIRL’ अनीता कुशवाहा की कहानी पढ़ें

 

“मैं जब छोटी थी, तो बगीचे में मधुमक्खियों के पीछे दौड़ती ,उन्हें फूलों से रस निकालते देखती थी। धुन में मगन हो छत्ते बनाते देखती थी।सच कहूं तो मेहनत और लगन मैंने इन्हीं से सीखी है।”

कहती हैं बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के पटियासा गांव की रहने वाली अनीता कुशवाहा । अनीता ने गरीबी से लड़कर न सिर्फ खुद को शिक्षित किया बल्कि मधुमक्खी पालन कर आज एक सफल उद्यमी में शुमार भी हो चुकी हैं।

हानी मधु से मिठास भरने वाली हनी गर्ल अनीता कुशवाहा की।

वो मुफ़लिस वाले दिन और मेरी जिद

thebigpost.com के मॉडरेटर vivek chandra से बातचीत करते हुए अनीता पुराने दिनों को याद कर भावुक हो जाती हैं। वें कहती हैं वो बहुत बुरा दौर था। तब हमारा परिवार बेहद गरीब परिवार में शामिल हुआ करता था। मेरे माता और पिताजी खेतीहर
मजदूर थे। काम भी हमेशा नहीं मिलता। ज्यादातर काम के बदले भी अनाज हीं मिला करता था तब उसी से हम सब की जीविका चलती थी।

मेरे गांव पटियासा का माहौल ऐसा था कि लड़कियों को स्कूल भेजना जरूरी नहीं माना जाता था। मुझे भी शुरुआती दिनों में स्कूल जाने से रोका गया। कहा जाता वहां जाकर क्या करोगी। “पता है तब मैं क्या करती थी !

मैं चुपके से स्कूल जाकर बच्चों के पीछे बैठ जाती थीं, और स्कूल की पढ़ाई का हिस्सा बन जाती।”
यह क्रम कुछ दिनों तक चला।

...और मान गए पिताजी

एक दिन ज़िद करके अपने माता-पिता को पढ़ाई के लिए मनाया। वें मान गए और मैं स्कूल अधिकार के साथ जाने लगी। अब मैं बहुत खुश थी। कागज पर सपनों के अक्षर सजाती, जोर जोर से कविताएं गाती। यह सब चलता रहा।

“जानते हैं मुफलिसी आपके सपनों को जीने नहीं देती। वह बार बार अड़ंगा डाल उसे रोकती है।”

मेरी पढ़ाई शुरू तो हुई पर आगे चलकर पढ़ाई जारी रखने के लिए पैसों की दिक्कत आने लगी। पिताजी की कमाई न निश्चित थी न उतनी की मुझे पढ़ा पाते। बचपन से ही मैं थोड़ी ज़िद्दी रही हूं तो मैंने भी जिद की पढ़ाई तो छोड़ना नहीं है। खुद से निचली कक्षा के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने का काम सोचा और शुरू कर दिया। काम चल निकला। अब मुझे पढ़ाई और खुद के खर्च के पैसों के लिए पिताजी पर बोझ नहीं बनना पड़ता।

पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम जी के साथ अनीता

मधुमक्खियां ने दिखाया रास्ता

अनीता कुशवाहा आगे कहती हैं हम मुजफ्फरपुर जिले से हैं और आपको मालूम होगा कि यह दुनिया भर में शाही लीची के लिए प्रसिद्ध है। मेरे गांव में भी लीची के खुब पेड़ हैं। वो लीची का सीजन था।इसी दौरान मेरा ध्यान मधुमक्खियों की ओर गया। लीची के पेड़ों पर मधुमक्खियां अपना राग गाते हुए मंडरा रही थीं। वह फूलों से रस निकालतीं।


मैंने सोचा क्यों न इन मधुमक्खियों से कमाई का रास्ता ढूंढा जाएं। क्यों न इन्हें पालकर शहद निकाला जाए। मैंने घर में इसकी चर्चा की पर किसी ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। उल्टे मुझे समझाने लगे, पर कहा न मैं हूं जिद्दी। ट्यूशन की कमाई से कुछ पैसे इकट्ठा किया और पहलापहला बी बॉक्स (Bee Box) खरीदा।शुरुआत में काफी परेशानी आई।

“मधुमक्खियों के डंक से चेहरा सूज जाता।
गांव के लोग देखकर मेरा मजाक उड़ाते । “सब कहते बेवकूफ यह काम  लड़कियों का नहीं है, “काबिल मत बनो”

छोटा काम बना बड़ा कारोबार

अनीता आगे कहती हैं कि सब कुछ अनसुना कर मैं अपने काम में लगी रही। धीरे धीरे अनुभव भी बढ़ा और बक्से भी।
पहले ही साल मुझे लगभग 10,000 रुपये का मुनाफा हुआ, अब मेरा मनोबल बढ़ा चुका था।एक-दो बॉक्स से बढ़कर 100 बॉक्स और फिर 200 से ज्यादा मधुमक्खी बॉक्स हो गए।

मेरा सालाना उत्पादन 100 क्विंटल तक पहुंचा। परिवार वालों की आर्थिक स्थिति भी सुधरने लगी। वें कहती हैं आज मेरी साल में लाखों रुपये की कमाई है।

बिहार के माननीय उपमुख्यमंत्री से सम्मानित होती अनीता

NCERT के किताब तक कहानी

अनीता की कहानी जानकर UNICEF ने उन्हें अपनी “Girl Stars” मुहिम के लिए चुना और अनीता दुनिया भर में हनी गर्ल के रूप में प्रसिद्ध हो गई।अनीता के संघर्ष और सफलता की कहानी पर फिल्म और किताबें बनीं। यही नहीं अनीता कुशवाहा की कहानी को स्कूलों में पढाएं जाने वालेNCERT की किताब (कक्षा 4) के चैप्टर में शामिल किया गया।
अनीता कहती हैं…

आज कभी कभी जब मैं पीछे मुड़कर देखती हूं तो लगता है क्या मैं वहीं लड़की हूं जिसने इतना संघर्ष किया है।”

वाकई बहुत संघर्ष के दिन थे वह और उसी संघर्ष ने मुझे तराशा है। एक ग्लोबल पहचान दी है।

शुरुआत में जहां अनीता के परिवार वालों ने इस काम का विरोध किया था , वहीं बाद में उनके पिता भी इस काम में उनके साथ जुड़ गए।आज अनीता न सिर्फ अपने परिवार को बेहतर जीवन दे रही हैं, बल्कि अपने बच्चों की पढ़ाई पर भी खास ध्यान दे रही हैं।
उनका सपना है कि उनके बच्चे बिना संघर्ष के अच्छी शिक्षा पा सकें।

बनाया अपना ब्रांड 

आज अनीता ने अपना ब्रांड  Anita’s honey बनाया है।अनिता कुशवाहा कहती है कि Anita’s honey   आज एक भरोसे का नाम बन चुका है। हम शुद्ध शहद उपलब्ध करवा कर इस भरोसे को हमेशा कायम रखना चाहते हैं। हम गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं करते।
अनीता ने मुजफ्फरपुर के मिठनपुरा में अपना शो रूम भी खोला है। अनीता कहती हैं कि हम लीची के शहर से हैं तो लीची का शहद तो हम उपलब्ध करवाते ही हैं इसके साथ साथ और कई वेराइटी के शहद भी हमारे यहां मिल जाएंगे ।

इसमें मस्टर्ड हनी, तुलसी हनी, जामून, शहजन आदि के हनी भी हमारे ब्रांड में शामिल है। सबके अपने अपने फायदे हैं। आज सोशल मीडिया की वजह से मेरा बिजनेस देश के साथ विदेशों तक भी फ़ैल गया है।
मेरा खास लगाव मुजफ्फरपुर शहर से हैं। मैं यहीं रहकर अपने प्रोडक्ट को दुनिया में और मशहूर करना चाहती हूं।

“मुजफ्फरपुर शहर ,लीची की तरह हीं मिठास से भरा है ‌ । हमें यहां बाबा गरीबनाथ का आशिर्वाद मिलता है तो बूढ़ी गंडक मैया का आशीष भी। यहां के लोग अच्छे हैं, मीठे है। मैं अपने ब्रांड से न सिर्फ खुद को बल्कि अन्य किसानों और मधुमक्खी पालकों को साथ लेकर आगे बढ़ना चाहती हूं। युवाओं से यहीं कहुंगी कि संघर्ष ही सफलता का द्वार है।”

(thebigpost.com की कोशिश बदलाव की कहानियों को सामने लाने की है। आप हमें आर्थिक सहयोग कर हमारी मुहिम को मजबूत कर सकते हैं। हमें आर्थिक मदद गुगल पे नंबर  7488413830 पर कर सकते हैं)

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गाली दी तो लगेगा जुर्माना! भारत के इस गांव का नियम जान लीजिए

आज के दौर में जहां सोशल मीडिया  से लेकर सड़कों तक भाषा की मर्यादा लगातार टूटती नजर आ रही है। गाली को फैशन ट्रेंड बनाने का प्रचलन तेजी से  बढ़ रहा है  वहीं  महाराष्ट्र का एक छोटा सा गांव सौंदला ने अपने  गांव में गाली के प्रयोग पर प्रतिबंध लगा दिया है। इसके बाद भी किसी ने गाली का प्रयोग किया तो उसपर 500 रूपया जुर्माना लगाया जाता है। इस गांव की पंचायत ने यह नियम बनाया है। पढ़ें पूरी कहानी…

क्या है पूरा मामला?

महाराष्ट्र के सौंदला गांव में पंचायत ने एक अनोखा नियम लागू किया है। यहां अगर कोई व्यक्ति गाली-गलौज करता है या अपशब्दों का इस्तेमाल करता है, तो उसे जुर्माना भरना पड़ता है। यह नियम सिर्फ डर पैदा करने के लिए नहीं, बल्कि गांव के माहौल को सकारात्मक और सम्मानजनक बनाए रखने के लिए बनाया गया है।

क्यों लिया गया यह फैसला?

गांव के बुजुर्गों और पंचायत का मानना है कि
गाली-गलौज से सामाजिक माहौल खराब होता है
बच्चों पर इसका गलत असर पड़ता है,
आपसी रिश्तों में कड़वाहट बढ़ती है।
इन्हीं कारणों से ग्राम सभा में यह प्रस्ताव पास किया गया कि भाषा पर नियंत्रण जरूरी है। गांव के शरद कहते हैं कि हम मां के कोख से जन्म लेते हैं और फिर मां को ही गाली देते हैं। यह कहां तक सही है! हमारे पंचायत का फैसला गांव के माहौल को सौम्य बना रहा। हम यहां एक दूसरे का आदर करते हैं न कि गाली देकर अपमानित।

इतना लगता है जुर्माना?

आमतौर पर जुर्माने  की राशि  500 रूपया रखी गई है पर गाली देने की गंभीरता के आधार पर जुर्माने की राशि तय की जाती है। हल्की गलती पर कम और बार-बार गलती करने पर ज्यादा जुर्माना देना पड़ता है। कुछ मामलों में सार्वजनिक माफी भी मांगनी पड़ती है।


इस नियम का असर भी जान लीजिए 

इस पहल का असर अब साफ दिखने लगा है—
गांव में झगड़े कम हो गए हैं। लोग एक-दूसरे से सम्मानपूर्वक बात कर रहे हैं।
बच्चों के सामने सकारात्मक उदाहरण बन रहा है।
गांव के लोग कहते हैं कि “अब यहां बोलने से पहले लोग सोचते हैं।”

एक छोटा कदम, बड़ा बदलाव

सौंदला गांव की यह पहल सिर्फ एक नियम नहीं, बल्कि एक सामाजिक प्रयोग है। यह दिखाता है कि अगर समुदाय ठान ले, तो छोटी-छोटी आदतों को बदलकर बड़ा बदलाव लाया जा सकता है।

“thebigpost.com”  मानता है कि समाज में बदलाव के लिए हमेशा बड़े संसाधनों की जरूरत नहीं होती। कभी-कभी एक छोटा सा नियम भी बड़ी क्रांति की शुरुआत बन सकता है।
सौंदला गांव की यह पहल आज के समय में एक आईना है—जहां हम सबको अपनी भाषा और व्यवहार पर फिर से सोचने की जरूरत है।

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‘आकृति’ के ‘मंच पर कलाकारों ने बताया ‘ युद्ध’ नहीं ‘प्रेम’  है आदमी की जरूरत 

मुजफ्फरपुर, की सांस्कृतिक माटी पर एक बार फिर मनुष्यता को संजोये रखने की कोशिश ने आकार लिया है। यहां आपको अपने सपनों के चटख रंग मिलेंगे तो जिंदगी को जी लेने का हुनर भी। आंखें सुरमई बन आशाओं का पैमाना छलका चहक उठेगी। यह जादू हो रहा है मुजफ्फरपुर राष्ट्रीय नाट्य मेला 3 में।

भावनाओं में गोता लगाते रहे दर्शक 

आकृति रंग संस्थान, मुजफ्फरपुर’ द्वारा आयोजित २७से३१ मार्च तक चलने वाले सांस्कृतिक आयोजन मुजफ्फरपुर राष्ट्रीय नाट्य मेल का दूसरा दिन भी पहले दिन सा हीं उत्साह से सराबोर रहा।
चित्रकला प्रदर्शनी के साथ-साथ दो स्तरीय नाट्य प्रस्तुतियों में दर्शक भावनाओं में गोता लगाते रहे।

    तेतू और महारथी का मंचन 

इस अवसर पर मुजफ्फरपुर की संस्था ‘किलकारी’ द्वारा प्रस्तुत नाटक ‘तेतू’ के साथ हीं गुलाबी नगरी जयपुर की नाट्य संस्था द्वारा मंचित ‘महारथी’ ने अपनी सशक्त विषयवस्तु और प्रभावशाली अभिनय के माध्यम से वर्तमान सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों को इंगित करते हुए मन को झकझोर दिया।

कला प्रेमियों की मानें तो यह आयोजन उत्तर बिहार के सांस्कृतिक इतिहास में एक मील का पत्थर सिद्ध हो रहा। यह सब वैसे समय में जब दुनिया प्रेम की जगह युद्ध को अपना सर्वोच्च मान बैठी है।
यह आयोजन एक सकारात्मक संदेश दे रहा है कि इंसानियत को बचाना सबसे जरूरी है।

इस महत्वपूर्ण आयोजन की सफलता के पीछे ‘आकृति रंग संस्थान’ की पूरी टीम का समर्पण और प्रयास सराहनीय रहा।
बात उद्घाटन सत्र और इस उत्सव के पहले दिन की करें तो मुजफ्फरपुर राष्ट्रीय नाट्य मेला – का उद्घाटन प्रसिद्ध आर्थोपेडिक सर्जन डॉ प्रवीण चंद्रा, वरीय शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ अरुण शाह, सीनेटर व नाट्य मेला के संयोजक डॉ संजय कुमार सुमन, पीजी हिंदी विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ सुशांत कुमार, किलकारी मुजफ्फरपुर की प्रमंडलीय कार्यक्रम समन्वयक पूनम कुमारी, एसबीआई के पूर्व महाप्रबंधक अरुण कुमार, जिला स्कूल मुजफ्फरपुर के प्राचार्य विभू झा एवं आकृति रंग संस्थान के अध्यक्ष अशोक अंदाज ने दीप प्रज्वलित कर किया। वहीं कला विशेषज्ञ यशवंत पराशर ने नाट्य मेला के बारे में प्रारंभिक उद्बोधन किया।

इनका भी हुआ मंचन

आकृति रंग संस्थान के डाॅ सुनील फेकानिया के निर्देशन में ‘नट-बक्खो’ नाटक का जीवंत मंचन किया गया।

इस मौके पर स्वाधीन दास, वीरेन नंदा, डॉ रमेश ऋतंभर, कुमार विरल, ललन भगत, बैजू कुमार, अरविंद वरुण, पत्रकार प्रभात कुमार, सहायक प्राध्यापक डॉ अविनाश कुमार, विमल विश्वास, चित्रकार सुजीत कुमार, कामेश्वर प्रसाद, विनय, डॉ हेमनारायण विश्वकर्मा, कुंदन कुमार, नदीम खान, नृत्यांगना रंजना सरकार, सोनू सरकार, प्रमोद आजाद, सुमन वृक्ष, कुमार दिनेश समेत शहर के गणमान्य हस्तियां भी मौजूद रहीं

इस दौरान दिवंगत रंगकर्मी राॅबिन रंगकर्मी को भी याद करते हुए सबकी आंखें नम हो गई।

रंगमंच का यह उत्सव 31 मार्च तक जारी रहेगा।
तो आप में इस अनोखे उत्सव का हिस्सा बनना चाहते हैं तो शाम 6.30 बजे आप सबका जिला स्कूल मैदान में में आइए और जीवंत बनाएं अपनी शाम

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गांव की पगडंडी से संसद तक : मिथिला की सांसद बेटी डॉ. धर्मशीला गुप्ता की कहानी

यह कहानी उस महिला की है, जिन्होंने शिक्षा के दम पर न सिर्फ अपनी किस्मत बदली, बल्कि गांव-गांव जाकर शिक्षा का उजियारा फैलाने में भी जुटी रहीं। अपने दम पर बिहार के छोटे से शहर दरभंगा से राज्यसभा सांसद बनने तक का सफर तय किया।
हौसलों के साथ विकास की यात्रा गतिमान है, और इन सबके बाद भी उनकी सादगी और सरलता ऐसी है कि उनसे बात करते समय यह एहसास ही नहीं होता कि आप किसी शीर्ष राजनेता से संवाद कर रहे हैं।
गांव की पगडंडी से संसद तक की यह यात्रा मिथिला की बेटी डॉ. धर्मशीला गुप्ता की प्रेरक कहानी  पढ़िए…

मैं किसान परिवार से आती हूं। मेरा बचपन लहलहाते खेतों के बीच गुजरा है। पिताजी किसानी से जुड़े रहे। मुझे याद है कि बचपन में हम पुआल बिछाकर धूप का आनंद लेते थे। तब हर घर में कोठी, जांता और ओखल हुआ करता था। मैंने किसानों की समस्याएं भी देखी हैं और ग्रामीण महिलाओं की कठिनाइयों को भी करीब से समझा है।
मेरी राजनीति का मकसद हर वर्ग, जाति और संप्रदाय के लोगों को सम्मान के साथ जीवन जीने में मदद करना है। समाज के हाशिए पर रह रहे लोगों को मुख्यधारा में लाना है और नारी शक्ति को सशक्त होने का एहसास कराना है।”यह कहना है राज्यसभा सांसद डॉ. धर्मशीला गुप्ता का।

बिहार की राजनीति में शिक्षा, सामाजिक सेवा और जनसमर्पण के बल पर राष्ट्रीय मंच तक अपनी पहचान बनाने वाली महिलाओं में डॉ. धर्मशीला गुप्ता, माननीय राज्यसभा सांसद तथा भाजपा महिला मोर्चा, बिहार प्रदेश की अध्यक्ष, का नाम आज विशेष सम्मान के साथ लिया जाता है।
मिथिला की समृद्ध सांस्कृतिक धरती से निकलकर उन्होंने शिक्षा, समाजसेवा और राजनीति—तीनों क्षेत्रों में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है।

साल 2024 में उन्हें बिहार से राज्यसभा के लिए निर्विरोध चुना गया। वे वरिष्ठ नेता स्व. सुशील कुमार मोदी के स्थान पर संसद के उच्च सदन में पहुंचीं और आज राष्ट्रीय स्तर पर बिहार की आवाज बुलंद कर रही हैं।

मिथिला की धरती से शुरू हुई प्रेरक यात्रा

डॉ. धर्मशीला गुप्ता का जन्म 27 नवम्बर 1969 को बिहार के मधुबनी जिले में हुआ।
उनके पिता स्व. अशर्फी लाल साह और माता स्व. बिमला देवी ने उन्हें शिक्षा, संस्कार और समाज के प्रति जिम्मेदारी का महत्व सिखाया।
बचपन से ही वे पढ़ाई में मेधावी और सामाजिक मुद्दों के प्रति संवेदनशील थीं। परिवार और समाज के बीच रहते हुए उन्होंने यह समझा कि शिक्षा ही वह माध्यम है, जिससे समाज में वास्तविक परिवर्तन लाया जा सकता है।

शिक्षा की रौशनी और शिक्षाविद के रूप में पहचान

डॉ. गुप्ता ने अपनी उच्च शिक्षा ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय से प्राप्त की। उन्होंने एम.एससी. (वनस्पति विज्ञान) के साथ-साथ बी.एड. और पीएच.डी. जैसी उच्च डिग्रियां हासिल कीं।
शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने शिक्षण और अकादमिक क्षेत्र में कार्य करते हुए एक प्रतिष्ठित शिक्षाविद के रूप में समाज में सम्मान अर्जित किया।

वे कहती हैं—
“शिक्षा केवल डिग्री प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि समाज को जागरूक और सशक्त बनाने का सबसे प्रभावी साधन है।”

कर्म के साथ घर परिवार का ख्याल भी

ऐसा है  निजी जीवन  का सफर

डॉ. धर्मशीला गुप्ता का विवाह परशुराम गुप्ता से हुआ। परिवार में उनके दो पुत्र और दो पुत्रियां हैं।
उनका स्थायी निवास बेंता, दरभंगा में है।
वर्तमान में संसदीय कार्यों के कारण वे नई दिल्ली स्थित स्वर्ण जयंती सदन डीलक्स में रहा करती हैं। अपने क्षेत्र में उनका आना- जाना लगा रहता है।

समाज सेवा से शुरू की बदलाव की डगर

राजनीति में सक्रिय होने से पहले ही डॉ. धर्मशीला गुप्ता का समाज सेवा से गहरा जुड़ाव रहा।
उन्होंने भारत सरकार के साक्षरता मिशन के तहत गांव-गांव जाकर जिला संयोजिका के रूप में साक्षरता अभियान को आगे बढ़ाया।
विशेष रूप से उन्होंने अनपढ़ महिलाओं को कॉपी-किताब उपलब्ध कराकर शिक्षा के लिए प्रेरित किया। ग्रामीण क्षेत्रों में साक्षरता और जागरूकता अभियान चलाया तथा महिलाओं को शिक्षा और आत्मनिर्भरता के लिए प्रेरित किया।
उनके प्रयासों ने कई गांवों में शिक्षा के प्रति नई चेतना जगाई।

दरभंगा नगर निगम में वर्ष 2002 से 2007 तक पार्षद के रूप में सक्रिय जनसेवा करते हुए उन्हें “बेस्ट पार्षद” के सम्मान से भी नवाज़ा गया। जनसमर्थन और नेतृत्व क्षमता के बल पर उन्होंने डिप्टी मेयर पद के लिए भी चुनाव लड़ा और सम्मानजनक तरीके से अपनी दावेदारी प्रस्तुत की।
इसके बाद वर्ष 2022 में दरभंगा नगर निगम के मेयर पद के चुनाव में भी उन्होंने भाग लिया और जनता के व्यापक समर्थन के साथ रनर-अप रहीं। यह उनके जनाधार, सक्रिय सामाजिक योगदान और नगर के विकास के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

बिहार के उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी जी के साथ

प्रशासनिक और संस्थागत जिम्मेदारियां

डॉ. धर्मशीला गुप्ता ने कई महत्वपूर्ण संस्थागत पदों पर भी अपनी सेवाएं दी हैं वे संस्कृत विश्वविद्यालय, दरभंगा में सिंडिकेट सदस्य रहीं हैं। इसके साथ ही
ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड में डायरेक्टर के पद पर भी सेवाएं दी हैं।इन जिम्मेदारियों के माध्यम से उन्होंने शिक्षा और प्रशासनिक कार्यों में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

राजनीति में प्रवेश और राज्यसभा तक का सफर

समाज सेवा और शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय रहते हुए उनका जुड़ाव धीरे-धीरे राजनीति से भी हुआ।
फरवरी 2024 में भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें बिहार से राज्यसभा के लिए उम्मीदवार बनाया।
इसके बाद वे निर्विरोध निर्वाचित हुईं और संसद के उच्च सदन में बिहार का प्रतिनिधित्व करने लगीं।
उनका राज्यसभा कार्यकाल 2024 से 2030 तक निर्धारित है।

संसद में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां

राज्यसभा सदस्य के रूप में डॉ. धर्मशीला गुप्ता कई महत्वपूर्ण संसदीय समितियों से जुड़ी हुई हैं—
• संसदीय राजभाषा समिति की सदस्य
• जल संसाधन संबंधी स्थायी समिति की सदस्य
• महिला एवं बाल विकास मंत्रालय से संबंधित संसदीय समिति में सहभागिता
• संसदीय सलाहकार समिति की सदस्य
• आयुष मंत्रालय की सलाहकार समिति की सदस्य

इन समितियों के माध्यम से वे भाषा, जल प्रबंधन, महिला सशक्तिकरण, स्वास्थ्य और सामाजिक नीतियों से जुड़े विषयों पर सक्रिय योगदान दे रही हैं।

समाज सेवा का सतत मिशन

डॉ धर्मशीला गुप्ता आगे कहती हैं कि  राज्यसभा    सांसद के साथ हीं भाजपा महिला मोर्चा के बिहार प्रदेश अध्यक्ष होने के कारण मेरी जिम्मेदारी आधी आबादी के प्रति और भी बढ़ जाती है। मेरी कोशिश है कि बिहार की बेटियां वैश्विक पटल पर अपनी पहचान बनाएं। इसके लिए मैं खेल गतिविधियों को काफी बढ़ावा देती हूं।

खिलाड़ियों के साथ डॉ धर्मशीला गुप्ता

इन दिनों बिहार में लड़कियां खेल में काफी अच्छा कर रही है। यहां अंतरराष्ट्रीय खेल प्रतिस्पर्धा का आयोजन भी हो रहा है। यह सकारात्मक है। महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की कई योजनाएं प्रधानमंत्री जी के अगुवाई में चल रही हैं। आज हमारे गांव की महिलाएं शिक्षित और सजग हो अपने पांव पर खड़ी हैं।

डॉ. धर्मशीला गुप्ता विशेष रूप से इन क्षेत्रों में सक्रिय रही हैं—
• ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा का विस्तार
• महिला सशक्तिकरण और आत्मनिर्भरता
• सामाजिक जागरूकता अभियान
• किसानों और ग्रामीण जीवन के सुधार के प्रयास

व्यापक है प्रधानमंत्री का विज़न 

डॉ धर्मशीला गुप्ता  कहती हैं कि

प्रधानमंत्री जी का विजन काफी व्यापक है। उनकी सोच सबका साथ सबका विकास की है। हम सभी उनके मार्गदर्शन में , एक बेहतर सिपाही की तरह तन- मन से सशक्त भारत का सपना सच करने में जुटे हैं।

राष्ट्रवाद भारत की ताकत है। यह देश को एक सूत्र में बांधता है उसे मजबूत करता है। हमें अपने देश पर गर्व होना चाहिए।

मैं पार्टी की साधारण कार्यकर्ता 

डॉ गुप्ता कहती हैं मैं जो कुछ भी हूं वह सब पार्टी का है। मैं कल भी बीजेपी की एक साधारण कार्यकर्ता थी, आज भी हूं और जीवन भर रहूंगी। पार्टी के सिद्धांत मेरे लिए अहम है, पद नहीं। पद तो जन सेवा का एक माध्यम है। मैं अपने आप को हमेशा सरल और सहज बनाए रखना चाहती हूं। आर एस एस के सवाल पर वह कहती हैं

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ  देश के लिए समर्पण का नाम है।  संघ से जुड़े लोग अपना सब कुछ त्याग देश के लिए संपूर्ण जीवन खपा देते हैं। इसके विचार देश को जोड़ने वाले हैं तोड़ने वाले नहीं।

 

उनका स्पष्ट मानना है—
“यदि शिक्षा मजबूत होगी तो समाज अपने आप मजबूत और समृद्ध बन जाएगा।”

 

डॉ. धर्मशीला गुप्ता सतत समाज सेवा की मिसाल बनकर देश की प्रगति में नया आयाम गढ़ने में जुटी हैं। उनका संकल्प प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकसित भारत के सपने को साकार करने का है।

डॉ. धर्मशीला गुप्ता की जीवन यात्रा यह संदेश देती है कि

यदि किसी व्यक्ति के पास शिक्षा, सेवा और समाज के प्रति समर्पण का संकल्प हो, तो वह छोटे से कस्बे से निकलकर भी देश की सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्थाओं तक पहुंच सकता है।

आज मिथिला की यह बेटी संसद में बिहार की सशक्त आवाज बनकर उभर रही है। खासकर बेटियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनकर यह बता रही है कि यदि हौसला मजबूत हो, तो मंजिल तक पहुंचने का रास्ता जरूर मिल जाता है।

thebigpist.com के मॉडरेटर vivek chandra से बातचीत में  डॉ. धर्मशीला गुप्ता कहती हैं कि मुझे हर पहर वह प्रण याद रहता है जिसे मैंने शपथग्रहण के वक्त लिया था। मैंने शपथ लिया था कि

“मैं, डॉ धर्मशीला गुप्ता, ईश्वर की शपथ लेती हूँ कि मैं विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखूँगी, भारत की प्रभुता और अखंडता अक्षुण्ण रखूँगी तथा जिस पद को मैं ग्रहण करने वाली हूँ, उसके कर्तव्यों का श्रद्धापूर्वक निर्वहन करूँगी।” यह शपथ हर क्षण मुझे भारत के संविधान के गौरव और श्रद्धा को याद दिलाता रहता है। मैं इसे आत्मसात करते हुए यह कहती हूं कि अंतिम सांस तक मैं देश के आम आवाम की बेहतरी के लिए काम करती रहूंगी, देश की प्रभुता और अखंडता को बनाए रखते हुए जनसेवा करना हीं मेरा जीवन है, यही मेरा धर्म है और यही मेरा तीर्थ भी।

(thebigpost.com  समाज की सकारात्मक कहानियों को सामने लाने की पहल है। इसे आर्थिक सहयोग कर आप मजबूत कर सकते हैं। हमारा गुगल पे नंबर है 7488413830 । यह कहानी कैसी लगी कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं )

 

 

 

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NDTV वाले प्रभाकर कुमार की कहानी

समाज की  स्याह – सफेद कहानियों को लिखते, पढ़ते फिल्माते, पता ही नहीं चला है कि मैं इनसे कोई अलग किरदार हूं। हर स्टोरी के पीटीसी करते वक्त लगता है यह मेरी ही तो कहानी है। भूख, पीड़ा, दर्द, घटना, दुर्घटना, और इन सब के बीच हिम्मत भरी अनगिनत कहानियां। सब कुछ ख़त्म हो जाने के बाद भी , हिम्मत समेट फिर से जीने का जुनू। मेरी खुद की कहानी भी तो ऐसी ही है। चकाचौंध से भरे दफ्तर में बैठकर भी मैं  उस काले पल को नहीं भूला पाता जब नीयती के क्रुर पंजों ने मां- पिताजी दोनों को  छीन लिया था।   बाबूजी के बेजान पड़े बदन से लिपट  भींगी आंखों से एक बार फिर उनसे लौटा लाने की प्रार्थना ईश्वर से करते रहे , तो आईसीयू  में मौत से जंग लड़ रही मां की सलामती की दुआ मांगते रहे। पहले पिताजी फिर मां दोनों को काल ने अपना ग्रास बना लिया। हमारी हंसती -खिलखिलाती दुनिया लूट चुकी थी। हम अनाथ हो चुके थे।

जिंदगी ने दामन में दर्द भरा तो जख्म पर मरहम भी लगाया। सुख दुख की इस पगडंडी पर कुछ ऐसे लोग मिले जिनके उपकारों का बदला, जिसके सहयोग का बदला ताउम्र मैं नहीं चुका पाऊंगा। उनके लिए न मेरे पास शब्द हैं, न  लिपि, न भाषा, बस हैं तो दिल में वो अपार श्रद्धा जो आंसू बन टपक कर मेरे अंतश को हर पल  गंगा कर देती है। हिन्दुस्तान टाइम्स के दफ्तर से एनडीटीवी, सी एन एन आईबीएन,  नेटवर्क 18, और फिर एनडीटीवी  तमाम यादें, तमाम लोग , तमाम प्यार और तमाम मौसम सब कुछ लगता है बस अभी तो बीता या। इस बीते वक्त के बीच कुछ बच बचा सा लगता है, ऐसा कि मैं भागकर जिंदगी की कोई स्कूप खबर ले आऊं और खुशियों के स्क्रीन पर मोटे मोटे ग्राफिक्स के साथ ये लिखा हो कि इस वक्त की बड़ी अब किसी भी शख्स के आंखों में आसूं नहीं होंगे, सबके चेहरे पर मुस्कान होगी,  सच्ची वाली। वाकई उसी खबर की तलाश तो कर रहा हूं मैं, माइक आइडी , कैमरा, और ट्राइपॉड लेकर  सालों से दर- दर की खाक छानता हुआ। क्या पता कब सुपर प्रोड्यूसर कह दे की अब जिंदगी की बुलेटिन यही तक। …. बस तब तक जी लेना चाहता हूं  जिंदगी….थोड़ी सी हंसी वाली, थोड़ी सी खुशी वाली, थोड़ी सी उम्मीद वाली । इस भरोसे के साथ कि दुनिया का थोड़ा भला कर सकूं। समाज के अंधेरे में जला सकूं  आशाओं का दीप । बस…! यही ख्वाहिश है , यही अरमान है। बाकी सब तो लाइफ के रनडाउन पर लिखा ही जा रहा है, हर रोज नई खबरें , कभी शोर, कभी शांति कभी तमाशा, पर बचा वही रहेगा जो किसी की मुस्कुराहटों पे  निसार होकर, किसी का दर्द   उधार  लेकर ,  जीना इसी का नाम है गा उठेगा। 

मैं बालपोथी में ‘क’ से ‘कलम’ की रट लगाता

हर शख्स के जीवन में बचपन एक सुनहरा दौर लेकर आता है। मेरा भी बचपन बेफ्रिक्री और मां- पिताजी के स्नेह- दुलार में परवान चढ़ा। मेरा जन्म पटना के कुर्जी होली फैमिली अस्पताल में 29 अक्टूबर को हुआ था।
नन्हें पांवों ने जब गिरते, संभलते चलना सीख लिया, और दिलोदिमाग की बातें होंठों पर शब्द की शक्ल लेने लगे तो घर वालों ने अक्षरों की दुनिया से नाता जोड़ दिया।
वो दिन बचपन वाले
मैं बालपोथी में  लिखे ‘क’ से कलम की रट लगाता। तब कौन जानता था कि ‘क’ से  यही कलम जीवन और करियर दोनों बन जाएगा।
अक्षरों से जान पहचान गहरी हो गई तो फिर मेरा नामांकन पटना के  St. Cairens School    करवाया गया। सुबह सवेरे यूनिफॉर्म पहन, कांधे पर बस्ता लादे मैं स्कूल आने जाने लगा। अब घर के साथ स्कूल भी घर जैसा लगने लगा। कुछ यारियां हुई। दोस्त बने। फिर भी कभी कभार स्कूल न जाने की ज़िद कर ही बैठता और तब मां बाबूजी, दोनों बड़े ही दुलार से मुझे समझा घर की दहलीज पार करा स्कूल की दहलीज में दाखिल करवा ही देते। मेरा भोला मन भी उनकी बातों में आ जाता। बचपन के उस दौर की इन बातों को आप अच्छी तरह से तब महसूस सकते हैं जब आप खुद अभिभावक बनते हैं और आपका बच्चा तुलती सी हंसी के साथ स्कूल न जाने का बहाना बना रहा होता है। वाकई असली राजा वाली फीलिंग तो बचपन में हीं आती है। ख़ैर, मैं कक्षा 2 तक सेंट कैरेंस स्कूल में ही पढ़ा।
इसके बाद फिर मेरा दाखिला बनारस के राजधाट बेसेंट स्कूल में करवाया गया।
राजधाट  बेसेंट  स्कूल एक बोर्डिंग स्कूल है।राजघाट बेसेंट स्कूल को कृष्णमूर्ति फ़ाउंडेशन इंडिया (KFI) चलाती है। यह संस्था दार्शनिक जिद्दू कृष्णमूर्ति के शिक्षा-दर्शन पर आधारित स्कूलों का संचालन करती है। KFI भारत में कुल छह स्कूल संचालित करती है, जिनमें राजघाट बेसेंट स्कूल बनारस भी शामिल है।
स्कूल की यादें
हमारा स्कूल और हॉस्टल गंगा के ठीक किनारे पर बना था। शुरू- शुरू मुझे घर की याद आती, पर धीरे-धीरे मन यहां रम गया। आज मैं अपने अंदर के इंसान और संवेदनाओ को अगर थोड़ा – बहुत भी बचा और रचा रखा है तो इसमें मेरे इस स्कूल के वातावरण और वहां के शिक्षकों का योगदान है। इस स्कूल ने मुझे किताबी ज्ञान के साथ ही मानवीय बोध भी सीखाया।
दर्शन और जीवन की जो बातें मैंने इस स्कूल से सीखी वह आज हिम्मत बन हर विकट लम्हों में मुझे डटे रहने का जज्बा देता है।
दस साल तक इस स्कूल में पढ़ाई की, फिर आगे की पढ़ाई के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय चला गया। डीयू से स्नातक किया। फिर गाजियाबाद से MBA।
लौट आया पटना 
पढ़ाई के बाद मैं पटना लौटा और बजाज इलेक्ट्रिकल्स, और गोदरेज कंपनियों में नौकरी की । पिताजी विरेंद्र कुमार  इलेक्ट्रिक इंजीनियर थे। माता  रंजना सिंह जी गृहिणी थीं। पिताजी  का एक बिजनेस भी था। पटना के कंकड़बाग में हमारा Electronic showroom: Heavens के नाम से था।
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पटना में शुरुआती काम के दौरान हीं समाचार पत्रों को देखकर मन में एक आकर्षण होता। लगता काश मैं भी यहां कुछ लिख पाता! तब के जमाने में अखबारों का जबर्दस्त क्रेज था।  लोग सुबह का काम तब तक शुरू न करते जबतक अखबार की हेडलाइन पर नजर न जमा लें। घर, दफ्तर, दुकान हर जगह अखबारों की दस्तक रहती।
अखबार के समाचार और कहानियां मुझे प्रभावित करने लगी। बाइलाइन खबरें देख सोचता काश मेरे नाम से भी खबरें छपती!
तब घर में हिन्दूस्तान टाइम्स आता था। मैं मन ही मन खबरें बनाता, हेडलाइन गढ़ता।
इन सब के कुछ दिनों बाद मैं फ्रीलांसर के तौर पर हिन्दूस्तान टाइम्स से जुड़ गया।  मार्केटिंग के  काम से जो समय बचता उसमें कुछ स्थानीय इवेंट की खबरें लिख भेजता। ये छपने भी लगी। खुद की लिखी खबरें जब अखबार में पहली बार छपकर आई तो यकीन ही नहीं हुआ। मैं बार बार उस पन्नें को पढ़ता, उसे देखता, उसे छूता। मैंने वह पेज भी सुरक्षित रख लिया था। खैर मार्केटिंग वाली नौकरी भी चलती रही और इस तरह से लिखना – छपना भी चलता रहा।
एचटी का विशेषांक और मेरी अखबार की नौकरी 
बात सन 99 की है। हिन्दुस्तान टाइम्स ने पटना से अखबार का एक नया सप्लीमेंट पेज शुरू करने की योजना बनाई। नाम रखा गया पटना टाइम्स। इसमें विशेष कर कला और संस्कृति की खबरें प्रमुखता से छपनी थी। इसके लिए नियुक्ति होने लगी। पटना हिन्दुस्तान टाइम्स में उस वक्त चीफ रिपोर्टर रहे मेमन मैथ्यू  जी ने मुझे कहा तुम इसमें अप्लाई कर दो। तुम्हारा सलेक्शन संभव है,  हो जाएगा ।
मेमन मैथ्यू जी मुझे काफी मानते भी रहे थे। मैं उन्हें पत्रकारिता का गुरू भी मानता हूं। उन्होंने मेरी लेखनी को निखारा। मेरी कापी दुरूस्त की। बाद के दौर में मेमन साहब एडिटर भी बनें
खैर, अब फैसला मुझे लेना था। दिल तो अखबार की नौकरी के लिए बेताब बना बैठा था पर दिमाग इस गणित में उलझा था कि मैं जिस जगह नौकरी कर रहा था। वहां से यहां की तनख्वाह आधी थी।
फिर मां -पिताजी से ली सलाह 
मन से लगता अखबार की नौकरी कर लूं। यहां अलग सम्मान दिखता। समाज से जुड़ाव दिखता।
फिर कम तनख्वाह का हिसाब लगाता। दिल और दिमाग के इस उधेड़बुन में काफी परेशान रहा फिर सोचा पिताजी से राय ले लूं।  मां से यह बात बताई, तो उन्होंने कहा आधी सैलरी पर क्यों यहां ज्वाइन करना। फिर हिम्मत कर पिताजी के पास गया। उनसे यह बात बताई। पिताजी ने कहा ‘आप अपना मन बताएं ‘
मैंने कहा मन तो अखबार जाने का है भले तन्खवाह कम है लेकिन प्रतिष्ठा ज्यादा है। फिर अपना फैमिली  बिजनेस तो है हीं। पिताजी ने सहमति दे दी।
वो H T का दौर
मुझे हिंदुस्तान टाइम्स में नौकरी मिल गई। पटना टाइम्स के फीचर पेज से शुरू हुआ सफर स्कूप  खबरों तक पहुंच गया। मैं कई विभागों की खबरें कवर करने लगा। हिन्दुस्तान टाइम्स के पांच साल के सफर में पत्रकारिता में काफी कुछ सीखा, समझा। संपादक चंद्रकांत नायडू,  संपादक एन . आर मोहंती, और मैथ्यू सर ने मुझे तराशा। मैंने यहां कई महत्वपूर्ण खबरें निकालीं। खुब बाइलाइन भी मिलें। सहकर्मियों का सहयोग मिला । पत्रकारिता के लिहाज से हिन्दुस्तान टाइम्स मेरे लिए स्कूल भी रहा और यूनिवर्सिटी भी।
 कुत्तों का भय , हाथ में ईंटें  लेकर घर लौटना 
अखबार की रिपोर्टिंग में दिन के साथ रात को भी काम करना पड़ता। दफ्तर जाकर खबरें लिखनी होती। तब संचार के साधन भी इतने सुगम नहीं थे। न सोशल मीडिया न व्हाट्सएप ग्रुप। मुझे काम कर लौटने में देर रात हो जाती। सड़कें भी अमूमन खाली ।
ऐसे में मुझे सड़क के कुत्ते अपना घोर दुश्मन मान लेते। उन्हें पूरे  विश्वास से लगता ,इस देर रात्रि में लौटने वाला अच्छा आदमी तो हरगिज़  नहीं हो सकता।
भाउ -भाउ के राग के साथ, वे आसपास के कुत्तों को भी सजग कर मोर्चा बना लेते और मुझे खदेड़ने  का उपक्रम शुरू कर देते।
भाई रविकर के साथ प्रभाकर कुमार
मैं भी इन कुत्तों का  इलाका प्रारंभ होने से पहले संभावित युद्ध के लिए ईंट – पत्थर के टुकड़ों से लैस हो जाता। फिर कुछ दूर बढ़ते ही  युद्ध शुरू।
मैं दौड़ा रहे कुत्तों पर निशाना साध ऐसे ईंट के टुकड़े फेंकता मानो , देश की सरहद से दुश्मन देश पर बम के गोले फेंक रहा हूं।
ज्यादातर बार अपने भाई रविकर कुमार को भी बुला लेता। कुत्तों को पराजित कर हम दोनों भाई सीना चौड़ा कर अर्ध रात्रि में घर पहुंचते।
    बाइक खरीदने के लिए सत्याग्रह 
मैं पापा के बजाज क्लासिक स्कूटर से हिन्दुस्तान टाइम्स के दफ्तर जाता। उन दिनों स्कूटर की सवारी संभ्रांत लोगों की सवारी मानी जाती थी। बाइक के तौर पर बुलेट और राजदूत भी सड़कों पर जलवा बिखेरती होंडा के साथ हीरो होंडा के हीरो होंडा CD100 आगमन हो चुका था। यामाहा RX100,बजाज बॉक्सर
उसी वक्त सुजुकी ने Samurai नामक बाइक उतारी थी। मेरा मन बाइक लेने का था। मैं यामाहा RX100 लेना चाहता था। स्कूटर की सवारी युवा अवस्था में बोझिल सी लगती। मैंने तन्खवाह से पैसे जोड़े, पर घर में स्कूटर के साथ  बाइक के शुभ प्रवेश के लिए पिताजी की अनुमति बेहद  जरूरी थी। उनसे डरते डरते निवेदन किया कि मुझे  बाइक खरीदनी है। पिताजी ने एक ही झटके में नकार दिया। उन्होंने कहा स्कूटर में क्या दिक्कत है। मैं भारी मन से अपने कमरे में लौटा।

अदद बाइक के लिए मैंने गांधी जी का मार्ग अपनाया । मैं आन्न जल का त्याग कर , मुंह फुलाए बाबूजी के निर्णय का विरोध अपने भोजन छोड़ सत्याग्रह से करने लगा।

मां के माध्यम से मेरे इस भूख हड़ताल की खबर बाबूजी तक पहुंची। पहले वे ना पर कायम रहे  । वे  मेरे  पास आए  और कहा कि बाइक तो हरगिज़ नहीं खरीदी जाएगी।  मैं अपनी भूख हड़ताल पर डटा रहा।
तब घर में  मैराथन बैठकों के दौर के उपरांत यह नतीजा निकला कि यमाहा और होंडा में खतरा ज्यादा है, उन दिनों बाइक लूट की वारदातें होती थी, पिताजी ने बाइक खरीदने की सहमति तो दी पर बाइक Suzuki Samurai  ख़रीदनी थी क्योंकि यह टू स्ट्रोक इंजन पर आधारित था  और इसकी लूट नहीं होती थी। मैंने भी  बीच का रास्ता निकलता देख अपनी सहमति दे दी।
 मैंने अपने सपनों की बाइक खरीदी, फूलों की माला पहना इसका स्वागत किया गया। अब यह मेरी नई सवारी थी जो स्टाइल के साथ मेरे सफर का साथ निभा रही थी। अभी बाइक की दस्तक घर में हुई ही थी कि पिताजी ने उसका निरीक्षण किया और मुझे इसमें डिक्की लगावाने का हुक्म दिया। मुझे बाइक में डिक्की तनिक भी पसंद नहीं थी । इससे मुझे लगता कि बाइक स्टाइलिश नहीं लगेगी। जब पिताजी की ज़िद तेज हो गई तो फिर मैंने डिक्की का विकल्प तलाश एक बैग बाइक में लटकवा लिया।
हिन्दुस्तान टाइम्स का दफ्तर
और कार से दफ्तर जाने लगा
कुत्तों से हर रात युद्ध करते -करते मन थक सा गया था। रोज रात दफ्तर से घर लौटते से पहले भौंकते आवारा  कुत्तों की तस्वीरें दिमाग पर छाने लगती। एक रोज पिताजी से मैंने कुत्तों के आतंक की चर्चा की तब उन्होंने कहा कि तुम कार लेकर जाया करो। उन दिनों पापा के पास फिएट  कार थी। मैं फिएट कार लेकर दफ्तर जाने लगा। उस वक्त कार की भीड़ इतनी नहीं बढ़ी थी। हिन्दुस्तान टाइम्स के पार्किंग एरिया में तब दो ही कार लगती थी। एक वाई सी अग्रवाल जो युनिट हेड थे दूसरे गिरीश मिश्रा जो संपादक थे। अब उस पार्किंग एरिया में तीसरी कार भी लगने लगी थी, वह मेरी थी।
 मुझे कार से गए दो- तीन रोज ही हुए होंगे कि मुझे संपादक महोदय का संदेशा मिला कि सर बुला रहे। मैं उनके चेम्बर में दाखिल हुआ तो उन्होंने कहा अच्छा तो तुम ही हो जो कार से दफ्तर आते हो और तुम्हारी गाड़ी हीं बाहर लगी रहती है। मैंने सर झुका कर हामी भरते हुए कहा कि सर बाइक या पैदल कुत्ते दौड़ाते हैं। कार में सुरक्षा रहती है। उन्होंने कहा हां ये तो ठीक बात है।
वो काले दिन : मां बाबूजी की सड़क दुर्घटना 
बात 22 नवंबर 2003 की है। शाम में मैं हिन्दुस्तान टाइम्स के दफ्तर में बैठा खबरें लिख रहा था। तभी वहां खबर आई की पटना के ए .एन कालेज के पास एक सड़क दुर्घटना हुई है और उसमें दंपति घायल हैं। मेरे दूसरे सहयोगी ने खबर नोट किया। मैं अपने काम में था, मुझे इस काले वक्त का तनिक भी आभास नहीं था। उन दिनों मैं अपना मोबाइल फोन भी दफ्तर में पहुंच कर स्विचऑफ कर देता था।
पापा को कहीं जाना होता था तो वे कार से जाते थे। मुझे यह भी ध्यान नहीं रहा कि मैं आज हीं कार को गैरेज में देकर आया हूं। थोड़ी देर बात थाना से फोन आया कि दुर्घटनाग्रस्त स्कूटर पर हिन्दूस्तान टाइम्स का स्टीकर लगा है और उसका यह नंबर है।
अब मौजूद सभी लोगों से पूछा गया कि ये नंबर किसके स्कूटर का है। तब मैंने ध्यान दिया अरे यह तो मेरा स्कूटर है..।
उधर भाई के मोबाइल फोन पर भी किसी  राहगीर ने फ़ोन किया। दरअसल पिताजी के जेब से मिले कागज़ पर छोटे भाई का नंबर लिखा था। एक राहगीर ने उन्हें फोन कर सूचना दी। पहले तो अनजान फोन को भाई ने रिसीव नहीं किया। फिर दुबारा फोन आने पर बात पता चली। भाई ने  मेरे दफ्तर के बेस फोन पर फोन कर मुझे सूचित किया। मेरे पांव तले जमीन खिसक चुकी थी।
 पहले पिताजी और माताजी को पाटलिपुत्र के पास सहयोग अस्पताल ले जाया गया। फिर पीएमसीएच के इमरजेंसी में ।
हम अस्पताल पहुंचे। मां- पिताजी वहां भर्ती थे। स्थिति नाजूक थी। हम उन्हें  पीएमसीएच वहां से  लेकर मगध अस्पताल पहुंचे। जैसे जैसे यह बात पत्रकारों को पता चली अस्पताल में भीड़ जुटने लगी। डॉ दीपक प्रसाद जो उस वक्त पटना के  डीएम थे वे पहुंचे। डॉ दीपक प्रसाद दो दिनों तक अस्पताल में ही रूक मुझे हौसला देते रहे   ।
पत्रकार मित्रों का आना जाना लगा रहा। डॉ दीपक प्रसाद जी के इस एहसान का बदला मैं कभी नहीं चुका पाऊंगा।  वो उस बुरे वक्त में ढाल बनकर खड़े रहे।
तमाम कोशिशों के बाद भी  हम मां, पापा को बचा नहीं सकें। नियति के सामने हम सब सब बौने हैं। यह जीवन की सबसे दुखद घड़ी थीं। पहले पिताजी हमें अकेला छोड़ गए फिर तीन दिन बाद मां की सांसें थम गयी।
पिताजी जीवन में परंपरागत तरह के लकड़ी वाले शवदाह की बात कहते थे।
होनी देखिए न चाहते हुए भी हमें पिताजी का अंतिम संस्कार बिजली वाले शवदाह गृह में करना पड़ा।  वजह मां आईसीयू में जिंदगी और मौत से लड़ रही थी और हम मां को बचाने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते थे। 
हम दोनों भाई  चुपचाप मां पिताजी की मृत शरीर के पास खड़े उन्हें देखते रहे और आंखों से आंसूओं का धारा बहती रही। फिर  पापा के निधन के तीसरे दिन मां परलोक चलीं गईं। फिर उनके  अंतिम संस्कार की प्रक्रिया हुई। इस दुःख की घड़ी में कई लोग हिम्मत बन डटे रहे। कुमार अरूणोदय ने अपने स्कूल के कर्मियों का ब्लड ग्रुप चेक करवा रक्त दान के लिए अस्पताल भिजवाया। वे पटना आने के बाद श्राद्ध कर्म में खुद समय दिया।
हम अनाथ हो चुके थे
मैं मौन हुआ नीयती के इस क्रुर खेल को देख रहा था। अंतिम संस्कार और श्राद्ध की प्रक्रिया के उपरांत, नाते रिश्तेदार भी धीरे-धीरे घर से जाने लगे। हमारे घर अब कोई चूल्हा जलाने वाला भी नहीं बचा था।
बहनों का प्यार
बहनों का योगदान 
ऐसे में हमारी चचेरी और मौसेरी बहनें आगे आई। मेरी मौसेरी बहन एक साल हमारे घर में रहीं। दोनों बहनों ने हमें मां का प्यार दिया। हमारा ख्याल रखा।
सिंगापुर में परिवार के सदस्यों के साथ
मैं उनके प्रति कृतघ्न हूं। यह ऐसा उपकार है जिसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है ।कहा नहीं जा सकता।  माता पिता जी के परलोक गमन के बाद  अब हम चार लोग घर में रहा करते थे। दो बहनें, हम दो भाई और एक छोटा नौकर रामू।
राजदीप सरदेसाई से अनोखी मुलाकात 
हिन्दुस्तान टाइम्स में मैंने खबरों से अपनी पहचान बनाई । कई बाइलाइन खबरें दिल्ली एडिशन में भी छपती थी। एक दिन राजदीप सरदेसाई जी का फोन आया। उन्होंने कहा मैं एक हफ्ते बाद पटना आ रहा हूं तुम आकर मुझसे मिलो।  राजदीप के पटना आने पर मैं उनसे मिलने मोर्या होटल गया। बातचीत हुई। वे चाहते थे कि मैं एनडीटीवी ज्वाइन कर लूं । मेरे लिए भी यह बेहतर मौका था।
यह इंटरव्यू इस मायने में भी दिलचस्प था कि जब मैं राजदीप सरदेसाई जी से मिलने होटल के कमरे में गया तो वो तुरंत नहाकर निकले थे और बदन पर सिर्फ तौलिया लपेटे थे।तौलिया लपेटे ही उन्होंने मेरा इंटरव्यू लिया।
उन्होंने मुझे दिल्ली बुलाया। कहा एक बार आपको डॉक्टर राय ( प्रणव रॉय ) से मिलना होगा।
दिल्ली में ट्रेनिंग वाले दिन 
मैं दिल्ली आया। प्रणव राय और राधिका राय जी से मुलाकात हुई। उन्होंने कहा तुम ज्वाइन कर लो। मुझे बिहार के लिए नियुक्त कर लिया गया। पटना मेरा दफ्तर था। इससे पहले मुझे ट्रेनिंग के लिए एनडीटीवी के गेस्ट हाउस में ठहराया गया। मेरी ट्रेनिंग शुरू हो गई। मैं टीम के साथ जाता। ज्यादातर वक्त राजदीप सरदेसाई होते वे संसद भवन चले जाते, मैं विजय चौक पर , जहां सारे चैनलों की ओवी वैन लगती, वहां प्रेक्टिस करता। कैमरामैन को मुझे कैमरे की प्रेक्टिस कराने की जिम्मेदारी दी गई थी। वहां बाकी चैनलों के कैमरा मैन भी मुझे कैमरे में बोलने और पीटीसी का अभ्यास कराते। मैं कक्षा के सबसे आज्ञाकारी छात्र की तरह सबकी बातें मानते हुए खुब प्रेक्टिस तो करता पर रिजल्ट कभी पास मार्क्स तक नहीं पहुंच पाता।
तुमसे न हो पाएगा
मैं विजय की कामना के साथ विजय चौक पर कैमरे को देख -देख, प्रेक्टिस करता। लंच ब्रेक में राजदीप आते और मुझे आंध्र भवन ले जाते ।हम वहां लंच में मछली- चावल खाते। शाम में न्यूज रुम में मेरी अग्निपरीक्षा होती। दिन भर की पीटीसी का टेप VTR में लगा राजदीप देखते और चेहरा बिदका कर कहते नो, नो,… तुमसे नहीं हो पाएगा।
निधि कुलपति की  टिप्स का जादू 
 मैं लगभग हर रोज न्यूज रूम में राजदीप सरदेसाई जी से डांट सुनता। एक रोज नियत रूटिन की तरह मेरा  टेप देखकर राजदीप सरदेसाई मुझे फटकार लगा रहे थे। तभी पीछे से एक महिला ने मुझे बुलाया। वह निधि कुलपति थीं।
वो मुझसे बोलीं मैं तीन दिन से देख रही हूं तुम रोज डांट सुनते हो। मैं तुम्हें एक ट्रीक बताती हूं
हम सब ने शुरू में यही किया है। तुम जहां भी रह रहे हो। कमरा बंद कर शीशे मे खुद को देख पीटीसी करने की प्रेक्टिस करो। इससे पीटीसी ठीक हो जाएगी। मैंने गेस्टहाऊस पहुंच कर यह शुरू कर दिया। अगले दो चार -दिनों में मेरी पीटीसी को सराहा जाने लगा।
NDTV  और बिहार में रिपोर्टिंग 
डेढ़ महीने की ट्रेनिंग के बाद मैं पटना आ गया और यहां काम करना शुरू कर दिया। मेहनत की और कई अहम खबरों को ब्रेक किया। अच्छी सॉफ्ट स्टोरी भी की। इसके कुछ साल बाद CNN- IBN को लांच करने की तैयारी में राजदीप सरदेसाई जुड़े। उन्होंने मुझे वहां बुलाया। दिल्ली में फिर से ट्रेनिंग हुई। उस दौरान चैनल की काफी चीजें तय हो रही थी। वैसे में मुझे काफी कुछ सीखने को मिला।
IIBN खबरों के लिहाज से काफी बेहतर रहा। उस वक्त साफ्ट स्टोरी पर काफी जोर दिया जाता। हम बिहार झारखंड जाते और ग्राउंड रिपोर्ट करते। बाद में आईबीएन न्यूज 18 का हिस्सा हो गया। इस वक्त मुझे इसके बिहार -झारखंड चैनल की भी जिम्मेदारी दी गई। इसके बाद फिर से एक बार NDTV से जुड़कर काम करने का मौका मिला है। यह दोबारा पुराने घर लौटने जैसा है।
देश के चर्चित पत्रकार Rahul Kanwal के साथ
Rahul Kanwal के साथ काम करना दिलचस्प 
 एनडीटीवी की दूसरी पारी में जाने जाने प्रत्रकार Rahul Kanwal जी के साथ काम करने का अनुभव काफी उम्दा और दिलचस्प है।राहुल कँवल टीवी के दुनिया के जाने माने चेहरे है और अभी NDTV की कमान उनके हाथ में है । इनके नेतृत्व में एनडीटीवी प्रगति की नई परिभाषा लिख रहा है।
राहुल जी के  शो में संतुलित और तथ्य आधारित चर्चा की शैली  शो को खास बनाती है।
युवा पत्रकारों के लिए उनकी ग्राउंड रिपोर्ट का अंदाज और उनका सरल व्यवहार सीखने योग्य है।
जब लालू  ने कर दी राजदीप से शिकायत 
एक बार मैं राजदीप सरदेसाई जी के साथ लालू जी के पास गया। लालू ने राजदीप सरदेसाई से मेरी शिकायत करते हुए कहा कि ये हमारी निगेटिव खबरें खोज -खोज कर चलाते हैं। फिर हम नीतीश कुमार जी के यहां गए उनकी भी शिकायत यह रही कि मैं उनके विरोधी खबरें ज्यादा चलाता हूं। बाहर आने पर राजदीप सरदेसाई ने मुझे शाबाशी देते हुए कहा तुम सही पत्रकारिता कर रहे हो।
पत्नी का हर कदम पर साथ
जीवन के हर उतार- चढ़ाव में मेरी जीवन साथी मोनिका ने मेरा साथ दिया। मैं ऐसे पेशे में हूं कि घर के लिए समय देना मुश्किल होता है ऐसे में घर को संभालने, बच्चों की परवरिश और पढाई के ख्याल के साथ -साथ उसने मुझे भी संभाले रखा है।
साथ जीवन साथी का
वह हर कमजोर लम्हों में मुझे हौसला देती रहीं हैं। चाहे वो जायका हो या फिर जिंदगी सब में स्वाद भरना …. को अच्छे से आता है। मैं ईश्वर का शुक्रिया अदा करता हूं कि मुझे ऐसी जीवन साथी मिली। वो घर के साथ साथ एक रेस्तरां का व्यवसाय भी संभालती है।
बच्चों ने फिर लौटाया बचपन
मेरे बच्चों में मुझे अपना बचपन लौटा हुआ दिखता है।
बेटा Suryaansh singh और बेटी Manashwani singh पढ़ाई कर रहे हैं।
मैं चाहता हूं मेरे बच्चे नेकी और इंसानियत के रास्ते पर चले। खुद की आत्मा की आवाज हमेशा सुनें और  सब लोगों की परवाह करें।
तमन्ना अंदर के आदमी को बचाएं रखने की
आज वक्त तेजी से बदल रहा है। हम एआई के जमाने में आ गए हैं.
ऐसे में बीतते वक्त और जीवन के गुजरते बसंत के बीच, एक ही तम्मन्ना है कि मैं अपने अंदर के आदमी को बचाएं रखूं।
आज भी हर रोज मदद के लिए मेरे पास बहुत सारे फोन आते हैं जहां तक संभव होता है मैं मदद करने की कोशिश करता हूं।
जिस पेशे में हूं उससे आम लोगों का जितना भला हो पाएं, करने की कोशिश करता हूं।
यह तो कठोर सच है कि एक न एक दिन जाना सभी को है जाने से पहले समाज के लिए कुछ कर के जाने की चाहत है। चाहत वैसे समाज के निर्माण में योगदान की है जो धर्म जाति से इतर सबकी खुशी चाहता हो । कवि नीरज के शब्दों में कहूं तो
‘अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए, जिस में इंसान को इंसान बनाया जाए”  
(यह कहानी  प्रभाकर कुमार से  विवेक चंद्र की बातचीत पर आधारित है। कहानी आपको कैसी लगी कमेंट कर जरूर बताएं, thebigpost.com की कोशिश सकारात्मक कहानियों को सामने लाने की है। आप  आर्थिक सहयोग कर हमारी मुहिम को मजबूत कर सकते हैं। हमारा नंबर है 7488413830.)
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इस ‘कर्नल’  को कैमरे से हुआ Love, घर छोड़ा, स्ट्रीट फोटोग्राफी की, मुफलिसी से लड़कर खड़ा किया खुद का स्टूडियो,एक रेस्तरां के भी मालिक 

स्कूल के दौरान ही उस शख्स ने ‘कैमरे’ से आशिक़ी कर ली।  फोटोग्राफी से मुहब्बत इस कदर कि मतवारे बन उसपर फ़ना हो गए। स्कूल में पढ़ने के साथ स्कूली बच्चों को यूनिफॉर्म में  ट्यूशन पढ़ाने लगे। घर छोड़ा। इश्क वाले कैमरे को अपना बनाने के लिए भूखे रह,  पैसे जोड़े। 
स्ट्रीट फोटोग्राफी कर जिंदगी की चटख तस्वीरें खींची।
 खुद डिफोकस  रह कैमरे का फोकस लोगों का जीवन बदलने में लगाया। समाज की रंगीन तस्वीर खींचने वाले। कर्नल सिंह के खुद के जीवन की तस्वीर में हमेशा दर्द का  फिल्टर चिपकता रहा पर , इस युवा ने हिम्मत नहीं हारी।
सड़क दुर्घटना में पिता का निधन हो गया , घर लौट आए परिवार की जिम्मेदारी संभाली।
आज खुद के स्टूडियो के मालिक हैं, एक शानदार रेस्तरां भी है।  वक्त निकाल जरूर पढ़िए जुनूनी  ‘फोटोग्राफर ‘ कर्नल सिंह की यह जुनूनी कहानी…

मुझे जीवन अपनी और खींचता है, हमरा ट्रेडिशन हमरा कल्चर, हमारे शहर गांव, और हर एक चेहरा जो आंखों में उम्मीद भर इस कोशिश में जुटा है कि खुशियों के दिन आएंगे जरूर। यह उम्मीद ही तो है जो हमारी सांसों को ताक़त देता है, धड़कनों को आल इज वेल कहना सिखाता है।

मेरी कहानी भी उम्मीद के इसी समंदर में   डूबती है , उबरती है, गोते लगाती है। कभी नमकीन आंसू बनकर तो कभी किसी की मुस्कुराहट पर निसार होकर।

इसी उम्र में हीं  मैंने बहुत उतार -चढ़ाव देखे। लोगों को बदलते देखा, खुद को टूटते , समेटते, संभलते देखा। इन सब के बावजूद मैं आज कह सकता हूं जिंदगी बहुत खुबसूरत है बिल्कुल आपकी मुस्कुराती हुई प्यारी तस्वीर जैसी।

फोटोग्राफी से मुहब्बत सी हो गई
मेरा पेशा और पैशन दोनों हीं फोटोग्राफी है। बचपन से ही फोटोग्राफी से मुहब्बत सी हो गई थी। फिर मैं फोटोग्राफी पर फना होता गया।
घर के लोगों के तमाम विरोधों के बावजूद फोटोग्राफी मेरे लिए सबकुछ बन गई। खुशी भी , उम्मीद भी, रोजी भी, रोटी भी।
कर्नल सिंह की फोटोग्राफी में जीवन के रंग
हां इस तमाम संघर्ष के दौर में कई लोग ऐसे मिले जिन्होंने मुझे हिम्मत दी , मुझे टूटने से बचाया। सबका शुक्रगुजार हूं मैं। मेरी दोस्त जो आज मेरी जीवन संगिनी है, क्या कहूं मैं उनके बारे में शब्द ही नही,
उन दिनों को याद करता हूं तो है होठ खामोश हो जाते हैं, आंखें चुपचाप बरस पड़ती है…।
खैर, मैं भी कहां भावनाओं के भंवर में फंस जाता हूं। यह जानते हुए कि इमोशन  की आज की दुनिया में कद्र कहां है! सब कुछ जानते समझते हुए भी इमोशन को नहीं छोड़ पाया। न छोड़ पाऊंगा कभी। तस्वीरें भी तो इसी लिए खींचता रहा कि दिल में इमोशन धड़कता रहे।
 वो बचपन वाले दिन थे
मेरा जन्म एक साधारण से परिवार में हुआ। पिताजी वकील थे, मां हाउस वाइफ। मैं बचपन में मां को बड़े गौर से खाना पकाते देखता। मैं सातवीं क्लास में था तो मुझे कुकिंग का शौक हो गया। मां से आटा गूंथना सीखता, सब्जियां बनाना सीखता। 9वीं आते आते मैंने खाना बनाना अच्छे से सीख लिया। इतनी  की लगभग सारे डिश मैं बना लेता था। परिवार के लोगों को भी मेरा बनाया पसंद आता ।
इसी वक्त एक और शौक धीरे धीरे मेरे अंदर परवाह चढ़ रहा था। वो था फोटोग्राफी।
मैं जब भी कोई दृश्य देखता तो दिमाग में फोटो के रूप में उसकी छवि कैद करने की कोशिश करता। जब कक्षा दसवीं में था तो अपने जन्मदिन पर मां से  गिफ्ट के तौर पर एक कैमरे वाला मोबाइल फोन लिया। कोई 2000 रुपए के आस पास का। फोन सिर्फ इसलिए की उसमें मुझे कैमरा मिल गया। फिर मैं अपनी कल्पनाओं की तस्वीरें आस- पास ढूंढ कर उसे कमरे में कैद कर लेता। मुझे यह अजीब सा सुकून देता था।
जब टीचर तक पहुंची यह बात 
मेरे स्कूल में अंग्रेजी के एक शिक्षक थे रंजय सेन गुप्ता। मैं उन्हें अपनी खींची तस्वीरें दिखाता, वो देखते और मुझमें हौसला भरते।
धीरे -धीरे यह बात मेरे घर वालों को भी पता चल गई कि मेरी संगत किताबों से ज्यादा इन दिनों फोटोग्राफी से हो गई है।
फिर डांट के साथ हिदायत दी गई की इन सब को छोड़ पढ़ाई में मन लगाओ। मैं इन हिदायतों को दिल से लगाए बिना ही कान से निकाल, मोबाइल कैमरे के साथ तस्वीरें लेने निकल जाता।  धीरे-धीरे सख्ती बढ़ने लगी।
पिताजी को लगता फालतू काम 
पिताजी को मेरे इस फोटोग्राफी का जुनून  तनिक भी नहीं भाता। अब हम दोनों पिता- पुत्र फोटोग्राफी के मसले पर आर-पार के मुड़ में चल रहे थे। पिताजी को यह सब फालतू का काम लगता, वो चाहते मैं पढ़ाई में मजबूत रहूं।
मुझे किताबों से ज्यादा तस्वीरों की पढ़ाई में मजा आता।
मुझे लगता इसमें भी तो भविष्य की बुलंदी गढ़ी जा सकती है। बात इतनी बढ़ी की घर की चहारदीवारी से निकल मेरे स्कूल के शिक्षक रंजय सर तक शिकायत बन पहुंच गई।
उनसे कहा गया कि यह बच्चा किताबों के साथ दोस्ती करने की जगह कैमरे के साथ मटरगश्ती कर रहा है। मेरी तो मानों शामत आने वाली थी।
लगा रंजय सर की डांट तो तय है साथ ही यह फोटो – वोटों का भूत भी आज वे उतार ही देंगे।
मैं मन ही मन  डरा सहमा ईश्वर से प्रार्थना कर रहा था, सब ठीक रहें और भगवान जी ने सब ठीक कर दिया।
रंजय सर ने मेरी तारीफ की और कहा यह लड़का ग़लत रास्ते पर नहीं, सही रास्ते पर है। अब मेरा फोटोग्राफर मन और मजबूत हो गया। मैं आस-पास जा लोक जीवन के रंग अपने कैमरे में कैद करता रहता। यह सब मुझे सुकून देता था।
स्कूल की यूनिफॉर्म पहन  ट्यूशन देने जाते 
 कर्नल सिंह कहते हैं कि मैं उस वक्त 11 वीं में पढ़ाई कर रहा था। मन पढ़ाई में कम फोटोग्राफी में ज्यादा लग गया था। मैंने एक कैमरा खरीदने का मन बनाया। कैमरे की कीमत सात हजार रुपए थी। मुझे मालूम था कि इतने पैसे मुझे घर से नहीं मिलने वाले। मैंने छोटे बच्चों को होम ट्यूशन देना शुरू किया। मैं घर से स्कूल यूनिफॉर्म में निकलता स्कूल के बाद उसी यूनिफॉर्म में बच्चों को ट्यूशन पढ़ाता। ऐसा करके मैं कुछ पैसे कमाने लगा।
कर्नल सिंह की खींची एक तस्वीर

घर पर जब यह बात पता चली तो काफी विरोध हुआ। पिताजी से मार भी पड़ी। मैं भी गुस्से में था। खुद से खुद की तलाश करता। अपना कैमरा अब भी सपना था। मैंने घर में कहा मुझे ‘दिल्ली कॉलेज ऑफ़ फोटोग्राफी ‘ से फोटोग्राफी का कोर्स करना है। घर में लोगों ने समझाया कि अभी दिल्ली नहीं जाना है। मैंने कहा मैं ठीक है मैं पटना में रहूंगा पर फोटोग्राफी नहीं छोड़ूंगा।

ऐसे आया खुद का कैमरा
इसी दौरान एक फोटोग्राफी एजेंसी में मुझे काम मिल गया। मैं उस आफिस में काम करने लगा। घर में जब यह बात पता चली तो फिर हंगामा खड़ा हो गया। मैंने घर छोड़ दिया।
दिन भर उस दफ्तर में काम करता और रात को वहीं बेंच जोड़कर सो जाता। मुझे यहां 6 हजार रुपए पगार मिलने लगी।
दो माह काम कर उसी दफ्तर से पुराना कैमरा खरीदा। मैं दफ्तर में ही रहता। इस एवज में मुझे रोज दफ्तर की सफाई करनी होती। इस दफ्तर में मैंने  खूब  मेहनत की। पैसे बचाएं और एक पुराना कैमरा इसी आफिस का खरीद लिया। अब मेरे पास खुद का कैमरा था।
इधर मैं मन से काम कर रहा था पर कभी कभी ज्यादा काम करना भी अच्छा नहीं होता। मेरे कुछ सिनियर को मेरा ज्यादा काम करना पसंद नहीं था। ऐसा इसलिए कि उनपर भी काम का दबाव बढ़ता था और मेरा बढ़ता ग्रोथ उन्हें अच्छा नहीं लगता। ऐसे एक रात मेरे एक सिनियर ने मुझे फोन किया कहा तुम काम छोड़ दो। यह सुनकर मेरी आंखों के आगे अंधेरा छा गया। मन को मजबूत किया और काम छोड़ दिया।
 शुरू की कंपनी 
मैं काफी परेशान था। इसी दौरान 12 वीं का इम्तिहान दिया। फिर सोचा कुछ अपना किया जाए। कई लोग जिनके लिए मैंने फोटोग्राफी की थी उनका फोन आता था।  फिर मैंने एक स्टूडियो के साथ मिलकर काम शुरू किया। मेहनत यहां भी  काफी की। होटलों में जाकर काम मांगा।  कुछ समय बाद हमारे पास काम था। अब काम तो आ रहा था पैसा भी पर जिनके साथ काम शुरू किया था वो लगातार दबाव बनाने लगे। वे ज्यादा हिस्सा चाहते थे। मैं काफी आहत हुआ। अंत में उन्हें हीं कंपनी दे दी।
दुःख बार बार मेरे हिस्से आता 
मैं फिर सब कुछ हार चुका था। सपने टूट चुके थे, मन बोझिल, आंखों के सामने था तो बस  घना अंधेरा। मैंने हिम्मत की , पिताजी को डरते हुए फोन किया कहा मुझे दिल्ली जाना है। टिकट कटवा दें। हर  पिता  उपर से कठोर हो अंदर से नर्म होते हैं  । पिताजी ने टिकट करवा दी। मैं दिल्ली आ गया।
अनुभव वाले दिन: महेश भट्ट जी के साथ
यहां मून लाइट स्टूडियो में फोटोग्राफी सीखता। रात को  देवी जागरण में इवेंट फोटोग्राफी करता। इस दौरान हीं महेश भट्ट जी से मुलाकात हुई। काफी प्रेरक रही यह मुलाकात। बाद में मून लाइट स्टूडियो में मैं पढ़ाने भी लगा। कुछ पैसे जोड़े और फिर ड्रीम आर्ट स्टूडियो शुरू किया।
‘मन बसे बनारस’

मन बनारसी होने को बेताब

मेरा मन बार- बार बनारस की ओर चला जाता। वह बनारस के रंगों में डूबना चाहता था। मुझे बनारस काफी पसंद है । संकट यह कि बनारस में उस वक्त   वेडिंग फोटोग्राफी लिए मार्केट नहीं था। इन सब के बाद भी मैं बनारस आया। जौनपुर में एक डाक्यूमेंट्री फिल्म की शूटिंग की। 15 दिन जौनपुर में बीता।
मैं वहां एक खाली बिल्डिंग में रहता था।  यह बिल्डिंग हॉरर फिल्म की तरह दिखती थी।
किसी तरह 15 दिन बीते। मैं फोटोग्राफी के लिए बनारस रहना चाहता था। यहां जीवन के रंगों को कैमरे के कैनवास पर उतारना चाहता था। अस्सी घाट से लेकर मणिकर्णिका घाट तक, जीवन और मोक्ष के रंग एक साथ आपको बनारस में ही तो दिखते हैं।
‘संघर्ष का फल मीठा होता है ‘
पुराने लोगों ने पटना से भेजा बुलावा
इधर पटना के सिनियर लोगों ने मुझसे संपर्क किया। वे चाहते थे कि मैं वापस पटना लौट जाऊं । मैंने उनकी बात मान ली। फिर मैं पटना आ गया। यहां बहुत मेहनत की।  DREAM ART STUDIO कंपनी को एक करोड़ के टर्नओवर तक पहुंचाया। 2020 में जन्मदिन पर खुद की कमाई से पहली बाइक ‘ बुलेट ‘ खरीदी।
सड़क दुर्घटना में पिताजी का निधन 
मैं पटना में पैतृक घर से अलग रहता था। पिताजी अब भी नाराज़ थे। उनका सपना था कि मैं सरकारी नौकरी करूं। 2020 में एक रोज पिताजी का निधन हो गया। परिवार के लिए यह बड़ा संकट था। इसी बीच चोरी भी हुई घर में। मेरी जिंदगी एक दिन में बदल गई। मेरे कंधे पर अब परिवार की जिम्मेदारी थी। मां की जिम्मेदारी थी।  सब कुछ एक साथ। लगा जिम्मेदारी और आर्थिक बोझ पहाड़ बनकर आ खड़ा हुआ। ऐसे में आंशिक, मैं और भाई अंगद मुस्तैदी से खुद को फौलाद बना डटे रहे।

और मिल गई हमसफर 
मेरे सुख दुख से भरी कहानी में मेरी हमसफ़र का जिक्र बेहद जरूरी है। मैं आज जो भी हूं इन सब में उसका योगदान अहम है।
उनसे न सिर्फ मेरे अंदर के की कला को पहचाना बल्कि हर अंधेरे वक्त में मुझे हिम्मत देते हुए मेरे साथ खड़ी रही। जब मेरी आंखें नम होती वो मुझे हंसाती। चुपचाप मेरी खामोश आंखों में रंगीन सपने रख जाती।
फुर्सत के पल: पत्नी अंशिका और बच्चे के साथ
वह मुझे यकीन दिलाती कि मैं एक न एक दिन सपनों की दहलीज पर चलते हुए मुकाम जरूर पाऊंगा। हां …अंशिका.नाम है उसका। आज वह मेरी  जीवनसाथी है, मेरी पत्नी है। हमारा रिश्ता दोस्ती से शुरू हुआ था। फिर धीरे-धीरे वह प्यार में बदला फिर शादी के रिश्ते में।  पढ़ाई के दौरान  मुलाकात हुई थी  अंशिका  से। उसे मेरी फोटोग्राफी काफी पसंद आती थी। फोटो पसंद करते करते मुझे भी पसंद करने लगी।

मुझे लगता है वह  बिना कहे मुझे जानती थी। समझती थी। मानो मेरी जिंदगी की किताब पढ़ रखी हो उसने।

उस वक्त अंशिका सरकारी नौकरी करती थी और मैं स्ट्रगल। धीरे धीरे मैंने 12 लोगों की टीम बनाई। पहली कार खरीदी। 2023 में हम शादी के बंधन में बंध गए।
संदीप: मिसाल वाली दोस्ती
 बुरे वक्त में ढाल बनकर खड़ा रहा मित्र संदीप 
मेरे जीवन के संघर्ष से सफलता की इस कहानी में एक एक और महत्वपूर्ण व्यक्ति की भूमिका काफी अहम रही। वह है मेरा दोस्त संदीप। संदीप का सहयोग नहीं मिलता तो शायद इतने सारे ब्रेकर को पार कर पाना मुश्किल था। वह बुरे वक्त में ढाल बनकर खड़ा रहा। मैं उसके उपकारों का बदला कभी नहीं चुका सकता। न उसे व्यक्त करने के लिए मेरे पास शब्द हैं। ईश्वर से प्रार्थना है कि संदीप जैसे लोग हमेशा खुश रहें और ऐसे दोस्त सबके पास हों।
खींचते तो फोटो ही हो
हमारी शादी में कई अड़चनें आई। अंशिका के घर वाले इस रिश्ते के लिए तैयार नहीं थे। काफी मान मनौव्वल करनी पड़ी। मुझे बार बार सुनाया जाता कि पैसा चाहे जो क्या वो। खींचते तो फोटो ही हों।
कर्नल सिंह की नजर से रेलवे स्टेशन
इधर मैंने पाटर्नरशिप में एक रेस्तरां भी शुरू कर दिया। यहां भी बाद में समस्या आई। मुझे लगता मेरे पार्टनर को इसमें जितना समय देना है वह नहीं दे पाते। फिर हमने बात कि वे अलग हो गए। इधर अब कैफे की जिम्मेदारी भी आ गई। आर्थिक बोझ बढ़ गया। ऐसे में दोस्त संदीप ने मदद की।
एहसास खास है
KOSMICKO CAFE   में प्रकृति के पास
Kosmicko कैफे और रेस्तरां को मैंने दिल से बनाया है। यह पटना के पाटलिपुत्र में है। यहां आकर आप इसे महसूस कर सकते हैं। इसे जी सकते हैं।इसका इंटीरियर भी मैंने खुद से डिज़ाइन किया है। यहां आप शांति  पा सकते हैं। यह प्रकृति के पास होने का एहसास कराता है।
हर ‘बाइट’ में स्नेह का चटखारा 
KOSMICKO ‘ में आपको सिर्फ जायका नहीं मिलता इसमें स्नेह भी लिपटा होता है। यहां की हर बाइट में आपको स्नेह और अपनापन का चटखारा भी मिलेगा।
कर्नल सिंह आगे कहते हैं यहां हम अतिथि देवो भव  की अवधारणा को साकार करते हैं। यहां का हर कर्मी आपको व्यवहार कुशल मिलेगा। हाइजीन का ध्यान यहां विशेष तौर से रखा जाता है। ताजगी और स्वच्छता और बेहतर व्यवहार हमें बाकी से अलग बनाती है।
खाने का स्वाद भी आपको लाजबाव मिलेगा और सबकुछ बजट फ्रेंडली भी।
हमने इसका स्लोगन Made With Love  दिया है।
अपने परिवार के बाद मैं  सबसे ज्यादा प्यार इस रेस्तरां को ही करता हूं।
DREAM ARTS STUDIO  में  अनोखा सब्सक्रिप्शन मॉडल
कर्नल सिंह कहते हैं। मैं अपने स्टूडियो में सब्सक्रिप्शन मॉडल लाना चाहता हूं । यह बिहार के लिए पहला होगा। इसमें एक बार मेंबर बनकर आप  साल में चार सेवाएं मुफ्त ले पाएंगे। वे आगे कहते हैं कि वेडिंग इडस्ट्री आज काफी तेजी से फ़ैल फूल रही है। वेडिंग फोटोग्राफी का क्रेज काफी बढ़ा है। आज हम दिल्ली, लखनऊ, जयपुर , कोलकाता जैसे शहरों में वेडिंग फोटोग्राफी का काम कर रहे। हम अपनी फोटोग्राफी में एक खास ह्यूमन टच देते हैं। यह हमें बाकी से अलग बनाता है।
काम के दबाव में परिवार को कम वक्त 
कर्नल सिंह कहते हैं काम के दबाव की वजह से मैं परिवार को काफी कम समय दें पाता हूं। मेरी पत्नी काफी तालमेल बैठाती है। अपने छोटे से बच्चे… से भी कई बार मिले कई दिन गुजर जाते हैं। मैं बस ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि सभी खुश रहें सलामत रहे । मैं दिन रात मेहनत इस लिए कर रहा कि कुछ अच्छा कर सकूं। यह अच्छा मेरे परिवार के लिए, समाज के लिए और देश के लिए हो। मैं उन सब का आभारी भी हूं जो मेरे बुरे दौर में हमेशा मुझे हौसला देते रहे हैं। मैं उनका कर्ज कभी नहीं भूल सकता।
फोटोग्राफी वर्कशॉप की शुरुआत
कर्नल सिंह बताते हैं कि मैंने जो सीखा है उसे लोगों को सीखना चाहता हूं। इसके लिए हमने फोटोग्राफी वर्कशॉप की शुरुआत की है। इसमें शिक्षण संस्थानों से जुड़े छात्रों को हम फोटोग्राफी की  बारीकियां बताते हैं। आज के दौर में सोशल मीडिया एक मजबूत कड़ी बन चुका है। हम जल्द ही सोशल मीडिया की एक कंपनी भी शुरू करने जा रहे यहां कम बजट में सोशल मीडिया की गुणवत्ता पूर्ण सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएगी।
मैं खुब मेहनत कर एक ऐसी तस्वीर बनाना चाहता हूं जिसमें मेरे देश का हर नागरिक तमाम उंच – नीच , जात- पात,  अमीरी -गरीबी से  बेफिक्र हो खिलखिला हुआ हंस सकें प्यारी सी उन्मुक्त हंसी…। 
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एक बायोग्राफी ने बदली जीवन की दिशा, दंत चिकित्सक बन सजा रहे ‘खुबसूरत हंसी’ 

वे लोगों की हंसी खुबसूरत बना रहे। आत्मविश्वास के  मोती भर चेहरे को नूरानी। 
कोशिश कि लोग जिंदगी और जायका दोनों का चटखदार स्वाद ताउम्र बेफिक्री से ले सकें। ताउम्र स्वस्थ और सेहतमंद बने रहे। आज कहानी एक ऐसे युवा दंत चिकित्सक कि  जिन्होंने पटना जैसे शहर में अत्याधुनिक दंत चिकित्सक तो शुरू की हीं दांतों के  ट्रांस्प्लांट के महारथी बन अब तक हजारों लोगों का सफल ट्रांस्प्लांट किया। वे दुनिया घूमते है  और सीखते हैं नई तकनीक।
खास यह भी कि  अत्याधुनिक मशीनों से  लैस इनका अस्पताल सीनियर सिटीजन के लिए होता है बिल्कुल मुफ्त। बदलते परिवेश में भी पेशे में इमानदारी और दिल में इंसानियत सजाए और बचाए रखने वाले डॉ रोहित  सिंह की कहानी पढ़ें, अच्छा लगेगा। 
पटना के ए एन कालेज के निकट   Dental Comfort Zone  में बड़े ही क़रीने से सजाएं गए वेटिंग लाउंज में अलग अलग उम्र के लोग अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं। सामने  कुछ पत्रिकाएं रखीं हैं। वेटिंग लाउंज का शांत और सुकून देने वाला माहौल में दक्ष कर्मचारी आपसे स्नेह के साथ आपकी तकलीफ के बारे में पूछ रहे हैं। यहां ज्यादातर वैसे लोग हैं जिन्होंने पहले से अपना अप्वाइंटमेंट बुक करा रखा है। बारी आने पर उन्हें अंदर बुलाया जा रहा है। अंदर बड़े से हॉल नुमा चमाचम कमरे में अलग-अलग सेक्शन बनें हैं। यहां अत्याधुनिक कुर्सियां और दंत चिकित्सा के उपकरण लगे हैं। यहां डॉक्टर रोहित सिंह बड़े ही सहज और स्नेहिल व्यवहार के साथ मरीज़ से उसकी समस्या जान उसका इलाज करने में लगे हैं।
डॉक्टर रोहित की मीठी बातें और बल्व की हल्की पीली रौशनी यहां के माहौल को और खुबसूरत बना रही है। आपको यहां यह एहसास नहीं होता कि आप किसी अस्पताल में इलाज के लिए आए हैं।
न कोई शोर, न तनाव, न दवाइयों की बिखरी तेज गंध, और न ही बेरूखा व्यवहार।
सब कुछ ऐसा जैसे आप किसी महानगर के सितारा अस्पताल में आएं हों। डॉक्टर रोहित हमें मुस्कुराते  हुए पास बने अपने डॉक्टर चेंबर की ओर ले जाते हैं। उन्होंने हमसे बातचीत के लिए अपने व्यस्ततम दिनचर्या से  समय निकाला है। हम उनसे उनकी जिंदगी की किताब के तमाम बीते पन्नों की कहानियां जानना चाहते हैं। यह भी कि पटना जैसे शहर में इतना व्यवस्थित डेंटल क्लिनिक खोलने और इसे कुशलता के चलाने का ख्याल जमीन पर कैसे उतरा।
डॉक्टर रोहित कहते हैं।
हमारे पास जो भी लोग आते हैं वो तकलीफ और दर्द में होते हैं। वे हम पर भरोसा कर आते हैं ऐसे में हमारा फर्ज है कि हम उनकी परेशानियों को दूर करें और इसकी शुरुआत एक अच्छे माहौल, एक अच्छा व्यवहार और एक अच्छी चिकित्सा से होनी चाहिए।
हाइजिन और बेहतर माहौल आपको सुरक्षित तो करता ही है आपके दिल को खुशी भी देता है और यह एक बेहतर इलाज के लिए काफी फायदेमंद साबित होता है। डॉक्टर रोहित  सिंह आगे कहते हैं
इन दिनों हम अपने चेहरे को आकर्षक बनाने के लिए महंगे ब्रांडेड क्रीम और फेसिएल तो करवाते हैं पर मुंह के अंदर की साफ सफाई और दांतों के ख्याल में कंजूस बन जाते हैं। दांत का ख्याल हमें तब आता है जब दांत में दर्द होता है।
जैसे  ब्यूटी पार्लर जाना अपने रूटिन में शामिल कर लिया है वैसे ही समय समय पर एक कुशल डेंटिस्ट से मिलना भी जरूरी है।
आपकी सेहत का रास्ता आपके मुंह से जाता है और आपके मुंह का आवश्यक अंग आपके दांत है। आपके दांत और मुंह दोनों सुरक्षित है तो समझिए आपका शरीर और मन दोनों सुरक्षित है।
इन दिनों सबसे चौकाने वाली बात यह है कि ओरल कैंसर के आंकड़े लगातार बढ़ते जा रहे हैं। महानगरों के साथ छोटे शहरों और गांवों तक के लोगों में यह कैंसर तेजी से फ़ैल रहा है।
इसकी वजह हमारी बदलती जीवनशैली और खानपान है। हम इन दिनों फास्ट-फूड की तरफ़ खुब मेहरबान हैं। हम भारतीय परंपरागत खानों की जगह विदेशी खासतौर से चाइनीज फास्ट-फूड को दिनचर्या में शामिल कर लिया है। ऐसे में इसका असर हमारे दांतों पर भी हो रहा है। तंबाकू और नशे की लत से भी ओरल कैंसर की संभावना काफी बढ़ जाती है। ऐसे में मसूड़ों और दांतों का ख्याल रखना बेहद जरूरी है।
 नया सीखने के लिए ट्रेवलिंग
डॉक्टर रोहित सिंह बताते हैं कि मेडिकल साइंस की तकनीक रोज बदल रही है। ऐसे में अपडेट रहना बहुत जरूरी है मैं और मेरी पत्नी… दोनों इसके लिए ट्रेवलिंग करते हैं। हम दुनिया घूमते  है, दंत चिकित्सा पर हो रहे वर्कशॉप और सेमिनार अटेंड करते हैं और नई तकनीकी बदलाव की जानकारी प्राप्त करते हैं
 इसके अतिरिक्त हम लगातार नए नए रिसर्च पेपर भी पढ़ते रहते हैं
यादों वाला बचपन 
डॉक्टर रोहित बताते हैं कि मेरा जन्म 1982 में गया में हुआ। फिर कुछ दिनों बाद हम रांची आ गए। फिर हजारीबाग। पिताजी वहीं पदस्थापित थे। तब हजारीबाग भी बिहार का हीं हिस्सा था। मेरी शुरूआती पढ़ाई हजारीबाग सेंट जेवियर्स स्कूल से हुई। पिताजी लेबर कमिश्नर के पद पर थे। उनका तबादला होता रहता। 1988 में हम पटना आ गए।
यहां मेरा नामांकन संत माइकल हाईस्कूल में हो गया। मेरी 12 वीं तक की पढ़ाई इसी स्कूल से हुई। मैं आज जो भी हूं उसमें मेरे परिवार के साथ इस स्कूल की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इस स्कूल ने मुझे गढ़ा है।
बचपन की यादों में हजारीबाग शहर, वहां ऊंचे-ऊंचे साल के पेड़, कैनेरी  पहाड़ी और संत जेवियर्स स्कूल का शानदार भवन आज भी किसी एल्बम सा महफूज है। तब पटना भी इतनी भीड़ वाला कहां था। पटना में उन दिनों ऊंची बिल्डिंगों की लाइनें नहीं थी न गाड़ियों की इतनी कतार।
हमारे स्कूल के पास से ही गंगा की धार कल- कल कर बहती दिखती और उसमें चलते नाव देख ऐसा लगता मानो जीवन मस्ती की धुन पर हिलोरें भरता चला जा रहा हो। गांधी मैदान के पास गोलघर शान से सीना तानकर खड़ा रहता। तब मोबाइल का ज़माना नहीं था। बेस फोन की घंटी बजती। कुशल क्षेम पूछती चिट्ठियां आती जाती।  शहर में बदलाव दबे पांव आ रहा था पर इन सब के बीच एक अपनापन था । लगता पूरा शहर हीं बाहें फैलाकर स्वागत कर रहा हो। स्कूल में पढ़ाई के साथ साथ काफी एक्टीविटी भी होती। खेल और बौद्धिक चर्चाएं मुझे काफी पसंद थी।
परिवार का साथ-संग
माताजी का दुलार, पिताजी का स्नेह 
बचपन से ही माता-पिता का स्नेह दुलार मुझे मिलता रहा। पिताजी डॉ अमरकांत सिंह के विचार काफी उच्च थे। वे मुझे हमेशा बेहतरी के लिए प्रेरित करते। मां डॉ उषा सिंह , पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय में हिंदी की उपाध्यक्ष थीं। मां के सानिध्य ने मुझे साहित्य किताबों से दोस्ती सिखाई। मां खुब दुलार देती साथ हीं नेक इंसान बनने की सीख भी।
दादाजी के कार्यों से मिली नई दृष्टि 
मेरे जीवन में दादा जी के कार्यों का योगदान भी शामिल है। उनके जिक्र के बिना मेरी जिंदगी की कहानी कुछ अधुरी सी है। दादाजी इलाके के काफी प्रतिष्ठित व्यक्ति थे। हमारे गांव रामगढ़ जो मोहनिया ब्लाक और कैमूर जिले में है, वहां दादाजी की खासी प्रतिष्ठा रही। दादाजी वहां के हाईस्कूल के फाउंडर और उसके सेक्रेटरी भी रहे। दादाजी से जुड़ा एक और किस्सा साझा करना चाहूंगा। मेरे दादाजी और नानाजी पहले मित्र थे, फिर यह मित्रता रिश्तेदारी में बदल गई।
पढ़ाई के दौरान दोस्तों के संग डॉ रोहित
एक बायोग्राफी ने बदली जीवन की दिशा 
स्कूल के दिनों से ही मन में ऐसा काम करने की चाहत थी जिससे जीविका के साथ समाज की भलाई भी जुड़ी हो।  एक दिन एक पत्रिका में डॉ नरेश त्रेहन की बायोग्राफी छपी थी। मैंने वह बायोग्राफी पढ़ी। उस बायोग्राफी ने मेरे मन में यह सपना भर दिया कि मुझे भी डॉक्टर बनना है। तब यह नहीं सोचा था कि दंत चिकित्सक बनूंगा। नरेश त्रेहान आज भी मुझे प्रेरित करते हैं और सच कहूं तो उनकी प्रेरणा से ही मैं इस पेशे में आया।
तीन दिन इंजीनियरिंग की पढ़ाई, फिर डॉक्टर बने
डॉक्टर रोहित बताते हैं कि 1988 में पटना से बीडीएस किया। फिर पीजी दिल्ली से किया। दो दो बार इंट्रेंस निकाला। पहली बार में ट्रेक करने के बाद एडमिशन नहीं लिया। वे कहते हैं कि मैंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई भी मणिपाल यूनिवर्सिटी से की , पर यह पढ़ाई बस तीन दिनों की थी। वे आगे कहते हैं कि मैं स्कूल की पढ़ाई में भी एक अच्छा बच्चा था पर मेरा गणित काफी कमजोर था। वैसे भी मुझे चिकित्सक का पेशा काफी लुभाता था। यह एक ऐसा पेशा है जो लोगों के भरोसे और उनकी जिंदगी से जुड़ा हुआ है।
बिहार के अग्रणी डेंटल विशेषज्ञों में शामिल 
डॉक्टर रोहित सिंह एक उच्च-शिक्षित और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रशिक्षित दंत चिकित्सक हैं। उन्होंने BDS (बैचलर ऑफ डेंटल सर्जरी) की मूल डिग्री के बाद MDS (मास्टर ऑफ डेंटल सर्जरी) के माध्यम से विशेषज्ञता हासिल की, जिससे वे सुपर-स्पेशलिस्ट स्तर के डेंटिस्ट बन गए। इसके साथ हीं उन्होंने एडवांस इम्प्लांटोलॉजी में पीजी डिप्लोमा, जर्मनी और अमेरिका से इंटरनेशनल क्लिनिकल ट्रेनिंग, तथा FICOI (USA) जैसी प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय फेलोशिप प्राप्त की है। डॉक्टर रोहित  डेंटल इम्प्लांट, फुल माउथ रिहैबिलिटेशन, मसूड़ा रोग उपचार और कॉस्मेटिक डेंटिस्ट्री के विशेषज्ञ माने जाते हैं, यह  आधुनिक डिजिटल डेंटिस्ट्री और लेजर तकनीक के क्षेत्र में डॉक्टर रोहित को   बिहार के अग्रणी दंत चिकित्सकों में शामिल करता है।
पत्नी के सहयोग से सपनों को मिला आकार 
डॉक्टर रोहित आगे बताते हैं कि 2013 में वे शादी के बंधन में बंध गए और बनारस की  डॉ नेहा सिंह जीवन संगिनी बनीं।
डॉक्टर नेहा एक अच्छी पत्नी, एक अच्छी डाक्टर और अच्छी बहू  और अब एक अच्छी मां की भूमिका बखूबी निभाती रही है। यह नेहा के प्रयासों का नतीजा ही है कि हम इस क्लीनिक को आकार दे पाए।
उसने निराशा भरे संघर्ष के दौर में मुझे हिम्मत दी है। तब मैं आर्थिक मजबूती के लिए कालेज में पढ़ाया भी। करता था और सिर्फ दो दिन ही यहां अस्पताल में देता था। डॉ नेहा ही यहां सातों दिन काम संभालती थी। वे कहती थीं कि जब हमारे पास हुनर है तो हमरा प्रयास जरूर रंग लाएगा। हमने शुरू के दिनों में ही तय किया था कि अपने इस नए वेंचर के लिए घर से पैसे नहीं लेंगे और ऐसा ही किया। नेहा एक अच्छी बहू भी है वो परिवार में सभी का ख्याल रखती है। बच्चों के परवरिश से लेकर मां, पिताजी की सेवा तक । मैं एक बात और कहना चाहूंगा कि डॉ नेहा ने निजी जीवन में कभी किसी चीज की डिमांड मुझसे नहीं की। पीजी के बाद तुरंत अस्पताल शुरू करना भी उन्हीं का निर्णय था।
गांव में खोला चेरिटेबल हॉस्पिटल 
डॉक्टर रोहित ने अपने गांव रामगढ़ में दादा जी की याद में एक अत्याधुनिक डेंटल हॉस्पिटल भी  शुरू किया है। इस अस्पताल में दंत चिकित्सक की तमाम आधुनिक मशीनें उपलब्ध है साथ ही इसमें मरीजों को एक अच्छा वातावरण देने की कोशिश की गई है। यहां की फीस काफी कम है। वें कहते हैं कि ऐसा इसलिए कि गांव के लोगों को भी गुणवत्ता पूर्वक दंत चिकित्सा उपलब्ध हो सके ‌ ।
समाजिक बदलाव के लिए भी कार्य 
डॉक्टर रोहित और डाक्टर नेहा समाजिक बदलाव के कार्यों से भी जुड़े हैं। डॉक्टर रोहित कहते हैं कि हम पटना के एक मूक बधिर बच्चों के विद्यालय में समय -समय पर निःशुल्क डेंटल चेकअप कैंप लगाते हैं। वहां शुद्ध पानी के लिए वाटर प्यूरिफायर भी लगवाया है। इसके साथ बच्चों के लिए टेलिविजन भी इनके प्रयास से इस स्कूल में लगा है। डॉक्टर रोहित लायंस क्लब से जुड़े हुए हैं। इसके माध्यम से वे समाजसेवी गतिविधियों में लगातार शामिल होते रहे हैं।
डॉक्टर मतलब भरोसा 
डॉक्टर रोहित बातचीत में यह कहते हैं कि डॉक्टर का मतलब भरोसा होता है। लोग आप पर विश्वास करते हैं ऐसे में हमारा काम इस विश्वास को बनाए रखना है।मुंह शरीर का दर्पण है ‌।  आज मुंह की बीमारियां तेजी से बढ़ रही है। मुंह के कैंसर के आंकड़े डराने वाले हैं। ऐसे में आपको मुंह के प्रति जागरूक रहना होगा। आप कोई भी समस्या आने पर अपने दंत चिकित्सक से संपर्क करें, और उनके बताए मार्गदर्शन पर कार्य करें।
नन्हें बेटे RIANN से मिलती उर्जा 
डॉक्टर रोहित बताते हैं कि हमारा काम काफी जटिल होता है। यह एक थका देने वाला काम जैसा है। ऐसे में अपने नन्हे बेटे RIANN से हमें ऊर्जा मिलती है।  मैं उसे लंबा समय तो नहीं दे पाता पर घर लौटने पर बेटे के साथ समय बिताना अच्छा लगता है। डॉक्टर नेहा बच्चे को समय देने के लिए हफ्ते में दो दिनों का पूरा वक्त निकालतीं है। हम  चाहते हैं कि वह भी बड़ा होकर दंत चिकित्सा के क्षेत्र में आए। उसे अभी से इसमें रूचि भी है। फिलवक्त उसकी भोली बातें,  मासूम सवाल और ढ़ेर सारा उत्साह हमें एक सुखद एहसास देती है।
इनमें खास रूचि 
वे कहते हैं कि मेरी रूचि फिटनेस को लेकर हमेशा से रही है। मैं रोज जिम  जाता हूं। मुझे पुरानी फिल्में देखना पसंद है। गाइड  तीसरी कसम जैसी फिल्में अच्छी लगती है। मोहम्मद रफी मेरे प्रिय गायक हैं। मुझे उनका गीत गाना भी पसंद है। मैं खाली वक्त में रफी साहब के गीत गुनगुनाता रहता हूं।
इसके साथ साथ मुझे बायोग्राफी पढ़ना काफी अच्छा लगता है।  स्टीव जॉब्स, एलन मस्क, की आटो बायोग्राफी मेरे मन को छू गई।
बच्चों की दांतों का ख्याल रखना जरूरी 
डॉक्टर रोहित कहते हैं बच्चे हीं हमारे भविष्य हैं ऐसे में बच्चों की दांतों का ख्याल जरूरी है। हम दूध के दांत के खराब होने पर यह सोचकर केयर नहीं करते की यह दूध का दांत है पर यही दांत आने वाले नए दांत को भी प्रभावित करता है। एक साल बच्चे की उम्र होते ही एक डेंटिस्ट का चुनाव आपको कर लेना चाहिए। इसके साथ हीं चाकलेट, जंक फूड की आदत बच्चों में न लगने दें यह दांतों को कमजोर करता है।
चाहत मल्टीस्पेशलिटी डेन्टल हॉस्पिटल के निर्माण की 
डॉक्टर रोहित बताते हैं कि चिकित्सक में काफी तकनीकी परिवर्तन हो रहे हैं।AI के आने के बाद यह क्षेत्र और भी बदल रहा है। ऐसे में मेरी कोशिश मल्टीस्पेशलिटी डेन्टल हॉस्पिटल के निर्माण की है जहां एक साथ कई सुविधाएं उपलब्ध हो सके। इस अस्पताल में हर  आधुनिक संसाधन उपलब्ध हो।
हम पटना के साथ साथ जल्द ही झारखंड की राजधानी रांची में भी अस्पताल शुरू करने की कोशिश में हैं। झारखंड से मेरा खास लगाव भी रहा है ऐसे में मुझे लगता है कि वहां के लोगों को भी बेहतर सेवा प्रदान करना मेरा फर्ज है।
डॉक्टरी पेशा नहीं, जीने का तरीका 
डॉक्टर रोहित कहते हैं मैं यह मानता हूं कि डॉक्टर बनना एक पेशा नहीं है, यह जीने का तरीका है।
हम कष्ट निवारण के कार्य से जुड़े हुए हैं। कष्ट देना हमारा मकसद नहीं होना चाहिए, चाहे यह कष्ट आर्थिक या मानसिक रूप में हो।‌यह पेशा काफी धैर्य वाला पेशा है। जीवन का मतलब कुछ ऐसा करें जिससे आने वाली पीढ़ी हम पर नाज करें।
बहरहाल Dental Comfort Zone के साथ डॉ रोहित सिंह न सिर्फ लोगों के दांतों में चमक भर रहे हैं बल्कि सेहत और मन को भी चमका दे रहे हैं नई उम्मीद और नया जज्बा।
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‘सत्य’ की राह, हौसलों से ‘जीत ’ पटना के डॉक्टर सत्यजीत की यह कहानी पढिए… 

मेरी कहानी में सुख का राग भी है तो दुःख के करूण स्वर भी, जिम्मेदारियों का एहसास भी और उन्मुक्त होकर जीवन के रंगों को मुट्ठियां भींच भर लेने के पल भी। देश की माटी से परदेश की जमीं तक यादों के सतरंगी सुर अब भी जेहन में  यूं  ताजा हैं जैसे कल की बात हो। शांति सेना के कैंप से लेकर ब्रिटेन की सरजमीं और खाड़ी युद्ध तक की। अब भी याद है मुझे ।

बाबूजी की वो सीख जिसने मुझे आदमी बनाए रखा,  स्वामी सहजानंद सरस्वती जी का वह जीवन मंत्र  संघर्ष: एवं जीवनस्य सार: ( संघर्ष ही जीवन का सार है) भी , जिसने मेरे हौसले को फौलाद बना दिया। 

यूं तो संघर्ष बचपन से ही मेरे हिस्से आया था। जन्म के बाद से ही बार- बार पीएमसीएच अस्पताल का बिस्तर ही ठिकाना  बनता रहा।
तब से अब तक लड़ता ही तो आ रहा हूं। कभी नियति से, कभी वक्त से, तो कभी खुद से, एक योद्धा की तरह। सोचता हूं जो भी कमाया, बनाया, बचाया वह मनुष्यता के काम आएं। मैं रहूं न रहूं मेरे कर्म एक बहादुर सिपाही की तरह निडरता के साथ फिजा में घुलते हुए हर अंतिम आदमी के चेहरे पर मुस्कान बिखेर सकें। बचा सकें बच्चों की खिलखिलाहट ,   बन सकें दादी मां के झुर्रिदार चेहरों की बीच तैरती हुई प्यारी सी हंसी। बस इतनी सी ही ख्वाहिश है मेरी। यह संभव हो सका तो मैं समझूंगा की मैंने वो वादा पूरा कर दिया जो मैंने बाबूजी से किया था। स्वामी जी से किया था और किया था खुद की आत्मा से। बस इसी कोशिश में चरैवेति -चरैवेति का मंत्र लिए इस उम्र में भी चलता जा रहा हूं मनुष्यता के पथ का एक  पथिक बन। कहते हैं रूबन मेमोरियल अस्पताल के संस्थापक  डॉ. सत्यजीत कुमार सिंह।
स्वामी जी के विचारों की संगत ने मुझे गढ़ा 
  डॉक्टर सत्यजीत पुराने दिनों की याद ताजा कर कहते हैं मेरा जन्म पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल में हुआ। पिताजी वकील थे। माता जी गृहणी। हमारा पुस्तैनी गांव पटना जिले के बिहटा का अमहारा रहा है।
यहां निकट हीं स्वामी सहजानंद सरस्वती जी ने अपना आश्रम बनाया था। यहीं से वे समाज-सुधार और किसान आंदोलन की दिशा तय करते थे। गांव की संगत में स्वामी सहजानंद सरस्वती के विचारों से संगत हो गई।
स्वामी सहजानंद सरस्वती
मुझे लगता है कि मुझे गढ़ने और आत्मबल मजबूत करने में इन विचारों का अनमोल योगदान रहा है।
बचपन से लेकर अब तक की अनगिनत  यादें हैं,  अनगिनत किस्से हैं। किसे साझा करूं, किसे छोड़ दूं।  इन यादों में दादाजी की कहानी भी है।
दादाजी के हौसले से प्रेरणा 
मैं मानता हूं कि मेरे दादाजी  श्री वासुदेव नारायण सिंह मेरे लिए प्रेरणा स्त्रोत रहें हैं। जब जीवन में अंधेरा गहराने लगे तब भी उम्मीद का दामन थाम उसे रौशन किया जा सकता है। यह मैंने दादाजी से सीखा है। दरअसल किस्सा यूं है कि हमारे गांव अमहारा में भयानक महामारी फैली। इस महामारी में हमारे परिवार के कई सदस्यों की मौत हो गई। एक तरह से कहें तो दादाजी और  उनके बड़े भाई का लड़का बचा था बस। काफी दर्दनाक था सब कुछ।
दादाजी गांव छोड़ पटना आ गए। पटना में खड़क विलास प्रेस में काम सीखा। यह उन दिनों काफी प्रसिद्ध प्रेस था।
आजादी के आंदोलन में भी इस प्रेस की महत्वपूर्ण भूमिका रही।यहां से बिहार बंधु नामक अखबार निकलता था।
दादाजी ने यहां छपाई और प्रेस के काम से जुड़ी बारिकियां सीखीं। फिर वे शिलांग चले गए। कुछ समय तक वहां काम किया फिर पूर्णिया आएं और यहां काम किया। दादाजी ने चालिस साल तक शादी नहीं की। इसलिए की उन्हें  भतीजे की परवरिश करनी थी। वे मानते की अगर शादी के बाद मेरी पत्नी इसे ठीक से नहीं रखेगी तो मेरे भाई की आत्मा को चोट पहुंचेगी। पूर्णिया में दादाजी अर्जुन लाल प्रेस में काम करते थे। यहां कमाकर दादाजी ने सौ बीघा जमीन खरीदी।
गहरी थी पिताजी की सोच 
मेरे पिताजी पेशे से वकील थे पर उनकी सोच काफी गहरी थी। पिताजी की शुरूआती पढ़ाई बिहटा स्कूल से हुई। यहीं वें स्वामी जी के संपर्क में आए। इसका उनपर काफी प्रभाव पड़ा। अपने जीवन काल में पिताजी समाजिक कार्यों से जुड़े रहे। उनकी राजनीतिक चेतना भी काफी मजबूत थी। वे पटना विश्वविद्यालय सिनेट के मेंबर और कालेज के सेक्रेटरी रहे। कम्यूनिस्ट मूवमेंट के भी पिताजी सेक्रेटरी थे।
घर आते विदेशी मेहमान
पिताजी के सामाजिक और राजनीतिक सरोकार
और विचारधारा के कारण उन दिनों हमारे घर में विदेशी डेलिगेट भी मेहमान के तौर पर आते रहते। हम बच्चों को भी कभी कभार इनसे बात करने का मौका मिल जाता। पटना में रहकर हमारा परिवार दुनिया  के विचारों और संस्कृतियों से ताल्लुक रखता था। मुझे यह अच्छी तरह याद है कि पिताजी के समय में हमारे घर में कभी किसी दूसरे परिवार की शिकायत या किसी कमी की चर्चा हुई हो। हम उन दिनों घर में विदेशी नीति, भारतीय दर्शन, कार्ल मार्क्स के सिद्धांत की चर्चा खाने की मेज पर करते।
बीमारी वाला बचपन और पीएमसीएच का बेड 
आपको लगता होगा आज मैं डॉक्टर हूं, और मेरा नाता अस्पताल से है। ऐसा नहीं है। अस्पताल से मेरा नाता बचपन से ही जुड़ा रहा है। उन दिनों हम बाकरगंज के दलदली में रहा करते थे। मैं बचपन में काफी बीमार रहता था। इस कारण 9 साल की उम्र तक मैं स्कूल भी नहीं है जा पाया था। मुझे बार-बार टाइफाइड होता। पीएम सीएच के बच्चा वार्ड से उन दिनों मेरा अस्थाई घर ही बन गया था और अस्पताल का बिस्तर दुनिया। डॉक्टर आते मेरी जांच करते।वार्ड की सिस्टर कभी मुझे उबला अंडा खिलाती तो कभी संतरा देती। इलाज के दौरान ही मेरे शरीर में खून बनना बंद हो गया। वहां के डॉक्टर और नर्स मुझे रक्त देते। इन सब को देखकर डॉक्टर का पेशा बचपन से प्रभावित करने लगा था। संयोग ऐसा कि बचपन में जिस पीएमसीएच में भर्ती होता वही से डॉक्टरी की पढ़ाई भी की।
पुनपुन नदी
पुनपुन नदी और बाढ़ में राहत कार्य 
डॉ .सत्यजीत कुमार आगे कहते हैं कि पिता को समाजिक कार्यों को करना खुब भाता। वे हमें भी बचपन से ही समाजिक कार्यों में भागीदारी के लिए प्रेरित करते।  मेरे गांव के थोड़ी दूर पर पुनपुन नदी बहती है। तब लगभग हर साल पुनपुन नदी में बाढ़ आ जाती। नदी के पास के  बाशिंदे इससे प्रभावित होते। मुझे याद है कि मेरी उम्र लगभग 13 साल तब रही होगी। मैं भी उस दौरान राहत कार्य में जुड़ा था। बाद में हर साल में इस कार्य में जुड़ा रहता था। 1967 में उत्तर बिहार में भयानक बाढ़ आयी थी। उस वक्त हम लोगों से  अनाज और कपड़े इक्ट्ठा करते और फिर पीड़ितों के बीच बांटते। यह सब पिताजी की ट्रेनिंग थी। वे कहते लोगों के दुःख में काम आना ही जिंदगी है। मैं भी मानता हूं जीना इसी का नाम है। हम इंसान हैं और हमारे अंदर की करूणा ही हमें इंसान बनाती है। दुःख इस बात का है कि इन दिनों तेजी से मानवीय मूल्यों का हरास हो रहा है,  संवेदना मर रही हैं। इसे बचाए रखना जरूरी है।
डॉक्टर बनने का सपना और पिता का वो आदेश 
डॉ सत्यजीत कहते हैं कि मैंने बचपन से ही सोच रखा था डॉक्टर का पेशा अपनाना है। पिताजी की गिनती पटना के बेहतर वकील के रूप में होती थी। मैं वकालत करता तो कई  सहूलियतें मिल जाती पर मैंने ऐसा नहीं किया। पिताजी से कहा कि मुझे डॉक्टरी का पेशा अपनाना है। उन्होंने इजाजत तो दी पर एक शर्त रख दी। शर्त यह कि मैं अपने गांव के मरीजों को सही दवा और बेहतर इलाज में हमेशा मददगार रहूंगा और इस पेशे की गरिमा बरकरार रखूंगा। मैंने पिताजी का आदेश स्वीकार किया और इस पेशे में आया।
जंग के दौरान मुक्ति वाहिनी की सेवा 
मैं पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल में पढ़ाई कर रहा था। जुनियर डॉक्टर के रूप में समाजिक कार्यों में भी मदद करता था। हमारा थर्ड इयर रहा होगा। 1971 में   मुक्तिवाहिनी और पाकिस्तान के बीच लड़ाई शुरू हो गई। भारत मुक्ति वाहिनी का साथ दे रहा था। बिहार की लंबी सीमा बंगलादेश ( तब के पूर्वी पाकिस्तान) से मिलती थी। यहां भी इसका असर दिख रहा था। सीमा से सटे इलाकों में जंग का  असर था।
ऐसे में जब मुझे इस बात की जानकारी हुई तो मैंने कॉलेज के साथियों के सीमा पर जा  वहां जाकर मेडिकल कैम्प लगाकर सेवा करने की योजना बनाई।
इसके लिए मैं सबसे पहले तात्कालिक प्राचार्य डॉ. गोविंदाचार्य से मिला और आग्रह किया कि हमें जाने की आज्ञा प्रदान करें। मैंने उनसे कहा लड़ाई चल रही है ऐसे में जो रिफ्यूजी बीमार या घायल होंगे हम उनके लिए कैंप लगाएंगे। सैनिकों की मदद भी करेंगे। डॉ. गोविंदाचार्य मेरी बातों से काफी प्रभावित हुए। मुझे शाम को बुलाया और बिहार के तात्कालिक गवर्नर डीके बरूआ के यहां ले गए। हमारे प्राचार्य ने गवर्नर साहब से मेरा परिचय कराते हुए कहा कि इनकी योजना युद्ध के दौरान मेडिकल कैंप लगाने की है।
फिर गवर्नर साहब ने मुझसे पुछा कैसे और क्या करना है। मैंने योजना बतलाया उन्होंने तत्काल अपने एडीसी को बुलवा कर मुझे दो सौ रूपए दिलवाएं और कहा डॉक्टर कल सुबह आकर आप चिट्ठी ले जाना। मेरी खुशी का ठीकाना नहीं रहा। मैंने दोनों को धन्यवाद दिया और आगे की तैयारी में जुट गया।
जब बस हो गई चार घंटे लेट 
हम जरूरत के सामान और  तैयारियों के साथ लेटर लेकर लेकर  किसनगंज के लिए बस पकड़ने निकले ।पता चला बस चार घंटे लेट है। टीम में हम 6  लोग थे। अब हमें लंबा इंतजार करना था। कहते हैं न अच्छा काम करो तो ईश्वर आपकी मदद करते हैं तभी वहां हमें मैडम सूरी जो हमारे कॉलेज की प्रोफेसर थीं उनके पति मिल गए।वे BSF में कमांडेंट थे, फिर क्या था हम सभी BSF के वैन में बैठकर सिल्लीगुड़ी पहुंचे। वहां डीएम से मिलकर राज्यपाल का लेटर दिया। उन्होंने हमारी सराहना करते हुए मदद करने की बात कही। हमें रेडक्रास की ओर से काफी मदद मिली, बीएमपी का  ट्रक, दो ड्राइवर, दो खलासी और हम छह दोस्त कैंप लगाने निकल गए।
कैंप में डॉ. गोपाल प्रसाद हमारे सिनियर थे। दिसंबर 71 तक यह कैम्प चला। अलग अलग प्लाटून का बैच आता रहता, हम उनका इलाज करते, उन्हें जरूरी दवाइयां देते।
वापस लौटने पर हमने गवर्नर साहब को सब कुछ बताया वह काफी खुश हुए। हम तीन माह वहां रहे थे। कालेज में इस काम के लिए हम सबों की खुब तारिफ हुई। कॉलेज की ओर से  मुझे एक उपाधि और स्पेशल ब्लेजर दिया गया।
 पिताजी का खत और भविष्य की चिंता 
मुक्तिवाहिनी की सेवा के बाद मन खुब उत्साहित था। पिताजी भी खुश थे पर उन्होंने इसे जताया नहीं। एक रोज घर में मेरे नाम एक चिट्ठी लिख छोड़ी। मैंने खत पढ़ा। उसमें उन्होंने लिखा था कि आप अच्छा काम कर रहे, लेकिन पढाई करोगे तभी अच्छा करोगे। अभी इस काम की जिम्मेदारी किसी को दे दो। पिताजी के ख़त में मेरे भविष्य को लेकर चिंता साफ दिख रही थी फिर मैंने भी ज्यादा वक्त पढ़ाई पर लगाना शुरू कर दिया।
रांची में पहली नौकरी 
MS करने के बाद मेरी नौकरी बिहार सरकार के स्वास्थ्य विभाग में लग गई। मेरी नियुक्ति  रांची के निकट बुरमू प्रखंड में हुई।
पत्नी पास के मार्डन मिशन अस्पताल में काम करने लगी। मुझे ms किए दो साल हो चुके थे, मैं सर्जन बनना चाहता था। इसके लिए जुलाई 1978 को मैं इंग्लैंड चला गया।
इंग्लैंड में पढ़ाई भी, नौकरी भी
यहां इंग्लैंड में मैंने रेजिडेंट डॉक्टर के तौर पर नौकरी कर ली। इसके साथ ही लंदन यूनिवर्सिटी से FRCS किया और यूरोलॉजी में डिप्लोमा किया। frcs करने के बाद रेजिडेंट डॉक्टर की नौकरी छोड़ दी। पढ़ाई के दौरान मैं दिन में पढ़ाई करता और  नाइट शिफ्ट में नौकरी करता।
डॉ सत्यजीत बताते हैं कि साउथ पॉल में हम एक सिख परिवार के किरदार के रूप में रहते थे। मुझे जहां मुझे FRCS की ट्रेनिंग के लिए भेजा गया वहीं मुझे नौकरी भी मिल गई यूरोलॉजी रजिस्टार की।
प्रतिकात्मक तस्वीर
स्कॉटलैंड का शांत टापू और “मेरी मैक्डोनल्ड “
मैंने स्कार्ट लैंड के एक टापू में रजिस्टार का काम कुछ दिनों के लिए किया था।यह शांत टापू समंदर के बीच में स्थित है यह एक धार्मिक जगह भी है।वे हमें वहां का वाकया सुनाते हैं।
मेरे पास इस टापू पर एक 70 साल की महिला इलाज के लिए आई। मैंने उनका इलाज किया, दवा दी और उन्हें सोमवार को जांच के लिए बुलाया। उन्होंने मुझसे हिंदी में पूछा आप कहां से आए हो भारत से?
मैंने आश्चर्य से उनकी ओर देखते हुए कहा, हां लेकिन! आप हिंदी कैसे जानती हैं।
फिर उन्होने बताया कि जबलपुर में उन्होंने आदिवासी बच्चों के साथ काम किया है। उन्होंने अपनी कहानी बताई। फिर उनसे हमारे परिवार का गहरा संबंध हो गया। मैं उस टापू से ग्लासको वापस आया , फिर लंदन आ गया। पर मेरी मैक्डोनल्ड मैम से हम जुड़े रहे। वो हमारे बच्चों के जन्मदिन पर स्पेशल केक भेजती रहती। चार साल बाद मेरे कंसल्टेंट ने बताया की मेरी मैम बीमार हैं। पता चला उन्हें कैंसर हो गया। हमने सीधे गाड़ी निकाली और खुद ड्राइव किया। फिर जहाज पकड़ पांच घंटे में मेरी मैम के घर तक पहुंचें।
पता चला कि वें तीन माह से बिस्तर से नहीं उठीं थीं।
हमें देख वो मुस्कुरा कर उठ बैठी और पत्नी से कहा कि मुझे चपाती सब्जी बना कर दो। मेरी पत्नी ने उन्हें चपाती बनाकर खिलाया। इसके बाद मेरी ने दुनिया को अलविदा कह दिया।
यह वाक्या बताते बताते डॉ सत्यजीत की आंखें नम हो जाती है, खुद को संभालते हुए वें आगे कहते हैं।
 उनसे मुझे और मेरे परिवार को विदेशी धरती पर इतना स्नेह मिला की शब्दों में बयां करना मुश्किल है। उन्होंने भारत में आदिवासी समाज के लिए काफी काम किया था।
भारत से उन्हें खूब लगाव  था। वो हमारे परिवार की सदस्य की तरह हो गई थीं। एक अभिभावक की तरह परिवार के हर सदस्य की खोज खबर लेती। उन्हें स्नेह देतीं। सच कहूं तो मेरी इंसानियत की मिसाल थीं। ताउम्र वो दूसरों की खुशी के लिए जीती रहीं।  मैंने तय किया है कि अपने नर्सिंग कालेज का नाम उनके नाम पर रखूंगा। यह उनके प्रति मेरी श्रद्धांजलि होगी।
लंदन में मकान खरीदा , दिल बिहार
लौटने को बेचैन
डॉ.सत्यजीत बताते हैं कि मैं अपने काम में आगे बढ़ रहा था। 1990 में मैं कंसल्टेंट के तौर पर काम करने लगा। नार्थ लंदन में  क्लीनिक  खोल   प्राइवेट  प्रैक्टिस भी करता। पैसे अच्छे आने लगे। लंदन में मकान भी ले लिया। बच्चे अच्छे स्कूल में पढ़ने लगे।
लेकिन पिताजी के मोटिवेशन से वापस लौटने की इच्छा मजबूत होने लगी। सोचा भारत लौट जाता हूं, पर जिस सम्मान और गर्व से हम वहां जीवन जीते थे उसमें पैसे बहुत बच नहीं पाते। सोचा पहले कुछ पैसे बचाएं जाएं। 1992 में पत्नी और बच्चे लौट आएं। मैंने सउदी अरबिया के अमेरिकन हॉस्पिटल में नौकरी कर ली। इसके पीछे सोच यह रही कि वहां की सैलरी बहुत ज्यादा थी, और मुझे पैसों की जरूरत भी।  मैंने सोचा था कि दो साल बाद बिहार लौट आऊंगा पर यह हो नहीं सका। माता जी भी एक साल स्कार्ट लैंड में रहीं। पिताजी मुझे वापस आने को प्रेरित करने रहे।  मां वहां के स्थानीय लोगों से मिलती-जुलती और बातें करतीं। हालांकि भाषा संबंधी कुछ मुश्किलें आतीं पर जब दिल जुड़ता है तो बाक़ी बाधाएं खुद बौनी हो जाती हैं।
पटना से संदेशा जाता’ बिहार लौट आओ’
इधर पत्नी डॉक्टर विभा ने त्रिपोलिया अस्पताल में गाइनोकोलॉजिस्ट का काम शुरू कर लिया था। पटना के डॉक्टर एके सेन और पी .गुप्ता मुझसे जब भी बात करते, कहते पटना आ जाओ। एक दिन मेरी पत्नी ने मुझसे कहा “आप पटना आ जाएं, यहां आप ज्यादा खुश रहेंगे। ” दिल को यह बात छू गई।
खाड़ी युद्ध, प्रतिकात्मक तस्वीर
सउदी अरब की जंग और मेरा फैसला 
मैंने नौकरी छोड़ी, पटना आया, तब कुवैत और इराक के बीच लड़ाई शुरू हो चुकी थी। मुझे लगा कि कुवैत के अमेरिकन अस्पताल में कुछ दिन नौकरी कर पैसा जमा करना जरूरी है। इधर अखबार और टीवी में जंग की खबरें सुर्खियों में रहती। दुविधा का समय था मेरे लिए। मैं लंदन गया, मकान किराए पर था। टीवी पर कुवैत में जंग की भयावह तस्वीरें आ रही थीं, न्यूक्लियर बम की चर्चा काफी तेजी से होने लगी थी।
ऐसे में हर किसी ने मुझे सलाह दी कि वापस न जाओ। लोग भाग रहे थे। मेरे मन में तूफान सा उमड़ रहा था। लोन बहुत सारे थे, उन्हें चुकाना था। मैंने सोचा इसे चुकाने में पांच साल इंग्लैंड में काम करने पर लग जाएंगे। मैं अगले दिन किसी से बिना कुछ कहे चुपचाप सउदी एम्बेसी गया और सऊदी जाने का वीजा लिया। फिर टिकट। टिकट देने वाली लड़की ने कहा आप बहुत बहादुर हो। लंदन से जेद्दा के इस एयरबस में सिर्फ 15 लोग थे। मैंने मन की हिम्मत को और बलवान बनाया और कहा ‘ करना है तो करना है ‘
बेटा मां से कहता  ‘पापा सलामत लौट आएंगे ‘
मैंने सउदी के अमेरिकन अस्पताल में नौकरी ज्वाइन कर ली। जंग गहराता जा रहा था। बम के धमाके सुनाई देते। हमें बम से बचने के लिए  मॉक ड्रिल कराय जाता। भारत जाने के लिए तब फ्लाइट भी बंद थी। पत्नी काफी घबराती थी। बेटा उसे समझाता था। मां परेशान मत हो पापा सलामत लौट आएंगे।
पटना लौटना और रतन क्लीनिक की शुरुआत 
मैं यह मानता हूं कि जो लोग बड़े सपने देखते हैं उन्हें भय नहीं रोकता है। मैं 1996 के अगस्त में पटना लौटा। हमने पटना के कंकड़बाग में माता जी के नाम पर रतन स्टोन क्लीनिक खोला।  तब हर कोई मुझे सलाह देता था कि यह नहीं चलेगा पटना में। मैंने इसमें नई तकनीक का इस्तेमाल किया था।  मुझे लगता कि मैं जब पटना आया हूं तो कुछ अलग करना है। लोगों के नकारात्मक बातों से पिताजी भी काफी घबरा गए थे। बैंक कर्ज देने को तैयार नहीं था। पत्नी ने जेवर गिरवी रखा। धीरे धीरे जब  सालों बाद आर्थिक हालात ठीक हुए तो मैं जेवर छुड़वा पाया। तब वही लोग मेरी सराहना करने लगे जो मुझे नसीहत देते थे।
 फ़िर बना रुबन मेमोरियल हॉस्पिटल 
तीन साल बाद बड़े भाई के बेटे रुबन का निधन हो गया। मैंने भाई कर्नल एके सिंह के साथ मिलकर रुबन की याद में गांधी मैदान के पास रुबन मेमोरियल हॉस्पिटल शुरू किया।
यहां यहां यूरोलॉजी के साथ-साथ अन्य बीमारियों का इलाज भी शुरू हुआ।
हमने शुरू में तीन बेड से रत्न स्टोन क्लीनिक की शुरुआत की थी जो बाद में 45 बेड का हुआ और2014 में पाटलिपुत्र कालोनी स्थित हमारे अस्पताल में 214 बेड के हो गए।
आज यहां सभी स्पेशलिटी मौजूद हैं। ट्रामा, इमरजेंसी, सब कुछ।
पहला लेजर सर्जरी का रिकॉर्ड 
रूबन अस्पताल ने कई रिकॉर्ड कायम किए हैं। हमने बिहार में पहला लेजर सर्जरी किया। रोबोटिक सर्जरी से पहला सफल किडनी ट्रांसप्लांट भी रूबन अस्पताल में ही हुआ। कभी मैं रत्न स्टोन क्लीनिक में अकेला डॉक्टर था आज हमारे अस्पताल में 150 चिकित्सक कार्य कर रहे हैं जिसमें 50 सुपर स्पेशलिस्ट हैं। इस अस्पताल में एक छत के नीचे सभी जांच उपलब्ध हैं।
इस बिजनेस को अच्छे नजरिए से देखने की जरूरत 
समाज के हर क्षेत्र के कार्य का अपना महत्व है। चिकित्सा कार्य लोगों की भावनाओं से सीधा जुड़ा हुआ है। एक अस्पताल के संचालक के लिए पूंजी की जरूरत होती है। यह एक बिजनेस है। हम भारत में अस्पताल के बिजनेस को लूट की तरह देखते हैं यह ग़लत हैं। हम बिजनेस शब्द को हेय दृष्टि से देखेंगे तो देश आगे नहीं बढ़ेगा। डॉक्टरी एक संवेदनशील पेशा है जिसे इस पेशे पर गर्व होगा वह बेइमानी नहीं करेगा। मैं 1996 में अपने सुखद जीवन को छोड़कर बिहार इस लिए नहीं आया कि बहुत आमदनी होगी। मैं यहां के लोगों को स्वस्थ बनाने और उनके साथ आगे बढ़ने के लिए आया। मैं यह कतई नहीं कहता कि मैं दया कर रहा हूं। मैं इलाज कर पैसा कमा रहा हूं और इसे अस्पताल को बढ़ाने में लगा रहा हूं।मेरा शौक मेरा शान सब मेरा अस्पताल है। मेरा जीवन मेरे सपने और मेरी अमीरी सब मेरा अस्पताल ही है। मैं ईमानदारी से अपने पेशे को जीना चाहता हूं।
स्वामी सहजानंद सरस्वती आश्रम में अनोखा विद्यालय 
मैं स्वामी सहजानंद सरस्वती आश्रम बिहटा का सेक्रेट्री भी हूं। यह आश्रम 1927 में स्वामी जी ने शुरू किया था। तब वे किसान आंदोलन चला रहे थे। आज इस आश्रम में हम एक अनोखा विद्यालय भी संचालित कर रहे हैं। स्वामी सहजानंद सरस्वती जी के आदर्श पर चलने वाले इस विद्यालय में 150 छात्र है। यहां शिक्षा बिल्कुल मुफ्त है। इसके साथ ही सप्ताह में दो दिन आयुर्वेद चिकित्सा की सेवा भी आश्रम में दी जाती है।
कई सामाजिक संगठनों से जुड़े 
मैं कई सामाजिक संगठनों से भी जुड़ा हुआ हूं। यह मुझे बेहतर करने की प्रेरणा देता है। मैं IPPNW, ICAN से जुड़ा हूं। हमने जादूगोड़ा में खनन मजदूरों के बच्चों पर अध्ययन किया और यूरेनियम से हो रहे उनके सेहत के दुष्प्रभाव को वैश्विक पटल पर रखा। परमाणु वार के खिलाफ हमने हिरोशिमा में भी कार्यक्रम किए। पटना इफ्टा का अध्यक्ष रहा हूं , पटना लिटरेरी फेस्टिवल का भी में अध्यक्ष हूं। कई अन्य सांस्कृतिक संस्थाओं को मैं मदद करता रहा हूं।
स्वामी सहजानंद सरस्वती मेडिकल कॉलेज जल्द
बिहार में अब भी डॉक्टर और नर्स की कमी है यहां डॉक्टर और  नर्स की और अधिक जरुरत है।‌
हम पटना के नौबतपुर में स्वामी सहजानंद सरस्वती मेडिकल कॉलेज स्थापित करने की मुहिम में जुटे हैं यहां 700 बेड का अत्याधुनिक अस्पताल होगा। विकासशील देश में शिक्षित लोगों की यह जिम्मेदारी है कि वे ईमानदारी से सत्य के साथ समाज के रचनात्मक काम में भागीदार बनें।
नौजवान डॉक्टरों से अपील 
वे नौजवान डॉक्टर को सलाह देते हुए कहते हैं कि आप अपने डॉक्टर मित्रों के साथ मिलकर मल्टीस्पेशलिटी अस्पताल खुद बनाएं और मैनेज करें। हम जिस समाज में है उसी के औसत आमदनी के अनुरूप सेवा का पैसा लें। हर देश के लोगों की औसत आमदनी अलग-अलग है पर हर देश को एक ही तरह की बेहतर स्वास्थ्य सेवा की जरूरत है।
रूबन कारपोरेट नहीं अपना ब्रांड 
रूबन कार्पोरेट हॉस्पिटल नहीं है यह बिहार का अपना ब्रांड है। हमने अब तक हजारों लोगों को सेवाएं दी है। उनका विश्वास कायम किया है। आने वाले दिनों में हम इसे और भी प्रभावशाली बनाएंगे। हम हमेशा तकनीक, सहानुभूति और सेवा को साथ लेकर चलते हैं।
वहीं व्यक्ति दूसरों को खुशी दे सकता है जो पहले खुद को खुश करे। बदलाव प्रकृति का नियम है। हमें परंपरा और संस्कृति को साथ लेकर चलना होगा। इस विचार को बल देने की जरूरत है कि आप खुद की उन्नति के साथ सबकी उन्नति के वाहक भी है। मन में सबकी प्रगति का भाव रचा – बसा रहना चाहिए। 
( यह कहानी आपको कैसी लगी कमेंट कर जरूर बताएं। thebigpost.com की कोशिश सकारात्मक कहानियों को  लोगों तक पहुंचाने की है। आप हमें आर्थिक सहयोग कर हमारी इस कोशिश को मजबूती दे सकते हैं  ।हमारा नंबर है 7488413830  )
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