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हौले-हौले झरोखे, चलो खोलें खुशी के

हम अक्सर जीवन में बड़ी सफलताओं, ऊँचे पदों और भव्य उपलब्धियों की तलाश में रहते हैं, लेकिन सच्ची खुशी उन्हीं में सीमित नहीं होती। असल में, जीवन की सबसे मधुर मुस्कानें उन छोटी-छोटी खुशियों में छुपी होती हैं, जिन्हें हम अनदेखा कर देते हैं।

एक बच्चे की निश्छल हँसी, बारिश की पहली फुहार, माँ के हाथों का बना खाना, पुराने दोस्त का अचानक मिल जाना, या किसी जरूरतमंद की मदद करने से मिलने वाली आत्मिक संतुष्टि—ये सब हमारे जीवन को संवारते हैं और उसे अर्थपूर्ण बनाते हैं।

छोटी खुशियों का महत्व को हम ऐसे समझ सकते हैं


मानसिक शांति और संतोष

रोजमर्रा की भागदौड़ में जब हम छोटी-छोटी खुशियों को पहचानना सीखते हैं, तो जीवन में संतोष बढ़ता है। हमें एहसास होता है कि खुशी सिर्फ बड़ी उपलब्धियों में नहीं, बल्कि साधारण पलों में भी बसती है।

सकारात्मक दृष्टिकोण

जो लोग छोटी-छोटी खुशियों को महत्व देते हैं, वे अधिक सकारात्मक और खुशमिजाज होते हैं। यह आदत कठिन समय में भी हमें आशावादी बनाए रखती है और हमें मानसिक रूप से मजबूत बनाती है।

रिश्तों में मिठास

किसी अपने के साथ बैठकर हँसी-मजाक करना, परिवार के साथ भोजन करना, या दोस्तों के साथ पुरानी यादें ताजा करना—ये छोटे-छोटे पल रिश्तों को गहराई देते हैं और जीवन को रंगीन बनाते हैं।

तनाव में कमी

जब हम छोटे-छोटे सुखों को महसूस करते हैं, तो हमारा मस्तिष्क सकारात्मक हार्मोन (जैसे डोपामिन और सेरोटोनिन) का स्राव करता है, जिससे तनाव कम होता है और हम अधिक ऊर्जावान महसूस करते हैं।

ऐसे पहचाने छोटी-छोटी खुशियाँ

वर्तमान में जिएँ: भविष्य की चिंताओं और अतीत के पछतावे में फँसे रहने के बजाय, वर्तमान के छोटे सुखों को महसूस करें।
आभार प्रकट करें: जो कुछ भी हमारे पास है, उसके लिए कृतज्ञ रहें। इससे मन में संतोष बढ़ता है।
छोटी चीज़ों में आनंद ढूँढें: सुबह की ताज़ी हवा, चिड़ियों की चहचहाहट, या किसी प्रियजन का स्नेह—इन पलों को संजोएँ।
दूसरों को खुश करें: किसी को मदद करना या किसी का दिन बेहतर बनाना, खुद के लिए भी खुशी लाता है।

बड़े सपने देखना और सफलता पाना ज़रूरी है, लेकिन असली खुशी छोटे-छोटे पलों में छुपी होती है। अगर हम इन पलों को महसूस करना सीख लें, तो जीवन अपने आप ही खुशनुमा और संतोषजनक हो जाएगा।

इसलिए, खुशियों को तलाशने के बजाय, उन्हें महसूस करना शुरू करें—क्योंकि छोटी खुशियाँ ही मिलकर बड़े सुख की राह बनाती हैं।

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कहानी जन-मन में कानूनी जागरूकता भरने वाले पूर्व न्यायाधीश बटेश्वर नाथ पाण्डेय की

यह कहानी एक ऐसे शख्स की है जिनका बचपन मुफलिसी में बीता । किसान पिता के कथन और संघर्ष को मंत्र बना उन्होंने न सिर्फ खुद को स्थापित किया बल्कि न्याय का सूर्य बन अंधेरे समय और समाज में सत्यमेव जयते का रंग और राग भरा। सबसे कम समय में न्याय दिलवाने की बात हो या फिर सबसे तेजी से मुकदमे का निपटारा करने की। गांव- जवार जाकर आम लोगों को कानूनी बारिकियों से अवगत कराने से लेकर स्कूली बच्चों को आसान भाषा में कानूनी अधिकारों का फलसफा बताने तक , बिना रुके बिना थके जोश- जुनून और नई उम्मीद से लैस। मकसद यह की सच की कसौटी बुलंद होती रहे कानून की इबारत , बुलंद होता रहे हमारा लोकतंत्र और महफूज हो निर्भयता के साथ मस्तक ऊंचा कर मुस्कुराती रहें वसुंधरा। आज कहानी मुश्किल हालातों से दो दो हाथ कर कानून की अनवरत रक्षा का प्रण लेने वाले पूर्व न्यायाधीश बटेश्वर नाथ पाण्डेय की…

संघर्ष को बनाया सफलता का साथी

पूर्व न्यायाधीश बटेश्वर  नाथ पाण्डेय का शुरुआती जीवन संघर्षों के कांटेदार रास्ते से गुजरते हुए बीता। जन्म उत्तर प्रदेश के बलिया ज़िला के छोटे से गांव गंगा पाण्डेय का टोला में 1 अप्रैल 1963 को हुआ।
पिता स्वर्गीय बलिराम पाण्डेय सामान्य खेती- किसानी से जुड़े थे। मां स्वर्गीय सहोदरी देवी एक गृहिणी थीं। मां की रुचि धर्म-कर्म में भी काफी ज्यादा थी। बचपन से ही मां ने इन्हें नैतिकता के रास्ते पर चलने की राह दिखाई। पिता की आमदनी अत्यंत सीमित थी पर मन का हौसला असीमित था। वह अपने बच्चों की हौसला-अफजाई करते और बड़े सपने देखने और उसे साकार करने की बात कहते।


गांव के स्कूल से पढ़ाई

पूर्व न्यायाधीश बटेश्वर नाथ पाण्डेय बताते हैं की परिवार में हम दो भाई और तीन बहन थें। मैं भाई में सबसे बड़ा हूं। तब हमारे परिवार की आय बहुत ही कम थी। पिताजी किसी तरह से माह का खर्च चला पाते। आर्थिक आमदनी का जरिया बस खेती ही थी ।

वहां भी मेहनत के बाद उपज की कोई गारंटी नहीं। कभी मौसम की मार से सारी उपज खत्म हो जाती तो कभी जानवर और टिड्डों की भेंट चढ़ जाती।

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विविधता में है सुंदरता और एकता में है शक्ति”

रंग बिरंगे ड्रेस में उत्साह से लबरेज बच्चे। ओठों पर वसुधैव कुटुंबकम का राग लिए, उत्साह के साथ पूरी दुनिया को यह संदेश देने में जुटे थे कि पूरा विश्व ही एक परिवार है। हम अलग अलग रंग रूप और जाति- धर्म के होकर भी एक हैं। एक परिवार है। सबको खुशियां बांटते हुए सबके ग़म में साथी बनते हुए हम एक साथ खड़े हैं।

 

सेंट माइकल्स हाई स्कूल में 6 दिसंबर 2024 को “वसुधैव कुटुंबकम – एक विश्व, एक परिवार” विषय पर भव्य समारोह का आयोजन किया गया। यह आयोजन मानवता की साझा भावना और विविधता में एकता के महत्व को रेखांकित करता है।

इनकी रही मौजूदगी

कार्यक्रम की शुरुआत मुख्य अतिथि श्री सुनील कुमार यादव (आईएएस), विशिष्ट अतिथि डॉ. मनीष मंडल और विशेष अतिथि डॉ. भानु प्रताप के स्वागत से हुई। मुख्य अतिथियों को विद्यालय बैंड ने गार्ड ऑफ ऑनर दिया और स्वागत गीत के साथ पुष्पगुच्छ व पौधों द्वारा उनका सम्मान किया गया। दीप प्रज्वलन के बाद प्रार्थना नृत्य और मधुर स्वागत गीत ने दर्शकों का मन मोह लिया।


शिक्षा का उद्देश्य शांति और सह-अस्तित्व भी: फादर ए. क्रिस्टू सावरिराजन एस.जे

प्राचार्य.  फादर ए. क्रिस्टू सावरिराजन एस.जे
ने अपने स्वागत भाषण में “वसुधैव कुटुंबकम” की प्रासंगिकता पर जोर देते हुए करुणा, सहयोग और वैश्विक एकता के महत्व को रेखांकित किया।

फादर ए. क्रिस्टू सावरिराजन एस.जे ने कहा  कि शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान देना नहीं, बल्कि शांति और सह-अस्तित्व के लिए युवाओं को तैयार करना है। फादर ने आगे कहा कि आज पूरी दुनिया हिंसा की और बढ़ रही है ऐसे में ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की भावना हमें शांति और विश्व बंधुत्व की और अग्रसर करती है। यह अहिंसा और प्रेम के मार्ग पर चलने का संदेश देती है।


छात्रों को मिला पुरस्कार

पुरस्कार वितरण समारोह में छात्रों की उपलब्धियों को सम्मानित किया गया, जिसमें शैक्षणिक उत्कृष्टता और विशेष पुरस्कार शामिल थे। मुख्य अतिथि ने छात्रों और शिक्षकों की प्रशंसा करते हुए विद्यालय के प्रबंधन की प्रतिबद्धता और प्राचार्य के नेतृत्व को सराहा, जिसने सेंट माइकल्स को उत्कृष्टता की नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया है।


नृत्य नाटक की रोमांचक प्रस्तुति

कार्यक्रम की प्रमुख प्रस्तुति “वसुधैव कुटुंबकम” पर आधारित नृत्य नाटक रही, जिसने शरणार्थियों की स्थिति और करुणा के महत्व को प्रभावशाली तरीके से दर्शाया। यह प्रस्तुति दर्शकों को वैश्विक भाईचारे का संदेश देकर मंत्रमुग्ध कर गई।

उप-प्राचार्या द्वारा धन्यवाद ज्ञापन और राष्ट्रीय गान के साथ हुआ। इस आयोजन ने विविधता में एकता के संदेश को सशक्त तरीके से प्रस्तुत किया।

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इसे पागलपन कहें या जुनून.. ड्राइवर ने टैक्सी को बना दिया चलता-फिरता बगीचा.. अब सफर को बेताब लोग

कोलकाता की सड़कों पर फर्राटे भरती हुई पीली टैक्सी तो बहुत देखी होगी आपने. लेकिन ये टैक्सी कुछ अलग है. कार की छत पर धातु के कंटेनर हैं. जिनके नीचे मिट्टी, सफेद रेत और पत्थर के टुकड़े रखे गए हैं. मशीनों की मदद से असली हरी घास उगाई गई है, जिसका वजन लगभग 65 किलोग्राम हो जाता है. इसे बनाने में अलग से करीब 22 हजार रूपए खर्च हुए. और इस तरह से यह पीली कार ग्रीन टैक्सी बन गई. माने चलता फिरता बगीचा.

ऐसे मिली प्रेरणा

ग्रीन टैक्सी चलाने वाले ये हैं धनंजय चक्रवर्ती

इस ग्रीन टैक्सी को चलाते हैं धनंजय चक्रवर्ती. उम्र 40 साल. वे कोलकाता के टॉलीगंज करुणामयी स्थित टैक्सी स्टैंड से ऑटो चलाने का काम करते हैं. उनका यह प्रोजेक्ट कई स्टेज में पूरा हो सका. इसकी शुरुआत तीन साल पहले हुई थी जब उन्होंने एक खूबसूरत कांच की बोतल में मनी प्लांट लगाया था जिसे एक यात्री ने पीछे की सीट पर छोड़ दिया था. इसके बाद से चक्रवर्ती ने इसकी देखभाल की और टैक्सी में ही इसका पालन-पोषण किया.

शुरू में लोगों ने कहा.. पागल है

कार के पीछे गमलों में लगाए फूल और शो प्लांट

चक्रवर्ती के लिए यह सफर आसान नहीं था. जब उन्होंने अपनी कार को मोडिफाई करना शुरू किया तो साथी ड्राइवरों ने उनका मजाक उड़ाया.  ज़्यादातर लोगों ने इसे गहराई से देखने से पहले ही सोचा कि वह इस तरह की बात सोचने के लिए पागल है. लेकिन उन्होंने इन बातों पर ध्यान नहीं दिया और पूरी लगन से अपने कार्य के प्रति लगे रहे.

धनंजय कहते हैं, इसको लेकर बहुत लोगों ने बहुत कुछ बोला. कुछ लोगों ने कहा कि मैं पागल हो गया हूं. तो किसी ने कहा कि कीड़ा मकोड़ा होगा. तो हमने कहा कि अब लगा दिया तो ठीक है. मर जाएगा तो फेंक देंगे.”

कार के अंदर प्राकृतिक घास उगे हैं

सुबुज रथ’ या हरा रथ

अब उनकी कार के छत पर चलता फिरता बगीचा है. जिसमें रंग-बिरंगे फूल खिले हैं. कार की डिक्की में गमलों में लगे पौधों के साथ एक छोटी सी हरी गुफा है. यह वाकई एक अद्भुत और विस्मयकारी नजारा होता है. धनंजय इसे सुबुज रथ’ या हरा रथ कहते हैं. आज उनकी इस ग्रीन कार का खूब क्रेज है. हर कोई इस मूविंग पार्क के जरिए सफर जरूर करना चाहता है.

चक्रवर्ती का खास संदेश

इतना ही नहीं, चक्रवर्ती एक और संदेश देते हैं. वे कहते हैं कि पेड़ लगाना ही काफी नहीं है. उनकी देखभाल करना और पालन-पोषण करना भी महत्वपूर्ण है. क्योंकि पेड़ लगाने की पहल तो हर समारोह में हो जाती है लेकिन वही लोग बाद में पेड़ की देखभाल ठीक तरीके से नहीं कर पाते हैं.

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ट्राम अतीत नहीं भविष्य है.. कोलकाता की 150 साल पुरानी विरासत यूं खत्म हो जाएगी?

भारत का इकलौता शहर कोलकाता जहां आज भी ट्राम चलती है. बीते डेढ़ सौ साल से ये यहां के लोगों की हमसफर रही है. लेकिन अब इसके पहिये शायद थमने वाले हैं.

पश्चिम बंगाल सरकार ट्राम को बंद करना चाहती है. अगर सार्वजनिक परिवहन से ट्राम को हटाया जाता है तो ट्राम प्रेमियों के लिए यह शहर की पहचान को मिटाने जैसा है. कोलकाता का दुर्गा पूजा, रसगुल्ला, विक्टोरिया मेमोरियल, हावड़ा ब्रिज जैसे इस शहर की पहचान है, वैसे ही ट्राम भी यहां की विरासत है जो डेढ़ सौ साल पुराना है.

ट्राम का सफर.. एक नजर

शुरुआत में ट्राम को घोड़ों से खींचा जाता था

दुनिया के कई शहरों की तरह जब पहली बार कोलकाता में पहली बार ट्राम चली तो उसे इंजन नहीं, बल्कि घोड़े खींचते थे. साल था 1873 जब सियालदह से लेकर अरमेनियन घाट तक करीब चार किलोमीटर तक चलने वाली यह ट्राम सेवा कुछ ही महीनों में बंद कर दी गई. लेकिन इसके 7 साल बाद कोलकाता में फिर से ट्राम की शुरुआत हुई. साल 1882 में ट्राम को चलाने के लिए भाप वाले इंजन का इस्तेमाल हुआ जो काफी सफल रहा. इस तरह कुछ साल चलने के बाद बिजली से चलने वाले ट्राम की शुरुआत साल 1902 से हुई. फिर शहर का ट्राम नेटवर्क बढ़ता चला गया.

यूं थमते गए ट्राम के पहिए

कलकत्ता ट्राम यूजर्स एसोशिएशन (CTUA) बताते हैं कि जब ट्राम नेटवर्क पूरी तरह से काम कर रहा था तब कोलकाता और हावड़ा में इसके 40 से ज्यादा नेटवर्क थे. हावड़ा का अलग ट्राम वे था. अभी सिर्फ तीन रूट ही चल रहे हैं. 2015 तक कोलकाता में 25 रूटों पर ट्राम चल रही थी. बीते कुछ सालों में कोलकाता की सड़कों से ट्राम गायब होते चले गए. कुछ लोग इसे गुजरे जमाने की चीज मानने लगे तो कुछ इसकी धीमी गति को सड़कों पर जाम की वजह बताते हैं.

ट्राम को बंद करना चाहती है बंगाल सरकार

पिछले दिनों कोलकाता हाईकोर्ट में ट्राम से जुड़ी एक याचिका पर सुनवाई के दौरान पश्चिम बंगाल के परिवहन मंत्री स्नेहाषीश चक्रवर्ती ने ट्राम को बंद करने की योजना के बारे में बताया. हालांकि, इसकी अभी कोई तारीख तय नहीं की गई है. परिवहन मंत्री ने बताया कि ट्राम की धीमी गति पीक आवर्स में सड़कों पर ट्रैफिक जाम का कारण बनती है और मौजूदा वक्त में उसे इसी गति पर चलाए रखना कठिन है, क्योंकि यात्रियों को तेज चलने वाले पब्लिक ट्रांसपोर्ट की जरूरत है. पर्यटकों के लिए मैदान से लेकर एस्प्लानाडे तक जाने वाली ट्राम रूट खुला रहेगा. बाकी रूटों से ट्राम को हटाया जाएगा.

कोई टाइम टेबल नहीं है. बहुत कम ट्राम चल रही है. आपको पता नहीं होता है कि अगली ट्राम कब आएगी. एक घंटा या दो घंटा बाद. दूसरी बात.. कि पहले ट्राम के लिए रिजर्व ट्रैक होते थे. अब कार मालिकों की सुविधा के लिए उन ट्रैक्स को डिरिजर्व कर दिया गया है. योजना यह है कि लोग ट्राम में नहीं चढ़ें. निश्चित तौर पर आप पूछ सकते हैं कि इससे किसको फायदा है? प्राइवेट टैक्सी, ट्रांसपोर्ट को”.देबाशीष भट्टाचार्य, अध्यक्ष, CTUA

देबाशीष भट्टाचार्य, अध्यक्ष, CTUA

रफ्तार में बाधा है ट्राम?

जानकार कहते हैं कि जिस रफ्तार से कोलकाता को चलना चाहिए, उस स्पीड के आधा के आधा से भी कम रफ्तार ट्राम की है. ऐसे में शहर को ट्राम के जरिये संभालना मुश्किल है. यानी कोलकाता समय के साथ आगे तो बढ़ा लेकिन इलेक्ट्रिफाई होने के बाद भी ट्राम आगे न बढ़ सकी.

दुनिया के दूसरे शहरों ने संभालकर रखा है ट्राम

दूसरा पहलू यह भी है कि ट्राम को दुनिया के कई देशों ने शान से संभालकर रखा है. उन देशों में ट्राम कोलकाता की तरह नजरअंदाज नहीं.. बल्कि वहां यह आधुनिक परिवहन व्यवस्था का हिस्सा है. आस्ट्रेलिया के मेलबर्न शहर में दुनिया का सबसे पुराना ट्राम नेटवर्क है. 1885 से चल रही मेलबर्न ट्राम आज 20 से ज्यादा रूटों पर चलती है. 500 से ज्यादा ट्राम का नेटवर्क करीब 250 किलोमीटर दूरी को आसान करती है.

आस्ट्रेलिया के मेलबर्न शहर में ट्राम पब्लिक ट्रांसपोर्ट का हिस्सा है

विदेशी ट्राम के नेटवर्क से सीखने की जरूरत

वहीं, रूस के शहर सैंट पीटर्सबर्ग में 40 रूटों पर ट्राम चल रही है. इनके जरिए 205 किलोमीटर तक का सफर तय किया जाता है. दुनिया के सबसे बड़े ट्राम नेटवर्क के मामले में तीसरा स्थान जर्मनी के बर्लिन शहर का है, जहां ट्राम के 22 रूट हैं और वे 193 किलोमीटर नेटवर्क का हिस्सा हैं.

जर्मनी के बर्लिन शहर में भी ट्राम का बड़ा नेटवर्क है

ट्राम अतीत नहीं.. भविष्य है

मॉर्डन होती दुनिया में जब विश्व के दूसरे देशों में ट्राम चल सकती है तो सवाल ये है कि भारत के शहर में कोलकाता में क्यों नहीं? जानकार और जिम्मेदार भी चाहते हैं कि कोलकाता में ट्राम चलती रहे लेकिन इसके स्वरूप को थोड़ा बदलना पड़ेगा. इसके चाहने वाले कहते हैं कि ट्राम को शहर का अतीत नहीं बल्कि भविष्य समझना चाहिए.

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एक शहर जो विश्वास की बदौलत चलता है.. पढ़िए आपसी भरोसे की मिसाल कायम करने वाली कहानी

बिना कैश काउंटर के बेकरी, जहां आप अपनी मर्जी से चीजें खरीद सकते हैं और उचित मूल्य लगाकर भुगतान भी. बिना किसी शुल्क के घंटों तक कायकिंग, अजनबी से मुलाकात और घंटों तक बातचीत. जरा कल्पना कीजिए कि ऐसी जगह कौन सी हो सकती है?

मुफ्त में एडवंचर कहां मिलता है?

देशप्रेम के नाते संभव है आप अपने देश या अपने शहर का नाम बोल सकते हैं. इसे हम कुछ हद तक सही भी मान सकते हैं कि लेकिन तब जब आप खुद से खरीदारी करके खुद उचित दाम लगाकर भुगतान करें. या कोई मुफ्त में आपका मनोरंजन करे. या फिर ट्रेन या बस में सफर करते वक्त आप बेफिक्र होकर अपने सामान या बच्चों को दूसरों के भरोसे छोड़ सकें. संभव है कुछ हद तक आपका जवाब इत्तेफाक से डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन से मिल जाएं.

सिस्टम जो विश्वास के दम पर चलता है

माइलस्टोन में आज कहानी उस शहर की जो विश्वास के दम पर चलता है. जिसका सिस्टम आपसी भरोसे की मिसाल कायम करता है. वो शहर है डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन. बिना किराए की कायकिंग, अजनबी से बढ़िया बातचीत और बिना निर्धारित मूल्य के ब्रेड आपको कोपेनहेगन में मिल सकेगा.

डेढ़ घंटे तक कायकिंग मुफ्त

दो लोगों के लिए 90 मिनट तक कायकिंग मुफ्त है. लेकिन इसके लिए एक शर्त होती है. वह शर्त है नदियों या तालाबों से ज्यादा से ज्यादा कचरा इकट्ठा करना. लोगों को मुफ्त में मनोरंजन चाहिए, इसके लिए वे नीक नीयत के खातिर कचरा बीन लेते हैं. इस दौरान उन्हें प्लास्टिक मिलता है. कभी कभी तो उन्हें मल-मूत्र से भरा थैली भी. लेकिन बावजूद वे इसे करते हैं. मकसद मनोरंजन से ज्यादा स्वच्छता का होता है.

टोबियास वेबर एंडरसन जिन्होंने मुफ्त कायकिंग का आइडिया लाया

पूरी तरह से भरोसे पर आधारित कॉन्सेप्ट

कचरे बीनने की शर्त पर मुफ्त कायकिंग का आइडिया टोबियास वेबर एंडरसन का है. वह कहते हैं, मैं नदियों में इतना ज्यादा कचरा देखकर दंग रह जाता था. मैं इस दिशा में कुछ करना चाहता था. मैं ज्यादा से ज्यादा लोगों को इसमें सक्रिय बनाना चाहता था. यह कॉन्सेप्ट पूरी तरह से भरोसे पर आधारित है. जो काफी सफल है.

शहर में यूनिक ह्मयूमन लाइब्रेरी

ड्रीम कायकिंग के जरिए उन्होंने खेल और एडवंचर को पर्यावरण के संरक्षण से जोड़ दिया है. यहां एक दूसरे जिले में एक अनोखी लाइब्रेरी है, जिसे ह्यूमन लाइब्रेरी कहते हैं. जहां आप किताबें तो पढ़ ही सकते हैं, अपने दिल का हाल भी बता सकते हैं.

रोनी आबेरगल, ह्मयूमन लाइब्रेकी के फाउंडर

इस लाइब्रेरी को स्थापित करने वाले रोनी आबेरगल कहते हैं कि उनकी लाइब्रेरी सबके लिए है. यहां आकर आप इंसानियत को खंगाल सकते हैं. उम्मीद है कि आपसी बातचीत से लोग समझेंगे. स्वीकार करेंगे. हम सबको इसकी जरूरत भी है. हम अकेले रहकर ये नहीं कर सकते, इसलिए हमें कंधे से कंधा मिलाकर चलना होगा.

समानता का अधिकार जीवन का सिद्धांत

जिन्होंने डेनमार्क को जीया है, वे कहते हैं कि यहां समानता का अधिकार ही जीवन का सिद्धांत है. यहां विश्वास की नींव पर सबकुछ टिका है. बेकरी जहां कोई कैशियर नहीं होता. यहां ग्राहक आते हैं. अपने जरूरत के फूट आइटम पैक करते हैं और फिर खुद से भुगतान करके चले जाते हैं. इस बेकरी के मालिक मार्टिन फोगेलियस कहते हैं कि ऐसी जगह में अकेले बेकरी चलाने का एकमात्र यही उपाय है. हमें लोगों पर भरोसा करना होगा.

बेकरी के मालिक मार्टिन फोगेलियस

द बिग पोस्ट आपसे यह सवाल पूछता है कि क्या आपके शहर में ऐसी व्यवस्था सफल हो सकती है, जो आपसी भरोसे पर चल सके?

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दिल्ली के इस इलाके में हर साल तैयार होता हजारों ‘रावण’… इनके जलने से हजारों घर चलते हैं

जब देशभर में शक्ति की देवी की आराधना होती है. भजन, कीर्तन, आरती, यज्ञ, हवन आदि-आदि. उसी समय दिल्ली के तीतरपुर इलाके में हजारों की संख्या में ‘रावण’ तैयार हो रहे होते हैं. रावण तैयार होना माने रावण के पुतले जो बनते ही वध के लिए तैयार होते हैं.

विरासत में मिला रावण बनाने का काम

रावण का पुतला बनाने का काम ऐसा है कि आज की पीढ़ी को भी यह विरासत में मिला. उम्मीद है आने वाली पीढ़ियों को भी मिले, जिससे अधर्म पर धर्म का विजय पताका हमेशा लहराता रहे.

ताकि आने वाली पीढ़ियां भी न भूले

ये हैं मदन लाल लोहिया.  ये दिल्ली के टैगोर गार्डन के पास तीतरपुर गांव में रहते हैं. रावण के पारंपरिक पुतले बनाते हुए इन्हें 40 साल से भी ज्यादा समय बीत चुका है. आगे की पीढ़ी को भी मदन लाल अपनी यह कला विरासत में दे रहे हैं. उनका बेटा छोटी उम्र से ही पिता से रावण बनाना सीख रहा है.

रावण के पुतलों का भारी डिमांड

अपनी कलाकारी और काम पर इन्हें गर्व है. मदनलाल बताते हैं कि इनकी दुकान न्यू इंडिया रावण वाले से इनके बनाए पुतले आस्ट्रेलिया तक भेजे जा चुके हैं. देश में तो रावण के पुतले के लिए महीनों पहले से ऑर्डर भी मिलते हैं.

5000 से ज्यादा कारीगर बनाते हैं पुतले

राजधानी दिल्ली के पश्चिमी हिस्से में स्थित तीतरपुर में हर साल दशहरे के समय सैकड़ों कारीगर रावण के पुतले बनाते हैं. यह एशिया का सबसे बड़ा पुतला मार्केट है. त्योहार के सीजन में 5 हजार से ज्यादा कारीगर दिन रात एक कर बांस और देसी तरीके से हर साल हजारों की संख्या में पुतले बनाते हैं.

जलता है रावण तो चलता है घर

नवरात्रि के समय से ही तीतरपुर के बाजार में आपको रावण के पुतले दिखने शुरू हो जाएंगे. दुकानदार सड़क किनारे रावण को सजाए रखते हैं. इनके बनाए पुतले जब जलते हैं तो इनके घरों में रोशनी आती है. रोटी का खर्च निकलता है.

त्योहार के सीजन में वैसे तो ये रावण गढ़ते हैं, लेकिन साल के बाकी समय में ये कारीगर कार्पेंटर, इलेक्ट्रिशियन, पेंटर और अन्य तरीके के कामगार होते हैं.

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नारी को पूजने वाले देश में यह बेहद चिंताजनक, इस नवरात्रि नारी शक्ति से एक वादा जरूर करें

अभी देशभर में नवरात्रि की धूम है. शक्ति की देवी की आराधना हो रही है. स्त्री शक्ति की उपासना. नौ दिनों तक कन्यायों की पूजा आदि-आदि. नारी को पूजने वाले देश में हमें समाज की एक कठोर वास्तविकता पर भी नजर डालनी चाहिए.

NCRB के आंकड़े चिंताजनक

NCRB (राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो) के 2023 के आंकड़ों के मुताबिक भारत में हर 16 मिनट में एक महिला का बलात्कार होता है. जो सिर्फ एक संख्या नहीं बल्कि एक ऐसी समस्या है जो हर दिन कितने इंसानों, परिवारों और समाज को प्रभावित करती है.

कैंडल मार्च के बाद फिर क्या?

ऐसी डराने वाली घटना जब भी सामने आती है तो हम सिर्फ अफसोस और गुस्सा करके फिर चुप हो जाते हैं. बहुत हद तक कैंडल मार्च और कुछ दिनों तक सुर्खियों में निंदा. द बिग पोस्ट पूछता है कि क्या सिर्फ आक्रोश काफी है ऐसी घटनाओं के लिए?

मजबूत कानून और बेहतर सपोर्ट सिस्टम की जरूरत

रेप, दरिंदगी, बलात्कार जो भी कह लें, पर लगाम लगाने के लिए कानूनी सुधार की काफी जरूरत है. एक मजबूत और कठोर कानून और उसे नियमानुसार लागू करने की जरूरत है. लेकिन इससे भी ज्यादा जरूरी है एक बेहतर सपोर्ट सिस्टम. किसी भी पीड़ित और सर्वाइवर तक चिकित्सा से लेकर कानूनी और भावनात्मक मदद पहुंचाना.

समाज में हम क्या कर सकते हैं?

खुद को और दूसरों को शिक्षित करना सबसे ज्यादा जरूरी है. इन मुद्दों को समझने के बाद इसे लोगों तक साझा करने की जरूरत है. रेप जैसी घटना की पीड़ितों की मदद के लिए आगे आने की जरूरत है. कभी कभी लोग उनसे दूर भागते हैं. छोटी से छोटी मदद समाज में बड़ा बदलाव लाती है. इससे समानांतर और आने वाली पीढ़ियों को एक संदेश जा सकता है.

सामाजिक बदलाव के लिए रेप जैसी घटना पर लगाम लगाने के लिए आवाज उठाना भी बेहद जरूरी है. कभी कभी अकेले और अलग थलग पड़ने के बाद विरोध की ऐसी आवाजें दब जाती हैं. ऐसे में मिलकर आवाज उठाना जरूरी है.

सबसे महत्वपूर्ण कड़ी होती है हिंसा की रिपोर्ट दर्ज कराना. आरोपियों की हनक, दबदबा के कारण पीड़ित कभी कभी शिकायत तक नहीं दर्ज करा पाते हैं. ऐसी स्थिति में बिना डरे अन्याय के खिलाफ बोलने की जरूरत होती है. मामलों की रिपोर्ट करने की जरूरत होती है.

एक होकर आवाज उठाएं

आम आदमी के तौर पर जागरूकता या बदलाव के आंदोलन में शामिल होना भी बड़ा योगदान होता है. आपकी अलेके की आवाज भले ही कुछ न बदल सके, लेकिन एकता की ताकत बहुत बड़ी होती है.

द बिग पोस्ट की आपसे अपील है कि इस नवरात्रि न सिर्फ शक्ति की उपासना करें, बल्कि नारी शक्ति से एक वादा भी करें. सिर्फ जश्न न मनाएं बल्कि एक ऐसे भविष्य के लिए भी कदम बढ़ाएं जहां हर महिला सुरक्षित, सम्मानित और मूल्यवान महसूस करें.

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पेड़ों का इलाज करने वाले ड़ॉक्टर्स, इनकी पहल से शहरों में बढ़ रही हरियाली

भारतीय वैज्ञानिक सर जगदीश चंद्र बोस. पेड़ों में जान होती है, यह खोज सर बोस की ही है. साल 1901 में सबसे पहले उन्होंने ही बताया कि पेड़-पौधों में भी जीवन होता है. पेड़ों में जीवन है तो दर्द और दुख भी होता होगा. बिल्कुल! पेड़ों की बीमारी, दुख-दर्द का इलाज करने वाले डॉक्टर्स की कहानी इस रिपोर्ट में आपको बता रहे हैं. जिनकी पहल से शहरों में बढ़ रही है हरियाली.

आर्बरिस्ट, पेड़ों के स्वास्थ्य और उनकी उम्र बढ़ाने के जानकार होते हैं. हम ऐसे ही आर्बरिस्ट से मिले, ईको-विलेज ऑरोविल में. इन्हें बचपन से ही जंगलों से प्यार था और अब इन्होंने उसे ही अपना करियर बना लिया है.

दक्षिण भारत के ऑरवेल शहर में हर पेड़ कीमती है. लिहाजा, जानकारों की एक स्थायी टीम शहर में हरियाली बनाए रखने के लिए काम करती है.

“जब मैं छोटा था तो मेरे पिता एक ट्रीहाउस बना रहे थे. सैंपल के रूप में उन्होंने हमारे घर के पिछवाड़े में पेड़ पर ऐसा एक घर बनाया. वहां जाकर एक अलग ही नजारा देखने को मिला. वो अनुभव ही अलग था. ऐसा लगता था कि तैरती हवा के बीच पेड़ सांस ले रहा है. आज भी मैं वो पल महसूस करता हूं.”भागीरथ प्रकाश, ट्रीकेयर

पहले प्रकृति से प्रेम हुआ, फिर वही बन गया करियर

भागीरथ प्रकाश, ट्रीकेयर कंपनी के संस्थापक जोनस सुहानेक के साथ मिलकर ऑरोविल के पेड़ों की देखरेख करते हैं. दोनों यहीं पले बढ़े. दोनों ही एक समय बंजर पड़े इस इलाके को हराभरा बनाने की लोकल कम्युनिटी की कोशिशों के गवाह थे. इस बदलाव से उनमें प्रकृति के लिए प्रेम पैदा हुआ और फिर वही उनका करियर बन गया.

क्या है आर्बिकल्चर, समझें

आर्बरिस्ट या आर्बिकल्चर लैटिन शब्द आर्बर से आया है, जिसका मतलब होता है पेड़. दूसरे शब्दों में ट्री प्रोफेशनल. हम लोग ट्री प्रोफेशनल्स हैं. हमलोग प्रकृति और शहरी विकास के बीच संतुलन बनाने वाले लोग हैं.

पिछले साल तमिलनाडु में आए चक्रवात के कारण हजारों की संख्या में पेड़ तहस नहस हो गए. ऑरोविल इसी राज्य में है. जलवायु परिवर्तन की वजह से चक्रवात अब यहां बार बार आने लगे हैं.

ऐसे काम आने लगी तकनीक

ऑरोविल की निवासी अगाथे फॉरक्वेज कहती हैं, चक्रवात के बाद जब मैं अपना पसंदीदा पेड़ को देखने आई तो पाया कि मेरा वह पेड़ दो हिस्सों में बंट गया था. वह बहुत विशाल पेड़ था. लेकिन चक्रवात के बाद मुझे यकीन नहीं हुआ कि मुझे मेरा पसंदीदा पेड़ काटना पड़ेगा. लेकिन किस्मत से ट्रीकेयर के जानकारों के पास इसका एक समाधान था.

अगाथे फॉरक्वेज का पेड़ चक्रवात में बर्बाद हो गया था, जिसे बचाया जा सका

हमने अपनी रिसर्च की और पेड़ को हटाने के सबसे सही तरीके के बारे में सोचा. आखिर में हमने ब्रेसिंग तरीका अपनाने के बारे में सोचा. ये तरीका यूरोप में काफी प्रचलित है. हमने एक बहुत लंबे ड्रील की मदद से पूरे पेड़ में ड्रिलिंग की. फिर उसमें थ्रेडेड रॉड घुसा दी. मेटल के कुछ प्लेट लगाए ताकि पेड़ को जोड़ा जा सके.योनास जुखानेक

कभी-कभी हर पेड़ को बचाया नहीं जा सकता

तमाम कोशिशों के बावजूद हर पेड़ को नहीं बचाया नहीं जा सकता. पेड़ के खराब या बीमार होने के बाद ही उनकी भूमिका आती है. शहरी पर्यावरणों में पेड़ आश्चर्यजनक रूप से बेशक ढल जाएं, लेकिन अक्सर बीमार पड़ जाते हैं या उनकी जड़ें खराब हो जाती हैं.

कंक्रीट की दुुनिया में हरियाली का खास ख्याल

आर्बोरिस्ट आइलैंड लेस्क्योर भी ऑरोविल में ही रहते हैं. वे शहरी पेड़ों के प्रबंधन के विशेषज्ञ हैं. वे नए निर्माण कार्यों में पुराने पेड़ों को संरक्षित करने की वकालत करते हैं. वे कहते हैं, मैं साइट पर जाकर पेड़ों को देखता हूं कि पेड़ कितने समय तक टिका रहेगा. मैं उन्हें लक्ष्य में भी रखता हूं ताकि आर्किटेक्ट की ड्राइंग में उन पेड़ों को जगह मिल सके. हम उनकी सेहत, स्थिति और कितने समय तक टिके रह सकते हैं ये सारी चीजें देखते हैं.

यह तरीका ऐसी हरियाली बढ़ाने में मददगार हैं जो बदलती जलवायु में प्रकृति के संतुलन में काफी हद तक मददगार साबित हो सकता है.

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मजहब की बेड़ियों को तोड़कर हुनर की नजीर पेश कर रहे हैं चाचा इश्तियाक.. आइये जानते हैं इनकी कहानी

धर्म और मजहब की दीवारें कमजोर पड़ जाती है कला के सामने. भला कला किसी मजहब का कैसे हो सकता है? ज्ञान को धर्म की जंजीर में कैसे बांधा जा सकता है? प्रतिभा को पहचान की मोहताज क्यों होनी चाहिए? इन सब सवालों के जवाब हैं उत्तर प्रदेश के काकोरी के रहने वाले इश्तियाक अली. आइये जानते हैं इनकी रोचक कहानी..

“मंदिर मस्जिद गिरिजाघर ने बांट लिया भगवान को।
धरती बांटी, सागर बांटा, मत बांटो इंसान को।।”

काकोरी के रहने वाले इश्तियाक अली लखनऊ में मूर्तियां बनाते हैं

मजहब, धर्म पर न जाने ऐसे कितनी रचनाएं की गई हैं. बेड़ियों और बंदिशों से ऊपर उठकर, संदेश बस एक.. इंसानियत की. मानवता का.

मेरा नाम इश्तियाक अली है. मैंने बड़ी गरीबी देखी है. 13 साल की उम्र से लकड़ी का काम कर रहा हूं. मैंने एक से बढ़कर एक काम किए लेकिन नाम नहीं हुआ. मैं अब भी अपने काम में जुटा हूं.- इश्तियाक अली, काष्ठ कलाकार

फटेहाल कपड़े, चेहरे पर झुर्रियां. नंगे पैर. हाथ में छेनी हथौड़ी और लकड़ी के कुछ टुकड़े. घंटों की मेहनत और फिर कला का वो नमूना तैयार हो जाता है, जिसे देखकर दंग रह जाएंगे. नाम इश्तियाक अली. चाचा ठाठ से कहते हैं कि वे सुन्नी मुसलमान हैं लेकिन वे मूर्तियां हिंदू देवी-देवताओं के बनाते हैं.

शिव, गणेश और हनुमान के सहारे जिंदगी

इश्तियाक चाचा की कलाकारी का नमूना

इश्तियाक चाचा शिवजी, गणेश जी और हनुमान जी की मूर्तियां बनाकर अपनी रोजी रोटी कमाते हैं. बचपन से उन्होंने अब तक कई काम किए. जैसे मदाड़ी का खेल दिखाया. गाड़ी साफ किया. मजदूरी की. लेकिन फिर उन्होंने वही चुना जो दिल ने कहा. लकड़ी पर नक्काशी की. वे कहते हैं कि बचपन से ही उन्हें लकड़ी पर कलाकारी करने का बहुत शौक था.

हर मूर्ति एक संदेश देती है

धीरे धीरे उनकी बनाई मूर्तियां लोग पसंद करने लगे. इस तरह उनके अंदर के कलाकार का मनोबल बढ़ता गया. आज इश्तियाक अली की बनाई हर मूर्ति एक संदेश देती है. संदेश कर्मठता का, एकता का और कर्म के प्रति सच्चा निष्ठा का.

इश्तियाक चाचा ने ऐसे सैकड़ों काम किए हैं

‘हिंदू देवताओं की मूर्तियां बनाना आसान नहीं था’

दूसरे मजहब की मूर्तियां बनाने का काम इतना भी आसान नहीं है. इस काम में उन्हें सामाजिक तिरस्कार भी सहना पड़ रहा है. वे कहते हैं, हमें धार्मिक काम का बहुत शौक है. रात में भी हमें देवी-देवता नजर आते हैं. कुछ हमारे भाई लोग हमसे नाराज भी होते हैं. हमसे दुआ-सलाम भी नहीं करते. हमसे कोई बात नहीं करता. हमारा काम अब सिर्फ धर्म है.

इश्तियाक चाचा के हुनर को पहचान दें

इश्तियाक चाचा चाहते हैं कि उनकी कला को सम्मान मिले. इस कलाकारी के लिए उनका नाम हो. उनकी अपील है कि लखनऊ के प्रमुख चौक चौराहों से गुजरते हुए जब कभी उनसे मुलाकात हो तो मूर्तियां जरूर खरीदें. इनसे उन्हें काफी मदद मिलेगी साथ ही पहचान भी.

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