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चेहरों को तराश कर उसे चांद सा खूबसूरत बनाने वाले इस युवा डॉक्टर प्रत्यूष अंशुमान मिलिए

चेहरा ऐसा मानों चांद खिला हो, और जब गुलाबी होंठ मुस्कान भरे तो चेहरे रंग नूरानी हो जाए ,ऐसे में मशहूर गजल गायक जगजीत सिंह की ग़ज़ल फिजा में तैर कर कह उठें कि किसका चेहरा मैं देखूं तेरा चेहरा देखकर। खुबसूरत चेहरों पर न जाने कितने गीत बने। कितने ही शायरों ने अपनी शायराना कलम चलाई । चेहरे की खूबसूरती को कोई नजर न लगे लोग इसकी दुआ मांगते हैं, पर कई बार हादसे की वजह से चेहरे की सुंदरता बिगड़ जाती है तो कई बार बढ़ती उम्र चेहरों पर झुरियों की शक्ल में अपनी पहचान छोड़ जाता है। ऐसे में मन हमेशा सशंकित रहता है कि सामने वाला हमें किस रूप में देखेगा।मन में बुरे विचार भरने लगते हैं। आत्मविश्वास कमजोर होने लगता है पर अब ऐसे में घबराने की बात नहीं। हम पटना के वैसे युवा चिकित्सक की कहानी लेकर आएं हैं जिन्हें चेहरों को तराश कर खूबसूरत बनाने में महारत हासिल है।वो चेहरों को इतनी संजीदगी से तराशते है कि देखने वाला उस खुबसूरती का कायल हो जाएं । पढ़िए कॉस्मो थेरेपी द्वारा चेहरे पर चार चांद लगाने वाले हैं कॉस्मो सर्जन डॉक्टर प्रत्यूष अंशुमान की यह कहानी

देखिए चेहरा व्यक्ति की पहचान होती है। वह उसके व्यक्तित्व का अहम हिस्सा भी होता है। कई बार दुर्घटना या फिर कोई अन्य परेशानी के कारण चेहरे का कोई खास अंग विकृत हो जाता है या उसकी खूबसूरती कम जाती है। कई बार यह जन्मजात भी होता है। ऐसे में व्यक्ति के अंदर हीन भावनाएं ग्रसित होने लगती हैं। हमारा समाज आज भी व्यक्ति के चेहरे से ही उसके व्यक्तित्व का आकलन करता है। आज के कारपोरेट दौर में नौकरियों तक के लिए आपको अच्छा दिखना भी जरूरी है। हम कॉस्मो थेरेपी द्वारा व्यक्ति के विकृत अंग को सुव्यवस्थित आकार प्रदान करते हैं। किसी कारण चेहरे का जल जाना, उस पर गहरे निशान पड़ना, किसी जख्म के कारण चेहरे का खास अंग विकृत हो जाना जैसी समस्याओं में चिंतित होने की जरूरत नहीं है। कॉस्मेटिक सर्जरी द्वारा बड़े आराम से इन्हें ठीक कर चेहरे की प्राकृतिक सुंदरता लौटाई जा सकती है। कहते हैं पटना के जानेमाने युवा कॉस्मो सर्जन डॉक्टर प्रत्यूष अंशुमान ।

कॉस्मेटिक सर्जरी से खिलखिला उठता है चेहरा

वे आगे बताते हैं कि इतना ही नहीं कॉस्मेटिक सर्जरी के द्वारा चेहरे को काफी खूबसूरत भी बनाया जा सकता है। तालु के ऊंचे होने, जबड़े की विकृति, आंखों को ठीक करना, तालु के कटे होने जैसी समस्याओं का निदान कोस्मेटिक सर्जरी द्वारा किया जाता है।
डॉक्टर प्रत्यूष अंशुमान बताते हैं कि उन्हे पढ़ाई खत्म होने के बाद देश और विदेश के कई बड़े अस्पतालों से ऑफर आये, पर मेरे मन में बिहार में ही इसे विकसित करने का सपना था। इसलिए मैं बड़े शहरों को छोड़कर पटना आ गया और यहां कॉस्मेटिक सर्जरी की शुरुआत की। अब भी बिहार में कॉस्मेटिक सर्जरी के काफी कम सर्जन उपलब्ध हैं।


महंगा नहीं है कॉस्मेटिक सर्जरी

डॉक्टर प्रत्यूष अंशुमान कहते हैं कि कॉस्मेटिक सर्जरी को लेकर लोगों को हमेशा लगता है कि यह काफी महंगा होगा खासतौर से बिहार में इसे लेकर एक धारणा बन गई है कॉस्मेटिक सर्जरी का खर्च काफी ज्यादा आता है लेकिन ऐसी बात नहीं है। कॉस्मेटिक सर्जरी का खर्च आपकी समस्या के ऊपर निर्भर करता है। कई बार बेहद कम खर्च में ही आपके चेहरे की खूबसूरती लौट आती है।

डरने की कोई जरूरत नहीं

डॉक्टर प्रत्यूष अंशुमान कहते हैं कि कॉस्मेटिक सर्जरी को लेकर मन में किसी तरह का भय या डर रखने की जरूरत नहीं है। इससे किसी तरह का नुकसान नहीं पहुंचता है। यह सर्जरी पूर्णता सुरक्षित है। हां इस बात का ध्यान जरूर रखें कि कॉस्मेटिक सर्जरी किसी अच्छे सर्जन से ही कराया जाए।

सैकड़ों चेहरों को बना चुके हैं सुंदर

डॉक्टर प्रत्यूष अंशुमान कॉस्मेटिक सर्जरी के द्वारा अब तक सैकड़ों लोगों की सर्जरी कर चुके हैं। इसमें ज्यादा तादाद महिलाओं और बच्चों की है। बच्चों में तालु काटने की समस्या का स्थाई समाधान भी इस सर्जरी के द्वारा संभव है।

गांव में फ्री कैंप

डॉक्टर प्रत्यूष कहते हैं कि बिहार में कॉस्मेटिक सर्जरी को लेकर जानकारी की काफी कमी है। लोगों को जागरूक करने के लिए वह बिहार के सुदूरवर्ती गांव में मुफ्त शिविर का आयोजन भी करते हैं। इस शिविर में यह कोशिश होती है कि लोग कॉस्मेटिक सर्जरी के बारे में जाने। इन शिविरों कई समस्याओं का निदान भी किया जाता है।

बाहर जाने की आवश्यकता नहीं

प्रत्यूष अंशुमान बताते हैं कि कॉस्मेटिक सर्जरी के लिए पहले लोग दिल्ली ,बेंगलुरु जैसे बड़े शहरों का रुख करते थे। वे कहते हैं कि आप लोगों को बाहर जाने की जरूरत नहीं है अब पटना में भी विश्वस्तरीय सुविधाओं के साथ कॉस्मेटिक थेरेपी उपलब्ध है। वे आगे बताते हैं कि हमारे क्लीनिक में भी अत्याधुनिक मशीनें और सुविधाएं उपलब्ध हैं। हमारे यहां चिकित्सा का खर्च भी बड़े शहरों से काफी कम आता है। मेरी कोशिश कम खर्च में बेहतर कॉस्मेटिक सर्जरी की सुविधा उपलब्ध कराने की है।

बचपन से डॉक्टर बनने का सपना

डॉक्टर प्रत्यूष अंशुमान बताते हैं कि उनके मामा योगेश कृष्ण सहाय डॉक्टर हैं। मेरे मन में भी बचपन से ही डॉक्टर बनने की चाहत थी। मैंने अपने मन में ठान कर रखा था कि मुझे डॉक्टर ही बनना है। आगे की पढ़ाई के दौरान जब मुझे कॉस्मेटिक सर्जरी के बारे में जानकारी मिली तो मुझे लगा कि यह बेहतर मौका है मैं इसके जरिए अपनी बिहार के लोगों की सेवा कर सकता हूं। डॉक्टर प्रत्यूष अंशुमान की प्रारंभिक शिक्षा डीएवी स्कूल पटना से हुई। फिर मणिपाल कॉलेज से डेंटल साइंस की पढ़ाई की और बेंगलुरु से बीडीएस किया । डॉक्टर प्रत्यूष अंशुमान ने मुंबई से फैलोशिप की।

परिवार का मिलता है सहयोग

डॉक्टर प्रत्यूष अंशुमान बताते हैं कि कॉस्मेटिक सर्जरी जैसी नई चिकित्सा पद्धति में आगे बढ़ने में परिवार के सभी सदस्यों का काफी सहयोग मिला। माता-पिता ने भी काफी हौसला दिया। पत्नी जो पेशे से खुद एक चिकित्सक हैं उन्होंने भी जीवन के हर मोड़ पर हिम्मत दी।

नन्ही बिटिया जीवन की शिक्षक

डॉक्टर अंशुमान बताते हैं कि जिंदगी की खूबसूरती के शिक्षा आपको नन्हे बच्चे बड़ी आसानी से दे जाते हैं। मेरी नन्ही बिटिया की मुस्कान में भी जिंदगी के कई शिक्षाएं छुपी होती हैं। मैं उसे जीवन के शिक्षक के रूप में देखता हूं। छोटे बच्चों से भी प्रेरणा लेने की जरूरत है।

तबला और शतरंज का शौक

डॉक्टर प्रत्यूष अंशुमान बेहतर कॉस्मेटिक सर्जन होने के साथ ही एक साधे हुए तबला वादक भी हैं। वह विभिन्न मंचों पर तबला वादन कर चुके हैं। तबला के साथ ही शतरंज के खेल का भी उन्हें शौक है। यूनिवर्सिटी लेवल पर शतरंज चैंपियनशिप में प्रतिभागी रह चुके हैं।

खुद पर भरोसा करें युवा

डॉक्टर प्रत्यूष अंशुमान युवाओं का संदेश देते हुए कहते हैं कि बिहार के युवाओं को खुद पर भरोसा करना चाहिए, युवाओं के अंदर अंग्रेजी न बोल पाने को लेकर एक भय का माहौल रहता है ऐसे में को मन से निकालने की जरूरत है। आपका आत्मविश्वास ही आपकी पूंजी है इसे हर हाल में बनाए रखें।
फिलवक्त डॉक्टर प्रत्यूष अंशुमान बिहार के पटना में कॉस्मेटिक सर्जरी द्वारा चेहरे को खूबसूरत बनाने की अपनी पहल में जुटे हैं। अगर आपके मन में कॉस्मेटिक सर्जरी को लेकर कोई सवाल हो तो आप डॉक्टर डॉक्टर प्रत्युष अंशुमान से संपर्क कर सकते हैं।

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कभी पढ़ाई छोड़ उठाई बंदूक, आज हजारों छात्रों को दे रहे मार्गदर्शन, पढ़ें जुनून और जीत की यह कहानी

ये कहानी उस शख्स की है जिसने अपने टूटते – जुड़ते सपनों से हताश होने की जगह उसे हथियार बना इतिहास रच डाला। जीवन के हर पहर संकटों से टकराहट होती रही। कभी पढ़ाई बीच में छूटी तो कभी
कलम वाले हाथ में बंदूक थामने की नौबत आ गई। सपने बनते बिखरते रहे पर नहीं बिखरा तो हौसला। इसी हौसले के दम पर आज इनका संस्थान गोल इंस्टीट्यूट राष्ट्रीय फलक पर अपनी मुकम्मल पहचान बना चुका है।
पढ़ें हजारों छात्रों को मेडिकल इंट्रेंस की सफल तैयारी करवाने वाली संस्था गोल इंस्टीट्यूट के संस्थापक विपिन कुमार के संघर्ष और सफलता की ये दास्तान


मेरे जीवन की कहानी में कई स्याह पन्ने हैं और इन पन्नों पर चस्पा दर्द की स्वेत श्याम तस्वीरें भी। मैं बिहार के गया जिले के एक पिछड़े गांव से आता हूं। पिछड़ेपन के साथ ही वहां वर्ग संघर्ष, नक्सलवाद, निजी सेना और नरसंहार जीवन का हिस्सा बन गए थे।कब किसे कहां मौत के घाट उतार दिया जाएगा कहना मुश्किल था। आज सब ठीक है पर इसका खौफ आज भी वहां की माटी में मौजूद हैं। । मैं इन सब से उदास तो होता था पर मैंने उस उदासी को लंबे समय तक खुद पर सवार नहीं रहने दिया। एक स्वप्न टूटता तो मैं दूसरा गढ़ लेता । बस रास्ते पर चलता रहा और क्या! कभी साईकिल से चलकर ट्यूशन पढ़ाने जाता था। आज देश के कई राज्यों में मेरे इंस्टिट्यूट की शाखाएं हैं। कभी दो नंबर से मेरा मेडिकल छूटा आज हमारे संस्थान से तैयारी कर हजारों छात्र डॉक्टर बन चुके हैं। जिंदगी आपका हर वक्त इम्तिहान लेती है आपको बस हौसला बनाए और बचाए रखना होता है। कहते हैं गोल इंस्टीट्यूट के संस्थापक और निदेशक बिपिन कुमार सिंह। विपिन कुमार आगे कहते हैं कि वक्त से अच्छा शिक्षक कोई नहीं होता।

बहुत काली थी वह रात

विपिन कुमार बताते हैं कि वह जीवन का काफी स्याह वक्त था। वह बहुत काली रात थी। हमारे गांव में तब ज़मीन को लेकर वर्ग संघर्ष चरम पर था। बिहार के कई इलाकों में नक्सली हमले बढ़ गए थे। नरसंहार का दौर शुरू हो गया था। हमारे गांव की भी यही हालत थी।। कोई शाम के बाद घर से बाहर नहीं निकलता। घर में भी हर वक्त चौकन्ना रहना होता था। ऐसे में दीपावली की रात हमारे घर भी हमला किया गया और मेरे चचेरे भाई को नक्सलियों ने गोली मार दी। उनकी मौत हो गई। हमारा सब कुछ उस रात तबाह हो गया। मेरी आंखों में खौफ का ये मंज़र रह रह कर तैरता रहता।

पढाई छोड़ थामा था बंदूक

बिपिन कुमार सिंह कहते हैं कि जब घर पर हमला हुआ तो उसके बाद हमारा पूरा परिवार काफी दहशत में जीने लगा। उस वक्त मैंने बोर्ड एग्जाम पास किया था और सपना पटना के साइंस कालेज में एडमिशन कराने का था। बोर्ड एग्जाम में मेरे नंबर काफी अच्छे आए थे। वे आगे बताते हैं कि भाई की हत्या ने हमारा सबकुछ बदल कर रख दिया। उम्र भी कम थी। पढ़ाई के सपने की जगह आंखों में खौफ और दिल में प्रतिशोध की भावना पनप गई। मैं पढ़ाई लगभग छोड़ गांव में ही रहने लगा।
गांव में लोग बंदूक ले टोलियां बना रात भर पहरेदारी करते। हमने भी पढ़ाई छोड़ बंदूक उठाया और रात- रात भर छत पर घूमकर पहरेदारी किया करते। पढ़ाई -लिखाई की कलम की जगह हाथों में थी तो अब बंदूक। यह भी पता नहीं था कि आगे क्या होना है। इसका अंजाम क्या होगा।

पिता बने मार्गदर्शक

बिपिन सिंह कहते हैं कि कुछ दिन तो ऐसा चलता रहा । बंदूक ले मैं पहरेदारी करता। पढ़ना- लिखना पुरानी बात बन गई थी। ऐसे में पिताजी ने एक बार पास बुलाया और बिठाकर पूछा कि इन सब से आगे क्या होगा? भविष्य क्या होगा? उन्होंने मुझे सलाह दी कि इनसे बाहर निकलो और अपने आगे का जीवन मजबूत बनाओ। हिंसा का ज़बाब हिंसा नहीं और इस तरह बंदूक से कोई बदलाव आने वाला नहीं। पिताजी की वह बात मेरे जीवन का टर्निंग प्वाइंट बना और फिर मैं पढ़ाई की और लौट गया।

नामांकन हो चुका था बंद

बिपिन कुमार सिंह बताते हैं जब मैं दुबारा से पढ़ाई की और लौटा तो काफी देर हो चुकी थी। कालेजों में एडमिशन हो चुके थे किसी तरह गया शहर के एक कालेज में मेरा नामांकन हुआ और मैं वहीं गया के एक लॉज में रहने लगा।

लॉज के सीनियर से मिली प्रेरणा

बिपिन कुमार आगे बताते हैं उसी लॉज में मेरे सीनियर रहते थे। काफी सौम्या, व्यवहारिक और हर वक्त पढ़ाई में मशगूल। उस समय तक मैंने कुछ नहीं सोचा था कि मुझे आगे क्या करना है बस मन में यह था कि अच्छे से पढ़ाई हो जाए और एक अदद नौकरी मिल जाए। मेरे सीनियर उस वक्त मेडिकल की तैयारी कर रहे थे और बाद में मुझे पता चला उन्होंने मेडिकल के एग्जाम में बिहार में सातवां स्थान लाया था। उनसे काफी प्रेरणा मिली और मैंने भी यह तय किया कि मैं भी मेडिकल की तैयारी करूंगा और डॉक्टर बनूंगा।

दो नंबर से छूटा मेडिकल

बिपिन कुमार सिंह कहते हैं कि फिर मैं मेडिकल की तैयारी करने के लिए पटना आ गया। एक साथ हम कई छात्र रहते। सब काफी मेहनत करते। हम सब मिलकर आपस में ही टेस्ट पेपर की प्रेक्टिस किया करते। सब कुछ ठीक चल रहा था। इस बीच बहन की तबीयत बिगड़ी और फिर मुझे अस्पतालों के चक्कर लगाने पड़े। बीच में प्रेक्टिस छूट गई। मैंने मेडिकल का एग्जाम दिया। जब रिजल्ट आया तो मैं सिर्फ दो नंबर से छट गया था। मुझे दो नंबर कम आए थे।

फिर साथ आया तनाव और अकेलापन

वे बताते हैं कि रिजल्ट के बाद मैं तनाव में था। पटना से गांव आया सोचा घर पर लोग दिलासा देंगे। कुछ सिंपैथी मिलेगी पर यहां हुआ उल्टा। नाकामयाबी का सारा ठीकरा मुझ पर ही फोड़ दिया गया। पिताजी ने कहा कि ठीक से पढ़ाई नहीं किए होगे। पढ़ते तो कैसे नहीं होता! अगर आपका ताल्लुक बिहार के गांवों से होगा तो वहां यह बात आम होती है। अब मुझे खुद से ही खुद को दिलासा भी देना था और आगे नए रास्ते भी ढूंढने थे। पिताजी ने कहा कि तुम अपने बारे में खुद सोचो और यही मेरा जीवन मंत्र बन गया।

जब चावल बेच दिया किराया

बिपिन कुमार सिंह कहते हैं कि एक वाक्या मुझे अब भी याद है। उस वक्त में किराए पर रह कर पढ़ाई करता था। मेरे पास पैसे खत्म हो चुके थे और मकान का किराया देना था। राशन आदि के लिए भी पैसे नहीं थे। पिताजी तब रिटायर कर चुके थे और गांव में रहते थे। मैं गांव आया और पिताजी से पैसा मांगा ‌। पिताजी ने कहा कि फिलहाल तो पैसे खत्म हो चुके हैं । तुम अगले माह ले लेना। फिर मैंने जब ज़िद की तो उन्होंने कहा कि पैसे तो है नहीं ऐसा करो ये धान रखा है ट्रैक्टर पर लादकर बाजार ले जाओ और फिर जो पैसे मिलेंगे उसे ले लेना। मैंने ट्रैक्टर पर धान लोड किया, बाजार गया उसे बेचा और फिर पैसे लिए। जो पैसे मुझे धान बेचकर मिले वह इतना कम था कि मेरे दो माह का रूम रेंट ही चल पाया। मुझे लगा कि पिताजी इतनी मेहनत करते हैं फिर भी अच्छी आमदनी नहीं हो पाती। मुझे इस हालत से निकलना है।

ऐसे आया संस्थान खोलने का आइडिया

मेडिकल प्रिपरेशन के कोचिंग खोलने के बारे में बताते हुए बिपिन कुमार कहते हैं मेरा मेडिकल का सपना टूट चुका था। इस दौरान मैंने जो तैयारी की थी , तैयारियों का जो पैटर्न और मॉडल बनाया था मैं उसके बारे में सोच रहा था। उस वक्त मेडिकल इंट्रेस्ट की प्रेक्टिस के लिए देश में कोई सेंटर नहीं था जो छात्रों को मार्गदर्शन दे सके। मैंने सोचा कि क्यों न एक ऐसा सेंटर बनाया जाए जिसमें मेडिकल के छात्रों की तैयारी कराई जाए। मैंने इस पर काफी मंथन शुरू किया और पाया कि बेहतर मार्गदर्शन के आभाव में एक-एक छात्र सालों साल तैयारियां करते हैं और फिर कईयों को निराशा हाथ लगती । फिर मैंने संकल्प लिया कि मुझे ऐसा एक सेंटर बनाना है।

सेंटर के लिए कहां से आए पैसा?

बिपिन कुमार आगे कहते हैं कि मैनै मन ही मन मैंने सेंटर खोलने की पूरी तैयारी कर ली। कई लोगों से बात भी किया पर उन लोगों ने मुझे डिमोटिवेट ही किया। पर इन सबकी बात अन्यथा ना ले मैंने तय किया कि मुझे एक ऐसा सेंटर बनाना है जहां मेडिकल एंट्रेंस एग्जाम के लिए प्रिपरेशन कराया जा सके। इन सबके लिए पैसे की जरूरत थी जो मेरे पास थे नहीं और मैं घर से मांग नहीं सकता था । घर से मांगता तो मिलता भी नहीं। मैंने किसी को कुछ नहीं बताया और ट्यूशन पढानी शुरू की । 30 से 40 किलोमीटर साइकिल से जाकर ट्यूशन पढ़ाने लगा और फिर पैसे इकट्ठे किए।

8×8 के कमरे से शुरुआत

बिपिन कहते हैं कि ट्यूशन पढ़ाकर मैंने जो पैसे इकट्ठे किए उसे एक छोटे से कमरे में मेडिकल की तैयारी के लिए कोचिंग शुरु किया। यह मेरे सपने के सच होने जैसा था। उस वक्त काफी लोगों ने मेरा मजाक उड़ाया कि छोटे से कमरे में कैसे मेडिकल एंट्रेंस की तैयारी होगी। आखिर पैसे देकर कौन टेस्ट सीरीज देना चाहेगा ? मुझे विश्वास था कि हो न हो कुछ बेहतर जरूर होगा। मैं लोगों की आलोचनाएं सुनता और दुगनी ताकत से इसे बेहतर बनाने पर पूरी उर्जा लगा देता। पहले ही साल में मेरे 80 में से 20 छात्र सेलेक्ट हो गए इसे मेरा उत्साह बढ़ा और फिर कारवां बनता गया।

आज देश भर में 18 ब्रांच

आज गोल इंस्टिट्यूट के देशभर में 18 से अधिक ब्रांच है। आज यह मेडिकल प्रिपरेशन का एक भरोसेमंद नाम बन चुका है।हमारे संस्थान से तैयारी कर हजारों छात्रों ने सफलता का परचम लहराया है। हम सैकड़ों लोगों संस्था से जोड़ कर रोजगार भी दे रहे हैं। साथी बिहार की राजधानी पटना में बहार 12 एकड़ का गोल विलेज भी कार्य कर रहा है या अपने आप में अनूठा शैक्षणिक गांव है। आज Goal संस्थान ने अपने सफलता का 25 वर्ष पूरे कर लिए है और इस 25 साल के सफर में 15 हजार से ज्यादा डॉक्टर हमने सोसाइटी को दिए हैं।कहते हैं बिपिन कुमार।

क्या है गोल विलेज

गोल विलेज हमारी प्राचीन गुरुकुल प्रणाली और आधुनिक टेक्नोलॉजी के साथ शांत और खुबसूरत प्राकृतिक वातावरण के बीच रचा- बसा एक आदर्श शैक्षणिक कैंपस है। यहां छात्रों के लिए एक ही जगह रहना- खाना, पढ़ाई, सेल्फ स्टडी, के साथ ही खेलकूद, व्यायाम और उनके व्यक्तित्व विकास की तमाम साधन – संसाधन उपलब्ध कराए गए हैं।

और नाराज हो गए पिताजी

वे बताते हैं कि कोचिंग खोलने के बाद पिताजी काफी नाराज हो गए थे। वे आगे बताते हैं कि यह वाक्य तब का है जब मेरी कोचिंग की शुरुआत हो चुकी थी और रिजल्ट भी काफी बढ़िया आया था। उस समय मैं गांव गया और दीदी ने पिताजी को बता दिया था कि मैं कोचिंग सेंटर चला रहा हूं। पिताजी तब मुझसे काफी नाराज हुए उन्हें लगा कि मैंने उनकी प्रतिष्ठा धूमिल कर दी है।

छोटा नहीं होता कोई काम

बिपिन कुमार सिंह कहते हैं कि कोई भी काम छोटा काम या बड़ा काम नहीं होता है अगर आप मन से उसे करते हैं तो उस काम में ऊंचाई जरूर मिलती है। जीवन में बाधाएं आती रहती हैं पर उन बाधाओं को हिम्मत बना आगे बढ़ जाने की जरूरत है।
फिलहाल विपिन कुमार सिंह अपनी निर्बाध लगन और उर्जा से ‘गोल’ को एक अंतरराष्ट्रीय फलक पर स्थापित करने की नई मुहिम में जुटे हैं।

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मुफलिसी से लड़कर अपने जायके की खुशबू को सात समंदर पार तक पहुंचाने वाले गोपाल कुशवाहा की कहानी

उनकी शुरुआती जिंदगी गरीबी से दो-दो हाथ करते बीती। मुफलिसी इतनी कि त्योहारों में भी सूखी रोटी ही नसीब होती। कम कीमत पर खरीदे पुराने कपड़े से तन ढकने का काम चलता। उस शख़्स ने कुंडली मारकर बैठी गरीबी की रेखा को अपने जीवन की रेखा से निकाल फेंकने का प्रण किया और मन में हिम्मत भर स्वाद का ऐसा तड़का लगाया कि बन गए जायकों के शहंशाह। आज देशभर के कई शहरों में उनके रेस्तरां की चेन है। अब सपना अमेरिका में रेस्तरां खोलने का है। अहुना मटन के लाजवाब स्वाद से दुनिया को परिचित कराने वाले ओल्ड चंपारण मीट हाउस के संस्थापक गोपाल कुशवाहा की यह कहानी पढ़िए…

मेरी परवरिश अत्यंत ही गरीबी में हुई दो वक्त का खाना जुटाने के लिए भी हमें संघर्ष करना पड़ता था। मैट्रिक का फॉर्म भरने के लिए मां के गहने गिरवी रखने पड़े थे। पिताजी सब्जी का ठेला लगाते उसी पैसे से हमारे परिवार का गुजारा किसी तरह चलता।
बड़े भाई चितरंजन कुशवाहा पिता की मदद करते और अखबार बांट कुछ पैसे जोड़ते। बड़े भाई इस हालत में हम सबको खूब है हौसला देते वे कहते कि वक्त जरूर बदलेगा। हम सभी पांच भाई बहनों को बड़े भइया ने खुब हिम्मत दी।

त्योहारों में भी हमें नए कपड़े नसीब नहीं होते थे। फुटपाथ पर बिकने पुराने कपड़े खरीद कर हमारे पिताजी हमारे लिए लाते थे। यह वाक्या बताते हुए गोपाल कुशवाहा की आंखें नम हो गई भीगी आंखों से आगे की कहानी बयां करते हुए गोपाल कहते हैं कि परिवार में सब चाहते थे कि मैं सरकारी नौकरी में जाऊं। घर में कम से कम एक फिक्स आमदनी हो जाए। मेरी नौकरी रेलवे में लगी पर मेरा मन नौकरी में नहीं रमा और मैंने नौकरी छोड़ दी। परिवार के लोगों ने मुझे खूब कोसा पर मेरे मन में कुछ अलग करने की चाहत बचपन से बेचैन के रहती थी । आज इसी चाहत ने मेरे अहुना मटन को देश दुनिया का पसंदीदा ज़ायका बना दिया है,कहते हैं ओल्ड चंपारण मीट हाउस के संस्थापक गोपाल कुशवाहा ।गोपाल द्वारा ईजाद किए गए अहुना हांडी मटन की खूब चर्चा है ।खास से आम तक सभी को इसके लाजवाब स्वाद का चटकारा इनके रेस्तरां तक खींच लाता है।

क्या है अहुना हांडी मटन

दरअसल अहुना हांडी मटन, मटन बनाने की एक विशेष शैली है इसमें मटन बनाने के लिए मिट्टी की हांडी का प्रयोग किया जाता है। गोपाल कुशवाहा बताते हैं कि वह बिहार -नेपाल बॉर्डर पर स्थित घोड़ासहन नामक की जगह से इसे लेकर आए हैं और इसकी पाककला में थोड़ा परिवर्तन किया।इसका स्वाद अन्य प्रकार से पकाए गए मटन से काफी अलग सोंधी खुशबू लिए होता है।
यह खाने में स्वादिष्ट तो होता ही है सेहत और पाचन क्रिया में भी फिट बैठता है। खास यह कि इसके बनाने का फार्मूला तो गोपाल का ही है साथ ही इसके मसाले भी वे खुद तैयार करते हैं। मटन पकाने के लिए सरसों तेल भी बाजार से ना खरीद कर खुद से ही तैयार कराया जाता है । गोपाल कुशवाहा आगे कहते हैं कि इससे जायके का स्वाद और सुगंध हमेशा एक जैसा रहता है ।हम मटन बनाने की प्रक्रिया में स्वच्छता और शुद्धता दोनों का पूरा ख्याल रखते हैं। वें आगे कहते हैं कि चावल पकाने के लिए भी हम गुणवत्ता पूर्वक बर्तन का प्रयोग ही करते हैं।

मिट्टी की हांडी हीं क्यों?

मिट्टी की हांडी में अहुना मटन क्यों पकाया जाता है ? इसके बारे में गोपाल कुशवाहा बताते हैं कि मिट्टी में 12 प्रकार के मिनरल्स पाए जाते हैं । यह मिनरल्स मटन में मिलकर इसे स्वादिष्ट और पौष्टिक बनाते हैं । माटी की महक की भीनी भीनी खुशबू भी इस मटन में आप महसूस करते हैं । वें यह बताते हैं कि हांडी में छोटे-छोटे छिद्र भी होते हैं इससे होकर से पकने के दौरान बनने वाली हानिकारक गैस बाहर आ जाती है।

ऐसे हुई शुरुआत

गोपाल पहले फुटवियर का कारोबार करते थे। शुरुआती दौर में फुटवियर कारोबार तो काफी बढ़िया चला पर कुछ दिनों के बाद यह कारोबार बंद हो गया। उसके बाद गोपाल अनिल डेकोरेटर में भाइयों के साथ काम करने लगे। वहां कैटरिंग का काम भी होता। एक बार कैटरिंग के आर्डर में हांडी मटन बनाने की चुनौती आई। कैटरिंग के कारोबार के दौरान एक पार्टी में काम देने की यह शर्त रखी गई कि वहां वह हांडी मटन बनाएंगे तभी काम मिलेगा। तब गोपाल कुशवाहा को हांडी मटन बनाने के बारे में कोई विशेष जानकारी नहीं थी। इसके बाद उन्होंने चुनौती को स्वीकार किया और इसके लिए इसके बारे में जानकारी जुटाई और जब हांडी मटन बनाया तो मेजबान को काफी पसंद आया। इसके स्वाद की काफी तारीफ मिली ।बस यही से हांडी मटन को और बेहतर बनाने का प्रयोग शुरू हुआ। फिर चंपारण के घोड़ासहन में जाकर हांडी मटन बनाने की विधि पर और गहरी जानकारी प्राप्त की। गोपाल कहते हैं कि इसके बाद मैंने शुरू किया ‘ओल्ड चंपारण मीट हाउस’ इसमें मुझे अपने भाइयों का भी खुब साथ मिला।

हर घर तक शुद्ध मसाला पहुंचाने की पहल

गोपाल कुशवाहा हर घर तक शुद्ध मसाला पहुंचाने की खास पहल भी कर रहे इसके लिए उन्होंने अपने ब्रांड बीएमएस मैजिक मसाले की शुरुआत की है। इस मसाले को विशेष तौर पर तैयार किया गया है।गोपाल बताते हैं कि इन मसालों में देसी फार्मूले का प्रयोग किया गया है। इसके प्रयोग से जहां मटन का स्वाद का कई गुना बढ़ जाता है वही हाथों में तेल की चिपचिपाहट भी नहीं लगती है। यह सेहत के लिए नुकसानदायक भी नहीं है ।फिलहाल वह फ्लिपकार्ट और अमेजन, इंडिया मार्ट जैसे ई-कॉमर्स प्लेटफार्म पर अपने मसाले लोगों को उपलब्ध करवा रहे हैं ।मशहूर क्रिकेटर इरफान पठान भी इनके मसाले का प्रयोग कर चुके हैं।

स्नातक तक पढ़ाई

गोपाल कुशवाहा ने बीए आनर्स तक के पढ़ाई की है इतिहास विषय में उन्होंने मगध विश्वविद्यालय से स्नातक किया है ।वहीं उनके स्कूल की पढ़ाई द्वारिका स्कूल मंदिरी से हुई है।

दोस्त बुलाते हैं रैंचो

गोपाल कुशवाहा जायकों के शहंशाह तो है ही वें नई- नई मशीन बनाने का प्रयोग करते रहते हैं। उन्होंने हांडी मटन और मटन स्टू बनाने की मशीन भी खुद ही तैयार की है ।वह गृहणियों के लिए एक वैसी मशीन तैयार करने में लगे हैं जिसमें सब्जी बनाते वक्त उसे चलाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। गोपाल कुशवाहा के अभिनय प्रयोगों के कारण उन्हें उनके दोस्त रैंचो कह कर बुलाते हैं। गोपाल कुशवाहा अपने इनोवेशन को आम लोगों तक पहुंचाने के लिए सरकार की सहायता चाहते हैं। वे कहते हैं कि अगर सरकार सहायता दे तो कई तरह की और भी मशीनें बना सकते हैं जिससे लोगों का जीवन स्तर काफी आसान हो जाएगा।

इसलिए रखा यह नाम

चंपारण के नाम पर अपने रेस्तरां का नाम इसलिए उन्होंने रखा क्योंकि इसकी मूल विधि में घोड़ासहन से ली गई है जो चंपारण जिले में पड़ता है। वे कहते हैं कि ऐसे में मुझे लगा कि चंपारण के नाम पर ही मुझे अपने संस्थान का नाम रखना चाहिए।

देशभर में हो रहा है विस्तार

गोपाल कुशवाहा द्वारा संचालित ओल्ड चंपारण मीट हाउस के बिहार की राजधानी पटना में सबसे पुरानी शाखा के साथ ही देश के कई शहरों में इसका विस्तार हुआ है दिल्ली ,चंडीगढ़ बनारस ,समस्तीपुर में इनकी फ्रेंचाइजी शाखाएं मौजूद है। गोपाल इसे केएफसी के तर्ज पर विस्तार देना चाहते हैं जिससे बिहार का नाम दुनिया भर में फैले और ज्यादा से ज्यादा हाथों को रोजगार मिल सके ।

राष्ट्रपति भवन के अधिकारी तक मुरीद

गोपाल कुशवाहा के हांडी मटन के जाकर का स्वाद लेने लोग दूर-दूर से आते हैं । गोपाल बताते हैं कि भारत के राष्ट्रपति भवन के अधिकारियों को भी यह खूब पसंद है राष्ट्रपति भवन के चीफ मेडिकल ऑफिसर की बेटी की शादी में हमारे यहां से अहुना हांडी मटन का आर्डर किया गया था।

सपना अमेरिका में रेस्तरां खोलने का

गोपाल कुशवाहा का सपना अहुना हांडी मटन के अपने रेस्तरां की शाखा अमेरिका में खोलने का है। वह इसके लिए रोड मैप बनाने में जुटे हैं । गोपाल कहते हैं कि ईश्वर चाहेंगे तो जल्द ही उनका यह सपना पूरा हो जाएगा।

नामी कुकरी शो में शिरकत

गोपाल कुशवाहा देश के कई बड़े कुकरी शो में अपने हुनर का जादू दिखा चुके हैं। इसके लिए इन्हें अब तक दर्जनों पुरस्कार और सम्मान मिल चुके हैं साथ ही दुनिया के मशहूर शैफ ने इनके व्यंजनों को सराहा है ।कई फिल्मी हस्तियों ने गोपाल कुशवाहा को सम्मानित करते हुए उनके अहुना हांडी मटन की तारीफ की है। गोपाल कुशवाहा के जायके की धूम इंडियन रेस्टोरेंट कांग्रेस 2022 में भी रही।

यूट्यूब पर है लाखों प्रशंसक

गोपाल कुशवाहा अपने खास व्यंजन अहुना हांडी मटन को बनाने की विधि भी लोगों को बताते हैं। यूट्यूब पर इनके वीडियो को लोगों का खूब प्यार मिला है। विलेज फूड फैक्ट्री, दिल्ली फूड, एचएचएम फूड, बिहार न्यूज़ जैसे पाककला के लोकप्रिय चैनलों पर गोपाल कुशवाहा अपने खास ज़ायके को बनाने का तरीका बता चुके हैं । दूरदर्शन पर प्रसारित कई एपिसोड के कुकरी शो के माध्यम से भी वह इस जायके की खुशबू को दुनिया भर में बिखेर चुके हैं ।गोपाल कहते हैं कि ज्ञान-विज्ञान और पकवान को खूब बांटना चाहिए। उनकी कोशिशों से घर घर में लोग अहुना हांडी मटन बनाने की विधि सीख रहे हैं।

रेस्टोरेंट्स बिजनेस अब बना प्रोडक्ट बिजनेस

गोपाल कुशवाहा ने 11 वें इंडियन रेस्टोरेंट कांग्रेस में भी शिरकत कर चुके हैं। इस कांग्रेस में देश भर के नामी रेस्टोरेंट्स बिजनेसमैन और सैफ मौजूद थे। गोपाल कुशवाहा कहते हैं कि वहां भी उन्होंने अपने प्रोडक्ट को बेहतर बनाने की बात कही। उन्होंने कहा कि रेस्टोरेंट्स बिजनेस अब एक प्रोडक्ट बिजनेस बन चुका है। कोरोना काल के बाद प्रोडक्ट की क्वालिटी और उसकी प्राइस पर ध्यान देना सबसे अहम है। इंटरनेट की दुनिया अब जायकों को दूर-दूर तक पहुंचाने में काफी मदद कर रही है।

परिवार के सभी सदस्यों का मिलता है साथ

गोपाल आगे बताते हैं कि जीवन के इस सफर तक पहुंचने में कई कठिन राहों से गुजरना पड़ा है । मुश्किल वक्त में परिवार के सदस्यों ने उनके मनोबल को बढ़ाएं रखा‌। पत्नी बिंदु कुशवाहा ने बुरे दिनों में खूब हौसला दिया। वह अब मसालों का कारोबार देखती है । बच्चे तेजस और अभिनव खेल खेल में ऑनलाइन कारोबार के कई बारीकियां सिखा जाते हैं। गोपाल भाइयों में सबसे छोटे हैं वे कहते हैं कि भाइयों का प्यार उन्हें खूब मिलता रहा है।

फिलहाल गोपाल अपने अहुना हांडी मटन की भीनी खुशबू दुनिया भर में फैलाने में जुटे हैं । इसके साथ ही वह रसोई के काम में आने वाली नई -नई मशीनों का ईजाद भी कर रहे हैं। गोपाल कुशवाहा की कहानी यह सिखा रही है कि शिद्दत से की गई कोशिशें नाकाम नहीं होती। गोपाल ने जहां खुद को गरीबी से उबारा वही इनके द्वारा ईजाद किया गया अहुना हांडी मटन से रोजगार के नए द्वार भी खुल रहे हैं और मिल रहा है सैकड़ों लोगों को काम ।
अहुना हांडी मटन पर और ज्यादा जानकारी के लिए आप गोपाल कुशवाहा से फोन नंबर 99334555506 पर संपर्क कर सकते हैं।

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इनसे सीखिए जिंदगी का हुनर, फोर्थ स्टेज कैंसर से लड़ बांट रहे जिंदादिली…

होंठों पर मुस्कान.. आंखों में सतरंगी सपनों की बसावट और दिल में लव यूं जिंदगी की जिद लिए धड़कती जिंदादिली.. बात बस यही तक नहीं है इनके चेहरे पर फैला बालपन सा उत्साह यह देखकर आप समझ नहीं पाएंगे कि आखिर मौत का दूसरा नाम कहीं जाने वाले खतरनाक कैंसर के फोर्थ स्टेज से दो -दो हाथ कर ये जिंदगी का उत्सव सजा रहे हैं। कैंसर से लड़ रहे लोगों में हौसला बांटते वरिष्ठ पत्रकार रवि प्रकाश की यह कहानी आपको जरूर पढनी- और गुननी चाहिए .

मैं 46 साल का हूँ लेकिन अगले 46 दिनों की योजनाएँ नहीं बना सकता। क्योंकि, मुझे अंतिम स्टेज का लंग कैंसर है। मैं स्मोकर भी नहीं था। ज़ाहिर है कि मैंने अपने कैंसर के लिए वजहें नहीं बनायी। फिर भी मुझे फेफड़ों का कैंसर हुआ। कहते हैं रवि प्रकाश। रवि जाने माने पत्रकार हैं और फिलहाल बीबीसी से जुड़े हैं। रांची में रहते हैं। लास्ट स्टेज के कैंसर से लड़ते – जुझते हुए भी रवि मायूस नहीं । वे पूरी शिद्दत से खुद की जिंदगी जी रहे हैं और दूसरे कैंसर मरीजों में भी जिंदादिली से जीवन जीने का उत्साह भर रहे हैं। रवि कहते हैं कि कैंसर क्योरेबल है। ठीक हो जाता है। एडवांस स्टेज में अगर ठीक नहीं भी हो, तो प्रबंधन करते हुए इसके साथ रहा जा सकता है। मैं लंग कैंसर के अंतिम स्टेज का मरीज़ हूँ। लाइव हूँ, अलाइव हूँ, एक्टिव हूँ। ज़िंदगी और कैसे चलती है दोस्त? जागरूक रहिए। जागरूक कीजिए।’

हौसलों से यारी

और फिर कैंसर से दोस्ती हो गई

रविप्रकाश बताते हैं कि कैंसर के साथ पिछले पौने 2 साल की ज़िंदगी में कई चीजें बदलीं। कैंसर की आमद एक बड़ी ख़ुशी के चंद महीने बाद हुई थी। या यूँ समझें कि वो तब भी मेरे शरीर में आ गया होगा, जिसका हमें पता नहीं चला। हालाँकि, इसके आने के बाद हमने हिम्मत हारने की जगह नयी संभावनाओं की तलाश शुरू की। बाक़ी ज़िम्मेदारी अपने डॉक्टर्स और ईश्वर पर छोड़ दी। अब ऊपर वाले भगवान के आशीर्वाद के साथ धरती के भगवान मेरे डॉक्टर्स की मेहनत, ज्ञान और स्नेह की बदौलत हमारी ज़िंदगी ठीक चल रही है।

कैंसर मरीजों का उत्साह बढ़ाते रविप्रकाश

कैंसर मरीजों में भर रहे उत्साह

रविप्रकाश कैंसर के मरीजों के बीच जिंदगी का उत्साह भर रहे हैं। अंतिम स्टेज कैंसर से पीड़ित होने के बाद उन्होंने मायूस होने की जगह कैंसर पीड़ित मरीजों के मन में बैठे भय को निकालने का संकल्प लिया। वे कैंसर पीड़ित मरीजों को हौसला देने के लिए अब तक दर्जनों सेमिनार का हिस्सा बन चुके हैं। इसके साथ ही अपने मोटिवेशनल आलेख और वीडियो के जरिए ये कैंसर पीड़ित मरीजों को जीवन का हौसला दे रहे हैं।

इनसे मिली प्रेरणा

ज़िद जिंदगी की…

रवि बताते हैं कि मैंने कई ऐसे लोगों की कहानियाँ पढ़ी है, जिन्होंने कैंसर के अंतिम स्टेज में भी शानदार तरीक़े से अपनी ज़िंदगी जी। ऐसे कुछ लोग कैंसर से पूरी तरह मुक्त भी हुए और आज बिल्कुल सामान्य हैं। मनीषा कोईराला, युवराज सिंह, लांस आर्मस्ट्रांग, लीजा रे आदि इसके उदाहरण हैं। मैंने इन चारों की किताबें पढ़ी है। वे आगे कहते हैं कैंसर हो जाना क़तई ठीक बात नहीं। फिर भी अगर कैंसर हो जाए, तो क्या करें। क्या रोना, पछताना, खुद को कोसना…इसका उपाय है। जवाब है- नहीं। कैंसर हो जाने के बाद उसका प्रबंधन ही एकमात्र उपाय है, जिससे हम अपनी और अपने परिवार के सदस्यों की ज़िंदगी ठीक रख सकते हैं।

धुन जिंदगी की…

हर हाल में खुबसूरत है जिंदगी

रवि विभिन्न मंचों से खुद के बारे में लोगों को बताते हुए यह कहते हैं कि मैं लंग कैंसर के अंतिम स्टेज का मरीज़ हूँ और कैंसर के साथ रहना ही अब मेरी पहचान है। तो, अब जब कैंसर के साथ ही रहना है, तो मेरे पास क्या विकल्प हैं। या तो मैं रोकर अपनी और अपने शुभेच्छुओं-परिजनों की ज़िंदगी ख़राब करूँ, या फिर कैंसर का इलाज कराते हुए अपनी बाक़ी बची ज़िंदगी को और खूबसूरत बनाऊँ। इतनी ख़ूबसूरत, कि कल इसकी कहानियाँ सुनायी जा सकें। मैंने अपने लिए दूसरा विकल्प चुना है। क्योंकि, रोना इसका समाधान नहीं है। ईश्वर न करें कि कोई कैंसर से पीड़ित हो लेकिन अगर कैंसर हो जाए, तो इससे घबराकर ज़िंदगी से भागने की ज़रूरत नहीं। महीनों से कैंसर के साथ रहते हुए मैंने यही सीखा है।

चौथा स्टेज को इसलिए कहते हैं एडवांस

रविप्रकाश बताते हैं कि ्जनवरी 2021 में जब मुझे कैंसर का पता चला, तो कुछ ही दिनों पहले मैंने अपना 45 वाँ जन्मदिन मनाया था. हल्की खाँसी और बुख़ार था।डॉक्टर के पास गए तो शुरुआती कुछ जाँचों के बाद पता चला कि मुझे फेफड़ों का कैंसर (लंग कैंसर) है. सीटी स्कैन की काली फ़िल्मों पर सिल्वर की चमक लिए आकृतियाँ थीं।
चौथा स्टेज अंतिम या एडवांस इसलिए कहा जाता है कि क्योंकि तब डॉक्टर मरीज़ का पैलियेटिव केयर ट्रीटमेंट करते हैं।
मतलब, ऐसा इलाज जिसमें बीमारी ठीक नहीं होगी लेकिन मरीज़ को उस कारण होने वाले कष्ट कम से कम हों और उसकी ज़िंदगी ज़्यादा से ज़्यादा दिनों, महीनों या साल तक बढ़ायी जा सके।

परिवार का मिला समर्थन

तेरा साथ रहे: पत्नी के साथ रविप्रकाश

कैंसर के बीच इस जिंदादिली का श्रेय रवि प्रकाश अपने परिवार को देते हैं। वे कहते हैं कि अपनी पत्नी संगीता, बेटे प्रतीक और तमाम दोस्तों का भी शुक्रगुज़ार हूँ. वे या तो मेरे इस रास्ते के हमसफ़र हैं या फिर मैं इस रास्ते पर चलता रहूँ, इसका सपोर्ट सिस्टम बने हुए हैं.।


थैरेपी के बीच गोवा की मस्ती

रवि बताते हैं कि मुंबई में इलाज के दौरान सीटी स्कैन और मेरी ओपीडी के बीच चार रातों और पाँच तारीख़ों का इंटरवल था. मैंने ये तारीख़ें कैंसर की चिंताओं से दूर गोवा में बिताने की सोची। हमने अपनी चार रातें गोवा में मस्ती करते हुए गुज़ारीं. सिर्फ़ इतना याद रखा कि दवाइयाँ समय पर खानी है। इसके अलावा मेरा कैंसर कहीं नहीं था।हमने खंडहरों में समय बिताया ।चर्च और मंदिरों भी गए।इतना ही नहीं
गोवा के तमाम बीचों की सैर की। समंदर में नहाया और डिस्को भी गए। वे कहते हैं कि मेरे बदन पर उभरे घाव में दर्द था पर मैं लेकिन मैं इस दर्द को अपने ऊपर हावी नहीं होने देना चाहता था।

कामकाजी लम्हा: रिपोर्टिंग के दौरान रविप्रकाश

दवाओं की कीमत कम करें सरकार

हौसला जीत का

रविप्रकाश कहते हैं कि कैंसर का इलाज इतना महँगा है कि बेहतर विकल्प होने के बावजूद मुझ जैसे मरीज़ सेकेंड या थर्ड ऑप्शन चुनने पर विवश हैं। सरकार को इसपर सोचना चाहिए। पारासिटामोल और मार्फिन की क़ीमत कम कर आप दवाइयों की क़ीमतों पर नियंत्रण के झूठे दावे कैसे कर सकते हैं। टारगेटेड थेरेपी और इम्यूनोथेरेपी की दवाओं की क़ीमत नियंत्रित कीजिए। तब शायद बात बने। जब किसी मरीज़ को यह कहा जाता है कि उसके कैंसर की दवा तो है लेकिन उसकी मासिक क़ीमत 5 लाख रुपये है। क्या भारत जैसी अर्थव्यवस्था में हम हर महीने 5 लाख की दवा अफोर्ड कर सकते हैं?

रविप्रकाश रविप्रकाश कैंसर के साथ मुस्कुरा कर जीते हुए दुसरे लोगों के बीच भी इसे लेकर नया नजरिया दे रहे हैं ताकि कैंसर पीड़ित होने के बाद की जिंदगी गमजदा होकर नहीं ठहाके लगाते हुए मस्ती के साथ गुजारी जाए।

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हौसलों के “जुगनू “थाम बदनाम गलियों से मानव अधिकार आयोग के सलाहकार तक का सफर,

ये कहानी नसीमा की है। उन नसीमा की जो बदनाम तंग गलियों में पली बढ़ी और अपने हौसलों के दम पर न सिर्फ खुद की किस्मत बदली बल्कि सेक्स वर्करों की बेटियों के जीवन सुधारने की मुहिम भी चलाई। मुजफ्फरपुर के रेडलाइट इलाके चतुर्भुज स्थान से राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की सलाहकार तक का सफर तय करने वाली नसीमा की हिम्मत भरी कहानी आपको जरूर पढ़नी और समझनी चाहिए….

मेरी कहानी उन बदनाम उन बदनाम गलियों से शुरू होती है जिसका नाम जुबा पे लाना भी सभी सभ्य समाज में गुनाह है। मैं मुजफ्फरपुर के रेड लाइट इलाके चतुर्भुज स्थान में पली-बढ़ी। हमने बचपन से ही काफी कुछ झेला, देखा , सुना समझा। अपनी बड़ बड़ी आंखों में बीते वक्त की खामोशी भरते हुए नसीमा आगे कहती है। हम पांच भाई बहन हैं मेरे अब्बा ने किसी तरह हम बहनों को पढ़ने के लिए प्राइवेट स्कूल में दाखिला कराया , पर यह सख्त सख्त हिदायत भी दी कि कभी भी किसी से अपने घर का पता नहीं बताएंगे।
जब मुझसे मेरे सहपाठी घर का पता पूछते तो मुझे बड़ा अजीब सा लगता । मैं सोचती कि यह क्या है और ऐसा क्यों है ? मुझे समझ तो नहीं थी लेकिन ऐसा लगता था कि मैं हर दिन अपने साथ बस्ते में एक झूठ लेकर जाती हूं और एकझूठ लेकर लौटती हूं। मैं और मेरी दोस्त स्कूल से लौटते वक्त इसलिए रास्ता बदलती रहती थी कि कहीं सच बाहर ना जाए।

  यह कहती थी दादी

नसीमा हमसे आगे कहती है कि मेरी मां सेक्स वर्कर नहीं थी ।उन्हें पालने वाली इस पेशे में थी। मेरी परवरिश मेरी दादी ने की जो एक सेक्स वर्कर रही थी इसलिए मैं अपने आपको डॉटर ऑफ सेक्स वर्कर कहती हूं।

नसीमा बताती हैं कि क्योंकि इस पेशे में औरत अपनी बेटी को आगे बढ़ाती है ताकि उसका बुढ़ापा आराम से कट जाए । मेरी दादी भी चाहती तो हम बहनों को इसमें शामिल कर अपना बुढ़ापा आराम से बिता सकती थी लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। मेरी दादी हमेशा कहती थी मैंने अपने जीवन में जो किया वह इनके साथ नहीं होने दूंगी। मुझे अपनी दादी पर गर्व है। मैं अपनी दादी की वजह से इतने गर्व से खुद को डॉटर ऑफ सेक्स वर्कर कहना शुरू किया ।

समाज के तानों से पढ़ाई छूटी

नसीमा बताती हैं कि समाज के तानों के कारण कई बार पढ़ाई छूटी अभी फाइनल किया है रेड लाइट एरिया में घरों में छोटी-छोटी बेटियां रहती है शर्मिंदगी और समाज के ताने के कारण उनकी पढ़ाई छूट जाती है जो कोई स्कूल जाती भी है तो उनमें से ज्यादातर को मजबूरी के चलते अपनी पहचान छुपा करती है।

परचम ने दी उम्मीद

नसीमा कहती हैं कि मुझे बचपन से ही लगता है कि मैं इस मोहल्ले के लोगों की स्थिति कैसे बदलूं आगे चलकर मैं सेक्स वर्करों और उनकी की बेटियों के जीवन में सवेरा भरने की कोशिश में जुट गयी। हमने कुछ लड़कियों के साथ एक छोटा सा संगठन बनाया और उसे नाम दिया “परचम”। परचम में सबसे पहले तो हम यहां की बेटियों को मोटिवेट करते उन्हें पढ़ाई से जोड़ते और जो सेक्स वर्कर हैं इन्हें छोटे छोटे रोजगार से जोड़कर आमदनी का विकल्प देते।
शुरूआती दौर में तो काफी समस्या आई । हमारा काफी विरोध हुआ। यहां के लोगों ने ही हमारा विरोध किया पर हमने अपना काम जारी रखा। धीरे- धीरे माहौल बदलने लगा। इग्नू जैसी संस्थाओं ने चतुर्भुज स्थान में अपनी शाखाएं खोली यहां की लड़कियों की पढ़ाई के लिए। हमारी संस्था की अब चर्चा होने लगी।

जुगनू से आयी रौशनी

उस दौर में एंड्राइड मोबाइल फोन हाथों तक नहीं पहुंचे थे, सोशल मीडिया का दौर नहीं था। ऐसे में मुझे लगा कि एक ऐसा माध्यम हो जहां हम अपने मन की बात रख पाए। यहां के बच्चे अपनी कलाओं को उस पटल पर रख सकें । मैं आपको ये जरूर बता दूं कि यहां के बच्चों में प्रतिभा की कोई कभी नहीं है। तो हमने साल 2004 में एक हस्तलिखित पत्रिका शुरू की नाम रखा जुगनू । इस पत्रिका में हमारे समाज के बच्चे अपनी बात रखते। उनकी कहानियां इसमें छपती। उनकी रचनाओं को स्थान मिलता। जुगनू एक वैसा मंच बना जहां आपसी संवाद करने और मन की बात रखने की पूरी आजादी मिलती। जुगनू का प्रकाशन आज भी जारी है। अब जुगनू राष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित हो रहा है और इसमें चार राज्यों के बच्चे लिख रहे हैं।

जुगनू रेडीमेड गारमेंट भी

नसीमा खातून के प्रयास से चतुर्भुज स्थान की महिलाएं अब रेडीमेड गारमेंट भी बना रही हैं। इसकी बाजार में अच्छी मांग है इसके लेबल को जुगनू रेडीमेड गारमेंट का नाम दिया गया है।

राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ने बनाया सलाहकार

नसीमा को राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ने राष्ट्रीय सलाहकार कोर ग्रुप का सदस्य बनाया है। इस कोर ग्रुप में देश भर से 13 लोग शामिल होते हैं।

नसीमा कहती है कि आज भी अगर कोई अपराध होता है तो इन बदनाम गलियों में ही सबसे पहले पुलिस आती है। उन्हें लगता है कि अपराधी यही छुपा होगा। हमने यह सब देखा सुना है। मेरे लिए यह गर्व की बात है कि आज मुझे राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग में सलाहकार बनाया गया है।

मिल चुके हैं कई एवार्ड

नसीमा खातून को सेक्स वर्करों के बीच बेहतर कार्य करने के लिए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों से कई सम्मान मिल चुके हैं। इसमें प्रतिष्ठित मीडिया कंपनी cnn-ibn द्वारा “रियल हीरोज सम्मान” भी शामिल है। दुनिया भर की प्रतिष्ठित न्यूज़ एजेंसियों ने नसीमा खातून के ऊपर डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया है।, नसीमा नहीं यूएनडीपी के सहयोग से देश भर के रेड लाइट इलाका पर केंद्रित “सफर” नामक पुस्तक का संपादन भी किया है।

बात प्रोफेशन चेंज कि नहीं जनरेशन चेंज की

नसीमा कहती हैं कि हम प्रोफेशन चेंज कि नहीं जेनरेशन चेंज की बात करते हैं। मैं तीन मुख्य बिंदुओं पर यहां ध्यान दे रही हूं एक तो यह की योजनाएं सीधे तौर पर इस इलाके के लोगों तक पहुंच पाए। दूसरा जुगनू के जरिए बच्चों को बेहतर तालीम के लिए सरकार से मदद मिल सके और तीसरा की इस इलाके में एक वैसा कम्युनिटी सेंटर बनें जहां स्वास्थ्य परीक्षण की व्यवस्था से लेकर सरकार की योजनाओं की जानकारी तक एक जगह पर उपलब्ध हो।
फिलवक्त समाज के अंधेरे को अपने हौसलों का परचम लहरा जुगनू बन नसीमा उसमें उजास भरने की भरपूर कोशिश में जुटी है। नसीमा को भरोसा है कि कोशिशें कामयाब जरूर होती हैं ।

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भारत की इस बेटी के प्रयास से ‘कतर’ में मुस्कुरा रही है प्रकृति, पढ़ें पूरी कहानी

यह कहानी भारत में जन्मे और पली-बढ़ी श्रेया सूरज की है। श्रेया वैसे तो गणित की शिक्षिका है पर इनके अंदर एक कलाकार का दिल धड़कता है। वैसा कलाकार जो प्रकृति की खूबसूरती को बचाने और संवारने में जुटा है। श्रेया समुद्र तटों की सफाई करती हैं। समुद्र के कचरे को इकट्ठा करती है और फिर अपने कलाकारी के हुनर से उसे रीसाइक्लिंग कर दोबारा प्रयोग के काबिल बना देती हैं। श्रेया ने अब तक कतर के 150 से अधिक समुद्र तटों के सफाई अभियान में हिस्सा लिया है। आईए इस प्रकृति प्रेमी कलाकार की कहानी जानते हैं

मेरा जन्म चेन्नई में हुआ कोलकाता में पली-बढ़ी और आज कतर में गणित की शिक्षिका हूं। मेरे मन में बचपन से ही प्रकृति के प्रति अगाध श्रद्धा रही है। यह प्रकृति की तो है जो हमें जीवन देती है, और हमें चलना और बढ़ना सिखाती है। कतर समुद्र के किनारे बसा है समंदर के कारण बसे होने यहां की ख़ूबसूरती भी निखर उठती है, इसका दूसरा पक्ष बेहद ही स्याह है। आपको समुद्र तटों पर कचरे के ढेर दिखेंगे। लोग यहां समंदर के किनारे वक्त बिताने आते हैं और प्लास्टिक, चिप्स की पैकटे, और ढेर सारा कचरा छोड़ कर चले जाते हैं। यह सब समंदर के लिए ही हानिकारक नहीं उस में रह रहे जलीय जीवो के लिए भी काफी खतरनाक है। मैंने सोचा कि क्यों ना प्रकृति को संवारने की पहल की जाए। लोगों को जागरूक किया जाए। इसके लिए मेरे कलाकार मन ने सबसे पहले मेरा साथ दिया।

मन के कलाकार को जिंदा रखने की जरूरत

मुझे लगता है कि प्रकृति की खूबसूरती बचाने के लिए मन की खूबसूरती को बचाना भी जरूरी है आपको अपने मन के कलाकार को जिंदा रखने की जरूरत है। इसको लेकर फेसबुक पर एनी बडी कैन ड्रा नामक कला समूह का गठन किया। मेरा मानना है कि हर इंसान के अंदर एक कलाकार छुपा बैठा होता है जरूरत उसे जगाने की है।

कार्यशालाओं का करतीं हैं आयोजन

श्रेया आगे कहती हैं कि मैं बच्चों और वयस्कों के लिए कला कार्यशाला का आयोजन करती हूं ।जिसमें बेकार फेंक दी गई प्लास्टिक सीसा, कागज की वस्तुओं को रिसाइकल कर उन्हें खूबसूरत बना पुनः उपयोग में लाने के लिए तैयार किया जाता है। इससे जहां बेकार की वस्तुएं उपयोगी बन रही है वही लोगों के बीच पर्यावरण संरक्षण को लेकर जागरूकता भी आती है।

समुद्री तटों की सफाई और वृक्षारोपण का कार्य भी

श्रेया आगे बताती है कि इन सबके साथ ही वो समुद्री तटों की सफाई और वहां वृक्षारोपण का कार्य भी कर रही हैं। वह कतर के कई पर्यावरण संरक्षण संगठन की सदस्य भी हैं।

150 से अधिक समुद्र तटों की कर चुकी है सफाई

the post.com से बात करते हुए श्रेया बताती है कि वह कई समूहों के साथ मिलकर पिछले 4 साल में150 से अधिक समुद्र तटों की सफाई और वहां वृक्षारोपण का कार्य कर चुकी है। ऐसा करने से पर्यावरण तो सुंदर होता ही है साथ ही मानसिक शांति भी मिलती है। वह कहती है कि प्रकृति है तो ही जीवन है ।हमें जीवन को बचाने के लिए पहले प्रकृति को बचाना और संवारना होगा।

कोरोना काल में अकेले निकल पड़ी सफाई अभियान पर

श्रेया का कहना है कि कोरोना के 6 महीनों में, कोरोना प्रतिबंधों के कारण समुद्र तट पर अकेले जा सफाई का कार्य मैनै किया। सभी समुद्र तटों में कूड़े की मात्रा को देखना बहुत निराशाजनक होता है.

बच्चों से मिलता है हौसला

श्रेया बताती है कि मेरे बच्चे हमेशा मेरी सफाई अभियान के दौरान मुझे हौसला देते हैं। वें कई बार मेरे साथ भी आते हैं। हम अपने घर में पानी, बिजली, भोजन और संसाधनों की बर्बादी को कम करने का प्रयास करते हैं।


नई पीढ़ी के लिए बनाए खूबसूरत पृथ्वी

वह यह भी कहती हैं कि केवल एक पृथ्वी है जहां इंसानों का वास है। हम सभी को आने वाली पीढ़ियों के लिए एक बेहतर दुनिया बनाने की पहल करनी चाहिए। प्लास्टिक जैसे पदार्थ के पुन: उपयोग और पुनर्चक्रण के लिए में अपनी भूमिका निभानी चाहिए।

बिना किसी अपेक्षा के दूसरों का भला करो

श्रेया कहती है कि जीवन में मेरा सिद्धांत है – बिना शर्त और बिना किसी अपेक्षा के दूसरों का भला करो। अगर आपका काम अच्छा है तो प्रकृति आपको इनाम जरूर देगी

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अंधेरे वक्त में उम्मीदों के अरूण बन जीवन का उजियारा बांट रहे इस डॉक्टर की कहानी जरूर पढ़ें…

यह कहानी एक वैसे डॉक्टर के हौसलों की बानगी है जिन्होंने अपने मजबूत इरादों से उत्तर बिहार में सालों से कहर बरपा रहे चमकी बुखार की न सिर्फ वजह ढूंढी, बल्कि उसे हारने पर मजबूर कर दिया। इनकी कोशिशों से इस इलाके में चमकी का खौफ लगभग थम गया है और बच्चों के चेहरों पर खिलखिलाहट लौट आई है। इतना ही नहीं यह लगातार बिहार के गांव- गांव जा गुदड़ी के लालों को स्वस्थ्य रहने का हुनर भी बांट रहे हैं। अंधेरे वक्त में उम्मीदों के अरुण बन समाज में आलोक भर रहे डॉक्टर अरुण शाह की यह कहानी आपको जरूर पढ़नी चाहिए…

वह बड़ा ही बेरहम वक्त था, सैकड़ों बच्चे काल के गाल में समा रहे थे, हर और रुदन और गम का माहौल रहता। सालों से जैसे ही गर्मी का मौसम आता मुजफ्फरपुर और इसके आसपास के जिलों में एक खौफ का साया मंडराने लगता, यह खौफ था AES यानी चमकी बुखार का। यह बेरहम बुखार कुछ ही मिनटों में बच्चों की जिंदगी छीन लेता, यह वाकया सुनाते -सुनाते प्रसिद्ध पीडियाट्रिक्स डॉक्टर अरुण शाह की आंखें भर आती हैं। वो आगे बताते हैं कि इससे प्रभावित होने वाले ज्यादातर बच्चे हाशिए पर रह रहे समाज से आते ।

देश – दुनिया के अखबार और टेलीविजन चैनल चमकी के तांडव से भरे होते थे। एक पीडियाट्रिक्स होने के नाते मुझे इसने अंदर तक हिला कर रख दिया। पत्रकार मुझसे विशेषज्ञ के तौर पर अपनी राय मांगते थे। । मुझे यह बात हमेशा बेचैन किए रही कि आखिर चमकी बुखार का यह कहर कैसे थमेगा, और क्या मैं इसके लिए कुछ भी नहीं कर सकता।

कई रातें इसी तरह बेचैनी में कटी। मैंने मन ही मन यह प्रण किया कि मुझे चमकी बुखार के इस कहर को खत्म करना है और लौटाना है बच्चों के चेहरों पर एक आजाद मुस्कान। कहते हैं ना कि जब मन में दृढ़ इच्छा शक्ति हो तो कुछ भी असंभव नहीं होता एक कार्यक्रम के सिलसिले में मेरी मुलाकात डॉक्टर टी जैकब जॉन से हुई ।

डॉक्टर जॉन इंडियन काउंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च (ICMR) के एंडवांस्ड रिसर्च इन वायरोलॉजी सेंटर के प्रमुख रह चुके हैं। मैंने उन्हें मुजफ्फरपुर आने के लिए मना लिया, डॉक्टर टी. जैकब जॉन के निर्देशानुसार हमने इस खौफनाक बीमारी के वजह तलाशनी शुरू कर दी। हमने काफी कड़ी मेहनत की , और इस नतीजे पर पहुंचे की इस बीमारी का एक बड़ा कारण कुपोषण है। फिर हमने सबसे ज्यादा प्रभावित गांव मे विशेष अभियान चलाया। इस अभियान में लोगों को जागरूक करने के साथी गरीब बच्चों के परिवार में ग्लूकोज और बिस्किट बांटे गए। घर घर जाकर लोगों को यह संदेश दिया कि वह अपने घर के अंदर और बाहर साफ सफाई रखें, अपने बच्चे को घर का बना भरपेट खाना चार से पांच बार दें। खाली पेट रात में ना सुलाएं, उन्हें ज्यादा से ज्यादा पानी पिलाएं और सड़े गले फल से उन्हें दूर रखे । गर्मी के मौसम में बाग बगीचों में धूप में ना निकलने दें।

हमारे अभियान को गांव वालों का भरपूर समर्थन मिला, लोग हमारी बात मानने लगे और देखते ही देखते इन गांव में चमकी बुखार का कहर घटने लगा। हमने सरकार को भी यह प्रस्ताव दिया और सरकारी ने भी जोर शोर से कैंपेन चलाए । नतीजा यह हुआ कि चमकी बुखार का कहर काफी हद तक काबू में आया। मुझे बताते हुए खुशी हो रही है कि हमने जिन गांव में अभियान चलाएं इस साल में वहां एक भी बच्चा चमकी के कारण बीमार नहीं हुआ है। इस साल पूरे मुजफ्फरपुर जिले में चमकी से प्रभावित होने वाले बच्चों की संख्या भी काफी सीमित रही है।
डॉक्टर अरुण शाह का यह शोध जल्द ही दुनिया के बड़े साइंस जनरल में प्रकाशित होने वाला है।

बिहार के गांव-गांव में लगा चुके हैं स्वास्थ्य शिविर

डॉ अरुण शाह ने चमकी जैसे खतरनाक बीमारी को अपने हौसलों से हराने में कामयाबी तो पारी ही, वे लगातार अन्य बीमारियों को लेकर भी बिहार भर में स्वास्थ्य शिविर और जागरूकता अभियान चलाया करते हैं।

डॉक्टर शाह कहते हैं कि बच्चे ही देश के भविष्य हैं, किसी परिवार के लिए भी बच्चे ही उम्मीद की किरण होते हैं वैसे में बच्चों का सेहतमंद होना सबसे जरूरी होता है।

शहरी इलाके बच्चों के सेहत के प्रति जागरूकता देखी जाती है, ग्रामीण क्षेत्रों में इसका अभाव रहता है। इसे लेकर हमने बिहार भर में निशुल्क शिशु स्वास्थ्य जांच एवं जागरूकता शिविर का आयोजन करते रहते हैं, जिसमें बच्चों का स्वास्थ्य परीक्षण और स्वास्थ्य के प्रति जागरूक किया जाता है। डॉक्टर अरुण शाह बताते हैं कि उनका यह अभियान सालों से चला आ रहा है और अब तक बिहार का कोई भी वैसा गांव नहीं बचा जहां उन्होंने स्वास्थ्य शिविर नहीं लगाया हो।


गांव में बितता है हर रविवार और छुट्टी का दिन

डॉक्टर अरुण शाह का हर रविवार अलग-अलग सुदूरवर्ती गांव में ही बीताता है। वो इन गांवों में निशुल्क शिशु स्वास्थ्य जांच एवं जागरूकता
शिविर का आयोजन करते हैं। डॉक्टर शाह बताते हैं कि दूर-दराज के गांव में जाने के लिए मुझे भोर के तीन बजे ही निकला पड़ता है, और लौटते लौटते देर रात हो जाती है। ऐसे में कई बार सोना भी गाड़ी में ही होता है। वे कहते हैं कि सामाजिक कार्यों से दिल में एक अनोखा सुकून मिलता है।

एंटीबायोटिक के खिलाफ अभियान

डॉक्टर अरुण शाह एंटीबायोटिक के खिलाफ विश्वव्यापी अभियान से भी जुड़े हुए हैं। डॉक्टर शाह बताते हैं कि बेवजह एंटीबायोटिक का इस्तेमाल हमारे स्वास्थ्य के लिए काफी खतरनाक होता है। ऐसा करने से एंटीबायोटिक प्रतिरोध में वृद्धि होती है जो कि वैश्विक स्वास्थ्य के लिए सबसे बड़े खतरे में एक है ।लंबे समय तक एंटीबायोटिक प्रतिरोध संक्रमण से मरीज की मौत के आंकड़े काफी तेजी से बढ़ रहे हैं।

मुफ्त दवा का करते हैं वितरण

डॉक्टर अरुण शाह बीमार बच्चों के बीच मुफ्त दवा का वितरण भी करते हैं। स्वास्थ्य शिविर के साथ ही उनके क्लीनिक पर आए बीमार बच्चों को भी यथासंभव मुफ्त दवाएं उपलब्ध कराई जाती है। डॉक्टर शाह बताते हैं कि उनके द्वारा गठित ‘डॉक्टर अरुण साह फाउंडेशन ‘ दवाइयों की खरीद करता है और उसे मरीजों के बीच वितरित करता हैं।

निशुल्क टीकाकरण अभियान भी

बच्चों के लिए निशुल्क टीकाकरण अभियान भी डॉक्टर अरुण शाह के क्लीनिक में चलाया जाता है। इसका उद्देश्य बच्चों में गंभीर संक्रमण रोग से होने वाली बीमारियों एवं मौतों में कमी लाना है।

डॉक्टर अरुण शाह , द्वारा गठित ‘डॉक्टर अरुण शाह फाउंडेशन’ द्वारा कोरोना महामारी से बचने के लिए भी लोगों को जागरूक किया जा रहा है। कोरोना से बचने का टीका लगवाने के लिए वे लोगों को लगातार प्रेरित करते हैं। कोरोना की लहर में उन्होंने अपने फाउंडेशन के द्वारा गरीबों के लिए निशुल्क मास्क और साबुन का वितरण करवाया। लॉक डाउन की अवधि में भी वे फोन और ऑनलाइन माध्यम से 12 घंटे चिकित्सीय परामर्श देते रहे। ‘डॉक्टर अरुण सा फाउंडेशन’ जाड़े के मौसम में गरीबों के बीच उनकी कपड़ों का वितरण करता रहा है। उत्तर बिहार में आने वाली प्रलयंकारी बाढ़ में भी फाउंडेशन द्वारा राहत कार्य चलाए जाते हैं।

जन्म परिचारक को प्रशिक्षण

प्रसव के दौरान जच्चा और बच्चा दोनों स्वस्थ रहें इसे लेकर डॉक्टर अरुण शाह ने बिहार के अलग-अलग गांव में 7000 से अधिक जन्म परिचारक को प्रशिक्षित किया। इसके लिए अलग-अलग कई टीमों का गठन किया गया था। इससे जच्चा और बच्चा की मृत्यु दर में काफी कमी आई।

मुक्तिधाम में अनोखी पहल

डॉक्टर अरुण शाह के प्रयास से मुजफ्फरपुर के सिकंदरपुर स्थित शवदाह गृह में 40 लाख रुपय की लागत से अत्याधुनिक शवदाह संयंत्र स्थापित है, इस संयंत्र की स्थापना में उन्होंने आर्थिक मदद की । इस संयंत्र के स्थापित हो जाने से जहां शवदाह में वायु प्रदूषण समस्या खत्म हुई है वहीं नौ मन की जगह दो मन लकड़ी में ही परंपरागत हिंदू धर्म अनुसार शवों का अंतिम संस्कार संपन्न हो रहा है। इसके साथ ही डॉ शाह की मदद से शवों को श्मशान घाट तक लाने के लिए मुक्ति रथ वाहन और डीप फ्रीजर की खरीद भी की गई है।

डॉक्टर अरुण शाह कहते हैं कि मृत्यु जीवन का अंतिम सत्य है और हर इंसान की मृत्यु के बाद उसका अंतिम संस्कार सम्मान के साथ होना चाहिए। नये संयंत्र की स्थापना से शव दाह में आने वाले खर्च में काफी कमी आई है साथ ही पर्यावरण का संरक्षण भी हो रहा है।

 

ऐसे बने डॉक्टर

डॉक्टर अरुण सब बताते हैं कि हमारी पारिवारिक पृष्ठभूमि व्यवसाय की रही। पिताजी कपड़े के व्यवसाय से जुड़े थे। मेरी प्रारंभिक शिक्षा मुजफ्फरपुर के मारवाड़ी हाई स्कूल से हुई। मेरे अंदर डॉक्टर बनने की चाहत तो बचपन से थी पर मैंने यह संकल्प किया था कि मैं अपने काबिलियत के दम पर डॉक्टरी की पढ़ाई करूंगा डोनेशन के दम पर नहीं। मैंने दिन-रात पढ़ाई की और फिर मेरा चुनाव दरभंगा मेडिकल कॉलेज में हो गया। डॉ शाह ने देश के प्रतिष्ठित मुंबई हॉस्पिटल से इंटर्नशिप किया।

पहले एनआईसीयू के निर्माण का श्रेय

डॉक्टर अरुण साह को मुजफ्फरपुर के पहले एनआईसीयू के निर्माण का श्रेय भी जाता है। डॉक्टर शाह मुजफ्फरपुर के केजरीवाल अस्पताल में जब चिकित्सक थे तो उन्होंने ही वहां प्रबंधन को एनआईसीयू की जरूरत बताई और इसे स्थापित करने के लिए तैयार किया।

माता पिता के आशीष और ईश्वर की कृपा

सादगी पूर्ण जीवन जीने वाले डॉक्टर शाह अपने जीवन की सफलता का श्रेय अपने माता- पिता और ईश्वर को देते हैं। वे कहते हैं कि पिताजी और माताजी के मार्गदर्शन ने इन्हें हमेशा इंसान बने रहने में मदद की। वे कहते हैं कि बचपन में बताइए मां की छोटी-छोटी बातें जीवन निर्माण में काफी महत्वपूर्ण बन गई। डॉक्टर शाह मानते हैं कि जीवन के हर मोड़ पर ईश्वर की कृपा मिलती रही है।

कभी कभी जब हर रास्ते बंद नजर आते हैं तो अचानक एक उम्मीद की लौ दिख जाती है। ईश्वर की कृपा ही है कि मैं इस उम्र में भी कुछ काम कर पा रहा हूं।

मिल चुका है कई सम्मान

डॉक्टर अरुण शाह को चिकित्सा और समाज सेवा के क्षेत्र में कार्य करने के लिए कई अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय सम्मान प्रदान किया जा चुका है। रॉयल कॉलेज ऑफ फिजीशियन लंदन ने उन्हें स्वास्थ्य के क्षेत्र में बेहतर कार्य के लिए एफआरसीपी की डिग्री प्रदान की। वे इसके फेलो भी है। डॉक्टर शाह इंडियन एसोसिएशन ऑफ पीडियाट्रिक्स के बिहार चैप्टर के प्रमुख भी रह चुके हैं। वह I.I.M.A , N.N.F के भी फेलो है। वह कई अन्य स्वास्थ्य और सामाजिक संगठनों में भी महत्वपूर्ण पदों पर जुड़े हैं।

इंसानियत सबसे बड़ा धन

डॉक्टर अरुण शाह कहते हैं कि उद्देश्य के बिना जीना मृत्यु के बराबर है। हमें हमेशा एक दूसरे की मदद करनी चाहिए और नेक रास्ते पर चलना चाहिए। आर्थिक संपन्नता से बड़ी मन की संपन्नता होती है।

पैसों का वैभव समय के साथ नष्ट हो जाता है पर आपकी कृति आपका व्यवहार हमेशा याद रखा जाता है। हर व्यक्ति को अपनी आत्मा की आवाज सुनने की जरूरत है। आज के एकल होते समाज में अपने अंदर के इंसान को बचाने और संवारने की जरूरत है।

आप ऐसा करके देखिए आपको पैसे इकट्ठा करने या उसके पीछे भागने से ज्यादा खुशी मिलेगी।

फिलवक्त डॉक्टर अरुण शाह, रिटायरमेंट की उम्र में भी बच्चों सी उर्जा से लवरेज हो समय और समाज में नई ऊर्जा भरने में जुटे हैं। इनकी कोशिशों से जहां समाज में उजियारा फैल रहा है वही लाखों लोगों को मिल रही है आशा की किरण।

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स्वस्थ भारत का अलख जगा रहे बिहार के डॉक्टर निखिल

“उनकी आंखों में स्वस्थ भारत का सपना पलता है। उनकी पहल से सुदूर ग्रामीण इलाकों की फिजा में जागरूकता आ रही है। गांव के लोग स्वास्थ्य के प्रति सजग हो रहे । इनके प्रयासों से जिंदगी का गुलशन गुलजार हो रहा है। आशाओं का दामन थाम हाशिए पर रह रहे लोगों की दिन रात मदद के लिए तत्पर रहने वाले डॉक्टर निखिल रंजन चौधरी की उम्मीद और उर्जा से लबरेज यह कहानी जरूर पढ़ें।”

आम तौर पर बिहार जैसे राज्य में लोगों के अंदर यह धारणा रहती है कि जब तक वो गंभीर रुप से बीमार न हो जाएं उन्हें डॉक्टर के पास जाने की जरूरत नहीं है। यह धारणा इतनी खतरनाक है कि ज्यादातर मरीज उस स्टेज में हम डॉक्टरों के पास पहुंचते हैं जब चाहकर भी हम उन्हें ठीक नहीं कर पाते। बीमारी अपने अंतिम चरण तक पहुंच चुकी होती है , जिंदगी और मौत के बीच काफी कम फासला बचा होता है। मैंने बतौर चिकित्सक ऐसे कई केसेज देखें जिसमें अगर मरीज शुरूआत में इलाज के लिए आ जाता तो उसकी जिंदगी बच सकती थी। किसी भी परिवार में एक सदस्य की जिंदगी पर पूरे परिवार की धूरी टीकी होती है, खासकर तब जब वह परिवार का मुखिया हो। ऐसे में मुझे लगा की लोगों की जिंदगी बचाने के लिए उन्हें स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करना सबसे जरूरी है।ऐसा करके हजारों जिंदगी बचायी जा सकती है फिर मैंने लोगों को जागरूक करना शुरू कर दिया। मैं लोगों को समय पर अस्पताल आने, और ईयरली हेल्थ चेकअप के लिए जागरूक करता हूं। उन्हें यह बताता हूं कि थोड़ी भी दिक्कत होने पर चिकित्सक से सलाह जरूर लें और आवश्यक हो तो जांच भी जरूर कराएं। कहते हैं यूरोलॉजिस्ट डॉक्टर निखिल रंजन चौधरी।डॉक्टर निखिल पटना के इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान में चिकित्सक हैं।

छुट्टी वाले दिन लगाते हैं स्वास्थ्य शिविर

डॉक्टर निखिल लोगों को स्वास्थ के प्रति जागरूक करने के लिए अनोखी मुहिम चला रहे हैं। छुट्टी वाले दिनों में वे बिहार के सुदूरवर्ती ग्रामीण इलाकों में जा कर स्वास्थ्य जागरूकता शिविर का आयोजन करते हैं। इन शिविरों में लोगों को जागरूक करने के साथ साथ उनका निःशुल्क स्वास्थ्य परीक्षण भी किया जाता है।
डॉक्टर निखिल अब तक ऐसे दर्जनों स्वास्थ्य शिविर का सफल आयोजन कर चुके हैं। लगभग हर रविवार को वह ऐसे आयोजनों में समय देते हैं। बिहार के समस्तीपुर, सुपौल, मोकामा और झारखंड के चपला में वे नियमित रूप से निशुल्क स्वास्थ्य जांच व जागरूकता शिविरों का आयोजन करते रहे हैं।

खुद भी करते हैं रक्त दान

निशुल्क स्वास्थ्य शिविर के साथ-साथ डॉक्टर निखिल रंजन रक्तदान की मुहिम भी चलाया करते हैं। वे अब तक दर्जनों रक्तदान शिविर का आयोजन सहभागिता कर चुके हैं। सामाजिक संगठनों द्वारा आयोजित रक्तदान शिविर में भी उनकी सहभागिता बढ़-चढ़कर रहती है। डॉक्टर निखिल न सिर्फ रक्तदान शिविर का आयोजन करते हैं बल्कि खुद भी रक्तदान करते हैं। डॉक्टर निखिल कहते हैं कि साल में कम से कम एक बार रक्तदान जरूर करें। रक्तदान बड़ा ही पुण्य का कार्य है । रक्तदान कर आप किसी की जिंदगी बचा सकते हैं।

24 घंटे ऑन रहता है मोबाइल

डॉक्टर निखिल बताते हैं कि फोन के द्वारा भी वे जरूरतमंदों की मदद और उन्हें उचित सलाह दिया करते हैं।वें बताते हैं कि उनका मोबाइल 24 घंटे ऑन रहता है।

मरीजों से दोस्तान व्यवहार

डॉक्टर निखिल बताते हैं कि उनके अस्पताल में ज्यादा मरीज ग्रामीण इलाकों से आते हैं। उनके अंदर बीमारी को लेकर एक भय का माहौल रहता है ।ऐसे में मेरी पहली कोशिश उनसे मित्रवत व्यवहार कर उनके भय को खत्म करने और आत्मविश्वास बढ़ाने की होती है। मैं यह भी मानता हूं कि चिकित्सक के अच्छे व्यवहार से मरीज खुलकर अपनी परेशानी बता पता है और इससे हमें चिकित्सा में काफी मदद मिलती है साथ ही मरीज को मानसिक रूप से सुकून भी मिलता है।

 

यहां बीता बचपन
डॉक्टर निखिल का जन्म रांची में हुआ था। रांची अब झारखंड की राजधानी है। डॉक्टर निखिल बताते हैं कि उनका बचपन रांची और पटना आते -जाते बीता इसकी वजह यह रही कि डॉक्टर निखिल के पिता रांची विश्वविद्यालय में वनस्पतिशास्त्र के प्राध्यापक थे वहीं नानाजी पटना में इंजीनियर। इस कारण ननिहाल पटना ही आना जाना लगा होता।

ऐसा रहा डॉक्टर बनने का सफर

डॉक्टर निखिल की स्कूली शिक्षा रांची के संत जेवियर स्कूल से हुई। ,
उन्होंने कोलकाता से MBBS की पढ़ाई की वहीं रांची स्थित रिम्स से PG किया । सीनियर रेजिडेंसी के लिए फिर उन्होंने हनुमानजी नैनीताल का रूख किया । नैनीताल में वे एक साल तक रहें। 2012 – 2015 तक आईजीआईएमएस से MCH यूरोलॉजी किया। इसके बाद 2015 से 2019 तक वे पटना के महावीर कैंसर संस्थान में यूरोलॉजिस्ट के तौर पर कार्यरत रहे। इसके बाद से वे आईजीआईएमएस में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। डॉक्टर निखिल ने महावीर कैंसर संस्थान में कार्य करने के दौरान राजेंद्रनगर पटना में अपनी प्रेक्टिस भी की थी। यहां उस दौर में मरीजों की भीड़ लगी रहती। यहां भी डॉक्टर निखिल गरीबों का निःशुल्क इलाज किया करते थे।

* घर के माहौल ने दी प्रेरणा

डॉक्टर निखिल बताते हैं बचपन में घर के माहौल ने डॉक्टर बनने में काफी मदद की। घर में हमेशा पढ़ाई का माहौल रहता। वें आगे बताते हैं कि वह दौर मोबाइल फोन का नहीं था, परिवार के हर सदस्य बच्चों की पढ़ाई का काफी ख्याल रखते। सबके पास पर्याप्त समय एक दूसरे के लिए हुआ करता था। पिता जी के प्रोफेसर होने के कारण घर में हमेशा किताबों की मौजूदगी होती। उन दिनों बच्चों के नैतिक मूल्यों पर काफी जोर दिया जाता था। मेरी मौसी भी डॉक्टर है ऐसे में मुझे लगा कि आगे जाकर कोई ऐसा पेशा चुना जाए जिसमें समाज के लोगों के सेवा की पूरी गुंजाइश हो और यह एक डॉक्टर के रूप में काफी हद तक संभव था।

परिवार का हर कदम पर मिला साथ

डॉक्टर निखिल बताते हैं कि जीवन के हर अच्छे बुरे वक्त में परिवार के सभी सदस्यों का खुब साथ मिला। पत्नी नेहा सिंह जो खुद पेशे से डॉक्टर हैं और एम्स पटना में कार्यरत हैं ने हमेशा परिवार की मजबूत धूरी का कार्य किया है।जब कभी निराशा हुई उन्होंने भरपूर हौसला दिया है। जीवन के कई अहम फैसले में पत्नी का साथ तो मिला ही सामाजिक कार्यों में भी वह मेरा हौसला बढ़ाती है। कई स्वास्थ्य शिविर में हम दोनों साथ भी होते हैं। डॉक्टर निखिल आगे बताते हैं कि डॉ नेहा एम्स के ब्लड बैंक में हेड के तौर पर कार्यरत हैं, रक्तदान की मुहिम में उनका हमेशा साथ और सहयोग मिलता रहता है। वो खुद भी मुझे रक्तदान करने के लिए प्रेरित करती रहतीं है।

बच्चे से मिलती है ऊर्जा

डॉक्टर निखिल कहते हैं कि हम डॉक्टर का पेशा काफी चुनौतीपूर्ण होता है और ऐसे में हमें अपने लिए काफी कम समय मिल पाता है ऐसे में मेरे पांच साल का बेटा नव्यांश के तुतली आवाज से सारी थकान दूर हो जाती है। डॉक्टर निखिल आगे कहते हैं कि छोटे बच्चे भी जीवन की कई बारिकियां आपको खेल- खेल में सीखा जाते हैं।

सपना चैरिटेबल अस्पताल खोलने का

डॉक्टर निखिल कहते हैं कि उनका सपना एक ऐसे चैरिटेबल अस्पताल खोलने की है जिससे विश्व स्तरीय स्वास्थ्य सेवाएं एक छत के नीचे मौजूद हो।इस अस्पताल में सेवाओं की दर कम से कम रखी जाए जिससे आम और खास के बीच उत्तम स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर फर्क मिट सके। वें कहते हैं कि बिहार जैसे राज्य में ऐसे अस्पताल की काफी आवश्यकता है।

बदलाव के लिए मेहनत करे युवा

डॉक्टर निखिल रंजन चौधरी मानते हैं कि समाज में परिवर्तन की काफी आवश्यकता है और इस परिवर्तन के लिए युवाओं को आगे आने की जरूरत है, मेहनत करने की जरूरत है। वें कहते हैं कि आज युवा दौलत और शोहरत कमाने का शॉर्टकट रास्ता अपनाना चाहते हैं। इससे बचने की जरूरत है ।सफलता का आकाश मेहनत के दम पर ही मिलता है।

ऐसे रहेंगे आप स्वस्थ

डॉक्टर निखिल कहते हैं कि यूरोलॉजी से संबंधित समस्या से बचाव के लिए जागरूक काफी जरूरी है। सेहत को लेकर जागरूक रहें।खुब पानी पीएं। नशा का सेवन न करें रुटिन हेल्थ चेकअप कराते रहे और अगर किसी तरह की समस्या नजर आ रही हो तो तुरंत यूरोलॉजिस्ट से संपर्क करें। वें आगे कहते हैं कि यहां ख़र्च के डर से बीमारी को छुपाने का प्रचलन है इससे बचने की जरूरत है। बिहार के सरकारी अस्पतालों में भी सभी संसाधन काफी कम दर पर उपलब्ध है आप उनका लाभ लें और स्वास्थ रहें।
फिलहाल डॉक्टर निखिल अपने जन-सेवा की मशाल जलाएं स्वस्थ भारत की रौशनी जन-जन तक पहुंचाने में जुटे हैं। डॉक्टर निखिल के इन प्रयासों से जहां समाज स्वस्थ हो सबल हो रहा है वहीं लोगों को भी मिल रही है प्रेरणा।

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