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अब रोटी बेलने का झंझट खत्म ‘पढ़िए मुंबई की युवती सृष्टि झोपे के स्टार्टअप ‘आटा पिटा’ की कहानी 

रोजी रोटी मिलना’ ,’रोटी कमाना’, ‘रोटी सेंकना ‘और ‘रोटी तोड़ना’, ये सब मुहावरे है। जब ‘रोजी- रोटी’ कार्पोरेट सेक्टर की हो तो ‘रोटी कमाने’ में हीं सारा वक्त जाया हो जाता है। भागदौड़ ने ‘रोटी तोड़ने’ वाली परंपरा भी खत्म कर दी। ऐसे में घर लौट आटा गूंथ कर गोलू- मोलू रोटी बेलना और रोटी सेंकना किसी किसी जंग जीतने  से कम नहीं  होता। हड़बड़ी में कभी रोटी बनाओ भी तो उसके नैन नक्श गोल न होकर  आड़े तिरछे हो जाते हैं । फिर अधपकी रोटी खाने और लंच बॉक्स में संभालने की जहमत कौन उठाए, 
पर रोटी तो रोटी है। न मिले तो जिंदगी का स्वाद और सेहत दोनों के बिगड़ते देर नहीं लगती।
भागदौड़ वाली लाइफ और कारपोरेट नौकरियों के इस दौर में भी आपको स्वादिष्ट और सेहतमंद गोल गोल रोटियां बिना सेंके, बैठे बिठाए मिलती रहे तो थाली और जिंदगी दोनों चटखदार तो हो हीं जाएगी।
जी हां इसी सोच के साथ महाराष्ट्र के मुंबई की युवती  Srushti zope  ने शुरू किया है एक अनोखा स्टार्टअप। रोटी अब मोबाइल स्क्रीन के एक टच पर हो जाएगी अवेलेबल। सृष्टि ने इस स्टार्टअप को नाम दिया है
‘ आटा पिटा ‘
क्या है ‘आटा पीटा ‘का कांसेप्ट और यह हमारे सेहत और जेब  के लिए कितना अनुकूल है पढ़ें इस आलेख में…
मैंने पढ़ाई के बाद कॉरपोरेट सेक्टर म जॉब किया  पैसा पोजिशन सब अच्छा था। नहीं था तो बस समय , घंटों अपनी  सीट पर बैठ काम करना ।
भूख मिटाने के  लिए मैं फास्ट फूड्स की आदि होती चली गई। धीरे धीरे इस आदत से मेरा वजन बढ़ता चला गया। थकान ,नींद की कमी और   चिड़चिड़ापन की दस्तक दबे पांव  होने  लगी।  एक समय ऐसा आया जब मुझे बीमारी ने अपने आगोश में ले लिया और फिर काम की जगह अस्पताल, डॉक्टर और दवाइयां जीवन में दाखिल हो गई।
ऐसे में मेरे मन में ख्याल आता कि मेरी तरह काफी युवक- युवतियां होंगी जो भोजन में पोषक तत्व कमी से जूझ रहे होंगे। कहती हैं  Srushti zope। वह आगे कहती हैं  मैंने देखा की रोटी  हमारे देश में भोजन का मुख्य हिस्सा है। इन दिनों रोटी ही हमसे दूर होती जा रही है। परिवार न्यूक्लियर है।  पति- पत्नी दोनों नौकरी पेशा ,  उनकी तादाद ज्यादा है। हजारों लोग अकेले रह रहे। ऐसे में मुझे लगा कि क्यों न ऐसा कोई कंसेप्ट बनाया जाए जिससे रोटी लोगों को उनके घरों तक उपलब्ध कराई जा सके और वह सेहतमंद भी हो। इसी ने जन्म दिया हमारे स्टार्टअप आटा पिटा को।
 याद आई बात दादी मां की 
मेरी दादी एक कुशल गृहिणी तो थीं ही एक अग्रसोची भी थी। मेरा लगाव मेरी दादी से काफी ज्यादा था। दादा कभी कभी आटे में पालक डालकर रोटी भी बनाती कभी रोटी में स्ट्रफ कर  उसे पकाती। इन सब का स्वाद काफी बेहतर होता और इसमें पोषक तत्व भी मौजूद होते थे। 25 अगस्त 2015  में दादी का निधन हो गया। दादी की बनाई वो रोटी और उसका स्वाद मुझे हमेशा प्रेरित करता रहा। दादी मुझसे सामाजिक बदलाव की बात भी कहा करती थी।
जब मैं बीमार हुई और मुझे दिन-  रात काली- पीली बेस्वाद कैप्सूल लेने पड़ते तो दादी की पकाई रोटी का ख्याल आता जिसमें पोषण भी था। विटामिन  , कर्बोहाइड्रेट, वहां, प्रोटीन सब कुछ। तब मैं सोचती क्यों न रोटियों को ही पोषक तत्वों से भरपूर बनाया जाए !जिसमें कभी हमें इनके लिए कैप्सूल न गटकना पड़े।
  इन सब विचारों का मेल से ही आगे चलकर आटा पिटा ने आकार लिया। आप सोचिए शरीर में प्रोटीन की कमी को दूर करने के लिए  प्रोटीन पाउडर खाना बेहतर विकल्प है या सिर्फ हमारी रोटी।
फिर छोड़ दी नौकरी 
 आटा पिटा की फाउंडर  सृष्टि झोपे  कहती हैं कि मैंने कॉमर्स से ग्रेजुएशन किया फिर डाटा साइंस और इकोनॉमिक्स में मास्टर्स की डिग्री ली। वह आगे कहती है कि मेरी पहली नौकरी रिलायंस इंडस्ट्री में
  एनालिटिक्स एक्सपर्ट के तौर पर लगी, फिर उन्होंने प्रोडक्शन की ओर अपना रुख किया
 साइबर सिक्योरिटी। लॉजिस्टिक्स, लीड जनरेशन,  एआई में कई महत्वपूर्ण कार्य किए।  वे आगे बतातीं हैं कि   मुझे  नाम , पैसा और शोहरत तीनों चीजें मिल रही थी पर कमजोर हो रही थी सेहत। फिर जब मैं बीमार पड़ी तो मुझे लगा कि मेरे जैसे लोगों को सेहतमंद बनाने और उन्हें रोटी उपलब्ध कराने के लिए मुझे काम करना चाहिए। फिर मैंने अपनी नौकरी छोड़ दी और शुरू हो गया आटा पिटा
चुनौतियों के बीच मिला ‘आटा पिटा’ को  रास्ता 
   सृष्टि झोपे  कहती हैं कि मैंने जो दादी से सीखा था और हमारे परंपरागत रसोई में जिस तरह की रोटियां बनती है उसे पोषण से भरपूर बनाना चाहती थी। इसके लिए हमने रोटी बनाने की प्रक्रिया में पालक, चुकंदर जैसे पोषक तत्वों को मिलाना शुरू किया। यह प्रयोग काफी बेहतर रहा।
अब हमारे पास सबसे बड़ी चुनौती इसे संरक्षित रखने की थी। इसके लिए हम किसी तरह का कैमिकल प्रयोग नहीं करना चाहते थे।
संरक्षित रखने के लिए कैमिकल का प्रयोग काफी हानिकारक होता है। ऐसे में काफी रिसर्च करने के बाद मैंने पाश्चराइजेशन का फार्मूला अपनाया। हम रोटियों को गर्म करने के बाद इसे काफी  ठंडा करते हैं। इससे इसके पोषक तत्वों को कोई नुक्सान नहीं पहुंचता और हानिकारक बैक्टीरिया मर जाते हैं। सृष्टि कहती हैं कि हम आपको जो रोटियां देते हैं उसे 45 दिनों तक उपयोग में लाया जा सकता है।
कई फ्लेवर की रोटियां उपलब्ध 
  सृष्टि झोपे  आगे बताती हैं कि हमने रोटियों के कई फ्लेवर उपलब्ध कराएं हैं। इसके लिए भी हम किसी आर्टिफिशियल फ्लेवर का इस्तेमाल नहीं करते। अभी हमारे पास चार वेराइटी प्रमुख रूप से उपलब्ध है। इनमें Palak,Beetroot,Pumpkin,Carrot,High protein फ्लेवर  वाली रोटियां लोगों को खुब पसंद आ रही है। वह कहती हैं कि रोटी के टुकड़े को हम चम्मच की तरह सब्जी में प्रयोग करते हैं यह मुलायम रहे हमने इसका भी ध्यान रखा है।
आगे हम इसमें और भी नया प्रयोग करने वाले हैं।
जेब का भी रखा ख्याल
सृष्टि झोपे कहती हैं की हमारे देश में हर आम वर्ग के लोग रहते हैं और रोटी सबकी आवश्यकताओं में शामिल है। इसलिए हमने रोटी – पिटा की रोटियों को पॉकेट फ्रेंडली रखा है। हम होम डिलीवरी के साथ 12 रुपये में चपाती  उपलब्ध करवा रहे हैं।
लोगों का बेहतर  रूझान
सृष्टि झोपे बतातीं हैं कि हमें बाजार से बेहतर रूझान मिल रहा है। अभी आटा पिटा की रोटियां मुंबई, पुणे अहमदाबाद में उपलब्ध हैं। जल्द ही हम इसका दायरा और बड़ा करने की पहल में जुटे हैं।‌हम इसे ई- कॉमर्स प्लेटफार्म पर लांच करने जा रहे हैं।
माता पिता के साथ सृष्टि
माता- पिता का मिला साथ

सृष्टि कहती हैं कि नौकरी छोड़कर खुद का स्टार्टअप करना आसान नहीं था। कई लोगों की प्रतिक्रिया थी कि यह बड़ा रिस्क है। पर मेरे परिवार के लोगों ने मेरा साथ दिया। पिताजी prashant zepe और माताजी sheetal zope ने मेरा हौसला बढ़ाया। मेरे पिताजी बिजनेस बैकग्राउंड से हैं और मां शिक्षा के क्षेत्र से दोनों ने हर कदम पर मेरा साथ दिया।

कायम रहे देश की संस्कृति और  स्वाद 
सृष्टि  झेपे कहती हैं कि हमारे देश में अलग अलग संस्कृतियां हैं। सबकी अपनी-अपनी विशेषताएं भी। ऐसे ही व्यंजनों के साथ भी है। हमारे देश के परंपरागत व्यंजनों में सेहत का राज छुपा है।
मैं देश की संस्कृति और स्वाद को बचाने और इसे दुनिया भर में फैलाने की पहल करना चाहती हूं। आजके वक्त में हमारे परंपरागत जायकों को फिर से अपनाकर ही हम स्वस्थ रह सकते हैं।  सृष्टि होंठ पर मुस्कान भरते हुए  कहती हैं तो क्यों हम अपने 
दादी -नानी के जायकों को फिर से अपनाएं और अपनी थाली को स्वादिष्ट बनाने के साथ ही देश को सबल और स्वस्थ भी बनाएं। 
( thebigpost.com समाज की प्रेरक कहानियों को समाज के सामने लाता है। इस कड़ी को मजबूत रखने के लिए आप आर्थिक सहयोग कर सकते हैं। आपका छोटा सा सहयोग हमें बड़ा संबल प्रदान करेगा)
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15 अगस्त विशेष: नये मिजाज वाली आजादी

 

हमारी बदलती सोच , गैजेट, और बाजारवाद ने आजादी का मिजाज भी बदला है और उसका स्वरूप भी । 15 अगस्त पर पढ़िए कैसे बदल रहे हैं आजादी के मायने और उसकी भाषा….

रोज बढ़ती मंहगाई के वजन के बीच ‘बरिस्ता ‘ कॉफी हाउस के बाहर रील बनाता लड़का। कान में ईयर बर्ड खोंसे दफ्तर के गलियारे में Davidoff classic सिगरेट का धुंआ उड़ाती महिला। शहर के चौराहे पर हॉट पैंट पहने फेमिनिज्म का नारा बुलंद करती युवती। टीवी पर प्रसारित लाइव डिबेट में गुस्से से चिचियाता एंकर। बिना हेलमेट मोटरसाइकिल दौड़ाते दरोगा जी। सरकारी स्कूल की दरख़्त वाली दीवारों के बीच से दिखता चमाचम पब्लिक स्कूल। ट्राफिक की लाल -पीली बत्तियों के बीच सड़क पर ठहरी गाड़ियां की भीड़ के बीच  हुटर बजा आगे निकलता नेताजी का काफिला। डीजे वाले बाबू की धुन पर चलती रेव पार्टी।। इंस्टाग्राम पर सितारा होटलों का दमकता ब्लॉग। खिलौनों को अलविदा कह मोबाइल पर वीडियो गेम में मशगूल नन्हा बच्चा। लंदन में पढ़ रहे बेटे का वीडियो काल। डायनिंग टेबल पर रखी ब्लैक वाटर की बोतल। ये नई आजादी की कुछ तस्वीरें हैं।

आज भी नहीं बदले वे हालात 

आजादी की कुछ तस्वीरें बेहद स्याह है।
नामी अस्पताल में सारी रकम न जमा करने पर बंधक बना मरीज़ का शरीर। रोजगार गारंटी के नारों के बीच बेरोजगार युवक के आत्मा की टीस। कांट्रेक्ट की सरकारी नौकरी की तन्खवाह से घर का बजट चलाने की चिंता। काम के लिए रिश्वत की खुलकर डिमांड करते दफ्तर वाले बाबू। बाढ़ में हर साल डूबते मकान, दालान, लोग, मवेशी और सरकारी दावे। क़र्ज़ का बढ़ता बोझ। जनरल डब्बे में कोंचा कर दिल्ली जाने की मजबूरी। सच को झूठ और झूठ को सच साबित करने वाले लोग। ताखा पर पड़ा भोथार खुरपी-हंसुआ। ठहरी हुई नदियां और उनका का काला होता पानी। दादा जी बढ़ती की खांसी।
ये आजाद भारत देश की दो तस्वीरें हैं। एक और बढ़ते बाजारवाद और भ्रष्टाचार, झूठ की ताल पर कदमताल करते मस्त लोग हैं तो दूसरी ओर इनकी वेदना का  शिकार जन मन।

जात और मजहब कै नाम पर 

आज हम सब ने आजादी की नई भाषा और परिभाषा गढ़ ली है। जाति और मजहब के नाम पर संकीर्णता की दीवारें खुब मजबूत होती जा रही है। राजनीति पूंजी लगाने और कमाने का धंधा बनता जा रहा। लोकतंत्र के स्तंभों पर प्रश्न चिन्ह लग रहा। चुनावी बयार में नेताओं के उड़नखटोला वाले आसमानी दौरा और बेशुमार धन ख़र्च लोकतंत्र का नया ट्रेंड है। जनता को भी कमो बेस राजनीति का तिकड़म और तिकड़म की राजनीति हीं अब भाने लगी है। सत्यमेव जयते वाले भारत मे सत्य को असत्य पटखनी दे बैठा है।

24 घंटे शॉपिंग की आजादी

बाजार ने भी आजादी की नई परिभाषा लोगों को थमा दी है। अब आनलाइन मोबाइल पर हर पल खरिदारी करने की आजादी है। ब्रांड वैल्यू बनाने की आजादी है। बेडरूम से लेकर दफ्तर तक में चौबिसों घंटे बाजार आपकी सेवा में जुटा है बस मोबाइल स्क्रीन पर उंगलियां फेरिए और सामान आपके पते पर। पूंजीवाद जनहित और आजादी का मुखौटा पहन आज सामने है।

झटपट प्यार और ब्रेकअप की आजादी 

इन सब के साथ ही रिश्तों ने भी आजादी के नये मानक गढ़े हैं। फैमली न्यूक्लियर हो गई है। युवा बंधन मुक्त लीव इन का रास्ता पसंद कर रहे। इश्क- विश्क वाले ट्रेडी युवाओं के लिए प्यार और ब्रेक अप झट पट वाली चीज हो गई है। दर्जनों डेटिंग साइट आज मौजूद हैं। आज सोशल मीडिया पर इश्क के इजहार के लिए दिल के साथ ILove u वाली इमोजी काफी है और ब्रेकअप के लिए भी इमोजी है। आज जहानाबाद के किसी सुदूर गांव में  रह रहा रामपाल  बैंगलोर के रजनी से दिल लगाने की आज़ादी गैजेट्स ने दी है। रेडी टू ईट के जमाने ने भारतीय खीर पुड़ी की जगह नुडल पास्ता को कीचेन का सरताज बना दिया है। जोमैटो और स्वीगी जैसे ऐप ने महिलाओं को चुल्हे से भी आजादी दी है। चुल्हा जलाने की जगह मोबाइल चला आर्डर करना आसान लगने लगा है।

AI वाली आजादी

एआई के जमाने ने अब हमें याद रखने और खुब दिमाग चलाने से भी आजादी मिल रही। बस पर भर में आप ज्ञानी बन जाते हैं। जब जिस चीज की जरूरत हो वह सब एआई से उपलब्ध है।
कुल मिलाकर बदलाव के इस दौर में आजादी के नए मायनों को लेकर देश का लोकतंत्र बदलाव की ओर है।

तमाम विसंगतियों के बावजूद उसने बचाए रखी है उम्मीद । जिसे दिल में भर वो ‘काबुलीवाला ‘ का वह गीत गुनगुनाता लेता है ‘ऐ मेरे प्यारे वतन तुझ पे दिल कुर्बान…..’

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‘जीवन दीप ‘ बन शिक्षा का उजियारा फैला रहे फादर A. Christu Savarirajan, S.J_ की कहानी

यह कहानी ज्ञान , संस्कार और शिक्षा का अलख जगा रहे उस इंसान की है जिन्होंने  समाज सेवा के लिए अपना समस्त जीवन समर्पित कर दिया।वे  ज्ञान का दीप जला ,  मानव सेवा ,प्रेम और भाईचारे की भावना मजबूत कर एक ऐसी दुनिया के  निर्माण की पहल में जुटे हैं जो मनुष्य को मनुष्यता का मार्ग दिखाता हो। आज कहानी बिहार के प्रसिद्ध विद्यालय  संत माइकल हाई  स्कूल, पटना के प्राचार्य फादर ए. क्रिस्टु सवरिराजन, एस.जे की…

मेरी परवरिश छोटे से गांव में हुई। जहां खुब सारे पेड़ थे, नदी का उन्मुक्त बहाव था। और पहाड़, पक्षी, नीला आसमान और रिमझिम- रिमझिम   बारिश में माटी से आती सौंधी सी महक भी। मैं बचपन में नदी किनारे कभी  मछली पकड़ने की कोशिश करता तो कभी पास पास उड़ती तितलियों के साथ दौड़ लगाता। मिट्टी में खेलना, बारिश में झूमकर नहाना। एक अल्हड़ – मिजाजी बचपन जिया है मैंने जो प्रकृति के साथ, प्रकृति की गोद में बीता। …..और पढ़ाई कब की! शायद ये सवाल यह सवाल आपके  दिमाग में बिजली की तरह कौन रही होगी। वह सब बताता हूं आपको। अपने अब तक के जीवन की पूरी कहानी पूरी दास्तां। मैं फादर क्यों बना। कैसे बना। एक शिक्षक की भूमिका में कैसे आया। वो बस के छत पर बैठकर सफर करना । वो बिहार आने की कहानी। सब । अपने  पुराने दिनों को याद करते हुए किसी छोटे  बच्चे सा पावनता और उत्साह से लबरेज होकर  कहते हैं  फादर ए. क्रिस्टु सवरिराजन एस.जे

प्रकृति का सानिध्य : अपने गांव में
फादर ए. क्रिस्टु सवरिराजन, एस.जे    बताते हैं कि मेरा जन्म सन् 1975 में हुआ।  मेरे गांव का नाम है ओटन काडुवेंट्टी है । यह तमिलनाडु में पड़ता है।   परिवार में हमारे माता-पिता और हम नौ भाई बहन थे। गांव जैसा की मैंने पहले ही बताया प्रकृति की खुबसूरती से भरा पड़ा था। पिताजी वैसे तो सरकारी नौकरी में थे पर वो गांव की खेती किसानी से भी जुड़े थे। मां गृहणी थीं।
वो बचपन के दिन
यहां से मिली प्रारंभिक शिक्षा
प्रारंभिक शिक्षा के सवाल पर फादर क्रिस्टु कहते हैं
बात प्रारंभिक शिक्षा की करें तो मेरी प्रारंभिक शिक्षा गांव के स्कूल से ही शुरू हुई।
मैं एक छोटा सा बस्ता जिसमें स्लेट, पेंसिल और किताब होती को लेकर स्कूल जाता था। धीरे-धीरे वहां मेरे कई दोस्त भी बन गए और फिर स्कूल जाना अच्छा लगने लगा।
मैं अपने गांव में कक्षा तीन तक ही पढ़ पाया। इसके बाद पिताजी और परिवार की राय से मुझे अपने ननिहाल में भेज दिया गया। वहां के  गिरजाघर में  एक स्कूल का संचालन होता था । इसी स्कूल में मेरा दाखिला कराया गया। मैंने कक्षा 4 से आठवीं तक की पढ़ाई यहीं से की। इस विद्यालय में मुझे नई दिशा दी। यहां मेरा खुब मन लगता।
अध्यात्म की ओर बढ़ने लगा लगाव 
वे आगे बताते हैं कि  जब भी  गिरजाघर में फादर को सफेद लिबास पहने देखता तो एक अजीब सी खुशी और संतोष का भाव मेरे मन में आता। सफेद कपड़ों में फादर का मुस्कुराता हुआ चेहरा , और हम बच्चों के प्रति उनका प्यार इसे और मजबूत करता।
उस वक्त से ही मैं मन ही मन सोचने लगा था या यूं कहें एक संकल्प कर लिया था कि आगे जाकर मुझे भी फादर बनना है। इन दिनों पढ़ाई के साथ साथ में अध्यात्मिक जीवन की ओर भी आकर्षित होने लगा था।
वो बीते दिन..
मेरी रूचि इस आध्यात्मिक दुनिया में गहरी होती जा रही थी। मैं हर सुबह प्रभू ईसा मसीह से दुनिया की बेहतरीन की प्रार्थना करता और फिर दिन की शुरुआत करता। आपको यह जानकर थोड़ी हैरानी होगी कि यह क्रम तब से आज तक निरंतर चलता आ  रहा है।
कक्षा आठ के बाद मेरा नामांकन बोर्डिंग स्कूल में करा दिया गया। इस बोर्डिंग स्कूल में हमारे भाई समेत परिवार के तीन लोग थे। इस कारण मन लगा रहता था। मैं नियमित गिरजाघर जाता और फादर के साथ प्रार्थना सभाओं में सम्मिलित होता। मुझे ऐसा कर के अद्भुत शांति और  असीम ऊर्जा मिलती।
ऐसा रहा शैक्षणिक सफर 
फादर ए. क्रिस्टु सवरिराजन   के शैक्षणिक सफर की बात करें तो सन 2000 में  उन्होंने   बी.एससी ,भौतिकी सेंट जोसेफ कॉलेज, त्रिची से किया। वहीं एम.एससी भौतिकी 2005 में लोयोला कॉलेज, चेन्नई से किया।2006 में सेंट जेवियर्स कॉलेज ऑफ एजुकेशन, पटना से बीएड की डिग्री ली‌, इसके बाद एम.एड 2015 में बॉस्टन कॉलेज, अमेरिका से किया। इसके बाद

डॉन बॉस्को विश्वविद्यालय, गुवाहाटी से पीएच.डी कर रहा हूं।

कोशिश दुनिया को जानने की
मैं फादर क्यों बना?
  फादर ए. क्रिस्टु सवरिराजन   इस बारे में बताते हैं  कि  मुझे बचपन से ही ऐसा लगने लगा था कि मुझे फादर बनना है। जैसा की मैंने पहले भी बताया मुझे पहले तो फादर का लिबास, फिर उनके कार्य और समर्पण को देखकर ऐसा लगता था कि मैं भी फादर बनूंगा। आगे चलकर मुझे लगने लगा कि मैं अपने जीवन को प्रभू चरणों में समर्पित कर दूं और समाज के सकारात्मक बदलाव में योगदान  दूं। जीवन का उद्देश्य समाज सेवा और लोगों की भलाई होनी चाहिए।
बाढ़ पीड़ितों के बीच राहत सामग्री बांटते हुए
मेरे मामा जी भी पुरोहित हैं। कुछ प्रेरणा वहां से भी मिली। फिर मैंने घर में खुद के संकल्प को बताया कि मुझे फादर बनना है। घर के  सदस्यों का पूरा-पूरा समर्थन मिला। सभी ने खुशी जाहिर की। फादर बनने की राह आसान नहीं होता। आपको अपना जीवन समाज को समर्पित करना होता है।
मार्ग प्रेम का: फादर बनने की राह
वे आगे कहते हैं कि यह एक लंबी प्रक्रिया है। यहां कई तरह के प्रशिक्षण और परिक्षाओं से आपको गुजरना होगा। यह 17 साल की लंबी प्रक्रिया है। इस दौरान तीन व्रत लेने होते हैं । यह व्रत है निर्धनता, आज्ञापालन, और ब्रह्मचर्य जीवन।
 निर्धनता :   एक फादर को पैसों की माया से दूर रहना होता है। हमारे कार्य की तन्खवाह भी हमारे संस्थान को दान में चली जाती है और संस्था हमारी मूल जरूरतों का ख्याल रखती है। हमारा खुद का कोई भी बैंक बाइलेंस नहीं होता।
आज्ञापालन – हमें हर वक्त आज्ञापालन के लिए तैयार रहना पड़ता है जब जहां जिस कार्य में लगा दिया जाए उसमें उसी वक्त से जुट जाना होता है। आज मैं संत माइकल का प्राचार्य हूं हो सकता है इसी पल मुझे पश्चिम बंगाल के किसी छोटे से स्कूल या अस्पताल में सेवा के लिए भेज दिया जाए। यहां पद का मोह त्यागकर हमें जीना होता है । तर्क की जगह समर्पण के भाव को आत्मसात करना होता है।
ब्रह्मचर्य जीवन: एक फादर को जीवन भर ब्रह्मचर्य का पालन करना होता है। अविवाहित रहना होता है।
फादर बनने की प्रक्रिया के दौरान हमें अंग्रेजी के साथ ही स्थानीय भाषा का प्रशिक्षण दिया जाता है।
बाइबल के गहन अध्ययन के साथ ही अलग अलग धर्म और दर्शन का अध्ययन भी हम करते हैं। हमें भाषा साहित्य, अच्छे लेखकों की कहानियां और रचनाएं भी पढ़ने होते हैं। फिर हम ब्रदर बनते हैं और हमें दो साल तक किसी संस्था में प्रशिक्षण हेतु भेजा जाता है।
मुझे  बिहार के मधुबनी में भेजा गया था। यहां मूलभूत सुविधाओं का भी अभाव था। यह हमरे लिए कठिनाईयों में रास्ता खोजने जैसा होता है। वहां हम दालान पर सोते थे। उस वक्त गांव में शौचालय भी नहीं था हमें लोटा लेकर शौच के लिए जाना पड़ता था।
दिलचस्प रही बिहार की यात्रा
फादर ए. क्रिस्टु सवरिराजन एस.जे  बिहार आने का क्रम याद करते हुए कहते हैं, जब मुझे यह बताया गया कि मुझे सेवा के लिए बिहार जाना है तो मेरे परिवार के लोग थोड़ा चिंतित से हो गए थे। मैं खुद इससे पहले कभी बिहार नहीं आया था। स्थानीय भाषा तो छोड़िए मुझे ठीक से हिंदी भी नहीं आती थी। आदेश का पालन भी करना था सो मैं मैं बिहार आ गया। यहां आकर मुझे यह लगा कि बिहार के बारे में जिस तरह की छवि बनाई गई है बिहार वैसा नहीं है।  मैं ट्रेन से बिहार आया था।
कई बार ऐसे मौके भी आए जब मुझे बस की छत पर बैठकर यात्रा करनी पड़ी। यहां आने के बाद मैंने स्थानीय भाषा सीखी।  हम सब्जी मंडी जाते और स्थानीय भाषा में बातचीत करने की कोशिश करते
यहां के लोग काफी सहयोगी और मिलनसार हैं। मुझे हमेशा उनका सहयोग मिलता रहता है।
सम्मान के पल: बिहार के शिक्षा मंत्री द्वारा सम्मान ग्रहण करते हुए
 अपनी कुशलता से इन पदों है संभाला
 औरंगाबाद के सेंट इग्नेशियस हाई स्कूल में — 2002 से 2003 उन्होंने शिक्षक के रूप में सेवाएं दीं ।इसके बाद सेंट थॉमस हाई स्कूल, बगहा के रतनपुरवा में 2010 से 2013 तक शिक्षक रहे।
सेंट माइकल्स हाई स्कूल, पटना में — 2016 से 2017 तक उपप्राचार्य के पद पर रहें। इसके उपरांत
वें  सेंट जेवियर्स हाई स्कूल, पटना में 2017 से 2018 तक उप प्राचार्य रहें।
फिर सेंट जेवियर्स हाई स्कूल, पटना में 2018 से 2022 तक प्राचार्य रहें।
फिलहाल, सेंट माइकल्स हाई स्कूल, पटना में 2023 से वर्तमान तक प्राचार्य के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।
 एक चित्रकार और खिलाड़ी भी
फादर ए. क्रिस्टु सवरिराजन  एक बेहतर चित्रकारों का खिलाड़ी भी है। वें  बताते हैं  कि मैं एक खिलाड़ी और चित्रकार भी हूं। मुझे प्रकृति से जुड़े चित्र बनाना काफी माता है। इसके साथ ही मुझे गीत गाना भी काफी पसंद है।
  संत माइकल स्कूल की गौरवशाली यात्रा 
बात अगर सेंट माइकल्स हाई स्कूल  पटना, की करें तो यह स्कूल सन   1858 में स्थापित होने के बाद से ही गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और अनुशासन का पर्याय बना हुआ है। इस ऐतिहासिक संस्थान ने न केवल शैक्षणिक उत्कृष्टता की नई परिभाषा गढ़ी, बल्कि हजारों छात्रों को सफलता की ऊँचाइयों तक पहुँचाया है।
सेंट जेवियर हाई स्कूल, पटना में प्राचार्य के कार्यकाल की एक यादगार झलक
इस गौरवशाली यात्रा को और अधिक प्रभावशाली बनाने में विद्यालय के प्राचार्य फादर ए. क्रिस्टु सवरिराजन, एस.जे. की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। दूरदर्शी शिक्षाविद्, कुशल प्रशासक और आदर्श मार्गदर्शक के रूप में उन्होंने इस विद्यालय को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया और इसे आधुनिक शिक्षा प्रणाली के अनुरूप विकसित किया।
 167 वर्षों की गौरवशाली परंपरा
1858 में डॉ. एनेस्टेसियस हार्टमैन (फ्रांसिस्कन (कैपुचिन) मिशनरी सोसाइटी) द्वारा स्थापित, सेंट माइकल्स हाई स्कूल अपने अनुशासन, नैतिक मूल्यों और उच्च शैक्षणिक मानकों के कारण पूरे बिहार में शिक्षा का एक आदर्श केंद्र बन चुका है।
 क्या खास है इस विद्यालय में?
समग्र शिक्षा (Holistic Education): यहाँ सिर्फ किताबों से ज्ञान नहीं दिया जाता, बल्कि नैतिकता, नेतृत्व क्षमता और सामाजिक जिम्मेदारी का भी विकास किया जाता है।
सफल पूर्व छात्र: प्रशासन, राजनीति, कॉर्पोरेट जगत, चिकित्सा और अन्य क्षेत्रों में विद्यालय के पूर्व छात्र अपनी सफलता की कहानी लिख रहे हैं।
 शिक्षा के साथ संस्कार: यह संस्थान सिर्फ अकादमिक उत्कृष्टता तक सीमित नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण और समाज सेवा में भी अग्रणी रहा है।
  नवाचार के अग्रदूत  हैं फादर ए. क्रिस्टु सवरिराजन
फादर ए. क्रिस्टु सवरिराजन, एस.जे. का मानना है कि
“एक शिक्षक केवल ज्ञान नहीं देता, बल्कि छात्रों के भीतर आत्मविश्वास और नेतृत्व क्षमता का निर्माण करता है।”
बच्चों से विशेष स्नेह
उन्होंने शिक्षा को तकनीक और आधुनिक आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनके नेतृत्व में किए गए प्रमुख नवाचार की बात करें तो
🔹 स्मार्ट क्लासरूम और डिजिटल लर्निंग का समावेश
🔹 स्पोर्ट्स और एक्स्ट्रा करिकुलर एक्टिविटीज को बढ़ावा
🔹 वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम
🔹 सामाजिक कार्यों में छात्रों की भागीदारी सुनिश्चित
फादर सवरिराजन का सपना है कि हर छात्र न केवल शिक्षित हो, बल्कि एक जिम्मेदार नागरिक भी बने।
 विद्यालय की उपलब्धियाँ और विकास में महत्वपूर्ण योगदान 
फादर सवरिराजन के कुशल नेतृत्व में सेंट माइकल्स हाई स्कूल ने कई उपलब्धियाँ हासिल की हैं:
🏅 सीबीएसई बोर्ड परीक्षाओं में बेहतरीन प्रदर्शन
🏅 राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में छात्रों की सफलता
🏅 आधुनिक प्रयोगशालाएँ, पुस्तकालय, स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स और डिजिटल संसाधनों का विस्तार
🏅 असहाय और आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों को शिक्षा में सहायता
जैसी पहल शामिल है  यह पहल आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत होगी।
क्यों है यह बिहार के युवाओं के लिए प्रेरणादायक?
 यह छात्रों को सिर्फ परीक्षा पास करने के लिए नहीं, बल्कि जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए तैयार करता है।
नैतिकता, अनुशासन और आत्मनिर्भरता का विकास करता है।यहाँ शिक्षा के साथ-साथ समाज सेवा, खेलकूद, कला और संस्कृति को भी महत्व दिया जाता है।
 ऐसा है विद्यालय का ऐतिहासिक सफर
1858 में डॉ. एनेस्टेसियस हार्टमैन द्वारा स्थापित यह विद्यालय शुरू में कुर्जी क्षेत्र में अनाथ एवं निर्धन बच्चों के लिए बोर्डिंग स्कूल के रूप में कार्यरत था।
1894 में, आयरिश क्रिश्चियन ब्रदर्स को इसकी जिम्मेदारी सौंपी गई, जिन्होंने इसे उच्च विद्यालय का दर्जा दिलाया और 1896 में पहला बैच हाई स्कूल परीक्षा में शामिल हुआ।
1958 में, विद्यालय ने अपनी शताब्दी (100 वर्ष) पूरी की और शिक्षा एवं सह-पाठ्यक्रम गतिविधियों में बिहार का अग्रणी संस्थान बन गया।
जेसुइट सोसाइटी को जानें
1968 से संत माइकल विद्यालय का प्रबंधन पटना जेसुइट सोसाइटी द्वारा किया जा रहा है। यह सोसाइटी 1540 में संत  इग्नेशियस लोयोला द्वारा स्थापित की गई थी । यह समाज सेवा के कार्य करता है। खासतौर से शिक्षा के क्षेत्र में इसने काफी कार्य किया है।
 वर्तमान में भारत में 418 से अधिक स्कूलों,   5 विश्वविद्यालय , प्रबंधन संस्थान, इंटर कॉलेजों और  डिग्री कॉलेजों का संचालन कर रही है। 4000 येसु समाजी विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत हैं।
अपनी माताजी के सानिध्य में फादर ए. क्रिस्टु सवरिराजन एस.जे
मिलती है मां की ममता की छांव 
फादर ए. क्रिस्टु सवरिराजन कहते हैं मैं अपनी मां की ममता से उर्जा प्राप्त करता हूं। मां मुझसे बहुत दूर गांव रहती है पर उसे मेरी चिंता हर वक्त लगी रहती है। वो मुझसे फोन पर अब भी यह पूछती है कि मैंने खाना खाया या नहीं। मां का संबल मुझे मजबूत करता है। मेरी मां ही नहीं  दुनिया की हर मां की ममता और दुआओं का असर जादूई होता है।
 लोगों को प्रभू का संदेश
फादर  फादर ए. क्रिस्टु सवरिराजन  कहते हैं कि प्रभु ईसा मसीह ने बाइबल में इस प्रेम और इस सेवा की बात कही है।
आज  एकता और भाईचारे की जगह कटूता बढ़ती जा रही है। लोगों को जोड़ने की जगह लोगों को बांटने का काम हो रहा है। हम एक दूसरे का सम्मान करना तक भूल रहे। जरुरत जन्म ,भाषा, क्षेत्र के नाम पर बटने या बांटने की नहीं। एकता के साथ मानव प्रेम और मानव सेवा के लिए समर्पित होने की है।
चुनौतियां तो जीवन में आती रहेगी। प्रभु यीशु के जीवन में भी आई । हमें साहस रखकर आगे बढ़ना है और बनाना है ऐसा समाज जहां मन का हर कोना प्रेम , शांति और सद्भाव से रौशन हो । मैं अंत में रविन्द्र नाथ टैगोर की अमर कृति गीतांजलि की इन पंक्तियों के साकार होने की कामना परमपिता परमेश्वर से करना चाहता हूं।

जहां मन भय से मुक्त हो, और मस्तक ऊंचा रहे

जहां ज्ञान स्वतंत्र हो;
जहां संसार संकीर्ण दीवारों से खंड-खंड न हुआ हो;
जहां वाणी सत्य की गहराइयों से निकलती हो;
जहां परिश्रम की अविराम धारा पूर्णता की ओर बढ़ती हो;
जहां तर्क की स्वच्छ धारा जड़ परंपराओं की मरुभूमि में न खो जाए;
जहां मन तुम्हारे द्वारा सतत विस्तार पाते विचार और क्रिया की ओर अग्रसर हो—
हे पिता! मेरे देश को उस स्वतंत्र स्वर्ग में जागृत कर।

( यह सिर्फ एक कहानी नहीं, एक उम्मीद है।आलेख: विवेक चंद्र का है । आप आर्थिक मदद कर इस मुहिम को मजबूत कर सकते हैं ।आपकी आर्थिक मदद हमारी सकारात्मक मुहिम को जीवन देती है। 📞 संपर्क: 748843830)

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असमिया वाद्य यंत्रों को पुनर्जीवित करने की सुरीली पहल करने वाले माधव कृष्ण दास की कहानी

ब्रह्मपुत्र के उन्मुक्त बहते जल तरंगों में  ‘बरगीत’ की पावन धुन हो या फिर चाय बागानों के पत्तों की सरसराहट में ‘रंगाली’ का मधुर राग, या दूर पहाड़ी पर बसे गांव की पगडंडी तक फिजा में मचलता ‘पेपा’ का मद्धिम -मद्धिम स्वर ।असम की आत्मा लोक धुनों के इन्हीं कोरस में बसती रही है , रचती रही है।
बदलते समय के साथ यहां भी जब लोक धुनों के स्वर की जगह पश्चिम के संगीत का शोर गूंजने लगा । संस्कृतियों की तान पर बाजार सीना तानकर खड़ा हो गया, तब यहां के एक  शख्स में  परिवर्तन का बीड़ा उठाया। उन्होंने न सिर्फ लोक धुनों को सहजने सवारने का जतन शुरू किया बल्कि असम के लुप्त हो रहे वाद्य यंत्रों को ढूंढ ,उन्हें फिर से नवीनता और मौलिकता के मेल के साथ आम लोगों के लिए उपलब्ध कराने की नायाब पहल शुरू की। बचपन में ही संगीत की संगत कर संगीत विशारद की डिग्री पाने वाले और असमिया गीत संगीत को पुनर्जीवित कर उसे दुनिया भर से परिचित करवाने की सुरीली कोशिश करने वाले गायक, संगीतकार, लेखक और वरिष्ठ सिनेमैटोग्राफर , लोकसंगीत रत्न माधव कृष्ण दास की यह कहानी जरूर पढ़िए…

मेरे घर में बचपन से ही संगीत का माहौल था। मां डॉ. डॉली दास लोक संगीत की गायिका थीं। घर का हर कोना मां के रियाज की आवाज और साजों के संगीत से गुलजार रहता। ऐसा कहूं की मैं बचपन में मां के गीत सुनते हुए ही नींद के आगोश में जाता और सुबह जब जागता तो देखता मां ने उगते सूरज के साथ ही अपनी संगीत की संगत शुरू कर दी है।

माधव कृष्ण दास की माताजी डॉ डॉली दास

“सच कहूं तो वो घर के संगीत का माहौल ही था जिसने अब तक मेरी आत्मा के अंदर मनुष्यता को बचा कर रखा है, जीवन को सजा कर रखा है कहते हैं माधव कृष्ण दास”

माधव कृष्ण दास असमिया लोक संगीत को पुनर्जीवित करने के लिए कई अभियान चला रहे हैं। इन अभियानों में लोक गीतों को सहेज कर उनका प्रकाशन से लेकर गुम हो रहे वाद्य यंत्रों की खोज और उनका निर्माण तक शामिल हैं।
माधव कृष्ण दास कहते हैं घर में संगीत की संगत का असर मुझ पर बचपन से ही होने लगा। मैंने कक्षा सात की उम्र में ही डिब्रूगढ़ संगीत महाविद्यालय से संगीत विशारद  की डिग्री पा ली थी। इतनी कम उम्र में यह डिग्री पाने  वाला मैं पहला बच्चा था। वैसे तो मेरी रूचि तबला वादन में सबसे अधिक थी पर मैं धीरे-धीरे कर अन्य वाद्य यंत्र भी बजाता और उसे सीखता था। कहते हैं श्री दास। आज  वे 22 से अधिक वाद्ययंत्र को बड़ी आसानी से बजा सकते हैं।

माताजी और भजन गायक अनूप जलोटा जी के साथ मुंबई स्टूडियो में

ऐसे सीखा इतने वाद्य यंत्र बजाना

माधव कृष्ण दास बड़े ही उत्साह से 22 से अधिक वाद्ययंत्र को सीखने और बजाने किस्सा सुनाते हुए कहते हैं कि मेरी मां परफॉर्मेंस के लिए लोक गीतों की तैयारी करती और कई बार ऐसा होता कि कोई म्यूजिशियन अनुपस्थित हो जाता तो फिर मैं उस वाद्य यंत्र को बजाने बैठ जाता। ऐसा करते करते मुझे, तबला के साथ, पेपा, बांसुरी, ढ़ोल, हारमोनियम समेत अनेक वाद्य यंत्र बजाने आ गए। इसके साथ ही अब किसी म्यूजिशियन की अनुपस्थिति में होने वाली कठिनाई भी समाप्त हो गई। अब मैं मां के साथ बाहर मंचों पर भी परफॉर्म करने जाने लगा।

मां डॉ .डॉली दास जी ने लोक संगीत के क्षेत्र में उल्लेखनीय  उपलब्धियां हासिल की थीं । वर्ष 2011 में  वें बुल्गेरिया  में आयोजित वर्ल्ड फोक फेस्टिवल में स्वर्ण पदक विजेता रहीं। इसके बाद,वर्ष 2014 में वियतनाम विश्वविद्यालय ने उन्हें लोक संगीत में डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया। उनकी इसी साधना और समर्पण के लिए वर्ष 2017 में उन्हें राष्ट्रपति पुरस्कार से भी नवाजा गया।

फिल्म में अकेले बजाए सभी वाद्य यंत्र

माधव कृष्ण दास ने 2009 में महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव के जीवन पर आधारित फीचर फिल्म में  अकेले बैकग्राउंड म्यूजिक दिया। इसके उन्होंने अकेले ही 22 वाद्य यंत्रों को बजाया और फिर म्यूजिक कंपोज किया। यह अपने आप में एक रिकॉर्ड है। फिल्म आने के बाद लोगों के इसके संगीत की भी सराहना की।

लोकसंगीत का तैयार किया सिलेबस

माधव कृष्ण दास बताते हैं कि हमारे असम में लोग परंपरागत गीत तो गाते थे। इनकी पढ़ाई भी शुरू हो चुकी थी पर कोई व्यवस्थित सिलेबस नहीं था। मुझे लगा कि लोक संगीत को पुनर्जीवित करने और मजबूती देने के लिए एक व्यवस्थित सिलेबस की जरूरत है जिसमें असम के लोक संगीत के सभी आयाम मौजूद हों। फिर मैंने इसकी पहल शुरू की और कई माह के मेहनत के बाद लोक संगीत का सिलेबस तैयार किया।
सर्वभारतीय संगीत -ओ- संस्कृति परिषद कोलकाता ने भी इसे मान्यता प्रदान की।‌आज असम के कई संगीत महाविद्यालय में इस सिलेबस से पढ़ाई हो रही है।

वाद्य यंत्र को नया रूप देते हुए

माधव बांसुरी एक सुरीली पहल

माधव कृष्ण दास बताते हैं कि असम के जीवन में बांस का हमेशा से एक महत्वपूर्ण स्थान रहा है ‌ । चाहे वह यहां का लोक जीवन हो या फिर लोक संगीत।

लोक संगीत में प्रयोग आने वाले वाद्ययंत्र में भी बांस का ज्यादातर प्रयोग होता है और बांसुरी तो यहां के लोकसंगीत की आत्मा है।

मैं एक बांसुरी वादक भी हूं। वादन के क्रम में मैंने यह महसूस किया कि  हमारे पारंपरिक बांसुरी में सभी   स्केल की बांसुरी एक साथ नहीं उपलब्ध हो पाती थी। मैंने इस पर रिसर्च शुरू किया और फिर  सभी स्केल की बांसुरी  का सेट ईजाद किया  ।  मैंने इसे माधव बांसुरी नाम दिया है। माधव बांसुरी के तहत 25 बांसुरी का एक सेट है जिसमें हर स्केल की बांसुरी मौजूद रहती है।

लुप्त हो रहे वाद्य यंत्रो को किया पुनर्जीवित

माधव कृष्ण आगे बताते हैं कि हमारे प्रदेश असम में कई आदिवासी जनजातियां हैं। इन सभी जन जातियों के अपने अपने त्योहार है, गीत है और वाद्ययंत्र भी।

“मैंने यह महसूस किया की बदलते ज़माने में हमारे वाद्य यंत्र को भूलकर वेस्टर्न म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट  अपनी जगह बना रहे हैं। मुझे यह काफी नागवार लगा। मैं यह मानता रहा हूं कि हमारे परंपरागत वाद्य यंत्र लोकसंगीत की सांस हैं। हां आज के समय के साथ उनकी डिजाइन को और आकर्षक बनाया जा सकता है, पर उनकी मौलिकता को संरक्षित रखते हुए”

फिर छुट्टियों में मैं गांव – गांव जाता , बुजुर्ग संगीतकारों से मिलता है और पुराने फोक म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट के बारे में जानकारी इकट्ठा करता ।

वैसे मैं अगर असम के म्यूजिक इंस्ट्रूमेंट की बात करूं तो वहां के सबसे खास म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट में ये वाद्य यंत्र शामिल होते हैं

ढोल, पेपा, गगना ,ताल , बान्ही खोल , नेगेरा शंख , हारमोनियम, बीन , सेरजा , शिफून , खराम आदि। 

जब तक नई पीढ़ी इन्हें नहीं अपनाती तब तक इनका संरक्षण और प्रयोग काफी मुश्किल जान पड़ता था। फिर मैंने खुद से ही इंस्ट्रूमेंट को बनाने की पहल शुरू की ।

इनके डिजाइन को थोड़ा आधुनिक रूप दिया और इनका निर्माण कार्य शुरू किया। इस काम में वहां के स्थानीय जानकार लोगों की मदद भी ली। परिणाम चमत्कारी थे। मेरे पास एसे परंपरागत वाद्य यंत्र नए रूप में मौजूद थे जो देखने में काफी खूबसूरत और आकर्षक तो थे उनकी मूल धुन ओर स्वर भी वैसे कायम था।

“संगीत जगत में इस पहल की काफी प्रशंसा हुई, और मुझे मिल एक आत्मिक संतोष। मुझे लगता है मैं रहूं न रहूं मेरे बनाएं इन वाद्य यंत्रों के स्वर फिजा में सुरीला रस भर इंसानियत का राग बचाएं रखेंगे”

माधव कृष्ण दास के पिता हितेश दास जी

पिताजी का योगदान अहम

माधव कृष्ण दास अपनी संगीत यात्रा का श्रेय अपने पिता हितेश दास जी को देते हैं। वे कहते हैं कि इस यात्रा में पिताजी का सहयोग काफी अहम रहा। पिताजी मां को हमेशा लोकसंगीत के लिए प्रेरित करते रहे। मेरे पिता वैसे तो टेलिकॉम डिपार्टमेंट में नौकरी करते थे पर उनकी रूचि लोक संगीत और लोक जीवन में काफी ज्यादा थी। उन्हें गांव, खेती, किसानी और कला से विशेष लगाव था। वे चाहते थे कि असम की कलाएं संरक्षित हो सके। मुझे संगीत की शिक्षा दिलवाने में भी उनका योगदान रहा। मैं जो कुछ भी हूं उनकी ही प्रेरणा से हूं।

जब ग्रामोफोन पर रिकॉर्ड हुआ गीत

माधव कृष्ण दास अपने पुराने दिनों को याद करते हुए कहते हैं। 1982 में मेरे गीत का ग्रामोफोन रिकार्ड आया था। इसे रिकॉर्ड करने के लिए हम एच एम वी कंपनी के मुख्यालय कोलकाता गए थे। उस वक्त इतनी दूर का पहला सफर था। इसके बाद 150 से अधिक ऑडियो कैसेट , सीडी कैसेट और डीवीडी  रिलीज हुए।  इसमें  आसामी,  हिंदी,  नेपाली,  बोडो, तीवा, नागामीज , मिसिंग, देउडी , उड़िया ,तमिल भाषा के  गीत शामिल हैं। आज इंटरनेट का युग है। सोचता हूं,इन सालों में तकनीक कितनी बदल गई। अब हर मोबाइल में या यूं कहें हर हाथ में रिकॉर्डर है, इंटरनेट है और है मुट्ठी में एक पूरी दुनिया।

इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में नाम

श्री दास बताते हैं कि उनका नाम दो बार “इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स “ में दर्ज हो चुका है। उन्होंने मेमोरी कार्ड में पहली बार गाना डालकर उसका प्रसार शुरू किया था। इसके साथ दूसरा  दिहानम में सर्वाधिक गीत गाने पर ।‌


मिल चुके हैं कई पुरस्कार

माधव कृष्ण दास को संगीत और कला के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए की पुरस्कार और सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। उन्हें चित्रकला के लिए 10 साल की उम्र में ही साल1979 में सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार प्रदान किया गया‌। 1987 में सांस्कृतिक कार्य विभाग, असम सरकार द्वारा आयोजित शास्त्रीय बांसुरी में द्वितीय स्थान और खोल वादन में तृतीय स्थान प्राप्त हुआ।

1987 में भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा युवा सांस्कृतिक कर्मियों के लिए उत्तर-पूर्व से प्रथम CCRT छात्रवृत्ति प्राप्त हुई।

1993 में कर्नाटक राज्य में सिनेमैटोग्राफी के अंतिम परीक्षा में 1st class तृतीय स्थान प्राप्त होने पर सम्मानित किया गया।

साल 1991मे ऑल इंडिया टेलीकॉम सांस्कृतिक सम्मेलन में कोलकाता (पश्चिम बंगाल) में शास्त्रीय बांसुरी में प्रथम स्थान प्राप्त हुआ।1990 में ऑल इंडिया टेलीकॉम सांस्कृतिक सम्मेलन अहमदाबाद (गुजरात) में लोकगीत में तृतीय पुरस्कार प्राप्त हुआ।वहीं साल 1978 में ऑल असम म्यूजिक एंड ड्रामा फेस्टिवल, तिनसुकिया में बिहूनाम  में द्वितीय पुरस्कार प्रदान किया गया। 1984 में ऑल असम चिल्ड्रन्स फेस्टिवल, सिबसागर में पर्बती प्रसाद गीत में द्वितीय पुरस्कार मिला।

पल सम्मान के..

1985 ऑल इंडिया चिल्ड्रन्स वन-एक्ट प्ले प्रतियोगिता, डिब्रूगढ़ में नाटक में द्वितीय सर्वश्रेष्ठ अभिनय पुरस्कार प्राप्त हुआ, 1987 में दोबारा सांस्कृतिक कार्य विभाग, असम सरकार द्वारा आयोजित अखिल असम सांस्कृतिक महोत्सव में शास्त्रीय बांसुरी में द्वितीय स्थान और खोल में तृतीय स्थान प्राप्त हुआ।सर्वभारतीय संगीत -ओ- संस्कृति परिषद कोलकाता  द्वारा 2013 में लोकसंगीत रत्न की उपाधि से नवाजा गया। साल 2025 में माधव कृष्ण दास को महानायक महाराज महावीर पृथु सम्मान  से नवाजा गया ।

चित्रकला प्रदर्शनी में माधव कृष्ण दास

राग के साथ रंग से भी रिश्ता

माधव कृष्ण दास का रिश्ता राग के साथ रंगों से भी है वे सुरों के साधक तो हैं हीं एक बेहतर पेंटर भी हैं। उन्होंने श्रीमंत शंकरदेव एवं माधवदेव की रचनाओं में आए पात्रों को अपनी कूची से कैनवास पर उतारा है। इसमें राधा -कृष्ण लीला, कृष्ण की बाल लीलाओं समेत लोक जीवन के चित्र भी शामिल हैं। माधव कृष्ण दास कहते हैं कि मैं अपनी पेंटिंग में ज्यादातर फूल – पत्ते हैंगूल , हाईताल,  से बने प्राकृतिक रंगों का प्रयोग करता हूं।

पत्नी ‘माया’ भी कला साधक

माधव कृष्ण दास की पत्नी माया सेनजी  दास भी एक कला साधक हैं। श्री दास कहते हैं कि मैं मानता हूं कि हम सब के जीवन की प्रोग्रामिंग ईश्वर ने सेट कर रखी है। हम सब भगवान के प्री प्लान पर ही चल रहे होते हैं। मेरी कला यात्रा को गति देने में पत्नी ‘माया’ का बड़ा योगदान है। वो मुझे हमेशा इन चीजों के लिए प्रेरित करती है। उसकी खुद की दिलचस्पी भी लोक कला और साहित्य में है।   उन्होंने   चेन्नई फिल्म इंस्टीट्यूट में  पढ़ाई के दौरान एडिटिंग में गोल्ड मेडल प्रदान किया गया था। वे दक्षिण भारतीय परिवेश में पली पढ़ी और मैं पूर्वोत्तर में पर हमारे बीच एक बेहतर तालमेल है ‌।

पत्नी माया सेनजी दास के साथ

वे आगे बताते हैं कि माया सेनजी दास ने  श्रीश्री माधव देव द्वारा रचित नामघोषा का तमिल में अनुवाद किया है। इसके साथ हीं दूरदर्शन के राष्ट्रीय चैनल के लिए उन्होंने महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव पर आधारित 13 एपिसोड का एक मेगा धारावाहिक का निर्देश भी किया है। उन्होंने असम राज्य गीत समेत कई असमिया गीतों का तमिलभषा में अनुवाद किया।

वे फिलवक्त गुवाहाटी के एक  न्यूज चैनल में  प्रोग्राम एडमनिस्ट्रेटर हैं। श्री दास कहते हैं कि हम असम के लोक गीतों को दुनिया भर में पहुंचाना चाहते हैं। इसके लिए हम उन्हें किताबों के तौर पर प्रकाशित के  पहल भी  कर रहे हैं साथ हीं हम इनके अन्य भाषाओं में अनुवाद पर भी ध्यान दें रहे हैं, ताकि अन्य भाषा के लोग भी हमारी विरासत को समझ पाएं, खास तौर पर महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव एवं माधवदेव के दिव्य रचनाओं को।

माधव कृष्ण दास के पुत्र जय कृष्ण दास और विजय कृष्ण दास एमसीए की पढ़ाई कर चुके हैं। जयकृष्ण को cotton विश्वविद्यालय में एमसीए की परीक्षा में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने के लिए गोल्ड मेडलप्रदान किया  था। विजय कृष्ण भी एमसीए करने के बाद फिल्म में ग्राफिक डिजाइनर के रूप में कार्य कर रहे हैं।

दिल्ली में गणतंत्र दिवस समारोह में कवरेज के दौरान

कलाकार से  सिनेमैटोग्राफर का  सफर
श्री दास बताते हैं कि संगीत की शिक्षा तो बचपन से ही मिलती रही। मैं उस वक्त गुवाहाटी कटन कॉलेज से जियोलॉजी में स्नातक कर रहा था। पढ़ाई के दौरान हीं में तबला वादन हेतु गुवाहाटी दूरदर्शन केन्द्र जाया करता था। वहां के एक तात्कालिक कैमरामैन ने मुझे सिनेमोटोग्राफी की पढ़ाई करने की सलाह दी।
मैंने उनकी सलाह मानते हुए 1990में बैंगलोर में इस कोर्स में दाखिला ले लिया। कोर्स पूरा होने पर मुझे उड़ीसा फिल्म इंस्टीट्यूट में लेक्चरर की नौकरी मिल गई।

यहीं माया सेनजी भी पढ़ाने आई थीं। हम एक दूसरे के करीब आएं  हमारे विचार विचार काफी मिलते थे, और फिर विवाह  के पवित्र बंधन में बंधने का फैसला लिया


इसके बाद मैंने चेन्नई में हीं कैमरामैन के तौर पर कार्य किया। फिर असम के ज्योति चित्रवन फिल्म इंस्टीट्यूट में कैमरा पढ़ाना शुरू किया। इसके बाद यूपीएससी के जरिए में दूरदर्शन में आ गया। मेरी पहली पोस्टिंग बिहार के मुजफ्फरपुर  दूरदर्शन केन्द्र में हुई फिर पटना।

दूरदर्शन परिवार का सदस्य होने का गर्व 

दूरदर्शन ने मुझे एक बड़ा फलक दिया। मुझे इस राष्ट्रीय परिवार का हिस्सा बनने पर गर्व है। यहां मैंने कई बातें सीखीं देश के अलग-अलग हिस्सों में जाने और संस्कृतियों को समझने का मौका भी मिला। यहां सभी सहयोगियों का भी भरपूर प्यार मिलता रहता है।

बिहारी लोकसंगीत के लिए काम करने की चाहत

माधव दास कहते हैं, मैंने बिहार में लम्बा वक्त बिताया है। बिहार ने काफी कुछ मुझे दिया भी है यही मेरा प्रमोशन भी हुआ। बिहार के लोगों का हर कदम पर सहयोग मिला है।

मेरी चाहत बिहार के गुम हो रहे लोग गीतों के संग्रह की है। मैं अपने छुट्टी के दिन का उपयोग बिहार के लोकसंगीत के संरक्षण और गुम हो रहे गीतों की खोज में करता हूं। 

मैं यहां के परंपरागत गीतों को एकत्र कर एक किताब की शक्ल देना चाहता हूं। ऐसे में वें संरक्षित हो सकेगी। मैं बिहार के प्राचीन वाद्य यंत्रों की खोज भी करने में जुटा हूं।

वे कहते हैं कि हमारे लोग गीतों को आज के परिवेश के अनुसार बनाकर उसे युवाओं से जोड़ने की जरूरत है। ध्यान यह रहें कि परंपरागत गीतों की मूल भावना और उसकी गहराई पर कोई खरोंच न आए। वे आगे कहते हैं संगीत तो हर जगह मौजूद हैं। हमारे हर क्रियाकलाप  में। लोकजीवन में, साइकिल की घंटी से लेकर  रेलगाड़ी की छुक छुक  तक‌ । हवाओं के झोंकों से लेकर सांसों के प्रवाह और दिल की धड़कन तक संगीत ही तो हैं। नन्हे से बच्चे की हंसी हो, या फिर बाल मन का क्रंदन संगीत ही हमें हर पहर , हर लम्हा बांधे रहता है।

एक संगीत साधक होने के नाते अगर मैं लोग संगीत के थोड़े से सुर -ताल भी अगली पीढ़ी के लिए संजो पाया तो मैं समझूंगा की मैंने अपने जीवन का उद्देश्य पूरा कर लिया। आज के इस एआई और वर्चुअल रियलिटी की दुनिया में संगीत ही है जो हमें इंसान बने रहने का स्वर देता है, मनुष्यता को बचाए रखने का स्वर देता है और इन्हीं स्वरों से मिलकर बनता है वह अलौकिक नाद जिसमें डूबकर शंकर देव कह उठते हैं ‘ मन मेरि राम चरणहि लागु। और कबीर गा उठते हैं ‘ मन लागो मेरा यार फकीरी में ‘
मेरे मन में भी बस एक छोटी सी ख्वाहिश है कि जब तक रहूं एक सच्चे संगीत साधक की तरह बचाए रखूं अपने दिल का वह साज जो हमें मशीन नहीं मनुष्य बनाएं रखता है।

 

( निवेदन: हम समाज की सकारात्मक कहानियों को सामने लाने की कोशिश कर रहे हैं।यह आपके सहयोग के बिना असंभव है। अगर आपके पास भी है ऐसी कोई कहानी तो हमसे साझा करें। आप हमारी आर्थिक मदद कर भी इस मुहिम को मजबूती दे सकते हैं। आपकी छोटी सी राशि हमें बड़ा संबल देगी। हमारा संपर्क सूत्र है 7488413830)

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बिहारियों को सेहतमंद बनाने की पहल के साथ शुरू हुआ अनोखा  STARTUP,  खूबियां जान आप कह उठेंगे wow! 

मिलेट्स और उनके प्रोडक्ट पर पहले लंबा रिसर्च, फिर बनाया  अनोखा  स्टार्टअप। पहल कि  जिसमें फ्रेस, पियोर और हेल्दी प्रोडक्ट  लोगों को एक छत के नीचे मुहैया कराई जा सकें। देश भर से किसानों के खेतों  से प्राप्त  खाद्य-पदार्थों की असली और उम्दा खुशबू से गुलजार है यह स्टोर ।     इतना ही नहीं  इस खुबसूरत से स्टोर में है लाइव ग्राइडिंग की भी सुविधा। प्रोडक्ट का चयन कीजिए, उसे आंखों के सामने ग्राइंड कराइए और इकोफ्रैंडली पेपर पैक में घर ले जाईए। यह सब उपलब्ध है पटना के युवा उद्यमी संकेत कुमार के स्टार्टअप FRESHORA EARTH में। आज कहानी संकेत कुमार के  हरित सपने और उसे धरती पर आकर देते उनके खुबसूरत स्टार्टअप FRESHORA EARTH की…
मेरी परवरिश जिस परिवार में हुई वहां की पृष्ठभूमि में बिजनेस था। वहां पल – बढ़कर मुझे लगा कि किसी समस्या का माकूल समाधान ही बिजनेस है। कोविड के बुरे दौर में जिंदगी और सेहत के नए मायने सीखने को मिला और यह भी कि प्रकृति के संरक्षण और पोषण से हीं जिंदगी का रस और राग दोनों संरक्षित रह  सकते हैं। मुझे लगता है प्रकृति ने हमें जीवन दिया है तो पोषण हेतु पोषक तत्व भी । हम अपने जिद और बाजार के प्रचार तंत्र में फंसकर अपनी सेहत से खिलवाड़ कर रहे हैं।
हम ज्वेलरी शॉप पर जाकर 24 कैरेट गोल्ड की तफ्तीश तो कर लेते हैं पर सेहत के लिए करते हैं बस समझौता। यही से हमारी सेहत बिगड़ी है,  जीवन बिगड़ा है परिवार बिगड़ता है और बैंक बैलेंस रहने के बावजूद हमारे सेहत का बैंलेस ऐसा गड़बड़ हो जाता है कि बस अस्पताल और नीली -पीली गोलियों का सहारा बचता है।”
मैं लोगों को एक खुशनुमा जिंदगी और जिंदादिल के साथ देखना चाहता हूं पर यह तभी मुमकिन है जब आप सेहतमंद होंगे। मैं प्रकृति से जुड़कर लोगों के संपूर्ण किचन का सॉल्यूशन शुद्धता, ताजगी और स्पष्ट भरोसे के साथ देने की कोशिश में लगा हूं। इसे आप मेरा बिजनेस भी कह सकते हैं, पैशन भी, सेवा भी और इबादत भी‌।
FRESHORA EARTH मेरे लिए वह मंदिर है जहां से सबके सेहत की नेमत का  प्रसाद हम बांट रहे हैं। कहते हैं FRESHORA EARTH के फाउंडर संकेत कुमार।
कुकिज से लेकर पास्ता तक सब सेहतमंद 
संकेत ने अपने अनोखे स्टार्टअप में मार्डन लाईफ की food habits  को भी शामिल किया है जिसमें स्वाद के ख्याल के साथ सेहत का ख्याल भी रखा गया है। संकेत कहते हैं कि पास्ता ने आज के किचन में अपनी जगह बना ली है। इसे आज के दौर में हम किचन से निकाल तो नहीं सकते हां इसे सेहतमंद जरूर बना सकते हैं। हमने जो पास्ता तैयार किया है वह स्वादिष्ट तो है ही सुपाच्य और सेहतमंद भी। इसे रागी से बनाया गया है न कि मैदे से। साथ ही किसी तरह का हानिकारक कैमिकल नहीं है। इसी तरह हमने कुकीज़, चॉकलेट , नमकीन भी तैयार किए हैं।  बाजार के आलू चिप्स में  सोडियम रहता है जो काफी हानिकारक है हमने मिलेट के चिप्स तैयार किए हैं।
देश भर से किसानों को जोड़ा 
इसके लिए हमने देश भर से किसानों और उम्दा प्रोडक्ट का चयन किया। बिचौलियों और होलसेल बाजार से प्रोडक्ट न ले कर हम किसानों से प्रोडक्ट लेते हैं। उदाहरण के लिए हमारे यहां कश्मीर के किसानों द्वारा उगाईं कश्मीरी मिर्च डायरेक्टर हम तक पहुंचती है वैसे ही बिहार के पश्चिम चंपारण का मिरचइया चूडा हम किसानों से लेकर आते हैं। होलसेलर और बिचौलियों के न होने से प्रोडक्ट की गुणवत्ता प्रभावित नहीं होती है। वो उसी रूप में हम तक पहुंचती है जिस रूप में वो किसानों के पास तैयार हुई। कोई  सुगंध वाला कैमिकल, या  गहरे रंगों में रंगने की गुंजाइश थोड़ी भी नहीं होती।
हम इससे किसानों को  बाजार भी दे रहे और उपज की अच्छी कीमत भी।
एक प्रोडक्ट की कई वैराइटीज 
संकेत कुमार कहते हैं कि हर एक प्रोडक्ट की हमने कई कई वैरायटी यहां उपलब्ध करवाई है। हल्दी की हमारे पास पांच वेराइटी है, जीआई टैग वाली हल्दी से लेकर बिहार की लोकल हल्दी तक की उम्दा क्वालिटी हमारे पास है। इसी तरह चावल, दाल, चाय, काफी , गुड़ और नमक में भी हमने कई वैरायटी लोगों को उपलब्ध करवा रहे। आप हमारे स्टोर आईए चयन कीजिए और सामने में उसका पाउडर फार्म बनवा कर घर ले जाईए।
पैक खाद्य पदार्थ में कैमिकल क्यों ?
संकेत बताते हैं कि आज कल मल्टीनेशनल कार्पोरेट कंपनियां खाद्य पदार्थ को चमकदार पैकेट में भर भर कर आप तक पहुंचा रही है। ये सब सेंट्रेलाइज युनिट में तैयार होते हैं। हमसे सैकड़ों हजारों किलोमीटर की दूरी पर। ऐसे में इन्हें संरक्षित रखने के लिए उनमें कैमिकल का इस्तेमाल किया जाता है। पैकेजिंग भी प्लास्टिक पैक में होती है। एक तो प्रोडक्ट में कैमिकल का उपयोग, ऊपर से प्लास्टिक के हानिकारक तत्व और माइक्रो प्लास्टिक का खतरा। अब तो इंस्टेंट नूडल्स,पोहा, और तैयार परांठे तक मिल रहें हैं।
बाजार अपने मुनाफे के लिए हमें जबरन भोजन के मामले में फ़ास्ट बना रहा। कभी हम जमीन पर बैठकर भोजन करते थे, फिर टेबल मेज पर करने लगे और अब तो खडे होकर या चलते भागते, इतनी भी क्या जल्दी ।”
आप आटा की गुणवत्ता ही देखिए। बाजार के पैकेट बंद आटा की कई वेराइटी ऐसी है जिसमें सिंथेटिक प्रिजर्वेटिव्स मिलाए जाते हैं ताकि वे लंबे समय तक खराब न हों।, कुछ कंपनियां आटे को फोर्टिफाईड कहकर सिंथेटिक विटामिन या आयरन मिलाती है। इन सब से पेट की गंभीर बीमारियों का खतरा रहता है ‌।
लाइव ग्राइडिंग वाला स्टोर
संकेत बड़े उत्साह से  FRESHORA EARTH   के अपने खुबसूरत स्टोर के शो रूम में एक शीशा लगी जगह दिखाते हैं जिसके उस पार तमाम अत्याधुनिक ग्राइडिंग मशीनें लगी हैं। वे इन्हें दिखाते हुए बताते हैं कि यहां हमने कच्ची घानी और पक्की घानी दोनों तरह की मशीनें लगाई हुई हैं। इसके साथ मसाला, बेसन , सत्तू और अन्य सामग्रियों को पिसने वाली मशीनें भी लगी हैं। वे कहते हैं कि
पहले घरों में गेहूं धोकर, सुखाकर चक्की में पिसवाते थे ‌ । आज के शहरी या फिर फास्ट लाइफ एरा में हमने इससे दूरी बना ली। अपार्टमेंट कल्चर ने आंगन भी खत्म कर दिया और खुद के छत की धूप भी। ऐसे में हम उन्हें फिर से गेहूं खरीद कर पिसवाने का सॉल्यूशन दे रहे हैं।”
हम आधुनिकता के साथ शुद्धता की बात कर रहे हैं।
हर वर्ग के लोगों की दिलचस्पी 
कस्टमर बेस के बारे में बताते हुए संकेत कुमार कहते हैं कि जब हम इस  स्टोर की परिकल्पना कर रहे थे तो हमें लगा था कि एक खास वर्ग ही हमारे कस्टमर होंगे पर यह काफी दिलचस्प है कि हमारे यहां हर वर्ग के लोग खरीदारी करने आ रहे हैं। यहां स्टूडेंट भी आ रहें हैं और मजदूर वर्ग भी, नौकरीपेशा लोग भी और उच्च वर्ग के लोग भी। मुझे  लगता है यह सब सेहत के प्रति जागरूक का ही असर है।
इस कारण नहीं बेचते आनलाइन 
संकेत कहते हैं कि आज दौर ऑनलाइन बाजार का है पर हमने ऑनलाइन मार्केटिंग से दूरी बना रखी है। हमरी नीति वहां न जाने की है। वजह यह की हम लोगों को भरोसा और शुद्धता की बात कहते हैं तो करते भी हैं। इसमें पैकैजिंग बड़ा महत्वपूर्ण है । ऑनलाइन बाजार में जाने पर हमें अपने प्रोडक्ट को प्लास्टिक की बोतलों या रैपर में पैक करना पड़ेगा या सेहत के लिए बेहतर नहीं माना जाता। और हमारा मकसद सिर्फ पैसा कमाना नहीं। समाजिक बदलाव लाना भी है।
कीमत भी किफायती 
संकेत कुमार के मुताबिक FRESHORA EARTH के स्टोर में ऐसा नहीं की कीमतें बाजार से ज्यादा या काफी महंगी हो। हमने बाजार के अनुसार ही कीमतें रखी है। कुछ तो बाकी से भी सस्ती पर शुद्धता और ताजगी की गारंटी के साथ।
 बिहार से शुरूआत के मायने 
मैं बिहार का रहने वाला हूं और मुझे इसपर गर्व है। आज हम नौकरी और बिजनेस  बिहार में नहीं करना चाहते।  ऐसी एक सोच बन गई है कि यहां लोगों का सहयोग नहीं मिलता मेरी धारणा बिल्कुल अलग है। दूसरी बात मैट्रो शहरों में तो कई विकल्प मौजूद होते हैं बिहार के लोगों को भी अच्छी सुविधाओं और नये आइडिया वाले स्टोर चाहिए। हमने इसी कारण पटना से शुरूआत की है।
शुरुआत से पहले मजबूत रिसर्च 
संकेत यह बताते हैं कि हमने स्टोर खोलने से पहले दो साल तक मजबूत रिसर्च किया। हम देश भर के एक्जीविशन में गए। खेती,किसानी, उपज, को जाना समझा। मिलेट पर गहराई से जानकारी जुटाई  फिर तैयार हुआ इस स्टोर का आईडिया। दरअसल हमारे एक रिलेटिव ने ड्राई-फ्रूट्स और चाकलेट का एक स्टोर खोला था। मुझे भी इसे नजदीक से देखने – समझने का मौका मिला। मेरी इच्छा भी ड्राई-फ्रूट्स स्टोर खोलने की थी पर देश भर के एग्जीबिशन देखने के बाद मेरी धारणा बदली और मैं अब टोटल किचन सॉल्यूशन के साथ मौजूद हूं।
फिलवक्त संकेत अपने स्टोर  FRESHORA EARTH में सिर्फ अपना प्रोडक्ट ही नहीं बेच रहे वह हर स्टोर  विजिटर को मोटे अनाज के प्रयोग और फायदों के बारे में भी बताते हैं ताकि लोग का भोजन स्वस्थ हों, लोग स्वस्थ हों और स्वस्थ हो हमारा भारत।
और अंत में हम संकेत कुमार के इस खास  स्टोर FRESHORA EARTH का पता और संपर्क सूत्र भी बता देते हैं ताकि आप भी  मिलेट के जायके से सेहत और स्वाद दोनों का आनंद लें पाएं
तो पता ये रहा
20 Kasturba path , North S.K  Puri,
Boring Road ,Patna
Phone number : 9942828095
7903313674
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दुनिया भर में पेड़ों को दोस्त बनाने का हुनर सिखला रही देवोप्रिया की कहानी पढ़िए

मेरी दो मां है, एक मुझे जन्म देने वाली मां और दूसरी धरती मां जिसके प्यार के बिना मेरा इस धरती पर जीवित रहना नामुमकिन था। इन दोनों मां ने मुझे खुब स्नेह दिया। धरती मां ने हरी भरे पेड़, पत्ते, रंग बिरंगे फूल, पक्षी बलखाती हुई नदियां और मस्त मलंग झरने मुझे उपहार में दिए। मुझे खुश रहने की कला सीखाई। वो अपने सभी बच्चों से बहुत प्यार करतीं हैं। तो क्या हम सब का कुछ फ़र्ज़ हमें इतना चाहने वाली मां के प्रति नहीं बनता? बनता है ना! मैं धरती मां के इसी कर्ज को चुकाने के लिए अब तक दुनिया भर में हजारों बच्चों से मिल चुकी हूं मैं उनसे बस एक   प्रॉमिस करवती हूं     कि धरती मां को खुशहाल रखें।” कहती हैं देबोप्रिया।

 

देवोप्रिया पर्यावरण संरक्षण पर काम करने वाली संस्था तरूमित्र से जुड़ी हैं। और अब तक भारत समेत कई देशों में जाकर पर्यावरण संरक्षण का अलख जगा रही हैं। देवो प्रिया युनाइटेड नेशन्स में भी इस विषय पर आपने विचार रख चुकी हैं।
देवोप्रिया कहती हैं कि मैंने इसके लिए बिहार, बंगाल , केरल, सिक्किम, महाराष्ट्र, मेघालय आदि राज्यों के स्कूलों का दौरा कर वहां के छात्र – छात्राओं से मुलाकात की है मैं उनसे पर्यावरण संरक्षण की अपील करने से पहले प्रकृति से जुड़ाव महसूस कराने की पहल करती हूं।

बच्चे बनाएंगे हरी दुनिया

देवो प्रिया कहती हैं कि हम सभी जानते हैं कि बच्चे ही कल हमारे जिम्मेदार नागरिक होंगे। इनके हाथों में कल के देश और दुनिया का भविष्य है। ऐसे में अगर बच्चे ही जागरूक हो जाएं तो समस्याओं का काफी हद तक समाधान निकल जाएगा। यह काफी चौंकाने वाला होता है कि शहर के स्कूलों में पढ़ने वाले काफी बच्चों ने गौरेया को नहीं देखा है। काफी बच्चों ने कौवे का कांव -कांव खुद के कानों से नहीं सुना है। आज अपार्टमेंट के बंद फ्लैट में रहते हैं।

गांवों की हालत भी काफी तेजी से बदल रही है। अब वहां भी आंगन वाले मकान काफी कम बचे हुए हैं। शहरी संस्कृति की खुब नकल गांवों में हो रही है। पेड़ कटते जा रहें हैं और कंक्रीट का दायरा बढ़ता जा रहा है। कुएं, तालाब, पाइन, आदि की संख्या तेजी से घटी है । इन सब के पीछे एक कारण यह भी है कि हमने प्रकृति से दोस्ती छोड़ दी है। पहले गांवों में कुओं का खुब प्रयोग होता था। लोग वहां के पानी का प्रयोग करते, यह जगह लोगों के मेल जोल की जगह भी थी। नहाने और पानी भरने के दौरान लोगों की आपसी बातें – मुलाकातें भी होती और शारीरिक श्रम भी। कुआं जल संरक्षण के लिए काफी उपयोगी होता था। समाज के लोग उसकी देखरेख करते। नियत समय पर साफ सफाई की जिम्मेदारी भी समाज के लोगों की होती। अब फास्ट लाइफ के पीछे या फिर एकल होते समाज में कुआं अकेला हो गया और बाद में उसे भर कर वहां भवन बना दिए गए। अब एक बटन दबाने पर पर ठंडा और गर्म पानी तो उपलब्ध है पर हमारा वाटर लेवल पाताल में चला गया है। जलवायु परिवर्तन का असर मौसम विज्ञान की गणना से बाहर आ शहरों और गांवों तक में दिख रहा है।

हम विकास के विरोधी न हों पर यह विकास प्रकृति की खुबियों के साथ साथ चलना चाहिए न की प्रकृति की आत्मा को कष्ट पहुंचा कर। अगर हम सभी बच्चों की सोच बदलने में कामयाब हो गए तो यह दुनिया खुद बदल जाएगी। मेरी कोशिश बस सोच बदलने की है ।

छोटी शुरुआत हीं सही

देवोप्रिया बताती है कि हम तुरंत जंगल नहीं लगा सकते पर आपने घर के छत या बालकोनी में चार गमले तो लगा सकते हैं। पंक्षियों के लिए छोटे घोंसले और दाना पानी तो रख सकते हैं यही से बदलाव की शुरुआत हो सकती है। हम तरूमित्र में बच्चों को तरह तरह के वर्कशॉप द्वारा प्रकृति से दोस्ती करना सीखाते है। हम वहां बिना उर्वरक और किटनाशक के आर्गेनिक फार्मिंग भी करते हैं। जब स्कूली बच्चे धान की रोपाई करते हैं तो उसका उत्साह देखने लायक होता है। यह सब मुझे काफी सुकून देता है। मुझे लगता है कि मैं धरती मां का क़र्ज़ चुका पा रही हूं।

यहां से मिली प्रेरणा

देवो प्रिया कहती हैं कि स्कूल में पढ़ाई के दौरान मैं मुझे अपने शिक्षक से प्रकृति से जुड़ाव की प्रेरणा मिली। मैं कक्षा 6 में थी तभी हमने तरुमित्र का दौरा किया था और यहां काफी कुछ जाना- सीखा। मन में यह बात तभी से आ गई कि धरती को बचाना जरूरी है। उसी वक्त वहां तरुमित्र के संस्थापक फादर रॉबर्ट से मुलाकात हुई ‌ । फादर रॉबर्ट से मैं काफी प्रभावित हुई। मैं क्लास की मॉनिटर रहा करती थी तो प्रखरता तो मेरे अंदर थी। आगे चलकर फादर रॉबर्ट ने मुझे तरूमित्र से जुड़ने का मौका दिया और फिर हरित बदलाव की मेरी मुहिम ने गति पकड़ ली।

 

क्या है तरूमित्र

तरूमित्र एक प्रसिद्ध पर्यावरणीय संस्था है, जिसकी स्थापना 1988 में पटना, बिहार में हुई थी। इसका मुख्यालय पटना में स्थित है और यह संस्था विशेष रूप से युवाओं को पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रेरित करती है। तरूमित्र का उद्देश्य वृक्षारोपण, जैव विविधता संरक्षण और हरित जीवनशैली को बढ़ावा देना है। यह संस्था स्कूलों और कॉलेजों के छात्रों को शामिल कर पर्यावरणीय जागरूकता अभियान चलाती है। तरूमित्र को यूनिस्को (UNESCO) द्वारा मान्यता प्राप्त है,जो इसकी वैश्विक स्तर पर प्रासंगिकता और योगदान को दर्शाता है।

गरीब बच्चों को पढ़ाती भी हैं देवोप्रिया

देवोप्रिया दत्ता   कहती हैं कि आप कुछ अच्छा कर के देखो आपको खुद एक सुकून मिलेगा। मैं लगभग हर दिन किसी न किसी स्कूल कालेज में अपने कैंपेन के सिलसिले में जाती रहती हूं।शाम का समय मैं गरीब बच्चों को बढ़ाने में बिताती हूं। मैं पटना वुमेन्स कॉलेज में चलने वाले शाम के निर्धन बच्चों की क्लास में पढ़ाती हूं। यह मुझे खुशी देता है।

मिला परिवार का साथ

देवोप्रिया बताती है कि मुझे पर्यावरण के प्रति किमी करने की ताकत देने में परिवार के लोगों का बड़ा योगदान है। मेरी मां एक शिक्षिका हैं और पिता इंजीनियर दोनों ने मेरे फैसले का सम्मान किया है। मेरे नाना जी जो एक रिटायर्ड आईएएस अधिकारी हैं वे भी मेरी हौसला आफजाई करते रहते हैं और प्रकृति संरक्षण हेतु मुझे प्रेरित करते हैं।

पेट लवर भी है देवोप्रिया दत्ता 

दोवोप्रिया को पालतू जानवरों से भी काफी लगाव है ‌ उन्होंने अपने घर में कुत्ते और बिल्ली को पाल रहा है। फुर्सत का लम्हा इनके साथ बितता है। वे कहती हैं कि बेजुबान हमें कभी हर्ट नहीं करते। वे काफी इमोशनल होते हैं। ये मेरे अच्छे दोस्त हैं। हमें बेजुबानों की भाषा समझने की जरूरत है।

माटी की सौंधी महक में है जीवन

देवो प्रिया कहती हैं कि हमने एक तरूमित्र कल्ब भी बनाया हुआ है। हम रिसाइक्लिंग पर काफी ध्यान देते हैं। हमारे आश्रम में ये सब कुछ आपको देखने को मिलेगा। चाहे वो मिट्टी की लेप वाली दीवार हो या फिर कुएं में बना क्लास रूम । हमें आज वैकल्पिक ईंधन और उर्जा स्रोत पर जोर देने की जरूरत है जो कार्बन फुटप्रिंट को कम कर सके। हम तरूमित्र में बिजली का प्रयोग काफी कम करते हैं यहां सोलर पावर का प्रयोग होता है। कुछ मिलाकर एक अच्छी जीवनशैली ही हमें बेहतर बना सकती है और इसका रास्ता कंक्रीट की दीवारों से नहीं पेड़- पौधों और मिट्टी की सौंधी महक के बीच से निकलता है।।देवोप्रिया समाज विज्ञान की छात्रा रही है। वो लोगों से अपील करते हुए कहती हैं कि

“हम सब को अच्छा सोचने और करने की जरूरत है यह मत सोचिए कि आप चुपचाप बुरा करेंगे तो कोई देखेगा नहीं। हम सब के उपर ईश्वर ने अपना सीसीटीवी कैमरा लगाया हुआ है। वहां हमारे सभी कर्मों की रिकार्ड रखा है फिर हम अच्छे काम क्यूं न करें, एक अच्छा इंसान क्यूं न बने। चलिए हम मिलकर फिर से धरती को खुशियों से हरी – भरी धरती बनाते हैं।”

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positive thinking के magic से जिंदगी बनेगी हसीन

हमारी ज़िंदगी में हर दिन नए अनुभव, नई चुनौतियाँ और नए फैसले लेकर आता है। इन सबका सामना हम कैसे करते हैं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि हम सोचते कैसे हैं। हमारी सोच ही हमारे जीवन की दिशा तय करती है। अगर हम अपने विचारों को सकारात्मक बनाए रखें, तो जीवन की कठिन राहें भी आसान लगने लगती हैं। यही है सकारात्मक सोच का जादू — एक ऐसी ताकत जो हालात नहीं, हमारी प्रतिक्रिया को बदलती है।

पॉजिटिव सोच क्या है?
सकारात्मक सोच का मतलब है — हर स्थिति में उम्मीद देखना, हर गिरावट में सीख ढूंढना, और हर कठिनाई में समाधान तलाशना। यह कोई जादू की छड़ी नहीं है, जो पलक झपकते ही सबकुछ बदल दे, बल्कि यह एक नजरिया है, जो हमें भीतर से मजबूत बनाता है।

पॉजिटिव थिंकिंग से क्या बदलता है?

आत्मविश्वास में बढ़ोतरी: जब हम अच्छा सोचते हैं, तो खुद पर विश्वास बढ़ता है।

तनाव में कमी: सकारात्मक सोच तनाव को कम कर, मानसिक शांति देती है।

रिश्तों में सुधार: जब हम पॉजिटिव होते हैं, तो हमारे व्यवहार में विनम्रता, समझदारी और सहानुभूति आती है।

जीवन के प्रति उत्साह: अच्छे विचारों से दिन की शुरुआत करें, तो पूरा दिन ऊर्जावान बन जाता है।

सफलता की राह आसान: सकारात्मक सोच हमें चुनौतियों का डटकर सामना करना सिखाती है, जिससे हम अपने लक्ष्यों के करीब पहुंचते हैं।

सुंदर सोच से बनें सुंदर जीवन

कैसे लाएं पॉजिटिव सोच को अपने जीवन में?

हर सुबह संकल्प लें: आज का दिन अच्छा रहेगा, मैं खुद को बेहतर बनाऊंगा।

नेगेटिव विचारों को चुनौती दें: खुद से पूछें — “क्या यह विचार सच में मेरे लिए मददगार है?”

आभार प्रकट करें: रोज़ तीन चीज़ों के लिए शुक्रिया कहें।

अच्छी संगत बनाएं: ऐसे लोगों से जुड़ें जो प्रेरणा देते हैं।

खुद से प्यार करें: अपनी कमियों को स्वीकारें और खुद को सुधारने के लिए प्रेरित करें।

प्रेरणादायक किताबें पढ़ें, पॉडकास्ट सुनें और मोटिवेशनल कहानियों से खुद को जोड़ें।

याद रखें:
सकारात्मक सोच का मतलब यह नहीं कि आप हर समय खुश रहें या हर समस्या को नज़रअंदाज़ करें। इसका मतलब है — हर परिस्थिति में आशा बनाए रखना, खुद पर यकीन रखना, और निराशा के बीच भी एक नई शुरुआत की उम्मीद जगाए रखना।

ज़िंदगी में मुश्किलें हर किसी के पास आती हैं, लेकिन जो लोग पॉजिटिव सोच रखते हैं, वे उन्हें मौके में बदल देते हैं। उनके चेहरे पर मुस्कान होती है, दिल में उम्मीद और कदमों में मजबूती।

“सोच बदलो, दुनिया बदल जाएगी।”
TheBigPost.com पर हम मानते हैं कि हर इंसान में अपनी ज़िंदगी को संवारने और दूसरों को प्रेरित करने की शक्ति होती है। अगर आपकी जिंदगी में पॉजिटिव सोच ने कोई बदलाव लाया है, तो अपनी कहानी हमारे साथ साझा करें। क्योंकि आपकी कहानी, किसी और के जीवन में बदलाव ला सकती है।

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छोटे शहरों से ऐसे करें बड़े सपने साकार

 

छोटे शहरों के युवाओं के पास सपनों की कोई कमी नहीं होती, लेकिन संसाधनों की सीमाएं, अवसरों की कमी और आसपास का नकारात्मक माहौल कई बार उनके आत्मविश्वास को तोड़ देता है। लगता है संभावनाओं के दरवाजे बंद हो गए हैं। न नामी स्कूल कॉलेज, न ब्रांडेड कोचिंग सेंटर और न समुचित माहौल।
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल होता है — क्या छोटे शहरों में हम वाकई कुछ बड़ा कर सकते हैं?

और उत्तर है – हां, बिल्कुल कर सकते हैं। फर्क बस नजरिए और रणनीति का है।

तो फिर देर क्यों करना, चलिए छोटे शहरों से कुछ बड़ा करते हैं आपको बस इन टिप्स पर करना है अमल। कर के देखिए बदलाव आएगा।

खुद को जानें, सपनों को समझें

करियर की शुरुआत अपने आप से होती है।आपकी रुचि क्या है? किन विषयों में आप बेहतर हैं? क्या आप नौकरी करना चाहते हैं या कुछ नया शुरू करना? इन सवालों का जवाब आपको सही दिशा की ओर ले जाएगा।

इंटरनेट को बनाएं अपना गुरू

छोटे शहरों में भले ही महंगी कोचिंग या प्रोफेशनल गाइडेंस की कमी हो, लेकिन इंटरनेट एक समान अवसर देने वाला प्लेटफॉर्म है। YouTube, Coursera, Udemy जैसे प्लेटफॉर्म से मुफ्त और सस्ती कोर्सेज़ करें। सरकारी योजनाओं, स्कॉलरशिप, इंटर्नशिप की जानकारी रखें। सोशल मीडिया पर ऐसे पेज और चैनल्स फॉलो करें जो करियर गाइडेंस देते हों।

अंग्रेज़ी और डिजिटल स्किल्स पर करें काम

भाषा और तकनीक दो सबसे बड़े ब्रिज हैं जो गांव-शहर की दूरी मिटाते हैं। रोज़ 15-30 मिनट अंग्रेज़ी बोलना, पढ़ना या सुनना शुरू करें। Excel, Canva, PowerPoint, Google Tools जैसी स्किल्स सीखें — ये हर क्षेत्र में काम आती हैं।

छोटे मौके, बड़ी सीख

छोटे शहरों में मिलने वाले किसी भी मौके को छोटा न समझें। लोकल NGOs, मीडिया हाउस, स्कूल, कोचिंग या सरकारी प्रोग्राम्स से जुड़ें। वॉलंटियरिंग, इंटर्नशिप या पार्ट टाइम जॉब से व्यावहारिक अनुभव लें।

गूगल पर खोजिए, सफलता के दरवाज़े

कई बार हम केवल अपने शहर या जान-पहचान तक ही सीमित रहते हैं। देशभर के कॉलेजों, संस्थानों, प्रतियोगिताओं और स्कॉलरशिप्स की जानकारी गूगल पर खोजें। नए क्षेत्रों को जानें – जैसे डिजिटल मार्केटिंग, साइबर सिक्योरिटी, एग्रीटेक, कंटेंट क्रिएशन, ई-कॉमर्स आदि।

प्रेरणा लें, तुलना नहीं करें

आप Instagram पर किसी बड़े शहर के छात्र की सफलता देखकर दुखी हो सकते हैं, लेकिन याद रखें — हर किसी की रेस अलग है।

अपने संघर्ष पर करें गर्व 

अपने विकास की तुलना कल के खुद से करें, न कि किसी और से। असफलता से डरें नहीं, सीखें ।छोटे शहरों के युवा अक्सर सोचते हैं कि एक बार फेल हो गए तो सब खत्म। लेकिन असफलता ही अगली सफलता का बीज होती है। गलतियाँ करें, लेकिन उनसे सीखें।

जहां हैं, वहीं से शुरू करें

छोटे शहर में होना कोई कमजोरी नहीं, बल्कि एक विशेषता है — जहां ज़िंदगी सिखाती है कि कैसे कम में ज्यादा किया जाए। अगर आप मेहनती, सीखने को तत्पर और आत्मविश्वास से भरपूर हैं — तो कोई ताक़त आपकी कहानी को रोक नहीं सकती।

छोटे शहरों में रहने वाले का सपना छोटा नहीं होता— उसे पंख चाहिए, और वो पंख आप खुद बना सकते हैं और छू सकते हैं सफलता का आकाश ।

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April fool बनाया तो उनको गुस्सा आया…

“अप्रैल फूल बनाया तो

उनको गुस्सा आया

तो मेरा क्या कुसूर

ज़माने का कुसूर
जिसने दस्तूर बनाया”

यह हिन्दी फिल्म का गीत है जो कभी काफी प्रसिद्ध हुआ था। इस फिल्म से उन दिनों अप्रैल फूल के दस्तूर की लोकप्रियता का अंदाजा भी लगता है।

अप्रैल फूल दिवस हर वर्ष 1 अप्रैल को मनाया जाता है। यह दिन हल्के-फुल्के मज़ाक, हास्य और विनोद से भरा होता है, जब लोग एक-दूसरे को बेवकूफ बनाकर हंसी-ठिठोली करते हैं। यह परंपरा सदियों पुरानी है और इसका मूल उद्देश्य लोगों के जीवन में खुशियाँ भरना और रिश्तों को मज़बूत करना है।

हास्य  हैं जिंदगी का रस 

अप्रैल फूल दिवस केवल मज़ाक करने का अवसर नहीं है, बल्कि यह रिश्तों को प्रगाढ़ बनाने का एक जरिया भी है। हल्के-फुल्के मज़ाक और विनोद से तनाव दूर होता है और सामाजिक मेलजोल बढ़ता है। वैज्ञानिक शोध भी यह बताते हैं कि हंसी मानसिक स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होती है। यह तनाव कम करने, रक्तचाप को नियंत्रित करने और जीवन में सकारात्मकता लाने में सहायक होती है।

इस दिन किए जाने वाले मज़ाक आमतौर पर हानिरहित होते हैं, लेकिन कभी-कभी लोग इसे अति गंभीर बना देते हैं, जिससे असुविधा उत्पन्न हो सकती है। इसलिए यह ध्यान रखना आवश्यक है कि मज़ाक ऐसा हो जिससे किसी की भावनाएँ आहत न हों।

कहानी अप्रैल फूल दिवस की शुरुआत की 

अप्रैल फूल दिवस की शुरुआत को लेकर कई कहानियाँ और मान्यताएँ हैं। एक लोकप्रिय मान्यता के अनुसार, 16वीं शताब्दी में फ्रांस में कैलेंडर में बदलाव किया गया था। पहले नया साल 1 अप्रैल को मनाया जाता था, लेकिन 1582 में पोप ग्रेगरी XIII ने ग्रेगोरियन कैलेंडर लागू किया, जिससे नया साल 1 जनवरी को मनाया जाने लगा। हालाँकि, कुछ लोग इस बदलाव से अनभिज्ञ थे और वे 1 अप्रैल को ही नया साल मनाते रहे। ऐसे लोगों को मूर्ख समझकर उनके साथ मज़ाक किया जाता था, और यही परंपरा आगे चलकर अप्रैल फूल दिवस के रूप में स्थापित हुई।

कुछ इतिहासकारों का मानना है कि अप्रैल फूल की जड़ें रोमन त्योहार “हिलेरिया” (Hilaria) से जुड़ी हो सकती हैं, जिसमें लोग वसंत के आगमन पर एक-दूसरे के साथ हंसी-मजाक और वेशभूषा बदलकर मनोरंजन करते थे। इसके अलावा, भारत में भी “होली” का त्योहार एक प्रकार से हंसी-मजाक और रंगों से भरा होता है, जिसे अप्रैल फूल से जोड़ा जा सकता है।

ई गैजेट्स के बीच अप्रैल फूल दिवस 

आज के डिजिटल युग में अप्रैल फूल दिवस ने एक नया रूप ले लिया है। पहले जहाँ यह केवल व्यक्तिगत स्तर पर मज़ाक तक सीमित था, वहीं अब सोशल मीडिया और इंटरनेट के ज़रिए यह बड़े स्तर पर फैल चुका है। बड़ी कंपनियाँ और मीडिया हाउस भी इस दिन मज़ेदार झूठी खबरें और विज्ञापन जारी करते हैं, जिससे लोगों का मनोरंजन होता है।

हालाँकि, सोशल मीडिया पर झूठी सूचनाओं के तेजी से फैलने के कारण कुछ लोग इस दिन के महत्व को गलत तरीके से प्रयोग करने लगते हैं। फर्जी खबरें और अफवाहें कई बार हानिकारक साबित हो सकती हैं। इसलिए, यह आवश्यक हो गया है कि लोग इस परंपरा को एक स्वस्थ और सकारात्मक दृष्टिकोण से अपनाएँ।

ऐसे बढ़ी भारत में अप्रैल फूल की लोकप्रियता

भारत में अप्रैल फूल दिवस बीसवीं सदी में लोकप्रिय हुआ, जब अंग्रेज़ों के प्रभाव से यह परंपरा यहाँ भी प्रचलित हुई। आज के समय में स्कूल, कॉलेज और ऑफिसों में इस दिन को बड़े उत्साह से मनाया जाता है। विद्यार्थी और सहकर्मी एक-दूसरे को हँसी-मज़ाक भरे चुटकुले सुनाते हैं और हल्के-फुल्के प्रैंक करते हैं। कई बार रेडियो, टेलीविजन और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर भी अप्रैल फूल से जुड़े मनोरंजक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

अप्रैल फूल मनाएं पर इन बातों का रखें ध्यान 

अप्रैल फूल दिवस हमें हँसी और मस्ती का एक अनोखा अवसर देता है, लेकिन यह भी महत्वपूर्ण है कि हम अपनी मर्यादा बनाए रखें। इन बातों पर ध्यान देकर इस परंपरा का आनंद उठाया जा सकता है:

मज़ाक को सकारात्मक बनाएँ – हल्के और हास्यप्रद मज़ाक करें, जिससे सभी को खुशी मिले।

भावनाओं का सम्मान करें – ऐसा कोई मज़ाक न करें जिससे किसी को ठेस पहुँचे।

सुरक्षित प्रैंक करें – शारीरिक या मानसिक नुकसान पहुँचाने वाले मज़ाक से बचें।

फर्जी खबरें फैलाने से बचें – सोशल मीडिया पर झूठी खबरें शेयर करने से बचें, जिससे किसी को परेशानी न हो।

अप्रैल फूल दिवस हास्य, मस्ती और सामाजिक मेलजोल का प्रतीक है। यह न केवल हमें हँसाने का काम करता है, बल्कि मानसिक तनाव को भी कम करता है। वर्तमान समय में, जब लोग भागदौड़ भरी ज़िंदगी में व्यस्त रहते हैं, तो ऐसे मौकों का विशेष महत्व होता है। हालाँकि, इसका सही ढंग से आनंद उठाना ही इसकी सफलता की कुंजी है। यदि हम इस परंपरा को जिम्मेदारी और समझदारी के साथ मनाएँ, तो यह न केवल हमारे जीवन में खुशियाँ लाएगा, बल्कि समाज में भी सकारात्मक ऊर्जा का संचार करेगा।

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“Life’s Journey” बड़े धोखे हैं इस राह में

जीवन की राह में हम कई रिश्ते बनाते हैं, कई उम्मीदें पालते हैं और कई सपनों को साझा करते हैं। भरोसे की इस डोर से हम अपने अपनों को जोड़ते हैं, लेकिन जब वही डोर टूट जाती है, जब वही अपना दिया हुआ विश्वास टूटकर बिखर जाता है, तो जीवन का अर्थ ही बदल जाता है।

धोखा एक ऐसा शब्द है, जो केवल एक क्षण में दिल को चीरकर रख देता है। यह केवल एक अनुभव नहीं, बल्कि एक भावना है, जो आत्मा तक को झकझोर देती है। हम जिसे अपनी आत्मा का अंश समझते हैं, जब वही हमें धोखा दे जाता है, तो यह अहसास दुनिया की सबसे पीड़ादायक अनुभूति बन जाता है।

जब भरोसा टूटे, तो क्या करें?

धोखे की चोट गहरी होती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि जीवन यहीं रुक जाए। सबसे पहले, हमें अपनी भावनाओं को स्वीकार करना होगा। रोना, दुखी होना या खुद से सवाल करना गलत नहीं है, लेकिन इसमें ज्यादा देर तक उलझे रहना खुद के साथ अन्याय है।

खुद को संभालने के लिए जरूरी कदम:

स्वीकार करें, लेकिन खुद को दोष न दें

जब हमें धोखा मिलता है, तो पहला सवाल यही आता है—’मैंने ऐसा क्या किया कि मेरे साथ ऐसा हुआ?’ लेकिन सच यह है कि हर किसी के फैसले के पीछे उनकी अपनी वजहें होती हैं, और हर किसी के कर्म उसकी अपनी जिम्मेदारी होती है। खुद को दोष देना बंद करें।

भावनाओं को दबाएं नहीं, लेकिन उन पर काबू पाएं

दर्द को अनदेखा करना या खुद को व्यस्त रखकर भूलने की कोशिश करना समाधान नहीं है। हमें अपनी भावनाओं से गुजरने देना चाहिए, लेकिन उन्हें अपने जीवन पर हावी नहीं होने देना चाहिए।

विश्वास की शक्ति को फिर से जगाएं
यह सच है कि एक धोखा हमें पूरी दुनिया से अविश्वास करने के लिए मजबूर कर सकता है, लेकिन यह भी सच है कि दुनिया में अभी भी सच्चे, ईमानदार और भरोसेमंद लोग हैं। एक व्यक्ति के धोखे को पूरी दुनिया पर लागू न करें।

खुद को प्राथमिकता दें
खुद को मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ रखना इस समय सबसे ज्यादा जरूरी होता है। योग, मेडिटेशन, और किताबें पढ़ना, ये सब हमारे आंतरिक संतुलन को बनाए रखने में मदद कर सकते हैं।

सीख लेकर आगे बढ़ें
हर अनुभव हमें कुछ सिखाता है। धोखा भी हमें जीवन के गहरे सबक देता है। इससे हमें यह समझ में आता है कि कब, कैसे और किस पर भरोसा करना चाहिए। यह हमें और मजबूत बनाता है।

धोखा एक दर्दनाक सच्चाई है, लेकिन यह जीवन का अंत नहीं है। जब भरोसा टूटता है, तो हमें खुद को समेटने में समय लग सकता है, लेकिन याद रखें—आपकी असली ताकत इस बात में है कि आप इस अंधेरे से कैसे बाहर आते हैं। जीवन एक यात्रा है और हर मोड़ हमें कुछ सिखाने आता है। धोखे से उबरकर जब आप दोबारा अपने सपनों की ओर कदम बढ़ाएंगे, तो पाएंगे कि आप पहले से कहीं ज्यादा मजबूत बन चुके हैं।

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