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“सर्वे भवन्तु सुखिनः ”  को आत्मसात करते हुए संपन्न हुआ संत माइकल्स हाई स्कूल , पटना का 51वाँ वार्षिक खेल-कूद महोत्सव

आंखों में जीत का सपना, नजर लक्ष्य पर, कड़ा अनुशासन और मन में ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ का राग ले जब खिलाड़ी मैदान में उतरे तो जाड़े की नर्म धूप और सिंदूरी हो दर्शकों की तालियों पर खिलखिलाने लगी। आम और खास सभी एक हो खेल और खिलाड़ियों की धुन में खो गए। बीच-बीच में गूंजतीं तालियां इस महोत्सव को और भी गुलजार कर देती। मौका था ‘संत माइकल्स हाई स्कूल’ पटना के विशाल खेल मैदान में आज 51वाँ वार्षिक खेल-कूद महोत्सव 2025 का। एक रिपोर्ट पढ़िए…

‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ के आदर्श वाक्य को आत्मसात करते हुए सेंट माइकल्स हाई स्कूल, पटना के विशाल खेल मैदान में आज 51वाँ वार्षिक खेल-कूद महोत्सव 2025 भव्यता, उत्साह और अनुशासन के उत्कृष्ट संगम के साथ आयोजित हुआ। लगभग 3,500 विद्यार्थियों की अप्रतिम भागीदारी और हजारों अभिभावकों एवं दर्शकों की गरिमामयी उपस्थिति ने पूरा वातावरण उत्साह, ऊर्जा, सौहार्द और उमंग से भर दिया।

इन विशेष अतिथियों रही उपस्थिति 

कार्यक्रम की शोभा बढ़ाने हेतु बतौर मुख्य अतिथि माननीय न्यायमूर्ति सत्यव्रत वर्मा (पटना उच्च न्यायालय) उपस्थित रहे।
विशिष्ट अतिथि के तौर पर
आईएएस: श्री कुमार रवि, श्री हिमांशु शर्मा, श्री यशपाल मीणा, श्री शेखर आनंद
आईपीएस: श्री कार्तिकय शर्मा, श्री रवि रंजन की उपस्थिति रही।सभी  विशिष्ट अतिथियों ने प्रतिभागियों के उत्साहवर्धन हेतु प्रेरक संबोधन भी दिया।

प्रधानाचार्य फादर ए. क्रिस्तु सावरिराजन एस.जे. ने सभी अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि 

खेल न केवल शरीर को मजबूत बनाते हैं, बल्कि नेतृत्व, अनुशासन, साहस और टीमवर्क जैसी अमूल्य जीवन-सीख भी प्रदान करते हैं।”

ऐसा रहा उद्घाटन समारोह का क्षण

कार्यक्रम की शुरुआत टॉर्च रिले, ध्वजारोहण, भव्य मार्च-पास्ट, और एथलीट ओथ के साथ हुई।
मार्च-पास्ट का नेतृत्व वैभव आर्य (रेड), इशिका हरलालका (ग्रीन), शिवानी राज (गोल्ड) और प्रज्ञान (ब्लू) ने किया।
स्कूल कैप्टन मिशेल स्कारलेट जे को ध्वज सौंपा गया।

रंगारंग प्रस्तुतियों ने जीता दर्शकों का दिल

स्कूल के नन्हे-मुन्ने और वरिष्ठ विद्यार्थियों द्वारा प्रस्तुत—
जुम्बा डांस, Hues of Love, Butterfly Blooms & Hoops Delight, Flower Dance,
Stars of Unity Drill, कराटे और योग प्रदर्शन किया ।   प्रस्तुति के दौरान  तालियों की गूँज के बीच समानता और सौहार्द का अद्भुत संदेश फिजा में गूंज गया।

ये रही मुख्य खेल स्पर्धाएँ

रोमांच से भरी स्पर्धाओं में शामिल रहे:
100 मीटर, 75 मीटर स्प्रिंट
4×100 मीटर रिले
बाधा दौड़
800 एवं 1000 मीटर साइकिल रेस
टग ऑफ वॉर जिसमें खिलाड़ियों का जोश चरम पर पहुँचा।

एक नज़र प्रतियोगिता के परिणाम पर 

🏆 टीम चैंपियन — रेड हाउस | 528 अंक
🥈 ब्लू हाउस — 478
🥉 ग्रीन हाउस — 471
🏅 गोल्ड हाउस — 458

बेस्ट एथलीट – मुख्य वर्ग
सब-जूनियर (Boy): आदित्य राज | (Girl): नित्या अदिति
जूनियर (Boy): सौरभ कुमार | (Girl): आरात्रिका सिन्हा
इंटर (Boy): अरहम आसिफ | (Girl): ज्ञानवी
सीनियर (Boy): एबिल सुजन एवं शाश्वत वैभव आर्य | (Girl): अनिशा तिर्की

राष्ट्रीय गान के साथ हुआ समापन 

पुरस्कार वितरण, राष्ट्रीय गान और धन्यवाद प्रस्ताव (डॉ. मारी डिक्रूज़) के साथ कार्यक्रम गरिमामय तरीके से संपन्न हुआ।

मुख्य अतिथि ने विद्यार्थियों को संदेश दिया—
“जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलता का मूल मंत्र है— खेल भावना, टीमवर्क और निरंतर प्रयास।”

इस मौके पर विद्यालय के प्रधानाचार्य फादर ए. क्रिस्तु सावरिराजन ने कहा कि

सर्वे भवन्तु सुखिनः — यह महोत्सव सद्भाव, अनुशासन और एकता की भावना को सदैव प्रज्वलित रखे।”

यह खेल पर्व केवल पदकों की प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण, नेतृत्व क्षमता, भाईचारा और अनुशासन का उत्सव बनकर सभी के हृदय में अमिट छाप छोड़ गया।

 

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चटखदार ‘अचार’ की मजेदार कहानी ,आज जान ही लीजिए

सुबह के नाश्ते का गर्मागर्म पराठा हो या फिर लंच के चावल दाल की थाली, जबतक अचार का चटखारा न हो सभी जायकों का स्वाद फीका- फीका लगता है। अचार आ जाए तो भूख और खाने की स्पीड दोनों बढ़ जाती है।
हर भारतीय रसोई में एक कोना होता है — जहाँ धूप में सूखते हुए अचार के जार चमकते हैं। उनके भीतर सिर्फ मसाले नहीं, बल्कि पीढ़ियों की यादें, परंपराएँ और ममता सिमटी होती है। अचार, यानी स्वाद का वो खजाना जो भोजन को बनाता है संपूर्ण। तो चलिए आज इस चटखदार अचार की कहानी जानते हैं। यह पहली बार  कहां बना और कैसे यह हम भारतीय की थाली से लेकर दिल तक को चटखदार बना, कर रहा है उसपर राज…

सबसे पहली बार अचार यहां बना था

अचार बनाने की परंपरा लगभग चार से पाँच हज़ार साल पुरानी  है। इतिहासकार मानते हैं कि इसका आरंभ  मेसोपोटामिया (आज का इराक क्षेत्र)  में हुआ, जब लोगों ने पहली बार सब्ज़ियों और फलों को नमक में डालकर लंबे समय तक सुरक्षित रखने की कला खोजी। वहीं से यह ज्ञान मिस्र, यूनान और फिर भारत तक पहुँचा।

भारत में अचार की कहानी

भारत में अचार का ज़िक्र  वैदिक ग्रंथों  में मिलता है। संस्कृत में इसे “आचार्यक”  कहा गया, और आयुर्वेद ने इसे पाचनशक्ति बढ़ाने वाला औषधीय आहार  बताया। नींबू, अदरक, आम और लहसुन के अचार को औषधियों में गिना गया। अचार सिर्फ भोजन का साथी नहीं था, बल्कि स्वास्थ्य और स्वाद का मेल था।

मुगल दरबार से आम घरों तक

मुगल काल में अचार ने शाही व्यंजन  का रूप लिया। अकबर, जहाँगीर और शाहजहाँ के दौर में  केसर, सिरका और मसालों से बने विदेशी अचार महलों की थालियों में परोसे जाते थे। धीरे-धीरे यह कला आम लोगों तक पहुँची, और हर प्रांत ने अपने मौसम और स्वाद के अनुसार अचार को नया रूप दिया। बिहार और उत्तर प्रदेश के गाँवों में आज भी गर्मी के दिनों में आम के अचार की खुशबू घर-आँगन में फैलती है।

मौसम, माँ और मिट्टी के बर्तन

भारतीय परिवारों में अचार बनाना एक संस्कार जैसा काम रहा है। मिट्टी के घड़ों में अचार डालकर धूप में पकाया जाता — हर दिन उसे उलट-पुलट कर धूप दिखाना एक अनुष्ठान बन जाता था। गर्मियों में आम का अचार, सर्दियों में गाजर-गोभी-शलगम का, और बरसात में नींबू या हरी मिर्च का — हर मौसम का अपना स्वाद।

दुनिया के अचार भी रोचक हैं 

– जापान में “त्सुकेमोनो

– चीन में “पाओकाई

– यूरोप में “gherkin pickle”

– और अमेरिका में “dill pickle” हर देश ने अपने तरीके से अचार को अपनाया — ताकि मौसम बदलने पर भी स्वाद बरकरार रहे।

अचार का आधुनिक रूप

आज अचार सिर्फ घरों में नहीं, बल्कि बड़े उद्योगों और निर्यात का हिस्सा बन चुका है। भारतीय अचार — खासकर आम, नींबू और लहसुन — अब अमेरिका, यूरोप और मध्यपूर्व में भी भारतीय स्वाद का दूत बन चुके हैं।


अचार की सीख भी सीख लीजिए 

अचार सिर्फ स्वाद नहीं, समय और संवेदना का प्रतीक है। यह सिखाता है कि —

“हर चीज़ को समय के साथ बदलने दो, बस उसमें थोड़ा धैर्य का नमक,  और बहुत सारा प्यार डाल दो — वही जिंदगी का असली स्वाद है।”

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…इत्ता सा टुकड़ा चांद का

कभी रात के आसमान में नज़र डालिए — चांद हर रात पूरा नहीं होता। कभी आधा, कभी चौथाई, कभी बस इत्ता सा टुकड़ा। फिर भी उसकी चमक कम नहीं होती। वो हर रूप में सुंदर लगता है, क्योंकि वो जानता है कि “अधूरापन भी अपनी जगह खूबसूरत होता है।

 

ज़िंदगी भी कुछ ऐसी ही है। हमें हमेशा लगता है कि कुछ और चाहिए — थोड़ा और पैसा, थोड़ा और नाम, थोड़ा और प्यार, थोड़ा और वक्त। लेकिन इस “थोड़ा और” की दौड़ में हम “जो है” उसे जीना भूल जाते हैं।

जो है, वही सबसे सुंदर है

हम अक्सर सोचते हैं कि हमारी ज़िंदगी अधूरी है, लेकिन शायद यही अधूरापन हमें इंसान बनाता है। सोचिए — जिस फूल में कांटे न हों, वो कितनी जल्दी मुरझा जाएगा। हमारी परेशानियाँ, हमारी छोटी खुशियाँ, हमारी सीमाएँ — यही हमारी पहचान हैं।

कई बार हमारे पास जो कुछ है, वही किसी और का सपना होता है। आपका घर, आपकी नौकरी, आपकी मुस्कान — किसी और के लिए खुदा की सबसे बड़ी दुआ हो सकती है। फिर क्यों हम शिकायतों में वक्त गँवाएँ, जब हमारे पास आभारी होने की इतनी वजहें हैं?

संतोष हार नहीं, समझ है

संतोष का मतलब ये नहीं कि आप आगे बढ़ना छोड़ दें। इसका अर्थ है — कदम बढ़ाते हुए भी मन को शांति में रखना। क्योंकि जो व्यक्ति हर हाल में मुस्कराना जानता है, उसे कोई भी हालात छोटा नहीं कर सकते।

ज़रा सोचिए — जब चांद अधूरा होता है, तब भी आसमान उसी का होता है। जब आप थोड़े परेशान होते हैं, तब भी ज़िंदगी आपकी होती है। बस फर्क इतना है कि चांद अपनी चमक नहीं छोड़ता… तो फिर हम क्यों छोड़ें?

खुशी तलाशनी नहीं, महसूस करनी  है

खुशी किसी मंज़िल का नाम नहीं, वो तो हर रोज़ के छोटे-छोटे पलों में छिपी होती है। सुबह की एक गर्म चाय, किसी बच्चे की हँसी, किसी पुराने दोस्त का संदेश, या अपने माता-पिता की आंखों की चमक — यही तो वो छोटे टुकड़े हैं, जिनसे मिलकर *पूरा चांद* बनता है।

अगर हम हर दिन इन छोटी-छोटी खुशियों को महसूस करने लगें, तो ज़िंदगी हमें किसी बड़ी सफलता से भी ज़्यादा संतोष दे जाएगी।

और अंत में…

अगली बार जब आसमान में चांद अधूरा दिखे, तो शिकायत मत कीजिए। बस मुस्कराइए और सोचिए — “इत्ता सा टुकड़ा चांद का भी कितना खूबसूरत है। क्योंकि शायद उसी टुकड़े में आपकी ज़िंदगी की पूरी रोशनी छिपी हो।

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रेत सी फिसलती जिंदगी में ‘मन की उलझन’ सुलझा, ‘All Is Well’ का तराना भरने वाली डॉ. बिन्दा की कहानी

वे खामोश  होंठों को मुस्कुराना सिखातीं है, नम आंखों में भरतीं हैं जिंदगी के ख्वाब। टूटे हुए दिल में सजा देतीं हैं उम्मीद। अब तक जीवन से मायूस हजारों लोगों को निराशा के भंवर से निकला आशा का उजास भर, जीवन से प्यार करने का हुनर सिखलाया है। कहानी, उम्र की बंदिशों को bye  कह , समय और समाज के दिल में Love you zindagi का सुर और साज सजाने वाली। जानी-मानी क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट

डॉ. बिन्दा सिंह की…

हम  पटना में हैं, पटना एक ऐतिहासिक शहर जो इन दिनों महानगर बनने दौड़ लगा रहा है। शाम का वक्त है। ट्रेफिक के शोर के बीच हम शहर के प्रसिद्ध बोरिंग रोड स्थित डॉ. बिन्दा सिंह के आवास की ओर बढ़ते हैं। बड़े से गेट के बाहर नेम प्लेट लगा है। इतने में गार्ड गेट खोलता है और हम अंदर दाखिल होते हैं। यह डॉक्टर बिन्दा सिंह का घर है और क्लीनिक भी। हम अपनी नजरें इधर उधर दौड़ाने की कोशिश करें इससे पहले ही दरवाजा खुलता है और दो मरीज (शायद वे पति-पत्नी) हों बाहर आते हैं। डॉ.बिन्दा खुद उन्हें छोड़ने बाहर तक आती है। फिर मुस्कुराते हुए हमें अंदर क्लीनिक में आने का इशारा करती है। क्लीनिक बडे़ ही क़रीने से सजा है। सूर्यमुखी के बड़े बड़े फूल खिलखिला रहे हैं। समाने समारोहों में मिलीं ढेरों स्मृति चिन्ह रखें हुए हैं।
डॉक्टर बिन्दा बड़े ही आदरभाव से हमारा सत्कार करतीं हैं।

सूरज मुखी के फ़ूल की तरह उनके चेहरे पर आत्मविश्वास की ताजगी खिलखिला रही हैं। बढती उम्र की सीढ़ियां चढ़ कर भी कोई थकान नहीं, कोई बोझिल पन नहीं, किसी तरूण सा उत्साह उनमें दिखता है।

हमरी बातचीत शुरू होती है। हम उनके बचपन के किस्से जानना चाहते थे। वो हमें बताती हैं

मेरा जन्म बिहार में हुआ। पिताजी श्री लक्ष्मण सिंह  सेना में अधिकारी थे। उनका बराबर तबादला होता रहता। पिताजी के तबादले के साथ ही हम सब भी अपना बोरिया – बिस्तर ले एक शहर से दूसरे शहर शिफ्ट होते रहते। इसी क्रम में देश के कई शहरों को देखने -जानने का मौका मिला।

हम जब तक शहर के मिजाज में अपना मिजाज घोलने की कोशिश करते तब तक पिताजी तबादले का पैगाम ले आते और हम उस शहर के शरबती मिजाज को टाटा -बाय- बाय कह फिर नए शहर से फ्रेंडशिप करने चल पड़ते।

शहर -दर -शहर की आपाधापी के बीच पटना ने मुझे अपना बनाया। कॉलेज की पढ़ाई, से लेकर कॉलेज में पढाना , शादी और करियर सब इसी शहर की आबोहवा में घुल -मिल आकार पाते रहे।

अब तो पटना शहर मेरी हर सांस में उस तरह घुल गया है जैसे बगिया से आती हवा में फूलों की खुशबू।

पिताजी सेना में थे तो घर में सेना वाला अनुशासन शुरू से ही था। सबको हर काम अनुशासन और समय पर करना होता। मां  होरीला सिंह  भी अनुशासन में विश्वास रखती। हम सभी भाई बहन बचपन से ही फौजी परिवार के इस गुण से गुणी हो गए थे। पिताजी और माताजी लड़कियों के आजादी की पक्षधर रहे। हम बहनों और भाइयों के बीच कोई भेदभाव नहीं होता। हमें पूरी आजादी मिली। पढ़ाई लिखाई से लेकर खेलकूद तक।

अपनी बनाई पेंटिंग के साथ डॉ.बिन्दा सिंह

पेंटिंग का शौक

डॉ बिन्दा हमें कुछ पेंटिंग दिखाते हुए बताती है कि मुझे पेंटिंग का शौक बचपन से ही रहा। बचपन में कागज पर चित्र बनाती और उसमें पेंसिल से लाल-पीली -नीले रंग भरती। बढ़ती उम्र के साथ, इस शौक ने कैनवास पर जगह बनायी। मेरी पेंटिंग में अक्सर जिंदगी के रंग आपको देखने को मिलेंगे। अब भी जब वक्त मिलता है मैं रंगों की इस दुनिया में डूब जाती हूं।,

सच कहूं तो रंग ही तो हैं, जो जीवन को चटखदार बनाए रखता है। आप जब भी मायूस हो प्रकृति को निहारिए, हरे भरे पेड़, खुबसूरत फूल और रंग बिरंगी तितलियां और भंवरों का क्रंदन आपमें एक नई उर्जा भर देंगे।

यहां से हुई पढ़ाईं 

वे आगे बताती है कि कॉलेज की मेरी पढ़ाई पटना वूमेंस कॉलेज से हुई। उन दिनों भी यह कॉलेज बिहार का सबसे महत्वपूर्ण कालेजों में से एक था। यहां नामांकन होना और पढ़ना एक गर्व की अनुभूति देता था। मैंने स्नातक के बाद पीजी क्लीनिक साइकोलॉजी में की। फिर पीएचडी किया। पीएचडी के दौरान  पति का काफी सहयोग मिला।

कॉलेज की छात्र राजनीति में इंट्री

पढ़ाई के दौरान हीं कॉलेज की राजनीति में मेरा मन लगने लगा। लीडरशिप क्वालिटी मुझमें बचपन से थी। उसका उपयोग मैंने यहां किया। मैं कॉलेज में कैबिनेट की मेंबर चुनी गईं थीं।

मन में डॉक्टर बनने की चाहत

डॉक्टर बिंदा सिंह कहती हैं कि मन में हमेशा डॉक्टर बनने की चाहत थी। दिक्कत यह कि मेरा मन साइंस सब्जेक्ट में थोड़ा भी नहीं लगता था। मैं जो भी करती उसे दिल से करती। साइंस में मन रमता नहीं था तो आर्ट लेना पड़ा। फिर आगे चलकर मुझे लगा की साइकोलॉजी में मैं अच्छा कर सकती हूं और इससे लोगों की सेवा भी की जा सकेगी। मैंने अपने शोध के दौरान काफी मेहनत किया। मैं मेंटल डिसऑर्डर लोगों के पास जा उनकी केस स्टडी करती। झुग्गियों और मलिन बस्तियों में जा वहां के लोगों का मेंटल हेल्थ देखती। इन सब से मुझे काफी जानकारी मिली ‌ ।

जब बदमाशों ने किया हमला

डॉक्टर बिन्दा हमें एक पुराना वाक्या बताते हुए कहती हैं। पढ़ाई खत्म होने के बाद मैंने पढ़ाना शुरू किया था। उस वक्त पटना के एक नामी कॉलेज में मैं क्लास लेती थी। क्लास में कुछ बदमाश लड़के, क्लास की लड़कियों को परेशान करते। वो उनसे बदतमीजी से पेश आते। जब मुझे यह बात पता चली तो मैंने इसका विरोध किया। इसके बाद क्लास में उनकी गुंडागर्दी बंद हो गई। फिर प्लान बना उन सब ने मुझ पर हमला कर दिया। मुझे चोट आई। यह मामला उन दिनों काफी सुर्खियां में रहा। मैंने अगर हिम्मत दिखा उनका विरोध नहीं किया होता तो उनकी क्लास में उन बदमाशों की मनमर्जी चलती रहती और लड़कियां प्रताड़ित होती रहती।

सम्मान के पल

बाढ़ से मिली सीख 

डॉ बिन्दा सिंह कहती हैं कि हमें पढ़ाई के दौरान पटना  में आयी बाढ़ का मंजर आज भी उसी तरह याद है। तब पटना शहर में बाढ़ का पानी प्रवेश कर गया था। हमारे मकान में भी पानी अंदर चला गया। इससे हम लोगों के कितने ही सामान खराब हो गए। फिर बाढ़ का पानी थमने पर हमने सोफ़ा को धूप में सुखाया। कितनी ही फोटो फ्रेम पानी के कारण खराब हो गई। हम इन्हें धूप में सुखाते और शीशा से भींगा पेपर हटा दूसरा चिपकाते।

इस बाढ़ ने भी हमें काफी कुछ सिखाया। विपदा के बाद आप फिर कैसे श्रृजन करते हैं मैंने बाढ़ से यह सीखा।

मैं यह मानतीं हूं कि बुरा से बुरा लम्हा भी आपको कुछ अच्छी सीख देकर जाता है।

लोग कहते हैं मैं मां पर गई

मैं पढ़ाई के बाद खुद से पैसे भी कमाने लगी थी और इन सब में मेरी मां का काफी अहम योगदान है। मेरी मां काफी प्रोग्रेसिव विचारों वाली महिला थी। मां ने मुझे आगे बढ़ने का खुब हौसला दिया। पीएचडी के दौरान भी मां का समर्थन मिला।

मेरे रिश्तेदार कहते हैं कि मैं मां पर गई हूं। यह मुझे गर्व से भर देता है। मेरे आत्मविश्वास को और मजबूत करता है।

मां ने मुझे हिम्मत न हारने और जमीन से जुड़े रहने की सीख दी। एक मध्यमवर्गीय परिवार के कारण मुझे हर छोटी-छोटी चीजें भी बचपन के दौरान मां ने सीखाया। आज इन सब का असर मेरी कार्यकुशलता पर पड़ता है।

याद खुबसूरत पुराने दिनों की

विशिष्ट बना शादी समारोह

डॉ. बिन्दा सिंह कहती हैं, बचपन बीता, स्कूल लाईफ बीता, फिर कालेज की पढ़ाई पूरी हुई। इन सब के बाद वह वक्त भी आया जो हर लड़की के जीवन में बेहद खास होता है। शादी की बेला। तब की शादियों में आज की तरह प्री-वेडिंग का न तो प्रचलन था, न शादी से पहले आप दुल्हे से दिन रात बतिया सकते थे। व्हाट्सएप्प, सोशल मीडिया तो सोच में भी नहीं था।

फिर एक सामान्य लड़की की तरह मेरी भी शादी तय  हुई। मेरे भी मन में विवाह के सतरंगी सपने आकार ले रहे थे।

मेरी शादी इन्द्र कुमार सिंह, जी के साथ हुई ।वें शासकीय अधिवक्ता थे। मेरे ससुर जी उन दिनों बिहार के अहम राजनीतिक चेहरे थे। इस कारण मेरी शादी बेहद भव्य रही। तात्कालिक मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर, उनके मंत्रिमंडल के सदस्य, जगन्नाथ मिश्रा जी समेत तमाम राजनीतिक हस्तियां मेरी शादी में मौजूद थे। ससुराल भी नौकर चाकरों से भरा। कुछ ही दिनों में मैंने ससुराल में सबका दिल जीत लिया। ससुर जी के कई पार्टी सम्मेलन और चुनाव के दौरान मैंने कई काम भी संभाले। खास तौर पर जब भी हेलिपैड बनाने की जरूरत होती थी तो मुझे इसकी जिम्मेदारी दी जाती। उन दिनों यह सब काफी मुश्किल था। तब मोबाइल का जमाना नहीं था। उस वक्त हमारे घर बिहार के की राजनीतिक हस्तियों का आना- जाना हुआ करता था।

बिता लम्हा : पति स्वर्गीय इन्द्र कुमार सिंह के साथ डॉ. बिन्दा सिंह

जब ससुराल में खोला क्लीनिक

मेरा ससुराल काफी सम्पन्न था , खासतौर पर आर्थिक और सामाजिक रूप से। मेरी नौकरी उन दिनों लेक्चर के रूप में सुंदरवती महिला कालेज भागलपुर में हुई, पर मेरी बेटी काफी छोटी थी, सो मैंने वहां नौकरी छोड़ दी। फिर घर में ही क्लीनिक खोला। शुरू में इक्का-दुक्का पेशेंट आते थे फिर तादाद बढ़ती चली गई।

यादें साथ हैं…

पति के सहयोग रहा अनमोल

जब मैंने अपना क्लीनिक खोलने की बात की तो परिवार में इसके लिए सहमति बना पाना काफी मुश्किल था। पहले तो छोटी बच्ची होने का हवाला दिया गया। फिर कहा गया कि इसकी जरूरत क्या है। पैसे की ऐसी कोई दिक्कत तो है नहीं! इन सब बातों के वावजूद मैंने संकल्प कर लिया था कि मुझे क्लीनिक खोलना है। यह बात मैंने अपने पति को बतायी। उनसे काफी समर्थन मिला। मेरे पति इन्द्र कुमार सिंह वकालत के साथ साथ वें व्यवसाय से भी जुड़े थे। वैसे मैं कहूं तो मैंने आज जो भी काम किया, समाजसेवा कर पायी, इसमें मेरे पति का योगदान काफी अहम रहा है। उन्होंने मेरा हमेशा समर्थन किया, मेरा हौसला बढ़ाया।

कुछ वर्षो पहले उनका निधन हो गया। हमें उनकी कमी हमेशा खलती है। वे मुझे मजबूती देते थे। मेरा उत्साह वर्धन करते थे। जब मेरा कालम अखबारों में छपने लगा तो मुझसे ज्यादा मेरे पति को उसका इंतजार होता। अखबार आते ही वे झट से पन्ना पलट मेरा आलेख पढ़ते फिर मुझे दिखाते। अब इस उत्साह की कमी लगती है।

पति के साथ जीवन के तमाम उतार – चढ़ाव का साथ रहता है। वे बच्चों सा हमेशा उत्साह से भरे रहते थें।
बेटे- बेटियों की पढ़ाई, उनकी शादी सब उन्होंने उसी उत्साह के साथ किया। हर वक्त उनकी यादें मेरे दिल में धड़कती हैं, पर जीवन तो जीना पड़ता है न, भावनाओं को दबा, मन को मजबूत कर।

वो बीते दिन

मीडिया की भूमिका अहम 

वो अखबारों का दौर था। अखबार प्रायः हर घर में सुबह- सबेरे दस्तक देते। खबरिया चैनल उन दिनों धीरे धीरे बढ़ रहे थे। अखबार का तब एक अलग ही सम्मान होता।

सन् 2000 में दैनिक हिन्दुस्तान में मेरा एक कालम शुरू हुआ। नाम था मन की उलझन। यह कालम काफी लोकप्रिय हो गया। इसमें मैं लोगों के सवालों का जबाब देती। बिहार, बंगाल, झारखंड, उड़िसा तमाम जगहों से खत आते। लोग अपने मन की उलझनों का जबाब चाहते थे।

मैं पूरी इमानदारी से इनका जबाब देती। यह कालम लंबे समय तक चला। इसने मुझे देश भर में एक मजबूत पहचान दी।
इसके बाद उस वक्त की प्रसिद्ध पत्रिकाओं में भी अलग-अलग नाम से मेरे कालम आने लगे। इनमें सरिता, सरस सलिल, मुक्ता आदि पत्रिकाएं शामिल थीं। इसके साथ हीं प्रभात खबर में भी मेरा कालम शुरू हुआ।


फिर दूरदर्शन, समाचार चैनल, एफ एम रेडियो पर मेरे ढेरों शो आने लग गए। दैनिक भास्कर जब पटना से प्रारंभ हुआ तो वहां भी मेरे लेख प्रकाशित होने लगे। मीडिया के जरिए लोगों को जागरूक करने की यह पहल अब भी चल रही है। इस
का असर भी दिखता है।

बस खुद से रखें उम्मीद

डॉ बिन्दा कहतीं हैं कि किसी दूसरे से उम्मीद रखना दुख का कारण बनता है। आप खुद अपने आप से उम्मीद रखें। दूसरों से नहीं। दूसरों से उम्मीद रखने पर अंत में निराशा ही हाथ आती है।

पूर्व केंद्रीय मंत्री अश्विनी चौबे और अन्य के साथ डॉ.बिन्दा सिंह

डर के आगे जीत है

डॉ. बिन्दा कहतीं हैं कि सफर रास्ते का हो या फिर जिंदगी का आपको खुद पर यकीन रखना सबसे जरूरी है। अपने अंदर के डर को निकाल फेंकिए। हो सकता है पहली बार सफलता नहीं मिले ऐसे में अपने काम की समीक्षा कर फिर से जुट जाएं। जीत पाने के लिए मन के डर को बाहर निकालना बहुत जरूरी है।

 

ओरिएंटेशन कार्यक्रम के दौरान

आत्मबल मजबूत रखें 

डॉ .बिन्दा सिंह बताती है कि अब तक 200 कॉलेज और 100स्कूलों में ओरियंटेशन कार्यक्रम अपने कार्यक्रम कर चुकी हैं। कई कार्पोरेट दफ्तरों में भी वे लोगों को जागरूक करने जाती रहती है। डॉ बिन्दा बताती है कि इन दिनों फास्ट लाइफ का प्रभाव काफी ज्यादा मेंटल हेल्थ पर पड़ रहा है। अवसाद की समस्या का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है। अब तो बच्चों में भी इसे लेकर परेशानियां बढ़ रही हैं। मेरी कोशिश लोगों को जागरूक करने की होती है। मैं उन्हें यह बताती हूं कि आपका मानसिक स्वास्थ्य बेहतर होना कितना ज़रूरी है, और इसे कैसे दुरूस्त रखा जाए।

कोविड के दौरान भी काउंसिल

डॉ. बिन्दा आगे कहती हैं कि हम सब ने कोरोना जैसी महामारी देखी। इस महामारी ने लोगों की शारीरिक के साथ मानसिक परेशानियां भी दी। मुझे लगा कि इस दौरान लोगों को मानसिक मजबूती की जरूरत है। मैं कोरोना में फ्री काउंसिल देती थी। मैं उस दौरान किसी भी वक्त काउंसिल करने के लिए तैयार रहती थी वह भी निशुल्क।

डॉ. बिन्दा सिंह को समाजिक योगदान के लिए कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों से सम्मानित किया जा चुका है।

मानसिक स्वास्थ्य पर किताबें प्रकाशित

डॉ बिन्दा सिंह के लेख जहां देश के नामी अखबारों में जगह बातें हैं वहीं उनकी कई किताब भी प्रकाशित हो चुकी है। मन की उलझन और डॉक्टर मैं क्या करूं काफी लोकप्रिय हैं। ये किताबें सरल भाषा में मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करती है। डॉ. बिन्दा बताती है कि ग्रामीण इलाकों में भी मेरे किताब के पाठक हैं, खासतौर पर महिलाएं।

थकान मिटा देती, ‘पंखुड़ी’ और ‘कोको’ की नन्ही हंसी

डॉ बिन्दा सिंह कहती हैं मेरे बच्चे मुझे खुब प्यार देते हैं। बेटी सुगंधा सिंह, पूजा सिंह और बेटे संदर्भ सिंह के साथ दामाद  प्रशांत रवि, दीपक,  बहू ऐश्वर्या   के साथ पारिवारिक दुनिया खुशियों के साथ चल रही है। नातिन पंखुड़ी और कोको की नन्हीं हंसी उम्र की सारी थकान मिटा देती है। इन बच्चों को भी मेरा संग- साथ अच्छा लगता है।

पल खुशियों के: परिवार के सदस्यों के साथ डॉ. बिन्दा

फिलवक्त डॉ. बिन्दा सिंह पूरी शिद्दत के साथ समाज में सकारात्मक ऊर्जा भरने की पहल में जुटी है। वो कहती हैं

मेरी कोशिश यह कि निराशा की निशा के बदले उम्मीद वाली भोर की मुलायम सी किरण लोगों के मन में जगह बनाए। लोग हंसते -मुस्कुराते,जिंदगी को गले लगाते हुए , प्यार से प्यारा सा ये गीत गुनगुनाता उठें…
” इत्ती सी हंसी
इत्ती सी खुशी
इत्ता सा टुकड़ा चाँद का,
ख्वाबों के तिनकों से
चल बनाएं आशियाँ!!

हमारी बातचीत खत्म हो चुकी है। हम उसने विदा लेते हैं, हमें एक अनमोल चीज यहां से तोहफे में मिल गई वह है जिंदगी को जीने, समझने और बांटने का खुबसूरत नजरिया….,

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‘डॉक्टर हृदय’ में पिता की स्मृतियां: पढ़ें डॉ. अरुण शाह के मनोभाव

डॉ. अरुण शाह प्रसिद्ध बाल रोग विशेषज्ञ हैं। इसके साथ ही वे समाजसेवा का अलख भी जगा रहे हैं। उम्र की थकान को हमेशा पीछे छोड़ जिंदगी के गीत गाने वाले डॉ. शाह ने अपने दिवंगत पिता स्वर्गीय हरिराम शाह जी की यादों को अपनी भावनाओं में कुछ यूं समेटा है कि हर एक पुत्र को उसे जरूर पढ़ना – सुनना और गुनना चाहिए – यह आलेख पढ़िए….

पिताजी, माताजी और भाई के साथ डॉक्टर अरूण शाह

आपकी बहुत याद आती है बाबूजी! प्रतिपल – प्रतिक्षण। जी करता है आपके कमरे के बाहर जा जोर-जोर से आपको पुकारूं, और आप कहें – अरे क्यों इतना शोर मचा रहे हो, आ रहा हूं न!  फिर बाहर आ, ठीक उसी तरह आप मेरे सर पर प्यार से हाथ फेरें, जैसे बचपन में फेरते थे और मैं आपके इस उन्मुक्त स्नेह की बरखा में चुपचाप भींगता रहूं। बाबूजी, हर सुबह ऐसा लगता है कि आप  पूजा कर रहे हों और आपके गाए भजन हमारे कानों को पावन । मैं झट से उठ बैठता हूं और हाथ जोड़ आपके भजन के स्वर में अपना स्वर मिलाने लगता हूं।

मैं वक्त-बेवक्त आपके ठौर पर आपकी राह देखता हूं। यह जानते हुए भी कि आप अब सदेह हमसे दूर चले गए हैं। बहुत दूर।,

चार पीढ़ियों को आशीर्वाद

आपकी दी हुई हिम्मत, उम्मीद और स्नेह को हम सब ने बड़े करीने से संभाल रखा है। आपकी यादें घर के हर कमरे – हर दर-ओ-दीवार पर मुस्कराहट बन चस्पा हैं। हम सब आपको बहुत याद करते हैं बाबूजी, आपकी नटखट परपोती अब भी अपनी तुतली आवाज में आपको पुकार लेती है। जानते हैं, अब वो स्कूल भी जाने लगी है।

हम सब पल-पल आपको याद करते हैं। बेटे, पोते, पोतियां सब के लिए आप ही तो हिम्मत थे बाबूजी। मां भी बहुत याद करती है आपको। आपके बिना अजीब सा एक खालीपन लगता है। एक ऐसा सुनापन जिसकी भरपाई कभी नहीं हो सकती।

वो उमंग भरे दिन: जन्मदिन पर बाबूजी

र जाता हूं तो देर तक आपकी उस कुर्सी के पास बैठ उसे निहारता रहता हूं जिस पर आप बैठा करते थे। वो कुर्सी अब खाली पड़ी है। आपका चश्मा… आपकी कलम… आपका नोटबुक सब वैसे ही रखे हैं करीने से, बस आप नहीं हो बाबूजी…!

बचपन की यादों की लंबी फेहरिस्त है। कैसे बचपन में मेरी छोटी-सी परेशानी भी आपके लिए बड़ी चिंता बन जाती थी और आप उसका समाधान ढूंढते। मुझे अब भी याद है, वही सात साल की उम्र रही होगी मेरी, जब मुझे चोट लगी और पैर में प्लास्टर लगने के बाद इंफेक्शन हो गया था। आप मुझे बेहतर इलाज के लिए तब पहलेजा घाट से पटना स्टीमर से ले जाते। मैं चल नहीं पाता तो मुझे कांधे पर बिठाकर आप ले चलते।तब डॉक्टर ने यह कह दिया था कि पांव काटने होंगे। आप बिना विचलित हुए इलाज में लगे रहे और मेरे दोनों पांव को सलामत रहे।

जमाना बचपन का: बाबूजी के साथ हम भाई-बहन

सच में, आप एक योद्धा थे बाबूजी…। कितनी बहादुरी से आपने जीवन के अंधेरे वक्त से लड़ाई लड़ी।

जीवन के हर उतार-चढ़ाव में आप स्थिर भाव से भरे रहते। ग़म में मुस्कुराते रहते। अंदर से मोम होकर भी बाहर फौलाद सा सख़्त बने रहते आप बाबूजी। मेरी खुशी में आप हर वक्त अपनी खुशी ढूंढते।

खुशियों बांटते चलें

स्कूल के वक्त आपने मेरे लिए कितनी प्यारी-सी साइकिल खरीदी थी। जब मैं घंटी बजाता हुआ साइकिल चलाता तो आप मुझे देख मुस्कुरा उठते।

बचपन में मैं रूठने का नाटक करता और आप मुझे मनाते। सोचता हूं, मैं फिर रूठने का नाटक करूं और आप फिर मुझे मनाने आ जाओ बाबूजी। जब मेरा दाखिला दरभंगा मेडिकल कॉलेज में हुआ तो आपने मेरे लिए एक स्कूटर खरीदा था। मैं उस स्कूटर से हर छुट्टी वाले दिन आपसे मिलने आता। जाते वक्त जरूरी सामानों की गठरी बांधते हुए आप मां से कहते – पूछ लो कि कुछ और जरूरी तो नहीं। जब मैं डॉक्टर बन गया तो आपने ही मेरी पहली कार खरीदी। जब आप शहर के काम से जाते और वापस लौटते तो आप हम सब बच्चों के लिए कुछ न कुछ चीजें लाना कभी नहीं भूलते।

समाज सेवा में भागीदारी

संत पुरुष थे आप बाबूजी

सादा जीवन, सुंदर विचार, ईमानदारी और खूब मेहनत – यही आपके जीवन का मंत्र था। आपसे हमने भी जीवन का यह मंत्र सीखा। खाने में भी सादा खाना, बस दाल-रोटी आपको पसंद आती। न कोई घमंड, न कोई दिखावा – बस अपनी धुन में मगन। अपने काम में खूब मेहनत, खूब ईमानदारी। यही वजह रही जिससे आपका प्रतिष्ठान उत्तर बिहार का सबसे प्रतिष्ठित और भरोसे वाला प्रतिष्ठान बन गया। 

मां के जन्मदिन पर बाबूजी का उत्साह

सब परिवार के लिए

अपने लिए आपने कभी कोई चाहत नहीं रखी बाबूजी। अंतिम दिन तक परिवार के लिए ही जुटे रहे। खुद सादा लिबास पहनते और हम सब के लिए ब्रांडेड कपड़े सिलवाते। खुद के सपनों को छोड़ हमारे सपनों में रंग भरते। हमारी छोटी-छोटी खुशियां पूरी करते। आप थे तो लगता कि हम सब महफूज हैं। हर परेशानी में लगता – बाबूजी हैं न, रास्ता निकाल लेंगे। लगता कोई है जो हमारा ख्याल रखता है।

आशीर्वाद बना रहे

आशीर्वाद साथ हमारे 

आज मैं जो कुछ भी हूं बाबूजी, सब आपके आशीर्वाद से ही संभव हुआ है। आपके ही मार्गदर्शन से हम सबने मंजिल पाई है। आपके पोते-पोतियां सब आपके बताए रास्ते पर चलते-बढ़ते हुए देश और दुनिया में अपनी पहचान बना रहे हैं। हम सब आपके आदर्श पर चल रहे हैं। आप लंबे वक्त तक हमारे साथ रहें, हमारी छांव बने रहें। मैंने सुना था कि कैसे बचपन में जब आप ढाई साल के थे, उस वक्त ही आपके सर से पिताजी का साया उठ गया था। पिता के बिना जीवन कितना कठिन होता है।

आप कठिनाई से लड़ते हुए बड़े हुए थे बाबूजी। कभी आपने हौसला नहीं खोया।

तब भी जब मैं हमेशा बीमार रहा करता था, और तब भी जब मेरी 15वीं सर्जरी का ऑपरेशन होना था। डॉक्टर ने काफी खतरा बताया, आप मुझमें हिम्मत भरते रहे। खुद चिंतित होकर भी परेशानी की लकीरें चेहरे पर न आने दीं। इसी विश्वास की वजह से मेरी सर्जरी कामयाब रही। आपकी संयमित जीवन शैली आपको स्वस्थ रखती थी, यदा-कदा कभी बुखार हो जाता और मैं आपकी तबीयत के बारे में पूछता तो आप कहते – अच्छा हूं, सब ठीक है। वो तो मां कह देती कि दो दिन से बुखार में हैं और तब मैं आपको गोलियां खिलाता। हजारों यादें जुड़ी हुई हैं आपसे बाबूजी।

आपने सीखाया स्वाद जिंदगी का 

आपसे मैंने हमेशा सीखा है कि जीवन का स्वाद कैसे लेकर जीना है – यह आपने ही मुझे सिखाया। समाज की सेवा को ईश्वर की सेवा मानना। यही धर्म कहा था आपने।

मुझे वो बातें भी याद हैं जब परिवार में लोगों की संख्या बढ़ने पर मैंने एक अलग घर की चाहत की थी और आपने न सिर्फ इसकी सहमति दी बल्कि मुझे मकान खरीदने में आर्थिक मदद भी की। आपको पुराने गीत कितने पसंद थे। हमेशा मुकेश, लता, किशोर के गाने आप सुनते-गुनगुनाते रहते थे। बाद में आपकी बेटियों ने आपको एक सारेगामा कारवां दिया था कि आपको मन का संगीत सुनने में आसानी हो।

आज मैं जब भी गीत गाता-गुनगुनाता हूं तो लगता है आप पास बैठे मेरा यह गीत सुन तालियां बजा रहे हैं।

बाबूजी, जब आप 80 की दहलीज पार कर गए, तब मैं हर हफ्ते जब भी मिलने आता कोशिश यही रहती कि आपको नन्हा सा बच्चा बना वैसे हंसा पाऊं, जैसे बचपन में आपने हमें हंसाया था। आपसे खूब बातें होती हम सब की। शाम की वो चाय और गप्पों की महफ़िल। आप सिर्फ एक पिता नहीं थे, आप मित्र भी थे, एक मार्गदर्शक भी, एक शिक्षक भी।

वो बेरहम वक्त

अभी तो आप एकदम स्वस्थ थे। आराम से खुद का सारा काम खुद करते। अचानक आप बीमार हुए और हम सब को छोड़ गए। 19 तारीख तक आप कर्मयोगी की तरह कार्य करते रहे। 20 तारीख को आपकी तबियत बिगड़ी हम सब ने आपको अस्पताल में भर्ती कराया और 21 तारीख को आप हमें छोड़ परलोक प्रस्थान कर गए। 

इस माया लोक से सबको विदा तो होना ही है। आप भी इस दुनिया से विदा हो गए।  सुकून यही कि हम सब हमेशा आपके बताए रास्ते पर चल रहे हैं। आपने तीन-तीन पीढ़ियों को गोद में खिलाया, उन्हें आशीष दिया। आप हमारी बगिया के बागवान बने रहे। बाबूजी, आपको टहलना खूब भाता था। सुबह-सबेरे हरी दूब पर चलकर मैं आपके पदचिन्हों को महसूस करना चाहता हूं।

गीता कहती है आत्मा अमर है, वह मरती नहीं। आप भी अमर हैं बाबूजी। हमारे पास ही तो हैं। घर के मंदिर के दीप की उजास बनकर, पलाश के ढेर सारे खिलते हुए फूल में मुस्कान बनकर, बारिश की नन्हीं बूंद में शीत बनकर, सूरज की पहली किरण में चमक बनकर। नीले-नीले अंबर में तारों की टिमटिमाहट बनकर आप हमें आज भी रास्ता बता रहे हैं।

जब भी कभी मन थकान से विचलित होता है, मैं आपकी ढेरों यादों को समेट गले लगा लेता हूं।
पावन हो उठता है मन। सांसें पुराण का मंत्र गा उठतीं हैं-

पिता स्वर्गः पिता धर्मः पिता हि परमं तपः।

पितरि प्रीतिमापन्ने सर्वा हि प्रीयते प्रजा॥”

यादें साथ हैं

मेरी आंखों के कोर से कुछ बूंदें टपक पड़ती हैं..। मैं आपकी ऊर्जा खुद में महसूस करता हूं, कदमों में हौसला भर आता है  , मैं चल पड़ता हूं उस मार्ग पर जिसे आपने अपने जीवन का मार्ग कहा था – सत्य का मार्ग कहा था। मोक्ष का मार्ग कहा था।

कोटि-कोटि प्रणाम बाबूजी!!!

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‘मसान’ में चल रही शिक्षा की साधना , अनोखे ‘अप्पन पाठशाला’ की कहानी पढ़िए

मृत्यु के शोक और मसान में जलती चिता के पास एक साधक सालों से अपनी साधना में लीन हैं।यह कोई तंत्र साधक नहीं, न तंत्र साधना हो रही है। यह ज्ञान की साधना है। विद्या की साधना और यह साधक है युवा सुमित कुमार।
सुमित यहां चला रहे हैं उन बच्चों के लिए अनोखा स्कूल जो कभी मसान से फल और पैसा चुनते थे।आज कहानी अप्पन पाठशाला की….

शाम का वक्त है, हम बिहार की स्मार्ट सिटी मुजफ्फरपुर के सिकंदरपुर स्थित चमचमाते मरीन ड्राइव से गुजर रहे हैं। थोड़ा आगे बढ़ने पर मुक्तिधाम का गेट दिखाई दिखता है।शहर का सबसे प्रमुख श्मशान घाट। हमारे कानों में घंटे की आवाज के साथ’राम नाम सत्य है ‘का एक स्वर सुनाई देता है । जीवन की नश्वरता और ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार करने का स्वर, जो शायद अंतिम यात्रा और मुक्तिधाम जैसी जगहों पर ही स्वीकार्य होता है। हम मुक्तिधाम पहुंच चुके हैं थोड़ी दूर पर ढलते सूरज की परछाई में चिंता की लपटें उठ रहीं हैं, आसमान में धूंए का गुब्बारा। मेरे मन में कबीर की पंक्ति अनायास उभरने लगती है

सांस सांस सब सांस है,सांस बिना सब सून,

कबीर सांस न कीजिए, सांस जाएगा तीन “

जीवन की इस अंतिम पड़ाव वाले स्थल पर एक और आवाज हमें सुनाई दे रही है ‘क’ से कलम ‘ख’ से खरगोश। बच्चों का एक झुंड और उन्हें पढ़ाते युवा। यह मुक्ति धाम में चलने वाली पाठशाला है। अप्पन पाठशाला। ‘अप्पन’ बज्जिका का एक शब्द है जिसका मतलब ‘अपना’ होता है।

हम थोड़ी देर यही खड़े हो पढ़ाई में रहें बच्चों को देखते हैं। बच्चे’ ग ‘ से ‘गमला’ ‘ घ’ से घर पढ़ रहे हैं । पास फैले मृत्यु के शोक के इन बच्चों की आंखों में जीवन के सपने हैं। सृजन के सपने हैं।

हमारी मुलाकात इस पाठशाला के संस्थापक सुमित     कुमार से होती है।
सुमित बताते हैं कि मैं एक दिन परिचित की अंतिम यात्रा में यहां आया था। इस दौरान कुछ बच्चों पर नजर पड़ी जो यहां से मिठाई, पैसा, कपड़े आदि चुन रहे थे। मुझे यह दृश्य बड़ा विचलित कर गया। सोचा यह कैसी विडम्बना है कि आज भी हमारे बच्चे इस तरह से जीने को मजबूर हैं। फिर कुछ दिन तक इन बच्चों की दिनचर्या देखी और फिर शुरू की एक कोशिश इन्हें पढ़ाने की 8 बच्चों के साथ शुरू हुआ हमारे इस अप्पन पाठशाला में अब 140 बच्चे हैं। इनमें से 110 नियमित आते हैं। शाम ढलती जा रही थी, चिंता की लपटें और तेज हो आई थी, इधर हमारे मन में इस अनोखे स्कूल को लेकर जिज्ञासा भी बढ़ रही थी। हमने वहां कुछ बच्चों से बातचीत की।

नन्ही आंखें में हैं बड़े-बड़े सपने 

सबमें अनूठा आत्मविश्वास। सबके अपने सपने । कोई डॉक्टर बनना चाहता है तो कोई जज। किसी को फिल्मी दुनिया में जा नाम कमाना है तो कोई शिक्षक बन शिक्षा की रौशनी बटना चाहता है।हम सुमित कुमार से फिर मुखातिब होते हैं। सुमित कहते हैं। यह सब आसान नहीं था।

पहले न बच्चे पढ़ने के लिए तैयार थे न उनके अभिभावक इन्हें भेजने के लिए। वो कहते पढ़कर क्या होगा?

ऐसे तो मेरा बच्चा दो पैसा कमाकर लाएगा। मैं और मेरे दोस्त ने इन लोगों को बहुत समझाया। फिर किसी तरह ये तैयार हुए।

 इस पाठशाला की शुरुआत मार्च 2017 में की। तब से लगातार यह चल रहा है।पाठशाला का नाम अप्पन इसलिए रखा गया ताकि बच्चों को अपना लगे।


जब पाठशाला की शुरुआत हुई तब धीरे-धीरे बच्चों को बैठने का आदत लगाई ,फिर पढ़ना शुरू किया। जब पाठशाला में बच्चे नियमित आने लगे तो फिर चिंता यह हुई कि इनका नामांकन कहां हो। मैंने पहल कर बगल के सरकारी स्कूल में नामांकन कराने के लिए बच्चों और बच्चों के अभिभावकों को मैंने प्रेरित किया। अब हर साल लगभग 35- 40 बच्चों का बगल के सरकारी प्राथमिक विद्यालय ,मध्य विद्यालय और उच्च विद्यालय में नामांकन हम लोग कराते हैं। इन 8 सालों में लगभग 300 से अधिक बच्चों का नामांकन बगल के सरकारी के विद्यालयों में कराया गया है।

कक्षा एक से ग्यारहवीं तक के बच्चे 

सुमित आगे बताते हैं कि अप्पन पाठशाला में
कक्षा एक से लेकर 11वीं तक के छात्र-छात्राएं पढ़ते हैं। उन्होंने यहां पढ़ने वाले बच्चों को उनके माता-पिता के कार्य शैली के आधार पर चार वर्गों में बांटा गया है
1. वह बच्चे जो पहले मुक्तिधाम में पार्थिव शरीर से फल पैसा या अन्य वस्तुएं उठाते हैं
2. वैसे बच्चे जिनकी मां घरों में चौक बर्तन की काम करती है
3. वह बच्चे जो कचरा चुनने का काम करते थे
4. आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े बच्चे ।

खुद की कमाई का एक हिस्सा यहां खर्च 

इन सभी बच्चों के लिए ड्रेस, बैग ,कॉपी ,किताब ,पेंसिल ,रबर कटर, बैठने के लिए आसनी और ठंड में स्वेटर ,कंबल का व्यवस्था सुमित खुद करते हैं। जब हमने उनसे यह पूछा कि इसके लिए पैसे कहां से आते हैं तो सुमित कहते हैं, मैं इसके लिए अलग काम करता हूं। मेरा कंसल्टेंसी का काम है इससे हुई आमदनी का 90 फीसदी हिस्सा मैं यहां खर्च करता हूं। कभी कभी कुछ लोग आर्थिक मदद करते हैं।

वुशु का प्रशिक्षण भी ले रहे यहां के बच्चे

इस अप्पन पाठशाला के बच्चे आत्मरक्षा के लिए वुशु( मार्शल आर्ट ) का प्रशिक्षण ले रहे हैं । इनमें ज्यादातर लड़कियां शामिल हैं।सुमित कहते हैं कि इस प्रशिक्षण का उद्देश्य महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराधों को ध्यान में रखते हुए किया गया है, वे स्वयं की रक्षा में समर्थ हो सकें तथा वे शारीरिक एवं मानसिक रूप से सशक्त बनें और दूसरे को जागरूक करें और सिखाएं ।
एक छात्र अपने घर के आस-पास कम से कम 10-10 बच्चों यह को सिखाएंगे और यह प्रक्रिया लगातार चलती रहेगी। यह प्रशिक्षण फिलहाल सप्ताह में दो दिन पाठशाला चल रहा है इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में दो मुख्य शिक्षक सुनील कुमार और अजीत सिंह के
सहयोग किया जा रहा है।

ऑर्गेनिक फॉर्मिंग भी यहां सीख रहे 

सुमित कुमार कहते हैं कि अप्पन पाठशाला में पढ़ने वाले बच्चों को पढ़ाई के साथ-साथ ऑर्गेनिक फॉर्मिंग भी सिखाई जा रही है. बच्‍चे पढ़ाई के साथ-साथ जैविक खेती का  व्यवहारिक ज्ञान सीख रहे हैं.
जिससे आने वाले भविष्य में ये स्वावलंबी बन सके । ये बच्‍चे आने वाले समय में किसानों को जैविक खेती के लिए भी जागरूक करेंगे।

सुंदर होगा समाज 

सुमित का मानना है कि ये बच्चे हम यहां इन्हें बस किताबी ज्ञान ही नहीं देते, इन्हें बेहतर इंसान बनने की प्रेरणा भी देते है। इनमें से कई वैसे बच्चे थे जो शुरू में नशे की चपेट में थे। अब वो नशामुक्ति का अलख जगा रहे हैं। पढ़-लिखकर ये खुद की किस्मत तो रौशन करेंगे ही अपने समाज को भी उजियारा प्रदान करेंगे। इससे हमारा समाज सबल होगा।

इस यात्रा में इनका मिला सहयोग

सुमित बताते हैं कि पाठशाला की इस यात्रा में कई लोगों का सहयोग मिला। मेरे माता-पिता ने मुझे हिम्मत दी। मेरे भाई और मेरे मित्र का भी इसमें बड़ा योगदान है। मैं अपने भाई अमित कुमार अपने मित्रों का, मुजफ्फरपुर के पूर्व सांसद अजय निषाद का, मुक्तिधाम प्रबंधन कार्यकारी समिति का और समाज के कुछ प्रबुद्ध लोगों का इस कार्य में सहयोग के लिए शुक्रगुजार हूं।

आर्थिक सहयोग की जरूरत

सुमित आगे कहते हैं कि काफी लोग हमारे प्रयास की सराहना तो करते हैं पर आर्थिक मदद काफी कम लोग करते हैं। मैं खुद की मेहनत से इसे चला तो यह हूं पर इस पाठशाला को और मजबूत करने के लिए हमें आर्थिक सहयोग की जरूरत है। अगर हमें आर्थिक सहयोग मिलेगा तो हम इसे और भी बेहतर ढंग से चला पाएंगे।

शाम ढलती जा रही है। बच्चे पढ़ाई के बाद घर लौट रहे हैं।
बाहर लगा स्ट्रीट लाइट जल उठता है। हम कांधे पर बस्ता लिए धीरे धीरे अपने घर की और लौटते इन बच्चों को निहार रहे हैं।

हम सुमित से विदा लेते हैं। रात हो आई है, पर इस अंधेरे में भी अप्पन पाठशाला की रौशनी, सितारों सा इस मसान में फैली लगती है। रौशनी हमारे मन में भी फ़ैल रही है। हम अप्पन पाठशाला की कहानी, सुमित और बच्चों के विश्वास भरी यादों को समेटे निकल पड़ते हैं। गाड़ी के रेडियो में मुकेश की आवाज में गीत बज रहा है।
“इक दिन बिक जाएगा, माटी के मोल
जग में रह जाएँगे, प्यारे तेरे बोल
दूजे के होंठों को, देकर अपने गीत,
कोई निशानी छोड़, फिर दुनिया से डोल।”

( नोट: thebigpost.com समाज की प्रेरक कहानियों को सामने लाने की पहल है। इस मिशन को मजबूत करने के लिए हमें आपके सहयोग की ज़रूरत है। 📞 आर्थिक मदद के लिए संपर्क करें: 7488413830)

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बंदिशों के पिंजरे तोड़, मुंबई लोकल से ‘Mohi Pure’ तक की ‘रेखा’, इस राजस्थानी लड़की की बहादुर कहानी पढ़िए

वह अपने नन्हे-नन्हे कदमों से सितारों को छू लेना चाहती थी। नन्ही हथेलियों में जुगनू की चमक समेट मन को रोशन कर लेना चाहती थी। वह अरावली की पहाड़ियों से आई हुई ठंडी हवा के झोंकों के साथ रेस लगाना चाहती थी। तब उसे कहाँ पता था कि बचपन की उस गुड़िया के होश  संभालते ही उसकी उम्मीद की रेखा से बड़ी लोहे की कंटीली रेखाएँ लगा दी गई हैं, ताकि उसके सपनों को नियति की क्रूरता और रस्म मानकर कुर्बान किया जा सके। इन सबके बाद भी उसने अपने सपनों को “लव यू” कहा, मन में हौसलों का चट्टान भरा, आँखों में उम्मीद की चमक और आशाओं के पंख पहनकर राजस्थान के अपने गाँव में ‘मैदान मार ‘लड़कियों की किस्मत बदली।  इन सब के बावजूद खुद की किस्मत भी उससे आँख-मिचौली खेलती रही। हाथ पीले कर मुंबई आयी तो ससुराल में भी  दुनिया रसोई घर तक ही सिमटी रही।  उसकी आँखें भीगती रहीं, पर सपनों को आँसुओं के सैलाब में बहने न दिया। वह मुंबई लोकल की राह पकड़ ज़िंदगी को ढूँढने निकल पड़ी। जनरल डब्बों की खाक छानते, तजुर्बों के पन्ने समेटते, रुकते-चलते हुए एक मुकाम बनाया। जलवा ऐसा कि  सासू माँ भी बेस्ट फ्रेंड बन चाय की प्यालियाँ खनका कर गप्पों की शाम बिताने लगी। बाल विवाह, पर्दा प्रथा और लड़कियों पर लगी तमाम बंदिशों के खिलाफ मुखर आवाज़ बन स्त्री मुक्ति का अलख जगाने वाली इस स्त्री के मन में एक कथाकार भी बसता है और एक उद्यमी भी। इनकी किताब ‘मुंबई लोकल’ जल्द आने वाली है। इनके ब्रांड  Mohi Pure के स्वाद के दीवाने पंकज त्रिपाठी तक हैं।
आज पढ़ें कहानी — दर्द से भरे दामन को उम्मीद के उजास से रौशन कर जिंदादिली की इंद्रधनुषी रेखाएँ खींचने वाली रेखा सुथार की–
  
प्रकृति के बीच महलों वाला गाँव
मेरा जन्म राजस्थान के अरावली की पहाड़ियों से घिरे एक छोटे से गाँव ‘घाणेराव’ में हुआ था। गाँव छोटा तो था पर बेहद खूबसूरत। नक्काशीदार मंदिरों की दीवारें, ऊँचे-ऊँचे खूबसूरत महल और राजवाड़े। विदेशी मेहमानों का आना-जाना, उनके कैमरे में कैद होती गाँव की कहानियाँ — सब कुछ था मेरे इस गाँव घाणेराव में।
बचपन में पढ़ाई-लिखाई के लिए मेरा दाखिला गाँव के ही स्कूल में कराया गया। हम बच्चों की टोली हरे-भरे जंगलों के बीच से पेड़ों को निहारते हुए स्कूल आती- जाती। यहाँ तक तो सब खूबसूरत था, पर मेरे गाँव की इस खूबसूरती के साथ ही एक स्याह पक्ष भी था। परंपरा के नाम पर रूढ़ियों की जड़ें मज़बूत थीं।
एक उम्र के बाद लड़कियों को पाबंदियों की परिधि में बाँध दिया जाता। वह अपने गाँव से बाहर कभी अकेली कदम नहीं निकाल सकतीं। बचपन में ही लड़की ब्याह दी जाती। बहुओं को चेहरे के आगे लंबा घूँघट ताने रखने का फरमान था।  अगर कोई गुस्ताख़ी हो गई तो सज़ा भी डरावनी।
यह बताते हुए रेखा सुथार का गला भर आता है। वह खुद को सँभालते हुए हिम्मत की मुस्कान होंठों पर भरती हैं और हमें आगे का वाकया बताती हैं। साहित्यिक मिजाज रखने वाली रेखा सुथार  Mohi Pure की फाउंडर हैं और जी-जान से देशभर में शुद्ध तेल और घी मुहैया कराने की पहल कर रही हैं।
माता पिता और खेल ने मुझे संवारा
रेखा आगे बताती हैं कि आज जो कुछ भी वे हैं उसमें उनके माता-पिता और खेल में उनकी रुचि का बड़ा योगदान है। वह कहती हैं कि पग-पग रूढ़िवादी विचारों से लैस इस गाँव में उनके माता-पिता ने उन्हें खुद के पंख फैला उड़ने की आज़ादी दी। गाँववालों के ताने मिले, पर इसकी परवाह न करते हुए वे उन्हें खुद का आकाश गढ़ने का हौसला देते रहे। पिता नरेंद्र प्रसाद परिहार जीवन बीमा कंपनी में कार्यरत थे। माँ कमला परिहार गृहणी थीं। माँ भले कम पढ़ी-लिखी थीं, पर ज़िंदगी के तजुर्बे ने उन्हें काफी व्यवहारिक बना दिया था। रेखा कहती हैं कि उनके माता-पिता ने उन्हें बंदिशों वाले गाँव में खुलकर जीने की आज़ादी दी। वह स्कूल में सॉफ्टबॉल खेलती थीं। उनका यह खेलना स्कूल के कई शिक्षकों को पसंद नहीं आता था। तब इसमें  है। हमारे दूसरे  पीटी टीचर भी शामिल थे। वह थोड़ी ज़िद्दी थीं — खेलना है तो खेलना है। काफ़ी समझाने पर स्कूल के प्रिंसिपल ने स्कूल में लड़कों के साथ लड़कियों की टीम शुरू की। धीरे-धीरे वे बाहर भी खेलने जाने लगीं।
अपने पिता के साथ रेखा सुथार
जब पीटी टीचर चुपचाप मेरी क्लास में आ गए
रेखा हमें स्कूल का एक खूबसूरत वाकया बताते हुए कहती हैं — “एक बार हमारी क्लास चल रही थी। हम सभी बच्चे पढ़ाई कर रहे थे। अचानक पीटी सर आए और मेरा नाम लेकर पुकारने लगे। मेरी धड़कनें तेज़ हो गईं। मुझे लगा कोई ग़लती हो गई। फिर उन्होंने सबके सामने मेरी पीठ थपथपाते हुए कहा कि इस लड़की ने स्कूल का मान बढ़ाया है। यह खरा सोना है, ठोक-पीटकर आगे निकली है।” उनका चयन तब नेशनल लेवल पर सॉफ्टबॉल के लिए हुआ था। इससे पहले वह स्टेट लेवल पर सॉफ्टबॉल जीत चुकी थीं।
 
नेशनल ट्रेनिंग कैंप, पीरियड का पेन और माँ की वो बात
रेखा सुथार  कहती हैं कि उनकी किस्मत की रेखाएँ हर वक्त उनका इम्तिहान लेती रही हैं। ऐसा ही एक वाकया नेशनल ट्रेनिंग कैंप के दौरान हुआ। दरअसल फाइनल चयन के लिए इस कैंप से 45 लड़कियों में से 16 लड़कियों को चुनना था। जिस दिन उनका परफॉर्मेंस था, उसी दिन उन्हें पीरियड आ गया। उनका पीरियड काफी पेनफुल होता था। उन्हें लगा कि ऐसी हालत में वे परफॉर्मेंस नहीं दे पाएँगी। नेशनल का फाइनल सिलेक्शन आज के ही टेस्ट के बाद होना था। उन्होंने सोच लिया कि वे नहीं कर पाएँगी। दर्द काफी तेज़ था। उन्होंने मम्मी को फोन कर यह बात कही। मम्मी ने कहा —
“पीरियड तो हमेशा आएँगे, यह टाइम वापस नहीं आएगा।”
फिर माँ 30 किलोमीटर दूर अस्पताल गईं, डॉक्टर से दवा पूछी और फोन पर लिखवाया। रेखा ने दवा मँगाई, खुद को मज़बूत किया और सबसे बढ़िया परफॉर्मेंस देकर सेलेक्ट हो गईं।
स्कूटर आएगी, ब्याह कर लो
 रेखा बताती हैं कि मैं बारहवीं में थी. इसी वक्त मेरा ब्याह कर दिया गया. हमारे गांव में बड़ी बहन के साथ छोटी बहन का भी ब्याह कर दिया जाता था. हाँ, शादी के काफी सालों बाद गौना होता, तब लड़की अपने ससुराल जाती. मेरी शादी भी बहन की शादी के वक्त कर दी गई. मैंने मना किया तो फिर मुझे स्कूटर खरीद कर देने की बात मेरे भाई ने बताई. मैंने सोचा, चलो शादी करने से स्कूटर चलाने की आजादी मुझे मिल जाएगी, तो ठीक है, कर लेते हैं शादी.
स्कूटर तो नहीं आई, हाँ मैंने पापा का बुलेट बाइक चलाना सीख लिया. गांव और आसपास में बुलेट चलाया करती. मेरे बुलेट मोटरसाइकिल चलाने देख गांव के कुछ रूढ़िवादी लोग ताने भी देते, पर मुझे तो रफ्तार चाहिए थी. खुलकर जीना था, खुद की जिंदगी. शादी के बाद मैंने CAT का एग्जाम दिया. फिर MBA कर ली. मैंने अंग्रेजी साहित्य से  स्नातक किया है।
ससुराल की बंदिशें मुझे नहीं आयी रास
रेखा बताती हैं कि मैं मायके में खूब आजादी के साथ रहती. दूसरी लड़कियों को भी पाबंदियों से निकाल, पढ़ाई-लिखाई की ओर बढ़ने में मदद करती. मेरी किस्मत ने मेरा खूब इम्तिहान लिया है. आखिर वह दिन भी आया जब गौना के बाद मेरे कदम ससुराल की दहलीज पर पड़े. हर लड़की की तरह मेरे आंखों में भी ससूराल और शादीशुदा जिंदगी को लेकर ढेरों ख्वाब बसे थे. मेरे ससूराल वाले मुंबई में रहते थे. मुझे लगा था कि इस महानगर में और पंख फैला उड़ सकूँगी, पर हुआ इसका उल्टा.
“मुझे उस वक्त मेरा ससूराल वैसा नहीं लगा जैसा मैं सोचकर आयी थी। हर आम परिवार की तरह यहां भी बहू के लिए वो बंदिशें थी जो उस वक्त चला करती थीं। 
मुंबई शहर में तो था, पर मुझे घर से निकलने की आजादी नहीं थी. यह सब मुझे बेचैन करता”
मुझे हमेशा साड़ी का पल्लू  ताने  रहना होता था. किसी जरूरी काम के लिए भी मैं नीचे चौराहे की दुकान पर नहीं जा सकती थी. घर का सारा काम तो मुझे करना था ही, वह भी साड़ी में रह कर. मैं सलवार सूट भी नहीं पहन सकती थी. आप सोचिए, जो लड़की एक खिलाड़ी रही, खूब आजादी से, उसे आज के जमाने में इतनी बंदिशें अचानक आ जाए तो उसके मन पर क्या बीतेगी. मैं अपने पति से इन सबको लेकर बात करती. पति सपोर्ट भी करना चाहते पर इससे बहुत कुछ बदला नहीं ।
“उस वक्त  मेरी आंखें बार-बार गंगा-यमुना होतीं। मन समंदर सा नमकीन और देह जलती असहाय ताप की पीड़ा से। “
मैं मन ही मन ईश्वर से सवाल करती, ये मेरे साथ क्या हो रहा है।
‘मुंबई लोकल ‘वाले दिन
हिम्मती दिल और मुंबई लोकल का सफर
मैं ससूराल में काफी तनाव में रहती. फिर मैंने सोचा, इस अंधेरे को मुझे ही दूर करना होगा, कोई मेरे लिए नहीं आएगा. फिर एक दिन मैंने कह दिया कि मुझे जॉब करने जाना है.
“इतना सुनते ही प्रतिरोध पर प्रतिरोध. ये लड़की जॉब करेगी? हमारी प्रतिष्ठा का क्या? क्या जरूरत है जॉब करने की? इस तरह के हजारों सवाल. मैंने गांधी जी की तरह सत्याग्रह वाला रास्ता चुना.”
मैं उनका विरोध तो करती, पर इसका तरीका अहिंसक होता. मैं कोई अपशब्द या हिंसा अपनी बात को मनवाने के लिए नहीं कहती—करती. बड़ी मुश्किल से मुझे नौकरी करने की इजाज़त मिली, पर इसके साथ ही घर का सारा काम निपटा कर मुझे जाना था और आकर फिर सारा काम करना था. मैंने यह चुनौती स्वीकार की.
जॉब करने निकली, पर जॉब ढूंढनी थी
मैं घर से नौकरी करने तो निकल गई, पर सच यह था कि  मुझे नौकरी ढूंढनी थी।  मैंने सोचा पहले मुंबई को जान लूं। नौकरी तो मिल ही जाएगी। . स्टेशन पहुंची,  लोकल टिकट लिया और लोकल ट्रेन में चल निकली—आठ घंटे अलग-अलग जगहों पर बिताए. ।मुंबई लोकल में समय बिताना.
सच कहूँ तो मुंबई लोकल का समय मेरे जीवन का वह अनुभव था जिसमें मैं कितने ही लोगों के जीवन को करीब से देख पाती थी. उनके सपने, उनकी उदासी, उनका संघर्ष—सब कुछ मैंने जाना समझा. एक आम आदमी के हिस्से की खालिस जिंदगी से मुझे मुंबई लोकल ने रूबरू कराया.”
वह आगे बताती है कि मुंबई लोकल ट्रेन यात्रा के दौरान की कहानियों को मैंने आकार दिया, और अब यह जल्द ही ‘मुंबई लोकल’ के नाम से छप कर आने वाली है.
...और नौकरी मिल गई
रेखा सुथार आगे बताती हैं कि मुंबई लोकल के राह में हीं मुझे मेरी पहली नौकरी भी मिली. इस दौरान मेरी मुलाकात एक ऐसी महिला से हुई जिन्हें अपने ब्लॉग के लेखों के अनुवाद के लिए एक व्यक्ति की जरूरत थी. मैंने उनके प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया. इस दौरान मुझे 7,500 रुपये मिलते. इसके बाद ICICI बैंक में मेरी नौकरी लग गई।
सोशल मीडिया ने मुझे लेखक बना दिया
रेखा आगे कहती हैं कि सोशल मीडिया का भी मेरे जीवन में काफी योगदान है. मैं अपने जीवन के घटनाक्रम को कभी-कभार कुछ पंक्तियों में लिखकर सोशल मीडिया पर डाल देती. इन पर अच्छी प्रतिक्रिया आती. फिर सोशल मीडिया फ्रेंड लोग कहने लगे, आप लिखती क्यों नहीं? ऐसे में धीरे-धीरे मैंने लिखना शुरू कर दिया—साहित्य की छात्रा होने का फायदा भी मिला. मैं इसके लिए सोशल मीडिया के अपने मित्रों का आभार व्यक्त करती हूँ. इन सब ने मेरा हौसला बढ़ाया.
साहित्य जगत की उभरती रेखा
रेखा सुथार अपने ब्लॉग लेखन और कथा कहानियों के सृजन में खूब डूबी रहती हैं. वो कहती हैं, मेरी रचना मेरी जीवन की दृष्टि है. यह हर आम लड़की और महिला की कहानी होती है. इसमें गम की दहलीज पर खुशियों को पाने की चाहत छुपी हुई है. रेखा साहित्यिक गोष्ठियों और संवादों में एक जाना-पहचाना नाम बन चुकी हैं. उनके कई पॉडकास्ट इंटरव्यू भी प्रसारित हो चुके हैं.
सफर हीं तो जिंदगी है
दुनिया को समझने के लिए सोलो ट्रैवल
 रेखा को दुनिया को नजदीक से जानना बहुत पसंद है। वो प्रकृति से भी खूब प्यार करती हैं वें बतातीं हैं कि
शादी के बाद मैंने सोलो ट्रैवल करना भी शुरू किया और कई सारे ट्रैक पूरे किए। घूमने फिरने का शौक हमेशा से रहा। पहले परिवार के साथ जाती थी फिर धीरे धीरे अकेले घूमने नए लोगों से मिलने और उनके जीवन को समझने की कोशिश करने लगी।
इन्ही अनुभवों की एक किताब जल्द लाने वाली हूं।
अनमोल यादें: जब बीस साल बाद मिलीं लक्ष्मी मैम
जब मिलने मुंबई आ गई लक्ष्मी मैम 
रेखा सुथार कहती हैं कि हमारे स्कूल के शुरुआती दिनों में लक्ष्मी मैम हमारी पीटी टीचर हुआ करती थी। वे बहुत ही अनुशासित थी। हमसे भी अनुशासन की उम्मीद रखती। मुझे खेल की बारिकियों को सीखने में लक्ष्मी मैम का बहुत योगदान रहा है।

रेखा, लक्ष्मी मैम से जुडा एक ताजा वाक्या बड़े ही उत्साह से सुनाने लगती हैं। हमारे स्कूल के वक्त ही लक्ष्मी मैम का तबादला हो गया था।
बीस साल बाद मुझे एक कॉल आया – एक पुरानी मगर बेहद करीबी आवाज़ सुनाई पड़ी सामने से – “हैलो,रेखा बात कर रही हो क्या ?”
मुझे आवाज़ पहचानने में ज़्यादा देर नहीं लगी मैंने तुरंत चहकते हुए कहा – “लक्ष्मी मैम”
खूब देर बातचीत के बाद वो बोली – “मैं मुंबई में हूं और आज रात की ट्रेन से शिरडी जा रही अगर तुम्हारे पास टाइम हो तो स्टेशन पर मिलने आना”
मैं उनके बताए वक्त से पहले पहुची स्टेशन।
मैं देर तक उनसे गले लगी रही..

आँखों में हम दोनों के पानी था,और चेहरे पे मुस्कान हम दोनों के थी।

मैंने स्कूल में मेरे साथ पढ़ी कई लड़कियों के नाम बताए की वो भी मुंबई में ही रहती है,लेकिन ये जानकर हैरानी हुई मुझे की उन्हें उनमें से कोई याद नहीं आ रही थी।
मैंने पूछा उनसे कि “फिर मैं कैसे याद रह गई आपको?”
वो बोली “तू भुलाने वालों में से नहीं है बेटा तेरी बातें तो मैं आज भी जिस स्कूल में पढ़ाती हूं वहा के बच्चों से करती रहती हूं।मैं नहीं जानती मेरी वो कौनसी बात थी जिसने मैम को आज भी मुझसे जोड़े रखा बस इतना जानती हूं की

मुझे जब भी अपनी कमाई के बारे में पूछा जाएगा तो मैं इन किस्सों का खजाना सामने रख दूंगी।

दादी की बीमारी और गाड़ी चला उन्होंने अस्पताल पहुँचाना
रेखा एक गुजरा हुआ लम्हा याद कर कहती हैं, मेरी दादी सास काफी रूढ़िवादी विचारों की हैं. वो मुझे हमेशा घूंघट में ही देखना चाहती थीं. एक बार मैं दादा, ससुर और दादी सास के साथ गांव में थी. अचानक दादी की तबीयत बिगड़ गई. तबीयत काफी ज्यादा खराब होने लगी. हमारे पास गाड़ी तो थी, पर ड्राइवर नहीं था. काफी खोज करने पर भी कोई ड्राइवर नहीं मिला. ऐसे में मैंने सोचा कि जान बचाना अभी सबसे जरूरी है—यह घूंघट नहीं. मुझे गाड़ी चलानी आती थी. मैंने गैरेज से कार निकाली, दादीजी को गोद में उठाकर सीट पर रखा और अस्पताल लेकर गई. दादी का इलाज हुआ और दादी की तबीयत ठीक हो गई. दादी ने तब मुझे खूब आशीर्वाद दिया.
खुशियों के पल: सासू मां के साथ रेखा सुथार
सास बन गई अच्छी दोस्त
रेखा आगे बताती हैं कि नौकरी के बाद धीरे-धीरे सब कुछ बदलने लगा. ससूराल वाली परंपरा भी बदल गयी।. मेरी सास जो कभी परंपराओं को मानने को कहतीं, आज वो मेरी अच्छी दोस्त हैं. हम हर शाम साथ साथ चाय की चुस्की लेते हुए गप्पों वाली शाम बिताते हैं.
साथ जीवन साथी का: अपने पति भरत सुथार के साथ रेखा
पति का योगदान अहम
रेखा कहती हैं कि मेरी इस संघर्ष यात्रा में मेरे पति भरत सुथार का अहम योगदान रहा है. उन्होंने मेरे हौसले को हमेशा मजबूत बनाए रखने में मदद की. आज भी वो मेरे हर फैसले का स्वागत करते हैं.
 पहल शुद्ध देशी घी और तेल उपलब्ध करवाने की
रेखा आज अपने स्टार्टअप Mohi Pure से देश भर में शुद्ध देसी घी और सरसों तेल उपलब्ध करवाने की नायाब पहल कर रही हैं. रेखा कहती हैं कि राजस्थान में तेलहन की फसल काफी अच्छी होती है. हमारे गांव में भी काफी अच्छी सरसों की उपज होती थी. संकट यह था कि हमारे गांव में तेल निकालने की मशीन नहीं थी. लोगों को दूर दूसरे गांव इस काम के लिए जाना पड़ता था. मेरे दादाजी को यह बात काफी नागवार लगती. फिर उन्होंने तेल मिल लगाया. अब गांव वालों को तेल निकलवाने दूर नहीं जाना पड़ता था. दादाजी की विरासत को मेरे पिताजी ने आगे बढ़ाया. अब पिताजी इसे चलना नहीं चाहते थे. मील चलाने वाले केयरटेकर ने भी नौकरी छोड़ दी. ऐसे में यह मील बंद होने के कगार पर आ गया.
इन मशीनों के बीच यादों वाला बचपन
वह आगे बताती हैं कि मेरे दादाजी काफी कम उम्र में परलोक चले गए.मेरे दादाजी के सपने को मेरे पापा ने करीब 40 साल पहले पूरा किया—जब उन्होंने लोहे की घाणी लगाकर सरसों का तेल निकालना शुरू किया. मैंने अपना पूरा बचपन गेहूँ पीसने, मसाले कूटने और तेल निकालने वाली उन्हीं मशीनों के बीच बिताया. तब के समय में शुद्ध अनाज, मसाले और तेल बहुत आसानी से मिल जाते थे, इसलिए उनकी उतनी अहमियत महसूस ही नहीं होती थी. पर धीरे-धीरे जैसे-जैसे वक्त बदला, ये परंपराएँ और कारोबार बंद होने लगे, और हम बड़ी कंपनियों के रेडीमेड खाने-पीने के सामान की ओर खिंचते चले गए. कंपनियों ने अपनी ज़रूरतें पूरी करने के लिए न जाने कितने केमिकल्स मिलाए, और हम जानते-बूझते भी उन्हें अपनाते गए—क्योंकि वो सस्ते थे. लेकिन उस सस्तेपन ने हमें बहुत महँगी बीमारियों के हवाले कर दिया.
कभी सोचा नहीं था कि तेल की घाणी चलाऊंगी
रेखा कहती हैं कि सच कहूँ तो मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि मैं ये काम शुरू करूँगी. मैं शहर में अपनी नौकरी में खुश थी. लेकिन एक दिन अचानक पापा ने बताया कि वो सारी मशीनें बेचकर वहाँ कंस्ट्रक्शन का काम शुरू करने वाले हैं. ये सुनते ही मेरा मन भारी हो गया. मेरे मन में कोई ठोस वजह नहीं थी, लेकिन इतना जरूर महसूस हुआ कि ये परंपरा बंद नहीं होनी चाहिए.
मैंने इस बारे में अपने दोस्तों से बात की, खुद बहुत सोचा, और धीरे-धीरे मन में एक निर्णय आकार लेने लगा. तब तक मैंने अपनी नौकरी भी छोड़ दी थी. एक दिन पापा से लंबी बातचीत हुई. उन्होंने बताया कि कैसे उन्होंने रात-दिन मेहनत करके ये घाणी लगाई थी, कैसे कठिन समय में यही घाणी हमारे परिवार का सहारा बनी. और अब जब वो और मेरे भाई अपनी-अपनी नौकरी में व्यस्त हो गए हैं, तो इस कारोबार को संभालने वाला कोई नहीं है. इसलिए उन्हें यही सही लगा कि इसे बंद कर दिया जाए.
उस रात मैं सो नहीं पाई. अगली सुबह मैंने पापा से कहा— “मुझे नहीं पता ये कितना प्रैक्टिकल है… लेकिन पापा, ये घाणी आप बंद नहीं करेंगे. ये वैसे ही चलेगी जैसे हमेशा से चलती आई है.”
पापा चौंके और बोले— “लेकिन इसे चलाएगा कौन?”
मेरी आँखों में थोड़ी देर की खामोशी थी, फिर मैंने बिना हिचकिचाए कहा— “मैं.”
कुछ पल की खामोशी के बाद उन्होंने मेरी आँखों में देखा और पूछा— “मैनेज कर लेगी?”
मेरी आँखें भर आईं, मैंने बस इतना ही कहा— पता नहीं… लेकिन जिस उम्र में आपने कर लिया था, उसी खून की बेटी हूँ मैं… कोशिश जरूर करूँगी.”
उस वक्त पापा चुप हो गए. और फिर धीमे से बोले— “ठीक है रेखा. अगर तूने इरादा कर लिया है तो मैं तुझे रोकूँगा नहीं. लेकिन एक बात हमेशा याद रखना—शुद्धता और मिलावट के बीच सिर्फ़ एक अंतर है—विश्वास का. लोगों का विश्वास कभी टूटने मत देना.”
अच्छा चल रहा बिजनेस 
आज उस बात को करीब 6-7 महीने हो गए हैं. हमारी घाणी के साथ बगल के गाँव में मामाजी की और दो घाणी होने की वजह से अच्छी खपत हो जाती है. तेल के साथ ही मैंने अपने गाँव और आसपास के गाँवों में परंपरागत तरीके से बने बिलोना घी को भी इस मुहिम से जोड़ा है. पिछले कुछ महीनों में मैंने कई लोगों तक ये उत्पाद पहुँचाए हैं. पंकज सर और कई सेलिब्रिटीज़ को ये घी और तेल सिर्फ़ इसलिए दे पायी हूँ, क्योंकि मुझे मेरे प्रोडक्ट पर पूरा भरोसा है कि वे एक बार इसे खाएँगे तो अगली बार फिर से ज़रूर माँगेंगे.
ब्रांड नहीं विश्वास 
रेखा  सुथार कहती हैं कि मेरे लिए कोई “अमीर” या “साधारण” ग्राहक नहीं है—सभी के लिए दाम और गुणवत्ता एक समान है. मेरा उद्देश्य सिर्फ़ इतना है कि अधिक से अधिक लोग शुद्धता से जुड़ें और उस भरोसे को महसूस करें, जो हमारी पीढ़ियों ने बनाया है. आज Mohi Pure सिर्फ़ एक ब्रांड नहीं है—ये मेरे दादाजी के सपने, मेरे पापा की मेहनत और मेरे अपने संकल्प की कहानी है.
ये सिर्फ़ सरसों का तेल नहीं है—ये पीढ़ियों की विरासत है, जो मैंने सिर्फ़ एक मकसद से आगे बढ़ाई है— “खुद को खुद से बेहतर करना.”
इसलिए Mohi Pure में आपको वही शुद्धता मिलेगी जो पहले हमारे घरों की रसोई में मिलती थी—बिना किसी मिलावट, बिना किसी समझौते के.
ऐसे रखा ब्रांड नेम
रेखा आगे कहती हैं कि जब मैंने तेल मिल को चालू करने और इसे एक ब्रांड नेम देने की पहल शुरू की तो सबसे पहले हमें एक नाम चाहिए था. ऐसे में एक रोज मैं और मेरी सास नाम पर दिमाग लगा रहे थे. फिर मैंने सासू मां से कहा, क्यों न आपके ही नाम पर इसका नाम रखा जाए. उनका नाम मोहिनी है. मोहिनी नाम से हमें डोमेन नहीं मिला, तो फिर इसे मैं ने उनके ही नाम से मोही कर दिया और शुद्धता की गारंटी के लिए पीयोर जोड़ दिया. ऐसे हमें मिला हमारे ब्रांड का नाम.
सेलिब्रिटी की बना पसंद 
रेखा के ब्रांड Mohi Pure के स्वाद के दीवाने मुंबई में फिल्मी हस्तियां  भी हैं. पंकज त्रिपाठी भी इनके शुद्ध देसी घी का स्वाद ले चुके हैं. रेखा कहती हैं कि हमारे प्रोडक्ट में शुद्धता के साथ प्यार भी शामिल होता है. यह हमारा टैगलाइन भी है.
रेखा सुथार नयी पीढ़ी से कहतीं हैं –
‘बदलाव ‘के लिए हिंसा की जरूरत नहीं. मैं लोगों से खास तौर पर लड़कियों से यह कहना चाहूँगी कि आप खुद पर विश्वास रखो, हालात खुद बदल जाएंगे. आप खूब उड़ो, पर गलत राहों में नहीं. बदलाव के लिए झगड़ों और हिंसा की जरूरत नहीं है. अहिंसक तरीके से भी क्रांति लायी जा सकती है. आप खुद पर यकीन करेंगे तो दुनिया आप पर यकीन करेगी. चलते रहिए, बढ़ते रहिए—अपनी राह।” 
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एक खत ‘letter box’ के नाम

याद है आपको वो चिट्ठियों का जमाना। वो पोस्टकार्ड, अंतर्देशी और लिफाफे में खत भेजना और वो चटख लाल अपना प्यारा ‘letter box’। लेटर बाक्स से जुड़ी कुछ यादों को हमने इस खत में संजोने की कोशिश की है। आप पढ़ें और कमेंट में अपनी यादों को भी करें साझा….

प्रिय, लेटर बॉक्स
यह पहला और शायद अंतिम खत तुम्हारे नाम। अब हम तुमसे कितने दूर हो गए हैं। फास्ट टेक्नोलॉजी के दौर में तुम पर हुए जुल्म भी मालूम है, पर चिट्ठी की अपनी मर्यादा है सो सर्वप्रथम कुशलता की कामना करता हूं। यह जानते हुए कि तकनीकी क्रांति और फास्ट लाइफ की परिभाषा में हम तुम अब बहुत दूर हो गए हैं।

 

ख़त लिखते आंखें नम हो गई

जानते हो, आज तुम्हें याद करते-करते जी भर आया। आंखें नम हो गई। तो सोचा क्यों न खत ही लिख दूं। फिर लिखने से जी घबराने लगा। कैसे लिखूं। क्या लिखूं। उसे जिसने अपने जीवन में न जाने कितने लाखों-लाख खतों की संवेदनाओं को सहेजा है। भावनाओं की कद्र की है। अक्षरों को महसूस किया है। उनकी खुशी में झूमा है और ग़म में दिलासा दी है। वो हर खत को अपने जिस्म में समेट ठिठुरती सर्दी में गर्माहट दी है। बारिश में खुद भीग, खतों को महफूज किया है। गर्मी में लू के थपेड़ों से उन्हें बचाए रखा है ताकि वो कुशल मंगल पते पर लिखने वाले का पता बताती हुई हाज़िर हो सके।

…कि पाती पते पर पहुंचेगी जरूर

भरोसा इतना मजबूत कि तुम्हारे पेटी में हर कोई चिट्ठी डाल निश्चित हो जाए कि पाती पते पर पहुंचेगी जरूर। आज की तरह न इंटरनेट के गायब होने की बैचैनी, न नेटवर्क कमजोर होने की शिकायत, और न ही 399 के रिचार्ज की चिंता। एक बच्ची भी खत उसी निश्चिंतता से तुममें डालती जिस निश्चिंतता से दादाजी। हम इसे चिट्ठी गिराना कहते थे।

हर आंखों में बसता था तुम्हारा ख्याल

तुम्हारा वो सुर्ख़ लाल रंग और श्याम होठ। हर आंखों में तब तुम्हारा ख्याल बसता था। चाहे मुहल्ले के पहलवान जी हों या फिर शर्मा जी की नई नवेली दुल्हन। लिफाफा, अंतर्देशीय, और पोस्टकार्ड की रंग-बिरंगी दुनिया के हीरो बन हर चौराहे पर तुम सीना तान खड़े रहते। शहरों की भागम-भाग हो या गांवों का चौक एक ही अंदाज़ में खड़े मिलते थे तुम। कहीं-कहीं तुम्हारा बाल रूप लटका रहता। उस पर सफेद अक्षरों से पिनकोड और चिट्ठी निकालने का समय दर्ज होता।

गुलाबी लिफाफे में कितनी उम्मीदें सुर्ख़ गुलाब होती

कोई दूर शहर से बेटा अपने पिता को खत लिखता, तो कोई प्रेमी अपनी प्रेमिका को। याद है न नए साल पर रंग-बिरंगे ग्रीटिंग कार्ड्स के वो गुलाबी लिफाफे जिनमें न जाने कितनी उम्मीदें सुर्ख़ गुलाब होती थीं। कितनी रूह, चंपा-चमेली। बहुत याद आते हो तुम ‘लेटर बॉक्स’! बहुत याद आता है वो ज़माना। जगजीत सिंह की ग़ज़ल ‘चिट्ठी न कोई संदेश…’ में जा तुझे महसूस करता हूं तो कभी गुलज़ार की नज़्म में। शहर-दर-शहर जा तुम्हें ढूंढाता हूं। तुम मिले पर मौन।गांव की पगडंडियों की खाक छानी वहां भी मायूसी मिली। बहुत मन करता है कि तुम मिलो उसी उमंग से और मैं रंगीन लिफाफे में पांच रुपए का टिकट साटकर एक रूमानी सा खत गिराऊं।

यादों की चिट्ठियां, रूह में महफूज

बचपन की ढेर सारी यादें हैं तुम्हारे साथ ‘लेटर बॉक्स’। इन यादों की चिट्ठियों को रूह में महफूज रखा है मैंने तुम्हारी तरह। बहुत कुछ कहना है तुमसे – बहुत कुछ लिखना भी, पर शब्द कम पड़ रहे।

कम लिखे को ज्यादा समझना। पता भी तो नहीं तुम्हारा।  बस बेपते का यह खत भेजा रहा हूं। तुम्हारे नाम।  इस उम्मीद के साथ कि तुम्हारा जवाबी खत जरूर मिलेगा और मैं गा उठूंगा

बड़े दिनों के बाद हम बेवतनो को याद, वतन की मिट्टी आई है, चिट्ठी आई है, चिट्ठी आई है….।”

इसी उम्मीदों के साथ,
तुम्हारा, विवेक

 

 

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Father A. Christu Savarirajan, S.J. – Lighting the Lamp of Learning for Bihar and Beyond

A Teachers’ Day Special on the Inspiring Journey of Fr. A. Christu Savarirajan, S.J., Principal, St. Michael’s High School, Patna,

As a mentor who moulds lives, develops character, and enlightens minds, a teacher is highly esteemed all across the globe and frequently given more respect than the supreme and divine. On this Teacher’s Day, we would like to express our sincere gratitude to Fr. A. Christu Savarirajan, S.J., the Principal of St. Michael’s High School in Patna, a leader who embodies the values of instruction, service, and leadership.

Roots in Nature’s Lap

Born in 1975 in the lush green village of Ottan Kaduvetti, Villupuram District, Tamil Nadu, India, Young Christu’s childhood was greatly influenced by rivers, mountains, butterflies, monsoon rains, and the simple joys of rural and rustic life.

He developed a strong bond with nature during his early years which he spent playing in the mud and fishing by the river. His values and faith initially took root in the simple early village schooling he received, followed by his formative years in a church-run institution.

Drawn to the Priesthood

The calming and serene demeanour of revered priests in white cassocks captivated Young Christu. He was deeply inspired by their radiance, kindness, and persistent devotion. By the time he was in middle school, Christu had already heard the quiet stirrings of his vocation — a resolute call to devote his life completely in the name of God and to the service of humanity.

What followed was an arduous yet grace-filled 17-year journey of Jesuit formation, where discipline became his strength, prayer his refuge, and service his mission. Through these years of moulding, forming, and discernment, he took to heart with conviction the sacred vows of poverty, obedience, and celibacy — an attestation to his selfless surrender and unwavering faith.

Academic and Professional Journey

Fr. Christu’s academic and professional journey is proof of both his intellectual brilliance and his unshakable commitment to education. Nurturing a deep love for science, he began with a B.Sc. in Physics from St. Joseph’s College, Tiruchirappalli (2000), and went on to earn his Master’s in Physics from Loyola College, Chennai (2005).

In his current capacity as the Principal of St. Michael’s High School, Patna, he is a glistening example of academic vision, Jesuit values, and transformative leadership. His career reflects steady progress — from shaping young minds at St. Ignatius High School, Aurangabad, to heading institutions in various leadership roles at St. Thomas High School, Ratanpurva, Bagaha, and St. Xavier’s High School, Patna. He is currently pursuing a Doctorate from Don Bosco University, Guwahati, continuing to push the boundaries of knowledge.

Embracing Bihar with Heart

When Fr. Christu was assigned to the Patna Province, Bihar, his family was concerned about the distance and unfamiliar culture. However, he encountered warmth and love from people, the vibrancy of traditions, and the richness of diversity instead of loneliness.

He joyfully and openly learnt Hindi and regional languages while immersing himself in the lively energy of markets and the laughter that filled the schoolyards. Eventually, Bihar evolved from being a workplace to an inseparable part of him, and he now proudly calls it his second home.

St. Michael’s High School – A Glorious Legacy

Established in 1858 and entrusted to the Patna Jesuit Society in 1968, St. Michael’s High School has long stood as an epitome of quality education. Under the dynamic leadership of Fr. A. Christu Savarirajan, S.J., the institution has grown into a vibrant blend of tradition and innovation — introducing smart classrooms and digital learning, nurturing talent through sports and extracurricular activities, preparing students for a global future, and extending inclusive support to the underprivileged.

His vision has borne remarkable fruit:
Consistently outstanding CBSE Board results
Student achievements at national and international platforms
Establishment of modern laboratories and a resource-rich library
A world-class sports complex Scholarship and student aid programs ensuring that every deserving child finds opportunity and hope within the hallowed portals of St. Michael’s.

Beyond the Principal’s Desk

An artist by heart, a musician by passion, and a true sports enthusiast, FrChristu embodies the belief that education must nurture creativity as much as intellect. His paintings, often inspired by the beauty of nature, reflect his vision of harmony and balance — the very values he seeks to cultivate in the young minds under his care.

Guiding Philosophy

“A teacher’s role is not confined to exams and grades. It is about igniting confidence, leadership, and compassion — preparing students not just for careers, but for life.”
— Fr. A. Christu Savarirajan, S.J.

A Teacher’s Day Inspiration

As India celebrates Teachers’ Day on September 5 in honour of Dr. Sarvepalli Radhakrishnan, Fr. Christu’s life and work shine as an embodiment of the transformative power of education. His journey affirms that when guided by faith, vision, and compassion, education becomes more than the sharing of knowledge — it becomes the lighting of countless lamps of literacy, wisdom, and hope.

Echoing Tagore’s dream of a world “where the mind is without fear and the head is held high,” Fr. Christu dedicates himself each day to nurturing fearless, compassionate, and empowered young people.

On this Teacher’s Day, he stands tall not merely as the Principal of St. Michael’s High School, Patna, but as a true architect of the future carrying forward a noble legacy of knowledge, values, and service to God.

 

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सरहद पार मन की दूरियां मिटाने को जुटे भारत नेपाल के कलमकार, रिश्तों की मिठास बचाने की हुई पहल

भारत और नेपाल एक ऐसे पड़ोसी देश हैं जिनकी संस्कृति और इतिहास में एकरूपता और अपनापन की खुशबू रचती- बसती रही है। राम जानकी से लेकर बुद्ध तक की आध्यात्मिक यात्रा का सफर हो या फिर शादी ब्याह के रिश्ते। दोनों देशों में संबंधो की प्रगाढ़ता सदियों से चलती रही है। बदलते ज़माने के साथ इस मजबूत रिश्तों में थोड़ी थोड़ी सुस्ती दिखने लगी। खुले सरहदों पर घेरा लगाने की बातें उठने लगी। ऐसा आभास होने लगा कि भरसे की इस मजबूत नींव को कहीं कमजोर करने की कोशिश तो नहीं। अगर ऐसा है तो इसकी वजह क्या है? कैसे ये दोनों देश संस्कृतियों के साथ मन के रिश्तों को भी निश्छल, निर्विकार बना पाए? कैसे भरोसे की मीठी मीठी खुशबू दोनों देशों के लोगों की दिल में महक कर गा उठे ये दोस्ती हम नहीं छोड़ेंगे…
इन्हीं सवालों का जबाब ढूंढने नेपाल की आर्थिक राजधानी कहे जाने वाले वीरगंज में जुटे दोनों देशों के कलमकार। बातें हुई, चर्चा हुई, और बनी साझा रणनीति की कैसे कलम की ताकत से नफरती ताकतों को खत्म कर प्यार और भरोसे की फीजा इस देश से उस देश तक बहती रहे। इस पहल को नाम दिया गया Nepal -India cross Border media conclave- 2025 । क्या कुछ हुआ कलमकारों के इस जुटान में पढ़िए…

नेपाल के वीरगंज में भारत-नेपाल पत्रकार संगठन “मीडिया फॉर बॉर्डर हार्मोनी” के बैनर तले नेपाल-इंडिया क्रॉस बॉर्डर मीडिया कॉन्क्लेव-2025 का आयोजन किया गया। इस सम्मेलन में नेपाल और भारत के सैकड़ों पत्रकारों ने शिरकत करते हुए दोनों देशों के संबंध को मजबूत करने में मीडिया की भूमिका पर लंबी चर्चा की । भारत से उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड के कई वरिष्ठ पत्रकार शामिल हुए, वहीं नेपाल के विभिन्न प्रांतों से भी बड़ी संख्या में पत्रकार पहुंचे।

भारत-नेपाल सीमा पर कभी बैरियर नहीं बनेगा’

नेपाल-इंडिया क्रॉस बॉर्डर मीडिया कॉनक्लेव 2025 के समापन सत्र को संबोधित करते हुए नेपाल सरकार के खाने पानी मंत्री प्रदीप यादव ने कहा कि भारत में शायद ही कोई बड़ी या छोटी घटना घटती हो जिसमें नेपाली नागरिक प्रभावित न हों। इसका प्रमुख कारण यह है कि बड़ी संख्या में नेपाली नागरिक भारत में रहते हैं। कोई रोजगार के लिए, कोई व्यवसाय के लिए तो कोई शिक्षा के लिए। यही सदियों से दोनों देशों के बीच अटूट रिश्ते का आधार है। उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल और सिक्किम के कई हिस्सों का नेपाल से ऐतिहासिक संबंध है। इसलिए भारत और नेपाल के रिश्ते को ‘रोटी-बेटी का संबंध’ कहा जाता है। बार-बार मांग उठने के बावजूद हमने हमेशा यह स्पष्ट किया है कि भारत-नेपाल सीमा पर कभी बैरियर नहीं बनेगा। दोनों देशों के बीच केवल कूटनीतिक ही नहीं, बल्कि वैवाहिक, धार्मिक और सांस्कृतिक संबंध भी हैं। इन रिश्तों को आगे भी मजबूत बनाए रखने में आप पत्रकारों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि भारत-नेपाल संबंधों को मजबूत करने के उद्देश्य से ऐसे कार्यक्रमों की भूमिका काफी महत्वपूर्ण है।सक्रिय रूप से भाग लेते हैं। ऐसे कार्यक्रम चलते रहने चाहिए ताकि दोनों देशों के बीच आपसी विश्वास और सहयोग और भी प्रगाढ़ हो सके।

खुला बॉर्डर पूरी दुनिया के लिए एक आदर्श मॉडल’ 

नेपाल सरकार के विधि‌‌ मंत्री अजय कुमार चौरसिया ने कहा कि “भारत और नेपाल के बीच बेटी-रोटी का अटूट संबंध है, जिसे कोई भी तोड़ नहीं सकता। दोनों देशों के बीच खुला बॉर्डर पूरी दुनिया के लिए एक आदर्श मॉडल है। विश्व में ऐसा संबंध भारत और नेपाल को छोड़कर किसी और देश में नहीं देखने को मिलता।”
कॉनक्लेव में वक्ताओं ने मीडिया की भूमिका को सीमा पार भाईचारे और आपसी सद्भाव को मजबूत करने में अहम बताया। साथ ही यह भी कहा गया कि सीमावर्ती क्षेत्रों की समस्याओं व संभावनाओं को रचनात्मक पत्रकारिता के माध्यम से सामने लाना, भारत-नेपाल रिश्तों को और गहराई देगा।

जिम्मेदारी का निर्वाह जरूरी

इस सभा के प्रथम सत्र में विषय प्रवेश कराते हुए मीडिया फार बॉर्डर हार्मनी के संस्थापक वरिष्ठ पत्रकार अमरेन्द्र तिवारी ने दोनों देशों में मीडिया की खबरों से बनते- बिगड़ते रिश्तों पर चर्चा करते हुए पत्रकारों को अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करने और रिश्तों की प्रगाढ़ता का ख्याल रखने की बात कही।

विश्वसनीयता बनाएं रखना सबसे अहम 

भारत के पटना से आए thebigpost.com के संस्थापक और दूरदर्शन बिहार के वरिष्ठ एंकर विवेक चंद्र ने कहा कि आज की पत्रकारिता का स्वरूप काफी बदल गया है। सूचना क्रांति और लाइक , व्यूज और सब्सक्राइबर वाले इस युग में खबरों की विश्वसनीयता बनाएं रखना सबसे अहम है। सरहद की खबरे को प्रसारित प्रकाशित करने से पहले उनकी सत्यता की पड़ताल सबसे जरूरी है। उन्होंने आगे कहा कि पाठकों पर आधारित सब्सक्राइब मार्डल अपनाकर पत्रकारिकता में विज्ञापनदाता के अनावश्यक दबाव से मुक्ति संभव है पर इसके लिए पाठकों को भी आगे आना होगा।

‘ज्यादा हो ग्राउंड रिपोर्ट ‘
कार्यक्रम के आयोजक मंडल में शामिल नेपाल के पत्रकार अनिल तिवारी जी ने कहा कि हम पर लोगों का विश्वास टिक है हमें इस विश्वास को मजबूत करने के लिए ग्राउंड रिपोर्ट को ज्यादा से ज्यादा करने की जरूरत है। उन्होंने इस कार्यक्रम में सम्मिलित होने के लिए दोनों देशों के पत्रकारों को धन्यवाद दिया।

मशीनी पत्रकारिता की जगह मानवीय पत्रकारिता ‘

राष्ट्रीय समाचार समिति नेपाल सरकार के अध्यक्ष धर्मेंद्र झा ने चर्चा के दौरान आए निष्कर्ष को बताते हुए एआई युग में मशीनी पत्रकारिता की जगह मानवीय पत्रकारिता की पहल करने की सलाह दी।
वहीं भारत के पत्रकार विजय झा ने कहा कि ऐसे कार्यक्रम पत्रकारिता और पत्रकारों के लिए आज की जरूरत है। उन्होंने कार्यक्रम के आयोजन के लिए मीडिया फार बॉर्डर हार्मनी के सदस्यों की सराहना करते हुए इसे सद्भाव बढ़ाने वाला बताया।

कार्यक्रम में नेपाल के स्थानीय प्रदेश सांसद श्याम पटेल, , नैनीताल उत्तराखंड से टाइम्स ऑफ इंडिया की पत्रकार सोनाली मिश्र, देहरादून, उत्तराखंड से अमर उजाला के पत्रकार करण जी, प्रेस काउंसिल नेपाल की सदस्य रिंकू झा, नेपाल के पूर्व राजदूत विजयकांत कर्ण, प्रतीक दैनिक के संपादक जगदीश शर्मा, पत्रकार महासंघ नेपाल के अध्यक्ष अशोक तिवारी आदि ने भी संबोधित किया। मंच संचालन मीडिया फॉर बॉर्डर हार्मोनी नेपाल के राष्ट्रीय महासचिव एवं वरिष्ठ पत्रकार रितेश त्रिपाठी ने किया।
कार्यक्रम में दोनों देशों के पत्रकारों ने समस्याओं पर भी खुलकर चर्चा की और एक साझा रणनीति भी बनाई और लिया एक संकल्प कि

सुपर फास्ट पत्रकारिता के जमाने में भी खबरों की बोर्ड पर टाइप होने से पहले सत्यता की कसौटी पर कसी जाए। खबरों में सनसनी का चटखारा नहीं दोनों देशों के जन- मन का ख्याल हो जिससे बची और बसी रहे दोनों देशों के बीच संबंधों वह मिठास जो सदियों से सरहद नहीं मन के रिश्तों को मजबूत करती आई है।

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