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‘डॉक्टर हृदय’ में पिता की स्मृतियां: पढ़ें डॉ. अरुण शाह के मनोभाव

डॉ. अरुण शाह प्रसिद्ध बाल रोग विशेषज्ञ हैं। इसके साथ ही वे समाजसेवा का अलख भी जगा रहे हैं। उम्र की थकान को हमेशा पीछे छोड़ जिंदगी के गीत गाने वाले डॉ. शाह ने अपने दिवंगत पिता स्वर्गीय हरिराम शाह जी की यादों को अपनी भावनाओं में कुछ यूं समेटा है कि हर एक पुत्र को उसे जरूर पढ़ना – सुनना और गुनना चाहिए – यह आलेख पढ़िए….

पिताजी, माताजी और भाई के साथ डॉक्टर अरूण शाह

आपकी बहुत याद आती है बाबूजी! प्रतिपल – प्रतिक्षण। जी करता है आपके कमरे के बाहर जा जोर-जोर से आपको पुकारूं, और आप कहें – अरे क्यों इतना शोर मचा रहे हो, आ रहा हूं न!  फिर बाहर आ, ठीक उसी तरह आप मेरे सर पर प्यार से हाथ फेरें, जैसे बचपन में फेरते थे और मैं आपके इस उन्मुक्त स्नेह की बरखा में चुपचाप भींगता रहूं। बाबूजी, हर सुबह ऐसा लगता है कि आप  पूजा कर रहे हों और आपके गाए भजन हमारे कानों को पावन । मैं झट से उठ बैठता हूं और हाथ जोड़ आपके भजन के स्वर में अपना स्वर मिलाने लगता हूं।

मैं वक्त-बेवक्त आपके ठौर पर आपकी राह देखता हूं। यह जानते हुए भी कि आप अब सदेह हमसे दूर चले गए हैं। बहुत दूर।,

चार पीढ़ियों को आशीर्वाद

आपकी दी हुई हिम्मत, उम्मीद और स्नेह को हम सब ने बड़े करीने से संभाल रखा है। आपकी यादें घर के हर कमरे – हर दर-ओ-दीवार पर मुस्कराहट बन चस्पा हैं। हम सब आपको बहुत याद करते हैं बाबूजी, आपकी नटखट परपोती अब भी अपनी तुतली आवाज में आपको पुकार लेती है। जानते हैं, अब वो स्कूल भी जाने लगी है।

हम सब पल-पल आपको याद करते हैं। बेटे, पोते, पोतियां सब के लिए आप ही तो हिम्मत थे बाबूजी। मां भी बहुत याद करती है आपको। आपके बिना अजीब सा एक खालीपन लगता है। एक ऐसा सुनापन जिसकी भरपाई कभी नहीं हो सकती।

वो उमंग भरे दिन: जन्मदिन पर बाबूजी

र जाता हूं तो देर तक आपकी उस कुर्सी के पास बैठ उसे निहारता रहता हूं जिस पर आप बैठा करते थे। वो कुर्सी अब खाली पड़ी है। आपका चश्मा… आपकी कलम… आपका नोटबुक सब वैसे ही रखे हैं करीने से, बस आप नहीं हो बाबूजी…!

बचपन की यादों की लंबी फेहरिस्त है। कैसे बचपन में मेरी छोटी-सी परेशानी भी आपके लिए बड़ी चिंता बन जाती थी और आप उसका समाधान ढूंढते। मुझे अब भी याद है, वही सात साल की उम्र रही होगी मेरी, जब मुझे चोट लगी और पैर में प्लास्टर लगने के बाद इंफेक्शन हो गया था। आप मुझे बेहतर इलाज के लिए तब पहलेजा घाट से पटना स्टीमर से ले जाते। मैं चल नहीं पाता तो मुझे कांधे पर बिठाकर आप ले चलते।तब डॉक्टर ने यह कह दिया था कि पांव काटने होंगे। आप बिना विचलित हुए इलाज में लगे रहे और मेरे दोनों पांव को सलामत रहे।

जमाना बचपन का: बाबूजी के साथ हम भाई-बहन

सच में, आप एक योद्धा थे बाबूजी…। कितनी बहादुरी से आपने जीवन के अंधेरे वक्त से लड़ाई लड़ी।

जीवन के हर उतार-चढ़ाव में आप स्थिर भाव से भरे रहते। ग़म में मुस्कुराते रहते। अंदर से मोम होकर भी बाहर फौलाद सा सख़्त बने रहते आप बाबूजी। मेरी खुशी में आप हर वक्त अपनी खुशी ढूंढते।

खुशियों बांटते चलें

स्कूल के वक्त आपने मेरे लिए कितनी प्यारी-सी साइकिल खरीदी थी। जब मैं घंटी बजाता हुआ साइकिल चलाता तो आप मुझे देख मुस्कुरा उठते।

बचपन में मैं रूठने का नाटक करता और आप मुझे मनाते। सोचता हूं, मैं फिर रूठने का नाटक करूं और आप फिर मुझे मनाने आ जाओ बाबूजी। जब मेरा दाखिला दरभंगा मेडिकल कॉलेज में हुआ तो आपने मेरे लिए एक स्कूटर खरीदा था। मैं उस स्कूटर से हर छुट्टी वाले दिन आपसे मिलने आता। जाते वक्त जरूरी सामानों की गठरी बांधते हुए आप मां से कहते – पूछ लो कि कुछ और जरूरी तो नहीं। जब मैं डॉक्टर बन गया तो आपने ही मेरी पहली कार खरीदी। जब आप शहर के काम से जाते और वापस लौटते तो आप हम सब बच्चों के लिए कुछ न कुछ चीजें लाना कभी नहीं भूलते।

समाज सेवा में भागीदारी

संत पुरुष थे आप बाबूजी

सादा जीवन, सुंदर विचार, ईमानदारी और खूब मेहनत – यही आपके जीवन का मंत्र था। आपसे हमने भी जीवन का यह मंत्र सीखा। खाने में भी सादा खाना, बस दाल-रोटी आपको पसंद आती। न कोई घमंड, न कोई दिखावा – बस अपनी धुन में मगन। अपने काम में खूब मेहनत, खूब ईमानदारी। यही वजह रही जिससे आपका प्रतिष्ठान उत्तर बिहार का सबसे प्रतिष्ठित और भरोसे वाला प्रतिष्ठान बन गया। 

मां के जन्मदिन पर बाबूजी का उत्साह

सब परिवार के लिए

अपने लिए आपने कभी कोई चाहत नहीं रखी बाबूजी। अंतिम दिन तक परिवार के लिए ही जुटे रहे। खुद सादा लिबास पहनते और हम सब के लिए ब्रांडेड कपड़े सिलवाते। खुद के सपनों को छोड़ हमारे सपनों में रंग भरते। हमारी छोटी-छोटी खुशियां पूरी करते। आप थे तो लगता कि हम सब महफूज हैं। हर परेशानी में लगता – बाबूजी हैं न, रास्ता निकाल लेंगे। लगता कोई है जो हमारा ख्याल रखता है।

आशीर्वाद बना रहे

आशीर्वाद साथ हमारे 

आज मैं जो कुछ भी हूं बाबूजी, सब आपके आशीर्वाद से ही संभव हुआ है। आपके ही मार्गदर्शन से हम सबने मंजिल पाई है। आपके पोते-पोतियां सब आपके बताए रास्ते पर चलते-बढ़ते हुए देश और दुनिया में अपनी पहचान बना रहे हैं। हम सब आपके आदर्श पर चल रहे हैं। आप लंबे वक्त तक हमारे साथ रहें, हमारी छांव बने रहें। मैंने सुना था कि कैसे बचपन में जब आप ढाई साल के थे, उस वक्त ही आपके सर से पिताजी का साया उठ गया था। पिता के बिना जीवन कितना कठिन होता है।

आप कठिनाई से लड़ते हुए बड़े हुए थे बाबूजी। कभी आपने हौसला नहीं खोया।

तब भी जब मैं हमेशा बीमार रहा करता था, और तब भी जब मेरी 15वीं सर्जरी का ऑपरेशन होना था। डॉक्टर ने काफी खतरा बताया, आप मुझमें हिम्मत भरते रहे। खुद चिंतित होकर भी परेशानी की लकीरें चेहरे पर न आने दीं। इसी विश्वास की वजह से मेरी सर्जरी कामयाब रही। आपकी संयमित जीवन शैली आपको स्वस्थ रखती थी, यदा-कदा कभी बुखार हो जाता और मैं आपकी तबीयत के बारे में पूछता तो आप कहते – अच्छा हूं, सब ठीक है। वो तो मां कह देती कि दो दिन से बुखार में हैं और तब मैं आपको गोलियां खिलाता। हजारों यादें जुड़ी हुई हैं आपसे बाबूजी।

आपने सीखाया स्वाद जिंदगी का 

आपसे मैंने हमेशा सीखा है कि जीवन का स्वाद कैसे लेकर जीना है – यह आपने ही मुझे सिखाया। समाज की सेवा को ईश्वर की सेवा मानना। यही धर्म कहा था आपने।

मुझे वो बातें भी याद हैं जब परिवार में लोगों की संख्या बढ़ने पर मैंने एक अलग घर की चाहत की थी और आपने न सिर्फ इसकी सहमति दी बल्कि मुझे मकान खरीदने में आर्थिक मदद भी की। आपको पुराने गीत कितने पसंद थे। हमेशा मुकेश, लता, किशोर के गाने आप सुनते-गुनगुनाते रहते थे। बाद में आपकी बेटियों ने आपको एक सारेगामा कारवां दिया था कि आपको मन का संगीत सुनने में आसानी हो।

आज मैं जब भी गीत गाता-गुनगुनाता हूं तो लगता है आप पास बैठे मेरा यह गीत सुन तालियां बजा रहे हैं।

बाबूजी, जब आप 80 की दहलीज पार कर गए, तब मैं हर हफ्ते जब भी मिलने आता कोशिश यही रहती कि आपको नन्हा सा बच्चा बना वैसे हंसा पाऊं, जैसे बचपन में आपने हमें हंसाया था। आपसे खूब बातें होती हम सब की। शाम की वो चाय और गप्पों की महफ़िल। आप सिर्फ एक पिता नहीं थे, आप मित्र भी थे, एक मार्गदर्शक भी, एक शिक्षक भी।

वो बेरहम वक्त

अभी तो आप एकदम स्वस्थ थे। आराम से खुद का सारा काम खुद करते। अचानक आप बीमार हुए और हम सब को छोड़ गए। 19 तारीख तक आप कर्मयोगी की तरह कार्य करते रहे। 20 तारीख को आपकी तबियत बिगड़ी हम सब ने आपको अस्पताल में भर्ती कराया और 21 तारीख को आप हमें छोड़ परलोक प्रस्थान कर गए। 

इस माया लोक से सबको विदा तो होना ही है। आप भी इस दुनिया से विदा हो गए।  सुकून यही कि हम सब हमेशा आपके बताए रास्ते पर चल रहे हैं। आपने तीन-तीन पीढ़ियों को गोद में खिलाया, उन्हें आशीष दिया। आप हमारी बगिया के बागवान बने रहे। बाबूजी, आपको टहलना खूब भाता था। सुबह-सबेरे हरी दूब पर चलकर मैं आपके पदचिन्हों को महसूस करना चाहता हूं।

गीता कहती है आत्मा अमर है, वह मरती नहीं। आप भी अमर हैं बाबूजी। हमारे पास ही तो हैं। घर के मंदिर के दीप की उजास बनकर, पलाश के ढेर सारे खिलते हुए फूल में मुस्कान बनकर, बारिश की नन्हीं बूंद में शीत बनकर, सूरज की पहली किरण में चमक बनकर। नीले-नीले अंबर में तारों की टिमटिमाहट बनकर आप हमें आज भी रास्ता बता रहे हैं।

जब भी कभी मन थकान से विचलित होता है, मैं आपकी ढेरों यादों को समेट गले लगा लेता हूं।
पावन हो उठता है मन। सांसें पुराण का मंत्र गा उठतीं हैं-

पिता स्वर्गः पिता धर्मः पिता हि परमं तपः।

पितरि प्रीतिमापन्ने सर्वा हि प्रीयते प्रजा॥”

यादें साथ हैं

मेरी आंखों के कोर से कुछ बूंदें टपक पड़ती हैं..। मैं आपकी ऊर्जा खुद में महसूस करता हूं, कदमों में हौसला भर आता है  , मैं चल पड़ता हूं उस मार्ग पर जिसे आपने अपने जीवन का मार्ग कहा था – सत्य का मार्ग कहा था। मोक्ष का मार्ग कहा था।

कोटि-कोटि प्रणाम बाबूजी!!!

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‘मसान’ में चल रही शिक्षा की साधना , अनोखे ‘अप्पन पाठशाला’ की कहानी पढ़िए

मृत्यु के शोक और मसान में जलती चिता के पास एक साधक सालों से अपनी साधना में लीन हैं।यह कोई तंत्र साधक नहीं, न तंत्र साधना हो रही है। यह ज्ञान की साधना है। विद्या की साधना और यह साधक है युवा सुमित कुमार।
सुमित यहां चला रहे हैं उन बच्चों के लिए अनोखा स्कूल जो कभी मसान से फल और पैसा चुनते थे।आज कहानी अप्पन पाठशाला की….

शाम का वक्त है, हम बिहार की स्मार्ट सिटी मुजफ्फरपुर के सिकंदरपुर स्थित चमचमाते मरीन ड्राइव से गुजर रहे हैं। थोड़ा आगे बढ़ने पर मुक्तिधाम का गेट दिखाई दिखता है।शहर का सबसे प्रमुख श्मशान घाट। हमारे कानों में घंटे की आवाज के साथ’राम नाम सत्य है ‘का एक स्वर सुनाई देता है । जीवन की नश्वरता और ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार करने का स्वर, जो शायद अंतिम यात्रा और मुक्तिधाम जैसी जगहों पर ही स्वीकार्य होता है। हम मुक्तिधाम पहुंच चुके हैं थोड़ी दूर पर ढलते सूरज की परछाई में चिंता की लपटें उठ रहीं हैं, आसमान में धूंए का गुब्बारा। मेरे मन में कबीर की पंक्ति अनायास उभरने लगती है

सांस सांस सब सांस है,सांस बिना सब सून,

कबीर सांस न कीजिए, सांस जाएगा तीन “

जीवन की इस अंतिम पड़ाव वाले स्थल पर एक और आवाज हमें सुनाई दे रही है ‘क’ से कलम ‘ख’ से खरगोश। बच्चों का एक झुंड और उन्हें पढ़ाते युवा। यह मुक्ति धाम में चलने वाली पाठशाला है। अप्पन पाठशाला। ‘अप्पन’ बज्जिका का एक शब्द है जिसका मतलब ‘अपना’ होता है।

हम थोड़ी देर यही खड़े हो पढ़ाई में रहें बच्चों को देखते हैं। बच्चे’ ग ‘ से ‘गमला’ ‘ घ’ से घर पढ़ रहे हैं । पास फैले मृत्यु के शोक के इन बच्चों की आंखों में जीवन के सपने हैं। सृजन के सपने हैं।

हमारी मुलाकात इस पाठशाला के संस्थापक सुमित     कुमार से होती है।
सुमित बताते हैं कि मैं एक दिन परिचित की अंतिम यात्रा में यहां आया था। इस दौरान कुछ बच्चों पर नजर पड़ी जो यहां से मिठाई, पैसा, कपड़े आदि चुन रहे थे। मुझे यह दृश्य बड़ा विचलित कर गया। सोचा यह कैसी विडम्बना है कि आज भी हमारे बच्चे इस तरह से जीने को मजबूर हैं। फिर कुछ दिन तक इन बच्चों की दिनचर्या देखी और फिर शुरू की एक कोशिश इन्हें पढ़ाने की 8 बच्चों के साथ शुरू हुआ हमारे इस अप्पन पाठशाला में अब 140 बच्चे हैं। इनमें से 110 नियमित आते हैं। शाम ढलती जा रही थी, चिंता की लपटें और तेज हो आई थी, इधर हमारे मन में इस अनोखे स्कूल को लेकर जिज्ञासा भी बढ़ रही थी। हमने वहां कुछ बच्चों से बातचीत की।

नन्ही आंखें में हैं बड़े-बड़े सपने 

सबमें अनूठा आत्मविश्वास। सबके अपने सपने । कोई डॉक्टर बनना चाहता है तो कोई जज। किसी को फिल्मी दुनिया में जा नाम कमाना है तो कोई शिक्षक बन शिक्षा की रौशनी बटना चाहता है।हम सुमित कुमार से फिर मुखातिब होते हैं। सुमित कहते हैं। यह सब आसान नहीं था।

पहले न बच्चे पढ़ने के लिए तैयार थे न उनके अभिभावक इन्हें भेजने के लिए। वो कहते पढ़कर क्या होगा?

ऐसे तो मेरा बच्चा दो पैसा कमाकर लाएगा। मैं और मेरे दोस्त ने इन लोगों को बहुत समझाया। फिर किसी तरह ये तैयार हुए।

 इस पाठशाला की शुरुआत मार्च 2017 में की। तब से लगातार यह चल रहा है।पाठशाला का नाम अप्पन इसलिए रखा गया ताकि बच्चों को अपना लगे।


जब पाठशाला की शुरुआत हुई तब धीरे-धीरे बच्चों को बैठने का आदत लगाई ,फिर पढ़ना शुरू किया। जब पाठशाला में बच्चे नियमित आने लगे तो फिर चिंता यह हुई कि इनका नामांकन कहां हो। मैंने पहल कर बगल के सरकारी स्कूल में नामांकन कराने के लिए बच्चों और बच्चों के अभिभावकों को मैंने प्रेरित किया। अब हर साल लगभग 35- 40 बच्चों का बगल के सरकारी प्राथमिक विद्यालय ,मध्य विद्यालय और उच्च विद्यालय में नामांकन हम लोग कराते हैं। इन 8 सालों में लगभग 300 से अधिक बच्चों का नामांकन बगल के सरकारी के विद्यालयों में कराया गया है।

कक्षा एक से ग्यारहवीं तक के बच्चे 

सुमित आगे बताते हैं कि अप्पन पाठशाला में
कक्षा एक से लेकर 11वीं तक के छात्र-छात्राएं पढ़ते हैं। उन्होंने यहां पढ़ने वाले बच्चों को उनके माता-पिता के कार्य शैली के आधार पर चार वर्गों में बांटा गया है
1. वह बच्चे जो पहले मुक्तिधाम में पार्थिव शरीर से फल पैसा या अन्य वस्तुएं उठाते हैं
2. वैसे बच्चे जिनकी मां घरों में चौक बर्तन की काम करती है
3. वह बच्चे जो कचरा चुनने का काम करते थे
4. आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े बच्चे ।

खुद की कमाई का एक हिस्सा यहां खर्च 

इन सभी बच्चों के लिए ड्रेस, बैग ,कॉपी ,किताब ,पेंसिल ,रबर कटर, बैठने के लिए आसनी और ठंड में स्वेटर ,कंबल का व्यवस्था सुमित खुद करते हैं। जब हमने उनसे यह पूछा कि इसके लिए पैसे कहां से आते हैं तो सुमित कहते हैं, मैं इसके लिए अलग काम करता हूं। मेरा कंसल्टेंसी का काम है इससे हुई आमदनी का 90 फीसदी हिस्सा मैं यहां खर्च करता हूं। कभी कभी कुछ लोग आर्थिक मदद करते हैं।

वुशु का प्रशिक्षण भी ले रहे यहां के बच्चे

इस अप्पन पाठशाला के बच्चे आत्मरक्षा के लिए वुशु( मार्शल आर्ट ) का प्रशिक्षण ले रहे हैं । इनमें ज्यादातर लड़कियां शामिल हैं।सुमित कहते हैं कि इस प्रशिक्षण का उद्देश्य महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराधों को ध्यान में रखते हुए किया गया है, वे स्वयं की रक्षा में समर्थ हो सकें तथा वे शारीरिक एवं मानसिक रूप से सशक्त बनें और दूसरे को जागरूक करें और सिखाएं ।
एक छात्र अपने घर के आस-पास कम से कम 10-10 बच्चों यह को सिखाएंगे और यह प्रक्रिया लगातार चलती रहेगी। यह प्रशिक्षण फिलहाल सप्ताह में दो दिन पाठशाला चल रहा है इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में दो मुख्य शिक्षक सुनील कुमार और अजीत सिंह के
सहयोग किया जा रहा है।

ऑर्गेनिक फॉर्मिंग भी यहां सीख रहे 

सुमित कुमार कहते हैं कि अप्पन पाठशाला में पढ़ने वाले बच्चों को पढ़ाई के साथ-साथ ऑर्गेनिक फॉर्मिंग भी सिखाई जा रही है. बच्‍चे पढ़ाई के साथ-साथ जैविक खेती का  व्यवहारिक ज्ञान सीख रहे हैं.
जिससे आने वाले भविष्य में ये स्वावलंबी बन सके । ये बच्‍चे आने वाले समय में किसानों को जैविक खेती के लिए भी जागरूक करेंगे।

सुंदर होगा समाज 

सुमित का मानना है कि ये बच्चे हम यहां इन्हें बस किताबी ज्ञान ही नहीं देते, इन्हें बेहतर इंसान बनने की प्रेरणा भी देते है। इनमें से कई वैसे बच्चे थे जो शुरू में नशे की चपेट में थे। अब वो नशामुक्ति का अलख जगा रहे हैं। पढ़-लिखकर ये खुद की किस्मत तो रौशन करेंगे ही अपने समाज को भी उजियारा प्रदान करेंगे। इससे हमारा समाज सबल होगा।

इस यात्रा में इनका मिला सहयोग

सुमित बताते हैं कि पाठशाला की इस यात्रा में कई लोगों का सहयोग मिला। मेरे माता-पिता ने मुझे हिम्मत दी। मेरे भाई और मेरे मित्र का भी इसमें बड़ा योगदान है। मैं अपने भाई अमित कुमार अपने मित्रों का, मुजफ्फरपुर के पूर्व सांसद अजय निषाद का, मुक्तिधाम प्रबंधन कार्यकारी समिति का और समाज के कुछ प्रबुद्ध लोगों का इस कार्य में सहयोग के लिए शुक्रगुजार हूं।

आर्थिक सहयोग की जरूरत

सुमित आगे कहते हैं कि काफी लोग हमारे प्रयास की सराहना तो करते हैं पर आर्थिक मदद काफी कम लोग करते हैं। मैं खुद की मेहनत से इसे चला तो यह हूं पर इस पाठशाला को और मजबूत करने के लिए हमें आर्थिक सहयोग की जरूरत है। अगर हमें आर्थिक सहयोग मिलेगा तो हम इसे और भी बेहतर ढंग से चला पाएंगे।

शाम ढलती जा रही है। बच्चे पढ़ाई के बाद घर लौट रहे हैं।
बाहर लगा स्ट्रीट लाइट जल उठता है। हम कांधे पर बस्ता लिए धीरे धीरे अपने घर की और लौटते इन बच्चों को निहार रहे हैं।

हम सुमित से विदा लेते हैं। रात हो आई है, पर इस अंधेरे में भी अप्पन पाठशाला की रौशनी, सितारों सा इस मसान में फैली लगती है। रौशनी हमारे मन में भी फ़ैल रही है। हम अप्पन पाठशाला की कहानी, सुमित और बच्चों के विश्वास भरी यादों को समेटे निकल पड़ते हैं। गाड़ी के रेडियो में मुकेश की आवाज में गीत बज रहा है।
“इक दिन बिक जाएगा, माटी के मोल
जग में रह जाएँगे, प्यारे तेरे बोल
दूजे के होंठों को, देकर अपने गीत,
कोई निशानी छोड़, फिर दुनिया से डोल।”

( नोट: thebigpost.com समाज की प्रेरक कहानियों को सामने लाने की पहल है। इस मिशन को मजबूत करने के लिए हमें आपके सहयोग की ज़रूरत है। 📞 आर्थिक मदद के लिए संपर्क करें: 7488413830)

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बंदिशों के पिंजरे तोड़, मुंबई लोकल से ‘Mohi Pure’ तक की ‘रेखा’, इस राजस्थानी लड़की की बहादुर कहानी पढ़िए

वह अपने नन्हे-नन्हे कदमों से सितारों को छू लेना चाहती थी। नन्ही हथेलियों में जुगनू की चमक समेट मन को रोशन कर लेना चाहती थी। वह अरावली की पहाड़ियों से आई हुई ठंडी हवा के झोंकों के साथ रेस लगाना चाहती थी। तब उसे कहाँ पता था कि बचपन की उस गुड़िया के होश  संभालते ही उसकी उम्मीद की रेखा से बड़ी लोहे की कंटीली रेखाएँ लगा दी गई हैं, ताकि उसके सपनों को नियति की क्रूरता और रस्म मानकर कुर्बान किया जा सके। इन सबके बाद भी उसने अपने सपनों को “लव यू” कहा, मन में हौसलों का चट्टान भरा, आँखों में उम्मीद की चमक और आशाओं के पंख पहनकर राजस्थान के अपने गाँव में ‘मैदान मार ‘लड़कियों की किस्मत बदली।  इन सब के बावजूद खुद की किस्मत भी उससे आँख-मिचौली खेलती रही। हाथ पीले कर मुंबई आयी तो ससुराल में भी  दुनिया रसोई घर तक ही सिमटी रही।  उसकी आँखें भीगती रहीं, पर सपनों को आँसुओं के सैलाब में बहने न दिया। वह मुंबई लोकल की राह पकड़ ज़िंदगी को ढूँढने निकल पड़ी। जनरल डब्बों की खाक छानते, तजुर्बों के पन्ने समेटते, रुकते-चलते हुए एक मुकाम बनाया। जलवा ऐसा कि  सासू माँ भी बेस्ट फ्रेंड बन चाय की प्यालियाँ खनका कर गप्पों की शाम बिताने लगी। बाल विवाह, पर्दा प्रथा और लड़कियों पर लगी तमाम बंदिशों के खिलाफ मुखर आवाज़ बन स्त्री मुक्ति का अलख जगाने वाली इस स्त्री के मन में एक कथाकार भी बसता है और एक उद्यमी भी। इनकी किताब ‘मुंबई लोकल’ जल्द आने वाली है। इनके ब्रांड  Mohi Pure के स्वाद के दीवाने पंकज त्रिपाठी तक हैं।
आज पढ़ें कहानी — दर्द से भरे दामन को उम्मीद के उजास से रौशन कर जिंदादिली की इंद्रधनुषी रेखाएँ खींचने वाली रेखा सुथार की–
  
प्रकृति के बीच महलों वाला गाँव
मेरा जन्म राजस्थान के अरावली की पहाड़ियों से घिरे एक छोटे से गाँव ‘घाणेराव’ में हुआ था। गाँव छोटा तो था पर बेहद खूबसूरत। नक्काशीदार मंदिरों की दीवारें, ऊँचे-ऊँचे खूबसूरत महल और राजवाड़े। विदेशी मेहमानों का आना-जाना, उनके कैमरे में कैद होती गाँव की कहानियाँ — सब कुछ था मेरे इस गाँव घाणेराव में।
बचपन में पढ़ाई-लिखाई के लिए मेरा दाखिला गाँव के ही स्कूल में कराया गया। हम बच्चों की टोली हरे-भरे जंगलों के बीच से पेड़ों को निहारते हुए स्कूल आती- जाती। यहाँ तक तो सब खूबसूरत था, पर मेरे गाँव की इस खूबसूरती के साथ ही एक स्याह पक्ष भी था। परंपरा के नाम पर रूढ़ियों की जड़ें मज़बूत थीं।
एक उम्र के बाद लड़कियों को पाबंदियों की परिधि में बाँध दिया जाता। वह अपने गाँव से बाहर कभी अकेली कदम नहीं निकाल सकतीं। बचपन में ही लड़की ब्याह दी जाती। बहुओं को चेहरे के आगे लंबा घूँघट ताने रखने का फरमान था।  अगर कोई गुस्ताख़ी हो गई तो सज़ा भी डरावनी।
यह बताते हुए रेखा सुथार का गला भर आता है। वह खुद को सँभालते हुए हिम्मत की मुस्कान होंठों पर भरती हैं और हमें आगे का वाकया बताती हैं। साहित्यिक मिजाज रखने वाली रेखा सुथार  Mohi Pure की फाउंडर हैं और जी-जान से देशभर में शुद्ध तेल और घी मुहैया कराने की पहल कर रही हैं।
माता पिता और खेल ने मुझे संवारा
रेखा आगे बताती हैं कि आज जो कुछ भी वे हैं उसमें उनके माता-पिता और खेल में उनकी रुचि का बड़ा योगदान है। वह कहती हैं कि पग-पग रूढ़िवादी विचारों से लैस इस गाँव में उनके माता-पिता ने उन्हें खुद के पंख फैला उड़ने की आज़ादी दी। गाँववालों के ताने मिले, पर इसकी परवाह न करते हुए वे उन्हें खुद का आकाश गढ़ने का हौसला देते रहे। पिता नरेंद्र प्रसाद परिहार जीवन बीमा कंपनी में कार्यरत थे। माँ कमला परिहार गृहणी थीं। माँ भले कम पढ़ी-लिखी थीं, पर ज़िंदगी के तजुर्बे ने उन्हें काफी व्यवहारिक बना दिया था। रेखा कहती हैं कि उनके माता-पिता ने उन्हें बंदिशों वाले गाँव में खुलकर जीने की आज़ादी दी। वह स्कूल में सॉफ्टबॉल खेलती थीं। उनका यह खेलना स्कूल के कई शिक्षकों को पसंद नहीं आता था। तब इसमें  है। हमारे दूसरे  पीटी टीचर भी शामिल थे। वह थोड़ी ज़िद्दी थीं — खेलना है तो खेलना है। काफ़ी समझाने पर स्कूल के प्रिंसिपल ने स्कूल में लड़कों के साथ लड़कियों की टीम शुरू की। धीरे-धीरे वे बाहर भी खेलने जाने लगीं।
अपने पिता के साथ रेखा सुथार
जब पीटी टीचर चुपचाप मेरी क्लास में आ गए
रेखा हमें स्कूल का एक खूबसूरत वाकया बताते हुए कहती हैं — “एक बार हमारी क्लास चल रही थी। हम सभी बच्चे पढ़ाई कर रहे थे। अचानक पीटी सर आए और मेरा नाम लेकर पुकारने लगे। मेरी धड़कनें तेज़ हो गईं। मुझे लगा कोई ग़लती हो गई। फिर उन्होंने सबके सामने मेरी पीठ थपथपाते हुए कहा कि इस लड़की ने स्कूल का मान बढ़ाया है। यह खरा सोना है, ठोक-पीटकर आगे निकली है।” उनका चयन तब नेशनल लेवल पर सॉफ्टबॉल के लिए हुआ था। इससे पहले वह स्टेट लेवल पर सॉफ्टबॉल जीत चुकी थीं।
 
नेशनल ट्रेनिंग कैंप, पीरियड का पेन और माँ की वो बात
रेखा सुथार  कहती हैं कि उनकी किस्मत की रेखाएँ हर वक्त उनका इम्तिहान लेती रही हैं। ऐसा ही एक वाकया नेशनल ट्रेनिंग कैंप के दौरान हुआ। दरअसल फाइनल चयन के लिए इस कैंप से 45 लड़कियों में से 16 लड़कियों को चुनना था। जिस दिन उनका परफॉर्मेंस था, उसी दिन उन्हें पीरियड आ गया। उनका पीरियड काफी पेनफुल होता था। उन्हें लगा कि ऐसी हालत में वे परफॉर्मेंस नहीं दे पाएँगी। नेशनल का फाइनल सिलेक्शन आज के ही टेस्ट के बाद होना था। उन्होंने सोच लिया कि वे नहीं कर पाएँगी। दर्द काफी तेज़ था। उन्होंने मम्मी को फोन कर यह बात कही। मम्मी ने कहा —
“पीरियड तो हमेशा आएँगे, यह टाइम वापस नहीं आएगा।”
फिर माँ 30 किलोमीटर दूर अस्पताल गईं, डॉक्टर से दवा पूछी और फोन पर लिखवाया। रेखा ने दवा मँगाई, खुद को मज़बूत किया और सबसे बढ़िया परफॉर्मेंस देकर सेलेक्ट हो गईं।
स्कूटर आएगी, ब्याह कर लो
 रेखा बताती हैं कि मैं बारहवीं में थी. इसी वक्त मेरा ब्याह कर दिया गया. हमारे गांव में बड़ी बहन के साथ छोटी बहन का भी ब्याह कर दिया जाता था. हाँ, शादी के काफी सालों बाद गौना होता, तब लड़की अपने ससुराल जाती. मेरी शादी भी बहन की शादी के वक्त कर दी गई. मैंने मना किया तो फिर मुझे स्कूटर खरीद कर देने की बात मेरे भाई ने बताई. मैंने सोचा, चलो शादी करने से स्कूटर चलाने की आजादी मुझे मिल जाएगी, तो ठीक है, कर लेते हैं शादी.
स्कूटर तो नहीं आई, हाँ मैंने पापा का बुलेट बाइक चलाना सीख लिया. गांव और आसपास में बुलेट चलाया करती. मेरे बुलेट मोटरसाइकिल चलाने देख गांव के कुछ रूढ़िवादी लोग ताने भी देते, पर मुझे तो रफ्तार चाहिए थी. खुलकर जीना था, खुद की जिंदगी. शादी के बाद मैंने CAT का एग्जाम दिया. फिर MBA कर ली. मैंने अंग्रेजी साहित्य से  स्नातक किया है।
ससुराल की बंदिशें मुझे नहीं आयी रास
रेखा बताती हैं कि मैं मायके में खूब आजादी के साथ रहती. दूसरी लड़कियों को भी पाबंदियों से निकाल, पढ़ाई-लिखाई की ओर बढ़ने में मदद करती. मेरी किस्मत ने मेरा खूब इम्तिहान लिया है. आखिर वह दिन भी आया जब गौना के बाद मेरे कदम ससुराल की दहलीज पर पड़े. हर लड़की की तरह मेरे आंखों में भी ससूराल और शादीशुदा जिंदगी को लेकर ढेरों ख्वाब बसे थे. मेरे ससूराल वाले मुंबई में रहते थे. मुझे लगा था कि इस महानगर में और पंख फैला उड़ सकूँगी, पर हुआ इसका उल्टा.
“मुझे उस वक्त मेरा ससूराल वैसा नहीं लगा जैसा मैं सोचकर आयी थी। हर आम परिवार की तरह यहां भी बहू के लिए वो बंदिशें थी जो उस वक्त चला करती थीं। 
मुंबई शहर में तो था, पर मुझे घर से निकलने की आजादी नहीं थी. यह सब मुझे बेचैन करता”
मुझे हमेशा साड़ी का पल्लू  ताने  रहना होता था. किसी जरूरी काम के लिए भी मैं नीचे चौराहे की दुकान पर नहीं जा सकती थी. घर का सारा काम तो मुझे करना था ही, वह भी साड़ी में रह कर. मैं सलवार सूट भी नहीं पहन सकती थी. आप सोचिए, जो लड़की एक खिलाड़ी रही, खूब आजादी से, उसे आज के जमाने में इतनी बंदिशें अचानक आ जाए तो उसके मन पर क्या बीतेगी. मैं अपने पति से इन सबको लेकर बात करती. पति सपोर्ट भी करना चाहते पर इससे बहुत कुछ बदला नहीं ।
“उस वक्त  मेरी आंखें बार-बार गंगा-यमुना होतीं। मन समंदर सा नमकीन और देह जलती असहाय ताप की पीड़ा से। “
मैं मन ही मन ईश्वर से सवाल करती, ये मेरे साथ क्या हो रहा है।
‘मुंबई लोकल ‘वाले दिन
हिम्मती दिल और मुंबई लोकल का सफर
मैं ससूराल में काफी तनाव में रहती. फिर मैंने सोचा, इस अंधेरे को मुझे ही दूर करना होगा, कोई मेरे लिए नहीं आएगा. फिर एक दिन मैंने कह दिया कि मुझे जॉब करने जाना है.
“इतना सुनते ही प्रतिरोध पर प्रतिरोध. ये लड़की जॉब करेगी? हमारी प्रतिष्ठा का क्या? क्या जरूरत है जॉब करने की? इस तरह के हजारों सवाल. मैंने गांधी जी की तरह सत्याग्रह वाला रास्ता चुना.”
मैं उनका विरोध तो करती, पर इसका तरीका अहिंसक होता. मैं कोई अपशब्द या हिंसा अपनी बात को मनवाने के लिए नहीं कहती—करती. बड़ी मुश्किल से मुझे नौकरी करने की इजाज़त मिली, पर इसके साथ ही घर का सारा काम निपटा कर मुझे जाना था और आकर फिर सारा काम करना था. मैंने यह चुनौती स्वीकार की.
जॉब करने निकली, पर जॉब ढूंढनी थी
मैं घर से नौकरी करने तो निकल गई, पर सच यह था कि  मुझे नौकरी ढूंढनी थी।  मैंने सोचा पहले मुंबई को जान लूं। नौकरी तो मिल ही जाएगी। . स्टेशन पहुंची,  लोकल टिकट लिया और लोकल ट्रेन में चल निकली—आठ घंटे अलग-अलग जगहों पर बिताए. ।मुंबई लोकल में समय बिताना.
सच कहूँ तो मुंबई लोकल का समय मेरे जीवन का वह अनुभव था जिसमें मैं कितने ही लोगों के जीवन को करीब से देख पाती थी. उनके सपने, उनकी उदासी, उनका संघर्ष—सब कुछ मैंने जाना समझा. एक आम आदमी के हिस्से की खालिस जिंदगी से मुझे मुंबई लोकल ने रूबरू कराया.”
वह आगे बताती है कि मुंबई लोकल ट्रेन यात्रा के दौरान की कहानियों को मैंने आकार दिया, और अब यह जल्द ही ‘मुंबई लोकल’ के नाम से छप कर आने वाली है.
...और नौकरी मिल गई
रेखा सुथार आगे बताती हैं कि मुंबई लोकल के राह में हीं मुझे मेरी पहली नौकरी भी मिली. इस दौरान मेरी मुलाकात एक ऐसी महिला से हुई जिन्हें अपने ब्लॉग के लेखों के अनुवाद के लिए एक व्यक्ति की जरूरत थी. मैंने उनके प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया. इस दौरान मुझे 7,500 रुपये मिलते. इसके बाद ICICI बैंक में मेरी नौकरी लग गई।
सोशल मीडिया ने मुझे लेखक बना दिया
रेखा आगे कहती हैं कि सोशल मीडिया का भी मेरे जीवन में काफी योगदान है. मैं अपने जीवन के घटनाक्रम को कभी-कभार कुछ पंक्तियों में लिखकर सोशल मीडिया पर डाल देती. इन पर अच्छी प्रतिक्रिया आती. फिर सोशल मीडिया फ्रेंड लोग कहने लगे, आप लिखती क्यों नहीं? ऐसे में धीरे-धीरे मैंने लिखना शुरू कर दिया—साहित्य की छात्रा होने का फायदा भी मिला. मैं इसके लिए सोशल मीडिया के अपने मित्रों का आभार व्यक्त करती हूँ. इन सब ने मेरा हौसला बढ़ाया.
साहित्य जगत की उभरती रेखा
रेखा सुथार अपने ब्लॉग लेखन और कथा कहानियों के सृजन में खूब डूबी रहती हैं. वो कहती हैं, मेरी रचना मेरी जीवन की दृष्टि है. यह हर आम लड़की और महिला की कहानी होती है. इसमें गम की दहलीज पर खुशियों को पाने की चाहत छुपी हुई है. रेखा साहित्यिक गोष्ठियों और संवादों में एक जाना-पहचाना नाम बन चुकी हैं. उनके कई पॉडकास्ट इंटरव्यू भी प्रसारित हो चुके हैं.
सफर हीं तो जिंदगी है
दुनिया को समझने के लिए सोलो ट्रैवल
 रेखा को दुनिया को नजदीक से जानना बहुत पसंद है। वो प्रकृति से भी खूब प्यार करती हैं वें बतातीं हैं कि
शादी के बाद मैंने सोलो ट्रैवल करना भी शुरू किया और कई सारे ट्रैक पूरे किए। घूमने फिरने का शौक हमेशा से रहा। पहले परिवार के साथ जाती थी फिर धीरे धीरे अकेले घूमने नए लोगों से मिलने और उनके जीवन को समझने की कोशिश करने लगी।
इन्ही अनुभवों की एक किताब जल्द लाने वाली हूं।
अनमोल यादें: जब बीस साल बाद मिलीं लक्ष्मी मैम
जब मिलने मुंबई आ गई लक्ष्मी मैम 
रेखा सुथार कहती हैं कि हमारे स्कूल के शुरुआती दिनों में लक्ष्मी मैम हमारी पीटी टीचर हुआ करती थी। वे बहुत ही अनुशासित थी। हमसे भी अनुशासन की उम्मीद रखती। मुझे खेल की बारिकियों को सीखने में लक्ष्मी मैम का बहुत योगदान रहा है।

रेखा, लक्ष्मी मैम से जुडा एक ताजा वाक्या बड़े ही उत्साह से सुनाने लगती हैं। हमारे स्कूल के वक्त ही लक्ष्मी मैम का तबादला हो गया था।
बीस साल बाद मुझे एक कॉल आया – एक पुरानी मगर बेहद करीबी आवाज़ सुनाई पड़ी सामने से – “हैलो,रेखा बात कर रही हो क्या ?”
मुझे आवाज़ पहचानने में ज़्यादा देर नहीं लगी मैंने तुरंत चहकते हुए कहा – “लक्ष्मी मैम”
खूब देर बातचीत के बाद वो बोली – “मैं मुंबई में हूं और आज रात की ट्रेन से शिरडी जा रही अगर तुम्हारे पास टाइम हो तो स्टेशन पर मिलने आना”
मैं उनके बताए वक्त से पहले पहुची स्टेशन।
मैं देर तक उनसे गले लगी रही..

आँखों में हम दोनों के पानी था,और चेहरे पे मुस्कान हम दोनों के थी।

मैंने स्कूल में मेरे साथ पढ़ी कई लड़कियों के नाम बताए की वो भी मुंबई में ही रहती है,लेकिन ये जानकर हैरानी हुई मुझे की उन्हें उनमें से कोई याद नहीं आ रही थी।
मैंने पूछा उनसे कि “फिर मैं कैसे याद रह गई आपको?”
वो बोली “तू भुलाने वालों में से नहीं है बेटा तेरी बातें तो मैं आज भी जिस स्कूल में पढ़ाती हूं वहा के बच्चों से करती रहती हूं।मैं नहीं जानती मेरी वो कौनसी बात थी जिसने मैम को आज भी मुझसे जोड़े रखा बस इतना जानती हूं की

मुझे जब भी अपनी कमाई के बारे में पूछा जाएगा तो मैं इन किस्सों का खजाना सामने रख दूंगी।

दादी की बीमारी और गाड़ी चला उन्होंने अस्पताल पहुँचाना
रेखा एक गुजरा हुआ लम्हा याद कर कहती हैं, मेरी दादी सास काफी रूढ़िवादी विचारों की हैं. वो मुझे हमेशा घूंघट में ही देखना चाहती थीं. एक बार मैं दादा, ससुर और दादी सास के साथ गांव में थी. अचानक दादी की तबीयत बिगड़ गई. तबीयत काफी ज्यादा खराब होने लगी. हमारे पास गाड़ी तो थी, पर ड्राइवर नहीं था. काफी खोज करने पर भी कोई ड्राइवर नहीं मिला. ऐसे में मैंने सोचा कि जान बचाना अभी सबसे जरूरी है—यह घूंघट नहीं. मुझे गाड़ी चलानी आती थी. मैंने गैरेज से कार निकाली, दादीजी को गोद में उठाकर सीट पर रखा और अस्पताल लेकर गई. दादी का इलाज हुआ और दादी की तबीयत ठीक हो गई. दादी ने तब मुझे खूब आशीर्वाद दिया.
खुशियों के पल: सासू मां के साथ रेखा सुथार
सास बन गई अच्छी दोस्त
रेखा आगे बताती हैं कि नौकरी के बाद धीरे-धीरे सब कुछ बदलने लगा. ससूराल वाली परंपरा भी बदल गयी।. मेरी सास जो कभी परंपराओं को मानने को कहतीं, आज वो मेरी अच्छी दोस्त हैं. हम हर शाम साथ साथ चाय की चुस्की लेते हुए गप्पों वाली शाम बिताते हैं.
साथ जीवन साथी का: अपने पति भरत सुथार के साथ रेखा
पति का योगदान अहम
रेखा कहती हैं कि मेरी इस संघर्ष यात्रा में मेरे पति भरत सुथार का अहम योगदान रहा है. उन्होंने मेरे हौसले को हमेशा मजबूत बनाए रखने में मदद की. आज भी वो मेरे हर फैसले का स्वागत करते हैं.
 पहल शुद्ध देशी घी और तेल उपलब्ध करवाने की
रेखा आज अपने स्टार्टअप Mohi Pure से देश भर में शुद्ध देसी घी और सरसों तेल उपलब्ध करवाने की नायाब पहल कर रही हैं. रेखा कहती हैं कि राजस्थान में तेलहन की फसल काफी अच्छी होती है. हमारे गांव में भी काफी अच्छी सरसों की उपज होती थी. संकट यह था कि हमारे गांव में तेल निकालने की मशीन नहीं थी. लोगों को दूर दूसरे गांव इस काम के लिए जाना पड़ता था. मेरे दादाजी को यह बात काफी नागवार लगती. फिर उन्होंने तेल मिल लगाया. अब गांव वालों को तेल निकलवाने दूर नहीं जाना पड़ता था. दादाजी की विरासत को मेरे पिताजी ने आगे बढ़ाया. अब पिताजी इसे चलना नहीं चाहते थे. मील चलाने वाले केयरटेकर ने भी नौकरी छोड़ दी. ऐसे में यह मील बंद होने के कगार पर आ गया.
इन मशीनों के बीच यादों वाला बचपन
वह आगे बताती हैं कि मेरे दादाजी काफी कम उम्र में परलोक चले गए.मेरे दादाजी के सपने को मेरे पापा ने करीब 40 साल पहले पूरा किया—जब उन्होंने लोहे की घाणी लगाकर सरसों का तेल निकालना शुरू किया. मैंने अपना पूरा बचपन गेहूँ पीसने, मसाले कूटने और तेल निकालने वाली उन्हीं मशीनों के बीच बिताया. तब के समय में शुद्ध अनाज, मसाले और तेल बहुत आसानी से मिल जाते थे, इसलिए उनकी उतनी अहमियत महसूस ही नहीं होती थी. पर धीरे-धीरे जैसे-जैसे वक्त बदला, ये परंपराएँ और कारोबार बंद होने लगे, और हम बड़ी कंपनियों के रेडीमेड खाने-पीने के सामान की ओर खिंचते चले गए. कंपनियों ने अपनी ज़रूरतें पूरी करने के लिए न जाने कितने केमिकल्स मिलाए, और हम जानते-बूझते भी उन्हें अपनाते गए—क्योंकि वो सस्ते थे. लेकिन उस सस्तेपन ने हमें बहुत महँगी बीमारियों के हवाले कर दिया.
कभी सोचा नहीं था कि तेल की घाणी चलाऊंगी
रेखा कहती हैं कि सच कहूँ तो मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि मैं ये काम शुरू करूँगी. मैं शहर में अपनी नौकरी में खुश थी. लेकिन एक दिन अचानक पापा ने बताया कि वो सारी मशीनें बेचकर वहाँ कंस्ट्रक्शन का काम शुरू करने वाले हैं. ये सुनते ही मेरा मन भारी हो गया. मेरे मन में कोई ठोस वजह नहीं थी, लेकिन इतना जरूर महसूस हुआ कि ये परंपरा बंद नहीं होनी चाहिए.
मैंने इस बारे में अपने दोस्तों से बात की, खुद बहुत सोचा, और धीरे-धीरे मन में एक निर्णय आकार लेने लगा. तब तक मैंने अपनी नौकरी भी छोड़ दी थी. एक दिन पापा से लंबी बातचीत हुई. उन्होंने बताया कि कैसे उन्होंने रात-दिन मेहनत करके ये घाणी लगाई थी, कैसे कठिन समय में यही घाणी हमारे परिवार का सहारा बनी. और अब जब वो और मेरे भाई अपनी-अपनी नौकरी में व्यस्त हो गए हैं, तो इस कारोबार को संभालने वाला कोई नहीं है. इसलिए उन्हें यही सही लगा कि इसे बंद कर दिया जाए.
उस रात मैं सो नहीं पाई. अगली सुबह मैंने पापा से कहा— “मुझे नहीं पता ये कितना प्रैक्टिकल है… लेकिन पापा, ये घाणी आप बंद नहीं करेंगे. ये वैसे ही चलेगी जैसे हमेशा से चलती आई है.”
पापा चौंके और बोले— “लेकिन इसे चलाएगा कौन?”
मेरी आँखों में थोड़ी देर की खामोशी थी, फिर मैंने बिना हिचकिचाए कहा— “मैं.”
कुछ पल की खामोशी के बाद उन्होंने मेरी आँखों में देखा और पूछा— “मैनेज कर लेगी?”
मेरी आँखें भर आईं, मैंने बस इतना ही कहा— पता नहीं… लेकिन जिस उम्र में आपने कर लिया था, उसी खून की बेटी हूँ मैं… कोशिश जरूर करूँगी.”
उस वक्त पापा चुप हो गए. और फिर धीमे से बोले— “ठीक है रेखा. अगर तूने इरादा कर लिया है तो मैं तुझे रोकूँगा नहीं. लेकिन एक बात हमेशा याद रखना—शुद्धता और मिलावट के बीच सिर्फ़ एक अंतर है—विश्वास का. लोगों का विश्वास कभी टूटने मत देना.”
अच्छा चल रहा बिजनेस 
आज उस बात को करीब 6-7 महीने हो गए हैं. हमारी घाणी के साथ बगल के गाँव में मामाजी की और दो घाणी होने की वजह से अच्छी खपत हो जाती है. तेल के साथ ही मैंने अपने गाँव और आसपास के गाँवों में परंपरागत तरीके से बने बिलोना घी को भी इस मुहिम से जोड़ा है. पिछले कुछ महीनों में मैंने कई लोगों तक ये उत्पाद पहुँचाए हैं. पंकज सर और कई सेलिब्रिटीज़ को ये घी और तेल सिर्फ़ इसलिए दे पायी हूँ, क्योंकि मुझे मेरे प्रोडक्ट पर पूरा भरोसा है कि वे एक बार इसे खाएँगे तो अगली बार फिर से ज़रूर माँगेंगे.
ब्रांड नहीं विश्वास 
रेखा  सुथार कहती हैं कि मेरे लिए कोई “अमीर” या “साधारण” ग्राहक नहीं है—सभी के लिए दाम और गुणवत्ता एक समान है. मेरा उद्देश्य सिर्फ़ इतना है कि अधिक से अधिक लोग शुद्धता से जुड़ें और उस भरोसे को महसूस करें, जो हमारी पीढ़ियों ने बनाया है. आज Mohi Pure सिर्फ़ एक ब्रांड नहीं है—ये मेरे दादाजी के सपने, मेरे पापा की मेहनत और मेरे अपने संकल्प की कहानी है.
ये सिर्फ़ सरसों का तेल नहीं है—ये पीढ़ियों की विरासत है, जो मैंने सिर्फ़ एक मकसद से आगे बढ़ाई है— “खुद को खुद से बेहतर करना.”
इसलिए Mohi Pure में आपको वही शुद्धता मिलेगी जो पहले हमारे घरों की रसोई में मिलती थी—बिना किसी मिलावट, बिना किसी समझौते के.
ऐसे रखा ब्रांड नेम
रेखा आगे कहती हैं कि जब मैंने तेल मिल को चालू करने और इसे एक ब्रांड नेम देने की पहल शुरू की तो सबसे पहले हमें एक नाम चाहिए था. ऐसे में एक रोज मैं और मेरी सास नाम पर दिमाग लगा रहे थे. फिर मैंने सासू मां से कहा, क्यों न आपके ही नाम पर इसका नाम रखा जाए. उनका नाम मोहिनी है. मोहिनी नाम से हमें डोमेन नहीं मिला, तो फिर इसे मैं ने उनके ही नाम से मोही कर दिया और शुद्धता की गारंटी के लिए पीयोर जोड़ दिया. ऐसे हमें मिला हमारे ब्रांड का नाम.
सेलिब्रिटी की बना पसंद 
रेखा के ब्रांड Mohi Pure के स्वाद के दीवाने मुंबई में फिल्मी हस्तियां  भी हैं. पंकज त्रिपाठी भी इनके शुद्ध देसी घी का स्वाद ले चुके हैं. रेखा कहती हैं कि हमारे प्रोडक्ट में शुद्धता के साथ प्यार भी शामिल होता है. यह हमारा टैगलाइन भी है.
रेखा सुथार नयी पीढ़ी से कहतीं हैं –
‘बदलाव ‘के लिए हिंसा की जरूरत नहीं. मैं लोगों से खास तौर पर लड़कियों से यह कहना चाहूँगी कि आप खुद पर विश्वास रखो, हालात खुद बदल जाएंगे. आप खूब उड़ो, पर गलत राहों में नहीं. बदलाव के लिए झगड़ों और हिंसा की जरूरत नहीं है. अहिंसक तरीके से भी क्रांति लायी जा सकती है. आप खुद पर यकीन करेंगे तो दुनिया आप पर यकीन करेगी. चलते रहिए, बढ़ते रहिए—अपनी राह।” 
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एक खत ‘letter box’ के नाम

याद है आपको वो चिट्ठियों का जमाना। वो पोस्टकार्ड, अंतर्देशी और लिफाफे में खत भेजना और वो चटख लाल अपना प्यारा ‘letter box’। लेटर बाक्स से जुड़ी कुछ यादों को हमने इस खत में संजोने की कोशिश की है। आप पढ़ें और कमेंट में अपनी यादों को भी करें साझा….

प्रिय, लेटर बॉक्स
यह पहला और शायद अंतिम खत तुम्हारे नाम। अब हम तुमसे कितने दूर हो गए हैं। फास्ट टेक्नोलॉजी के दौर में तुम पर हुए जुल्म भी मालूम है, पर चिट्ठी की अपनी मर्यादा है सो सर्वप्रथम कुशलता की कामना करता हूं। यह जानते हुए कि तकनीकी क्रांति और फास्ट लाइफ की परिभाषा में हम तुम अब बहुत दूर हो गए हैं।

 

ख़त लिखते आंखें नम हो गई

जानते हो, आज तुम्हें याद करते-करते जी भर आया। आंखें नम हो गई। तो सोचा क्यों न खत ही लिख दूं। फिर लिखने से जी घबराने लगा। कैसे लिखूं। क्या लिखूं। उसे जिसने अपने जीवन में न जाने कितने लाखों-लाख खतों की संवेदनाओं को सहेजा है। भावनाओं की कद्र की है। अक्षरों को महसूस किया है। उनकी खुशी में झूमा है और ग़म में दिलासा दी है। वो हर खत को अपने जिस्म में समेट ठिठुरती सर्दी में गर्माहट दी है। बारिश में खुद भीग, खतों को महफूज किया है। गर्मी में लू के थपेड़ों से उन्हें बचाए रखा है ताकि वो कुशल मंगल पते पर लिखने वाले का पता बताती हुई हाज़िर हो सके।

…कि पाती पते पर पहुंचेगी जरूर

भरोसा इतना मजबूत कि तुम्हारे पेटी में हर कोई चिट्ठी डाल निश्चित हो जाए कि पाती पते पर पहुंचेगी जरूर। आज की तरह न इंटरनेट के गायब होने की बैचैनी, न नेटवर्क कमजोर होने की शिकायत, और न ही 399 के रिचार्ज की चिंता। एक बच्ची भी खत उसी निश्चिंतता से तुममें डालती जिस निश्चिंतता से दादाजी। हम इसे चिट्ठी गिराना कहते थे।

हर आंखों में बसता था तुम्हारा ख्याल

तुम्हारा वो सुर्ख़ लाल रंग और श्याम होठ। हर आंखों में तब तुम्हारा ख्याल बसता था। चाहे मुहल्ले के पहलवान जी हों या फिर शर्मा जी की नई नवेली दुल्हन। लिफाफा, अंतर्देशीय, और पोस्टकार्ड की रंग-बिरंगी दुनिया के हीरो बन हर चौराहे पर तुम सीना तान खड़े रहते। शहरों की भागम-भाग हो या गांवों का चौक एक ही अंदाज़ में खड़े मिलते थे तुम। कहीं-कहीं तुम्हारा बाल रूप लटका रहता। उस पर सफेद अक्षरों से पिनकोड और चिट्ठी निकालने का समय दर्ज होता।

गुलाबी लिफाफे में कितनी उम्मीदें सुर्ख़ गुलाब होती

कोई दूर शहर से बेटा अपने पिता को खत लिखता, तो कोई प्रेमी अपनी प्रेमिका को। याद है न नए साल पर रंग-बिरंगे ग्रीटिंग कार्ड्स के वो गुलाबी लिफाफे जिनमें न जाने कितनी उम्मीदें सुर्ख़ गुलाब होती थीं। कितनी रूह, चंपा-चमेली। बहुत याद आते हो तुम ‘लेटर बॉक्स’! बहुत याद आता है वो ज़माना। जगजीत सिंह की ग़ज़ल ‘चिट्ठी न कोई संदेश…’ में जा तुझे महसूस करता हूं तो कभी गुलज़ार की नज़्म में। शहर-दर-शहर जा तुम्हें ढूंढाता हूं। तुम मिले पर मौन।गांव की पगडंडियों की खाक छानी वहां भी मायूसी मिली। बहुत मन करता है कि तुम मिलो उसी उमंग से और मैं रंगीन लिफाफे में पांच रुपए का टिकट साटकर एक रूमानी सा खत गिराऊं।

यादों की चिट्ठियां, रूह में महफूज

बचपन की ढेर सारी यादें हैं तुम्हारे साथ ‘लेटर बॉक्स’। इन यादों की चिट्ठियों को रूह में महफूज रखा है मैंने तुम्हारी तरह। बहुत कुछ कहना है तुमसे – बहुत कुछ लिखना भी, पर शब्द कम पड़ रहे।

कम लिखे को ज्यादा समझना। पता भी तो नहीं तुम्हारा।  बस बेपते का यह खत भेजा रहा हूं। तुम्हारे नाम।  इस उम्मीद के साथ कि तुम्हारा जवाबी खत जरूर मिलेगा और मैं गा उठूंगा

बड़े दिनों के बाद हम बेवतनो को याद, वतन की मिट्टी आई है, चिट्ठी आई है, चिट्ठी आई है….।”

इसी उम्मीदों के साथ,
तुम्हारा, विवेक

 

 

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Father A. Christu Savarirajan, S.J. – Lighting the Lamp of Learning for Bihar and Beyond

A Teachers’ Day Special on the Inspiring Journey of Fr. A. Christu Savarirajan, S.J., Principal, St. Michael’s High School, Patna,

As a mentor who moulds lives, develops character, and enlightens minds, a teacher is highly esteemed all across the globe and frequently given more respect than the supreme and divine. On this Teacher’s Day, we would like to express our sincere gratitude to Fr. A. Christu Savarirajan, S.J., the Principal of St. Michael’s High School in Patna, a leader who embodies the values of instruction, service, and leadership.

Roots in Nature’s Lap

Born in 1975 in the lush green village of Ottan Kaduvetti, Villupuram District, Tamil Nadu, India, Young Christu’s childhood was greatly influenced by rivers, mountains, butterflies, monsoon rains, and the simple joys of rural and rustic life.

He developed a strong bond with nature during his early years which he spent playing in the mud and fishing by the river. His values and faith initially took root in the simple early village schooling he received, followed by his formative years in a church-run institution.

Drawn to the Priesthood

The calming and serene demeanour of revered priests in white cassocks captivated Young Christu. He was deeply inspired by their radiance, kindness, and persistent devotion. By the time he was in middle school, Christu had already heard the quiet stirrings of his vocation — a resolute call to devote his life completely in the name of God and to the service of humanity.

What followed was an arduous yet grace-filled 17-year journey of Jesuit formation, where discipline became his strength, prayer his refuge, and service his mission. Through these years of moulding, forming, and discernment, he took to heart with conviction the sacred vows of poverty, obedience, and celibacy — an attestation to his selfless surrender and unwavering faith.

Academic and Professional Journey

Fr. Christu’s academic and professional journey is proof of both his intellectual brilliance and his unshakable commitment to education. Nurturing a deep love for science, he began with a B.Sc. in Physics from St. Joseph’s College, Tiruchirappalli (2000), and went on to earn his Master’s in Physics from Loyola College, Chennai (2005).

In his current capacity as the Principal of St. Michael’s High School, Patna, he is a glistening example of academic vision, Jesuit values, and transformative leadership. His career reflects steady progress — from shaping young minds at St. Ignatius High School, Aurangabad, to heading institutions in various leadership roles at St. Thomas High School, Ratanpurva, Bagaha, and St. Xavier’s High School, Patna. He is currently pursuing a Doctorate from Don Bosco University, Guwahati, continuing to push the boundaries of knowledge.

Embracing Bihar with Heart

When Fr. Christu was assigned to the Patna Province, Bihar, his family was concerned about the distance and unfamiliar culture. However, he encountered warmth and love from people, the vibrancy of traditions, and the richness of diversity instead of loneliness.

He joyfully and openly learnt Hindi and regional languages while immersing himself in the lively energy of markets and the laughter that filled the schoolyards. Eventually, Bihar evolved from being a workplace to an inseparable part of him, and he now proudly calls it his second home.

St. Michael’s High School – A Glorious Legacy

Established in 1858 and entrusted to the Patna Jesuit Society in 1968, St. Michael’s High School has long stood as an epitome of quality education. Under the dynamic leadership of Fr. A. Christu Savarirajan, S.J., the institution has grown into a vibrant blend of tradition and innovation — introducing smart classrooms and digital learning, nurturing talent through sports and extracurricular activities, preparing students for a global future, and extending inclusive support to the underprivileged.

His vision has borne remarkable fruit:
Consistently outstanding CBSE Board results
Student achievements at national and international platforms
Establishment of modern laboratories and a resource-rich library
A world-class sports complex Scholarship and student aid programs ensuring that every deserving child finds opportunity and hope within the hallowed portals of St. Michael’s.

Beyond the Principal’s Desk

An artist by heart, a musician by passion, and a true sports enthusiast, FrChristu embodies the belief that education must nurture creativity as much as intellect. His paintings, often inspired by the beauty of nature, reflect his vision of harmony and balance — the very values he seeks to cultivate in the young minds under his care.

Guiding Philosophy

“A teacher’s role is not confined to exams and grades. It is about igniting confidence, leadership, and compassion — preparing students not just for careers, but for life.”
— Fr. A. Christu Savarirajan, S.J.

A Teacher’s Day Inspiration

As India celebrates Teachers’ Day on September 5 in honour of Dr. Sarvepalli Radhakrishnan, Fr. Christu’s life and work shine as an embodiment of the transformative power of education. His journey affirms that when guided by faith, vision, and compassion, education becomes more than the sharing of knowledge — it becomes the lighting of countless lamps of literacy, wisdom, and hope.

Echoing Tagore’s dream of a world “where the mind is without fear and the head is held high,” Fr. Christu dedicates himself each day to nurturing fearless, compassionate, and empowered young people.

On this Teacher’s Day, he stands tall not merely as the Principal of St. Michael’s High School, Patna, but as a true architect of the future carrying forward a noble legacy of knowledge, values, and service to God.

 

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सरहद पार मन की दूरियां मिटाने को जुटे भारत नेपाल के कलमकार, रिश्तों की मिठास बचाने की हुई पहल

भारत और नेपाल एक ऐसे पड़ोसी देश हैं जिनकी संस्कृति और इतिहास में एकरूपता और अपनापन की खुशबू रचती- बसती रही है। राम जानकी से लेकर बुद्ध तक की आध्यात्मिक यात्रा का सफर हो या फिर शादी ब्याह के रिश्ते। दोनों देशों में संबंधो की प्रगाढ़ता सदियों से चलती रही है। बदलते ज़माने के साथ इस मजबूत रिश्तों में थोड़ी थोड़ी सुस्ती दिखने लगी। खुले सरहदों पर घेरा लगाने की बातें उठने लगी। ऐसा आभास होने लगा कि भरसे की इस मजबूत नींव को कहीं कमजोर करने की कोशिश तो नहीं। अगर ऐसा है तो इसकी वजह क्या है? कैसे ये दोनों देश संस्कृतियों के साथ मन के रिश्तों को भी निश्छल, निर्विकार बना पाए? कैसे भरोसे की मीठी मीठी खुशबू दोनों देशों के लोगों की दिल में महक कर गा उठे ये दोस्ती हम नहीं छोड़ेंगे…
इन्हीं सवालों का जबाब ढूंढने नेपाल की आर्थिक राजधानी कहे जाने वाले वीरगंज में जुटे दोनों देशों के कलमकार। बातें हुई, चर्चा हुई, और बनी साझा रणनीति की कैसे कलम की ताकत से नफरती ताकतों को खत्म कर प्यार और भरोसे की फीजा इस देश से उस देश तक बहती रहे। इस पहल को नाम दिया गया Nepal -India cross Border media conclave- 2025 । क्या कुछ हुआ कलमकारों के इस जुटान में पढ़िए…

नेपाल के वीरगंज में भारत-नेपाल पत्रकार संगठन “मीडिया फॉर बॉर्डर हार्मोनी” के बैनर तले नेपाल-इंडिया क्रॉस बॉर्डर मीडिया कॉन्क्लेव-2025 का आयोजन किया गया। इस सम्मेलन में नेपाल और भारत के सैकड़ों पत्रकारों ने शिरकत करते हुए दोनों देशों के संबंध को मजबूत करने में मीडिया की भूमिका पर लंबी चर्चा की । भारत से उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड के कई वरिष्ठ पत्रकार शामिल हुए, वहीं नेपाल के विभिन्न प्रांतों से भी बड़ी संख्या में पत्रकार पहुंचे।

भारत-नेपाल सीमा पर कभी बैरियर नहीं बनेगा’

नेपाल-इंडिया क्रॉस बॉर्डर मीडिया कॉनक्लेव 2025 के समापन सत्र को संबोधित करते हुए नेपाल सरकार के खाने पानी मंत्री प्रदीप यादव ने कहा कि भारत में शायद ही कोई बड़ी या छोटी घटना घटती हो जिसमें नेपाली नागरिक प्रभावित न हों। इसका प्रमुख कारण यह है कि बड़ी संख्या में नेपाली नागरिक भारत में रहते हैं। कोई रोजगार के लिए, कोई व्यवसाय के लिए तो कोई शिक्षा के लिए। यही सदियों से दोनों देशों के बीच अटूट रिश्ते का आधार है। उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल और सिक्किम के कई हिस्सों का नेपाल से ऐतिहासिक संबंध है। इसलिए भारत और नेपाल के रिश्ते को ‘रोटी-बेटी का संबंध’ कहा जाता है। बार-बार मांग उठने के बावजूद हमने हमेशा यह स्पष्ट किया है कि भारत-नेपाल सीमा पर कभी बैरियर नहीं बनेगा। दोनों देशों के बीच केवल कूटनीतिक ही नहीं, बल्कि वैवाहिक, धार्मिक और सांस्कृतिक संबंध भी हैं। इन रिश्तों को आगे भी मजबूत बनाए रखने में आप पत्रकारों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि भारत-नेपाल संबंधों को मजबूत करने के उद्देश्य से ऐसे कार्यक्रमों की भूमिका काफी महत्वपूर्ण है।सक्रिय रूप से भाग लेते हैं। ऐसे कार्यक्रम चलते रहने चाहिए ताकि दोनों देशों के बीच आपसी विश्वास और सहयोग और भी प्रगाढ़ हो सके।

खुला बॉर्डर पूरी दुनिया के लिए एक आदर्श मॉडल’ 

नेपाल सरकार के विधि‌‌ मंत्री अजय कुमार चौरसिया ने कहा कि “भारत और नेपाल के बीच बेटी-रोटी का अटूट संबंध है, जिसे कोई भी तोड़ नहीं सकता। दोनों देशों के बीच खुला बॉर्डर पूरी दुनिया के लिए एक आदर्श मॉडल है। विश्व में ऐसा संबंध भारत और नेपाल को छोड़कर किसी और देश में नहीं देखने को मिलता।”
कॉनक्लेव में वक्ताओं ने मीडिया की भूमिका को सीमा पार भाईचारे और आपसी सद्भाव को मजबूत करने में अहम बताया। साथ ही यह भी कहा गया कि सीमावर्ती क्षेत्रों की समस्याओं व संभावनाओं को रचनात्मक पत्रकारिता के माध्यम से सामने लाना, भारत-नेपाल रिश्तों को और गहराई देगा।

जिम्मेदारी का निर्वाह जरूरी

इस सभा के प्रथम सत्र में विषय प्रवेश कराते हुए मीडिया फार बॉर्डर हार्मनी के संस्थापक वरिष्ठ पत्रकार अमरेन्द्र तिवारी ने दोनों देशों में मीडिया की खबरों से बनते- बिगड़ते रिश्तों पर चर्चा करते हुए पत्रकारों को अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करने और रिश्तों की प्रगाढ़ता का ख्याल रखने की बात कही।

विश्वसनीयता बनाएं रखना सबसे अहम 

भारत के पटना से आए thebigpost.com के संस्थापक और दूरदर्शन बिहार के वरिष्ठ एंकर विवेक चंद्र ने कहा कि आज की पत्रकारिता का स्वरूप काफी बदल गया है। सूचना क्रांति और लाइक , व्यूज और सब्सक्राइबर वाले इस युग में खबरों की विश्वसनीयता बनाएं रखना सबसे अहम है। सरहद की खबरे को प्रसारित प्रकाशित करने से पहले उनकी सत्यता की पड़ताल सबसे जरूरी है। उन्होंने आगे कहा कि पाठकों पर आधारित सब्सक्राइब मार्डल अपनाकर पत्रकारिकता में विज्ञापनदाता के अनावश्यक दबाव से मुक्ति संभव है पर इसके लिए पाठकों को भी आगे आना होगा।

‘ज्यादा हो ग्राउंड रिपोर्ट ‘
कार्यक्रम के आयोजक मंडल में शामिल नेपाल के पत्रकार अनिल तिवारी जी ने कहा कि हम पर लोगों का विश्वास टिक है हमें इस विश्वास को मजबूत करने के लिए ग्राउंड रिपोर्ट को ज्यादा से ज्यादा करने की जरूरत है। उन्होंने इस कार्यक्रम में सम्मिलित होने के लिए दोनों देशों के पत्रकारों को धन्यवाद दिया।

मशीनी पत्रकारिता की जगह मानवीय पत्रकारिता ‘

राष्ट्रीय समाचार समिति नेपाल सरकार के अध्यक्ष धर्मेंद्र झा ने चर्चा के दौरान आए निष्कर्ष को बताते हुए एआई युग में मशीनी पत्रकारिता की जगह मानवीय पत्रकारिता की पहल करने की सलाह दी।
वहीं भारत के पत्रकार विजय झा ने कहा कि ऐसे कार्यक्रम पत्रकारिता और पत्रकारों के लिए आज की जरूरत है। उन्होंने कार्यक्रम के आयोजन के लिए मीडिया फार बॉर्डर हार्मनी के सदस्यों की सराहना करते हुए इसे सद्भाव बढ़ाने वाला बताया।

कार्यक्रम में नेपाल के स्थानीय प्रदेश सांसद श्याम पटेल, , नैनीताल उत्तराखंड से टाइम्स ऑफ इंडिया की पत्रकार सोनाली मिश्र, देहरादून, उत्तराखंड से अमर उजाला के पत्रकार करण जी, प्रेस काउंसिल नेपाल की सदस्य रिंकू झा, नेपाल के पूर्व राजदूत विजयकांत कर्ण, प्रतीक दैनिक के संपादक जगदीश शर्मा, पत्रकार महासंघ नेपाल के अध्यक्ष अशोक तिवारी आदि ने भी संबोधित किया। मंच संचालन मीडिया फॉर बॉर्डर हार्मोनी नेपाल के राष्ट्रीय महासचिव एवं वरिष्ठ पत्रकार रितेश त्रिपाठी ने किया।
कार्यक्रम में दोनों देशों के पत्रकारों ने समस्याओं पर भी खुलकर चर्चा की और एक साझा रणनीति भी बनाई और लिया एक संकल्प कि

सुपर फास्ट पत्रकारिता के जमाने में भी खबरों की बोर्ड पर टाइप होने से पहले सत्यता की कसौटी पर कसी जाए। खबरों में सनसनी का चटखारा नहीं दोनों देशों के जन- मन का ख्याल हो जिससे बची और बसी रहे दोनों देशों के बीच संबंधों वह मिठास जो सदियों से सरहद नहीं मन के रिश्तों को मजबूत करती आई है।

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अब रोटी बेलने का झंझट खत्म ‘पढ़िए मुंबई की युवती सृष्टि झोपे के स्टार्टअप ‘आटा पिटा’ की कहानी 

रोजी रोटी मिलना’ ,’रोटी कमाना’, ‘रोटी सेंकना ‘और ‘रोटी तोड़ना’, ये सब मुहावरे है। जब ‘रोजी- रोटी’ कार्पोरेट सेक्टर की हो तो ‘रोटी कमाने’ में हीं सारा वक्त जाया हो जाता है। भागदौड़ ने ‘रोटी तोड़ने’ वाली परंपरा भी खत्म कर दी। ऐसे में घर लौट आटा गूंथ कर गोलू- मोलू रोटी बेलना और रोटी सेंकना किसी किसी जंग जीतने  से कम नहीं  होता। हड़बड़ी में कभी रोटी बनाओ भी तो उसके नैन नक्श गोल न होकर  आड़े तिरछे हो जाते हैं । फिर अधपकी रोटी खाने और लंच बॉक्स में संभालने की जहमत कौन उठाए, 
पर रोटी तो रोटी है। न मिले तो जिंदगी का स्वाद और सेहत दोनों के बिगड़ते देर नहीं लगती।
भागदौड़ वाली लाइफ और कारपोरेट नौकरियों के इस दौर में भी आपको स्वादिष्ट और सेहतमंद गोल गोल रोटियां बिना सेंके, बैठे बिठाए मिलती रहे तो थाली और जिंदगी दोनों चटखदार तो हो हीं जाएगी।
जी हां इसी सोच के साथ महाराष्ट्र के मुंबई की युवती  Srushti zope  ने शुरू किया है एक अनोखा स्टार्टअप। रोटी अब मोबाइल स्क्रीन के एक टच पर हो जाएगी अवेलेबल। सृष्टि ने इस स्टार्टअप को नाम दिया है
‘ आटा पिटा ‘
क्या है ‘आटा पीटा ‘का कांसेप्ट और यह हमारे सेहत और जेब  के लिए कितना अनुकूल है पढ़ें इस आलेख में…
मैंने पढ़ाई के बाद कॉरपोरेट सेक्टर म जॉब किया  पैसा पोजिशन सब अच्छा था। नहीं था तो बस समय , घंटों अपनी  सीट पर बैठ काम करना ।
भूख मिटाने के  लिए मैं फास्ट फूड्स की आदि होती चली गई। धीरे धीरे इस आदत से मेरा वजन बढ़ता चला गया। थकान ,नींद की कमी और   चिड़चिड़ापन की दस्तक दबे पांव  होने  लगी।  एक समय ऐसा आया जब मुझे बीमारी ने अपने आगोश में ले लिया और फिर काम की जगह अस्पताल, डॉक्टर और दवाइयां जीवन में दाखिल हो गई।
ऐसे में मेरे मन में ख्याल आता कि मेरी तरह काफी युवक- युवतियां होंगी जो भोजन में पोषक तत्व कमी से जूझ रहे होंगे। कहती हैं  Srushti zope। वह आगे कहती हैं  मैंने देखा की रोटी  हमारे देश में भोजन का मुख्य हिस्सा है। इन दिनों रोटी ही हमसे दूर होती जा रही है। परिवार न्यूक्लियर है।  पति- पत्नी दोनों नौकरी पेशा ,  उनकी तादाद ज्यादा है। हजारों लोग अकेले रह रहे। ऐसे में मुझे लगा कि क्यों न ऐसा कोई कंसेप्ट बनाया जाए जिससे रोटी लोगों को उनके घरों तक उपलब्ध कराई जा सके और वह सेहतमंद भी हो। इसी ने जन्म दिया हमारे स्टार्टअप आटा पिटा को।
 याद आई बात दादी मां की 
मेरी दादी एक कुशल गृहिणी तो थीं ही एक अग्रसोची भी थी। मेरा लगाव मेरी दादी से काफी ज्यादा था। दादा कभी कभी आटे में पालक डालकर रोटी भी बनाती कभी रोटी में स्ट्रफ कर  उसे पकाती। इन सब का स्वाद काफी बेहतर होता और इसमें पोषक तत्व भी मौजूद होते थे। 25 अगस्त 2015  में दादी का निधन हो गया। दादी की बनाई वो रोटी और उसका स्वाद मुझे हमेशा प्रेरित करता रहा। दादी मुझसे सामाजिक बदलाव की बात भी कहा करती थी।
जब मैं बीमार हुई और मुझे दिन-  रात काली- पीली बेस्वाद कैप्सूल लेने पड़ते तो दादी की पकाई रोटी का ख्याल आता जिसमें पोषण भी था। विटामिन  , कर्बोहाइड्रेट, वहां, प्रोटीन सब कुछ। तब मैं सोचती क्यों न रोटियों को ही पोषक तत्वों से भरपूर बनाया जाए !जिसमें कभी हमें इनके लिए कैप्सूल न गटकना पड़े।
  इन सब विचारों का मेल से ही आगे चलकर आटा पिटा ने आकार लिया। आप सोचिए शरीर में प्रोटीन की कमी को दूर करने के लिए  प्रोटीन पाउडर खाना बेहतर विकल्प है या सिर्फ हमारी रोटी।
फिर छोड़ दी नौकरी 
 आटा पिटा की फाउंडर  सृष्टि झोपे  कहती हैं कि मैंने कॉमर्स से ग्रेजुएशन किया फिर डाटा साइंस और इकोनॉमिक्स में मास्टर्स की डिग्री ली। वह आगे कहती है कि मेरी पहली नौकरी रिलायंस इंडस्ट्री में
  एनालिटिक्स एक्सपर्ट के तौर पर लगी, फिर उन्होंने प्रोडक्शन की ओर अपना रुख किया
 साइबर सिक्योरिटी। लॉजिस्टिक्स, लीड जनरेशन,  एआई में कई महत्वपूर्ण कार्य किए।  वे आगे बतातीं हैं कि   मुझे  नाम , पैसा और शोहरत तीनों चीजें मिल रही थी पर कमजोर हो रही थी सेहत। फिर जब मैं बीमार पड़ी तो मुझे लगा कि मेरे जैसे लोगों को सेहतमंद बनाने और उन्हें रोटी उपलब्ध कराने के लिए मुझे काम करना चाहिए। फिर मैंने अपनी नौकरी छोड़ दी और शुरू हो गया आटा पिटा
चुनौतियों के बीच मिला ‘आटा पिटा’ को  रास्ता 
   सृष्टि झोपे  कहती हैं कि मैंने जो दादी से सीखा था और हमारे परंपरागत रसोई में जिस तरह की रोटियां बनती है उसे पोषण से भरपूर बनाना चाहती थी। इसके लिए हमने रोटी बनाने की प्रक्रिया में पालक, चुकंदर जैसे पोषक तत्वों को मिलाना शुरू किया। यह प्रयोग काफी बेहतर रहा।
अब हमारे पास सबसे बड़ी चुनौती इसे संरक्षित रखने की थी। इसके लिए हम किसी तरह का कैमिकल प्रयोग नहीं करना चाहते थे।
संरक्षित रखने के लिए कैमिकल का प्रयोग काफी हानिकारक होता है। ऐसे में काफी रिसर्च करने के बाद मैंने पाश्चराइजेशन का फार्मूला अपनाया। हम रोटियों को गर्म करने के बाद इसे काफी  ठंडा करते हैं। इससे इसके पोषक तत्वों को कोई नुक्सान नहीं पहुंचता और हानिकारक बैक्टीरिया मर जाते हैं। सृष्टि कहती हैं कि हम आपको जो रोटियां देते हैं उसे 45 दिनों तक उपयोग में लाया जा सकता है।
कई फ्लेवर की रोटियां उपलब्ध 
  सृष्टि झोपे  आगे बताती हैं कि हमने रोटियों के कई फ्लेवर उपलब्ध कराएं हैं। इसके लिए भी हम किसी आर्टिफिशियल फ्लेवर का इस्तेमाल नहीं करते। अभी हमारे पास चार वेराइटी प्रमुख रूप से उपलब्ध है। इनमें Palak,Beetroot,Pumpkin,Carrot,High protein फ्लेवर  वाली रोटियां लोगों को खुब पसंद आ रही है। वह कहती हैं कि रोटी के टुकड़े को हम चम्मच की तरह सब्जी में प्रयोग करते हैं यह मुलायम रहे हमने इसका भी ध्यान रखा है।
आगे हम इसमें और भी नया प्रयोग करने वाले हैं।
जेब का भी रखा ख्याल
सृष्टि झोपे कहती हैं की हमारे देश में हर आम वर्ग के लोग रहते हैं और रोटी सबकी आवश्यकताओं में शामिल है। इसलिए हमने रोटी – पिटा की रोटियों को पॉकेट फ्रेंडली रखा है। हम होम डिलीवरी के साथ 12 रुपये में चपाती  उपलब्ध करवा रहे हैं।
लोगों का बेहतर  रूझान
सृष्टि झोपे बतातीं हैं कि हमें बाजार से बेहतर रूझान मिल रहा है। अभी आटा पिटा की रोटियां मुंबई, पुणे अहमदाबाद में उपलब्ध हैं। जल्द ही हम इसका दायरा और बड़ा करने की पहल में जुटे हैं।‌हम इसे ई- कॉमर्स प्लेटफार्म पर लांच करने जा रहे हैं।
माता पिता के साथ सृष्टि
माता- पिता का मिला साथ

सृष्टि कहती हैं कि नौकरी छोड़कर खुद का स्टार्टअप करना आसान नहीं था। कई लोगों की प्रतिक्रिया थी कि यह बड़ा रिस्क है। पर मेरे परिवार के लोगों ने मेरा साथ दिया। पिताजी prashant zepe और माताजी sheetal zope ने मेरा हौसला बढ़ाया। मेरे पिताजी बिजनेस बैकग्राउंड से हैं और मां शिक्षा के क्षेत्र से दोनों ने हर कदम पर मेरा साथ दिया।

कायम रहे देश की संस्कृति और  स्वाद 
सृष्टि  झेपे कहती हैं कि हमारे देश में अलग अलग संस्कृतियां हैं। सबकी अपनी-अपनी विशेषताएं भी। ऐसे ही व्यंजनों के साथ भी है। हमारे देश के परंपरागत व्यंजनों में सेहत का राज छुपा है।
मैं देश की संस्कृति और स्वाद को बचाने और इसे दुनिया भर में फैलाने की पहल करना चाहती हूं। आजके वक्त में हमारे परंपरागत जायकों को फिर से अपनाकर ही हम स्वस्थ रह सकते हैं।  सृष्टि होंठ पर मुस्कान भरते हुए  कहती हैं तो क्यों हम अपने 
दादी -नानी के जायकों को फिर से अपनाएं और अपनी थाली को स्वादिष्ट बनाने के साथ ही देश को सबल और स्वस्थ भी बनाएं। 
( thebigpost.com समाज की प्रेरक कहानियों को समाज के सामने लाता है। इस कड़ी को मजबूत रखने के लिए आप आर्थिक सहयोग कर सकते हैं। आपका छोटा सा सहयोग हमें बड़ा संबल प्रदान करेगा)
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15 अगस्त विशेष: नये मिजाज वाली आजादी

 

हमारी बदलती सोच , गैजेट, और बाजारवाद ने आजादी का मिजाज भी बदला है और उसका स्वरूप भी । 15 अगस्त पर पढ़िए कैसे बदल रहे हैं आजादी के मायने और उसकी भाषा….

रोज बढ़ती मंहगाई के वजन के बीच ‘बरिस्ता ‘ कॉफी हाउस के बाहर रील बनाता लड़का। कान में ईयर बर्ड खोंसे दफ्तर के गलियारे में Davidoff classic सिगरेट का धुंआ उड़ाती महिला। शहर के चौराहे पर हॉट पैंट पहने फेमिनिज्म का नारा बुलंद करती युवती। टीवी पर प्रसारित लाइव डिबेट में गुस्से से चिचियाता एंकर। बिना हेलमेट मोटरसाइकिल दौड़ाते दरोगा जी। सरकारी स्कूल की दरख़्त वाली दीवारों के बीच से दिखता चमाचम पब्लिक स्कूल। ट्राफिक की लाल -पीली बत्तियों के बीच सड़क पर ठहरी गाड़ियां की भीड़ के बीच  हुटर बजा आगे निकलता नेताजी का काफिला। डीजे वाले बाबू की धुन पर चलती रेव पार्टी।। इंस्टाग्राम पर सितारा होटलों का दमकता ब्लॉग। खिलौनों को अलविदा कह मोबाइल पर वीडियो गेम में मशगूल नन्हा बच्चा। लंदन में पढ़ रहे बेटे का वीडियो काल। डायनिंग टेबल पर रखी ब्लैक वाटर की बोतल। ये नई आजादी की कुछ तस्वीरें हैं।

आज भी नहीं बदले वे हालात 

आजादी की कुछ तस्वीरें बेहद स्याह है।
नामी अस्पताल में सारी रकम न जमा करने पर बंधक बना मरीज़ का शरीर। रोजगार गारंटी के नारों के बीच बेरोजगार युवक के आत्मा की टीस। कांट्रेक्ट की सरकारी नौकरी की तन्खवाह से घर का बजट चलाने की चिंता। काम के लिए रिश्वत की खुलकर डिमांड करते दफ्तर वाले बाबू। बाढ़ में हर साल डूबते मकान, दालान, लोग, मवेशी और सरकारी दावे। क़र्ज़ का बढ़ता बोझ। जनरल डब्बे में कोंचा कर दिल्ली जाने की मजबूरी। सच को झूठ और झूठ को सच साबित करने वाले लोग। ताखा पर पड़ा भोथार खुरपी-हंसुआ। ठहरी हुई नदियां और उनका का काला होता पानी। दादा जी बढ़ती की खांसी।
ये आजाद भारत देश की दो तस्वीरें हैं। एक और बढ़ते बाजारवाद और भ्रष्टाचार, झूठ की ताल पर कदमताल करते मस्त लोग हैं तो दूसरी ओर इनकी वेदना का  शिकार जन मन।

जात और मजहब कै नाम पर 

आज हम सब ने आजादी की नई भाषा और परिभाषा गढ़ ली है। जाति और मजहब के नाम पर संकीर्णता की दीवारें खुब मजबूत होती जा रही है। राजनीति पूंजी लगाने और कमाने का धंधा बनता जा रहा। लोकतंत्र के स्तंभों पर प्रश्न चिन्ह लग रहा। चुनावी बयार में नेताओं के उड़नखटोला वाले आसमानी दौरा और बेशुमार धन ख़र्च लोकतंत्र का नया ट्रेंड है। जनता को भी कमो बेस राजनीति का तिकड़म और तिकड़म की राजनीति हीं अब भाने लगी है। सत्यमेव जयते वाले भारत मे सत्य को असत्य पटखनी दे बैठा है।

24 घंटे शॉपिंग की आजादी

बाजार ने भी आजादी की नई परिभाषा लोगों को थमा दी है। अब आनलाइन मोबाइल पर हर पल खरिदारी करने की आजादी है। ब्रांड वैल्यू बनाने की आजादी है। बेडरूम से लेकर दफ्तर तक में चौबिसों घंटे बाजार आपकी सेवा में जुटा है बस मोबाइल स्क्रीन पर उंगलियां फेरिए और सामान आपके पते पर। पूंजीवाद जनहित और आजादी का मुखौटा पहन आज सामने है।

झटपट प्यार और ब्रेकअप की आजादी 

इन सब के साथ ही रिश्तों ने भी आजादी के नये मानक गढ़े हैं। फैमली न्यूक्लियर हो गई है। युवा बंधन मुक्त लीव इन का रास्ता पसंद कर रहे। इश्क- विश्क वाले ट्रेडी युवाओं के लिए प्यार और ब्रेक अप झट पट वाली चीज हो गई है। दर्जनों डेटिंग साइट आज मौजूद हैं। आज सोशल मीडिया पर इश्क के इजहार के लिए दिल के साथ ILove u वाली इमोजी काफी है और ब्रेकअप के लिए भी इमोजी है। आज जहानाबाद के किसी सुदूर गांव में  रह रहा रामपाल  बैंगलोर के रजनी से दिल लगाने की आज़ादी गैजेट्स ने दी है। रेडी टू ईट के जमाने ने भारतीय खीर पुड़ी की जगह नुडल पास्ता को कीचेन का सरताज बना दिया है। जोमैटो और स्वीगी जैसे ऐप ने महिलाओं को चुल्हे से भी आजादी दी है। चुल्हा जलाने की जगह मोबाइल चला आर्डर करना आसान लगने लगा है।

AI वाली आजादी

एआई के जमाने ने अब हमें याद रखने और खुब दिमाग चलाने से भी आजादी मिल रही। बस पर भर में आप ज्ञानी बन जाते हैं। जब जिस चीज की जरूरत हो वह सब एआई से उपलब्ध है।
कुल मिलाकर बदलाव के इस दौर में आजादी के नए मायनों को लेकर देश का लोकतंत्र बदलाव की ओर है।

तमाम विसंगतियों के बावजूद उसने बचाए रखी है उम्मीद । जिसे दिल में भर वो ‘काबुलीवाला ‘ का वह गीत गुनगुनाता लेता है ‘ऐ मेरे प्यारे वतन तुझ पे दिल कुर्बान…..’

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‘जीवन दीप ‘ बन शिक्षा का उजियारा फैला रहे फादर A. Christu Savarirajan, S.J_ की कहानी

यह कहानी ज्ञान , संस्कार और शिक्षा का अलख जगा रहे उस इंसान की है जिन्होंने  समाज सेवा के लिए अपना समस्त जीवन समर्पित कर दिया।वे  ज्ञान का दीप जला ,  मानव सेवा ,प्रेम और भाईचारे की भावना मजबूत कर एक ऐसी दुनिया के  निर्माण की पहल में जुटे हैं जो मनुष्य को मनुष्यता का मार्ग दिखाता हो। आज कहानी बिहार के प्रसिद्ध विद्यालय  संत माइकल हाई  स्कूल, पटना के प्राचार्य फादर ए. क्रिस्टु सवरिराजन, एस.जे की…

मेरी परवरिश छोटे से गांव में हुई। जहां खुब सारे पेड़ थे, नदी का उन्मुक्त बहाव था। और पहाड़, पक्षी, नीला आसमान और रिमझिम- रिमझिम   बारिश में माटी से आती सौंधी सी महक भी। मैं बचपन में नदी किनारे कभी  मछली पकड़ने की कोशिश करता तो कभी पास पास उड़ती तितलियों के साथ दौड़ लगाता। मिट्टी में खेलना, बारिश में झूमकर नहाना। एक अल्हड़ – मिजाजी बचपन जिया है मैंने जो प्रकृति के साथ, प्रकृति की गोद में बीता। …..और पढ़ाई कब की! शायद ये सवाल यह सवाल आपके  दिमाग में बिजली की तरह कौन रही होगी। वह सब बताता हूं आपको। अपने अब तक के जीवन की पूरी कहानी पूरी दास्तां। मैं फादर क्यों बना। कैसे बना। एक शिक्षक की भूमिका में कैसे आया। वो बस के छत पर बैठकर सफर करना । वो बिहार आने की कहानी। सब । अपने  पुराने दिनों को याद करते हुए किसी छोटे  बच्चे सा पावनता और उत्साह से लबरेज होकर  कहते हैं  फादर ए. क्रिस्टु सवरिराजन एस.जे

प्रकृति का सानिध्य : अपने गांव में
फादर ए. क्रिस्टु सवरिराजन, एस.जे    बताते हैं कि मेरा जन्म सन् 1975 में हुआ।  मेरे गांव का नाम है ओटन काडुवेंट्टी है । यह तमिलनाडु में पड़ता है।   परिवार में हमारे माता-पिता और हम नौ भाई बहन थे। गांव जैसा की मैंने पहले ही बताया प्रकृति की खुबसूरती से भरा पड़ा था। पिताजी वैसे तो सरकारी नौकरी में थे पर वो गांव की खेती किसानी से भी जुड़े थे। मां गृहणी थीं।
वो बचपन के दिन
यहां से मिली प्रारंभिक शिक्षा
प्रारंभिक शिक्षा के सवाल पर फादर क्रिस्टु कहते हैं
बात प्रारंभिक शिक्षा की करें तो मेरी प्रारंभिक शिक्षा गांव के स्कूल से ही शुरू हुई।
मैं एक छोटा सा बस्ता जिसमें स्लेट, पेंसिल और किताब होती को लेकर स्कूल जाता था। धीरे-धीरे वहां मेरे कई दोस्त भी बन गए और फिर स्कूल जाना अच्छा लगने लगा।
मैं अपने गांव में कक्षा तीन तक ही पढ़ पाया। इसके बाद पिताजी और परिवार की राय से मुझे अपने ननिहाल में भेज दिया गया। वहां के  गिरजाघर में  एक स्कूल का संचालन होता था । इसी स्कूल में मेरा दाखिला कराया गया। मैंने कक्षा 4 से आठवीं तक की पढ़ाई यहीं से की। इस विद्यालय में मुझे नई दिशा दी। यहां मेरा खुब मन लगता।
अध्यात्म की ओर बढ़ने लगा लगाव 
वे आगे बताते हैं कि  जब भी  गिरजाघर में फादर को सफेद लिबास पहने देखता तो एक अजीब सी खुशी और संतोष का भाव मेरे मन में आता। सफेद कपड़ों में फादर का मुस्कुराता हुआ चेहरा , और हम बच्चों के प्रति उनका प्यार इसे और मजबूत करता।
उस वक्त से ही मैं मन ही मन सोचने लगा था या यूं कहें एक संकल्प कर लिया था कि आगे जाकर मुझे भी फादर बनना है। इन दिनों पढ़ाई के साथ साथ में अध्यात्मिक जीवन की ओर भी आकर्षित होने लगा था।
वो बीते दिन..
मेरी रूचि इस आध्यात्मिक दुनिया में गहरी होती जा रही थी। मैं हर सुबह प्रभू ईसा मसीह से दुनिया की बेहतरीन की प्रार्थना करता और फिर दिन की शुरुआत करता। आपको यह जानकर थोड़ी हैरानी होगी कि यह क्रम तब से आज तक निरंतर चलता आ  रहा है।
कक्षा आठ के बाद मेरा नामांकन बोर्डिंग स्कूल में करा दिया गया। इस बोर्डिंग स्कूल में हमारे भाई समेत परिवार के तीन लोग थे। इस कारण मन लगा रहता था। मैं नियमित गिरजाघर जाता और फादर के साथ प्रार्थना सभाओं में सम्मिलित होता। मुझे ऐसा कर के अद्भुत शांति और  असीम ऊर्जा मिलती।
ऐसा रहा शैक्षणिक सफर 
फादर ए. क्रिस्टु सवरिराजन   के शैक्षणिक सफर की बात करें तो सन 2000 में  उन्होंने   बी.एससी ,भौतिकी सेंट जोसेफ कॉलेज, त्रिची से किया। वहीं एम.एससी भौतिकी 2005 में लोयोला कॉलेज, चेन्नई से किया।2006 में सेंट जेवियर्स कॉलेज ऑफ एजुकेशन, पटना से बीएड की डिग्री ली‌, इसके बाद एम.एड 2015 में बॉस्टन कॉलेज, अमेरिका से किया। इसके बाद

डॉन बॉस्को विश्वविद्यालय, गुवाहाटी से पीएच.डी कर रहा हूं।

कोशिश दुनिया को जानने की
मैं फादर क्यों बना?
  फादर ए. क्रिस्टु सवरिराजन   इस बारे में बताते हैं  कि  मुझे बचपन से ही ऐसा लगने लगा था कि मुझे फादर बनना है। जैसा की मैंने पहले भी बताया मुझे पहले तो फादर का लिबास, फिर उनके कार्य और समर्पण को देखकर ऐसा लगता था कि मैं भी फादर बनूंगा। आगे चलकर मुझे लगने लगा कि मैं अपने जीवन को प्रभू चरणों में समर्पित कर दूं और समाज के सकारात्मक बदलाव में योगदान  दूं। जीवन का उद्देश्य समाज सेवा और लोगों की भलाई होनी चाहिए।
बाढ़ पीड़ितों के बीच राहत सामग्री बांटते हुए
मेरे मामा जी भी पुरोहित हैं। कुछ प्रेरणा वहां से भी मिली। फिर मैंने घर में खुद के संकल्प को बताया कि मुझे फादर बनना है। घर के  सदस्यों का पूरा-पूरा समर्थन मिला। सभी ने खुशी जाहिर की। फादर बनने की राह आसान नहीं होता। आपको अपना जीवन समाज को समर्पित करना होता है।
मार्ग प्रेम का: फादर बनने की राह
वे आगे कहते हैं कि यह एक लंबी प्रक्रिया है। यहां कई तरह के प्रशिक्षण और परिक्षाओं से आपको गुजरना होगा। यह 17 साल की लंबी प्रक्रिया है। इस दौरान तीन व्रत लेने होते हैं । यह व्रत है निर्धनता, आज्ञापालन, और ब्रह्मचर्य जीवन।
 निर्धनता :   एक फादर को पैसों की माया से दूर रहना होता है। हमारे कार्य की तन्खवाह भी हमारे संस्थान को दान में चली जाती है और संस्था हमारी मूल जरूरतों का ख्याल रखती है। हमारा खुद का कोई भी बैंक बाइलेंस नहीं होता।
आज्ञापालन – हमें हर वक्त आज्ञापालन के लिए तैयार रहना पड़ता है जब जहां जिस कार्य में लगा दिया जाए उसमें उसी वक्त से जुट जाना होता है। आज मैं संत माइकल का प्राचार्य हूं हो सकता है इसी पल मुझे पश्चिम बंगाल के किसी छोटे से स्कूल या अस्पताल में सेवा के लिए भेज दिया जाए। यहां पद का मोह त्यागकर हमें जीना होता है । तर्क की जगह समर्पण के भाव को आत्मसात करना होता है।
ब्रह्मचर्य जीवन: एक फादर को जीवन भर ब्रह्मचर्य का पालन करना होता है। अविवाहित रहना होता है।
फादर बनने की प्रक्रिया के दौरान हमें अंग्रेजी के साथ ही स्थानीय भाषा का प्रशिक्षण दिया जाता है।
बाइबल के गहन अध्ययन के साथ ही अलग अलग धर्म और दर्शन का अध्ययन भी हम करते हैं। हमें भाषा साहित्य, अच्छे लेखकों की कहानियां और रचनाएं भी पढ़ने होते हैं। फिर हम ब्रदर बनते हैं और हमें दो साल तक किसी संस्था में प्रशिक्षण हेतु भेजा जाता है।
मुझे  बिहार के मधुबनी में भेजा गया था। यहां मूलभूत सुविधाओं का भी अभाव था। यह हमरे लिए कठिनाईयों में रास्ता खोजने जैसा होता है। वहां हम दालान पर सोते थे। उस वक्त गांव में शौचालय भी नहीं था हमें लोटा लेकर शौच के लिए जाना पड़ता था।
दिलचस्प रही बिहार की यात्रा
फादर ए. क्रिस्टु सवरिराजन एस.जे  बिहार आने का क्रम याद करते हुए कहते हैं, जब मुझे यह बताया गया कि मुझे सेवा के लिए बिहार जाना है तो मेरे परिवार के लोग थोड़ा चिंतित से हो गए थे। मैं खुद इससे पहले कभी बिहार नहीं आया था। स्थानीय भाषा तो छोड़िए मुझे ठीक से हिंदी भी नहीं आती थी। आदेश का पालन भी करना था सो मैं मैं बिहार आ गया। यहां आकर मुझे यह लगा कि बिहार के बारे में जिस तरह की छवि बनाई गई है बिहार वैसा नहीं है।  मैं ट्रेन से बिहार आया था।
कई बार ऐसे मौके भी आए जब मुझे बस की छत पर बैठकर यात्रा करनी पड़ी। यहां आने के बाद मैंने स्थानीय भाषा सीखी।  हम सब्जी मंडी जाते और स्थानीय भाषा में बातचीत करने की कोशिश करते
यहां के लोग काफी सहयोगी और मिलनसार हैं। मुझे हमेशा उनका सहयोग मिलता रहता है।
सम्मान के पल: बिहार के शिक्षा मंत्री द्वारा सम्मान ग्रहण करते हुए
 अपनी कुशलता से इन पदों है संभाला
 औरंगाबाद के सेंट इग्नेशियस हाई स्कूल में — 2002 से 2003 उन्होंने शिक्षक के रूप में सेवाएं दीं ।इसके बाद सेंट थॉमस हाई स्कूल, बगहा के रतनपुरवा में 2010 से 2013 तक शिक्षक रहे।
सेंट माइकल्स हाई स्कूल, पटना में — 2016 से 2017 तक उपप्राचार्य के पद पर रहें। इसके उपरांत
वें  सेंट जेवियर्स हाई स्कूल, पटना में 2017 से 2018 तक उप प्राचार्य रहें।
फिर सेंट जेवियर्स हाई स्कूल, पटना में 2018 से 2022 तक प्राचार्य रहें।
फिलहाल, सेंट माइकल्स हाई स्कूल, पटना में 2023 से वर्तमान तक प्राचार्य के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।
 एक चित्रकार और खिलाड़ी भी
फादर ए. क्रिस्टु सवरिराजन  एक बेहतर चित्रकारों का खिलाड़ी भी है। वें  बताते हैं  कि मैं एक खिलाड़ी और चित्रकार भी हूं। मुझे प्रकृति से जुड़े चित्र बनाना काफी माता है। इसके साथ ही मुझे गीत गाना भी काफी पसंद है।
  संत माइकल स्कूल की गौरवशाली यात्रा 
बात अगर सेंट माइकल्स हाई स्कूल  पटना, की करें तो यह स्कूल सन   1858 में स्थापित होने के बाद से ही गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और अनुशासन का पर्याय बना हुआ है। इस ऐतिहासिक संस्थान ने न केवल शैक्षणिक उत्कृष्टता की नई परिभाषा गढ़ी, बल्कि हजारों छात्रों को सफलता की ऊँचाइयों तक पहुँचाया है।
सेंट जेवियर हाई स्कूल, पटना में प्राचार्य के कार्यकाल की एक यादगार झलक
इस गौरवशाली यात्रा को और अधिक प्रभावशाली बनाने में विद्यालय के प्राचार्य फादर ए. क्रिस्टु सवरिराजन, एस.जे. की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। दूरदर्शी शिक्षाविद्, कुशल प्रशासक और आदर्श मार्गदर्शक के रूप में उन्होंने इस विद्यालय को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया और इसे आधुनिक शिक्षा प्रणाली के अनुरूप विकसित किया।
 167 वर्षों की गौरवशाली परंपरा
1858 में डॉ. एनेस्टेसियस हार्टमैन (फ्रांसिस्कन (कैपुचिन) मिशनरी सोसाइटी) द्वारा स्थापित, सेंट माइकल्स हाई स्कूल अपने अनुशासन, नैतिक मूल्यों और उच्च शैक्षणिक मानकों के कारण पूरे बिहार में शिक्षा का एक आदर्श केंद्र बन चुका है।
 क्या खास है इस विद्यालय में?
समग्र शिक्षा (Holistic Education): यहाँ सिर्फ किताबों से ज्ञान नहीं दिया जाता, बल्कि नैतिकता, नेतृत्व क्षमता और सामाजिक जिम्मेदारी का भी विकास किया जाता है।
सफल पूर्व छात्र: प्रशासन, राजनीति, कॉर्पोरेट जगत, चिकित्सा और अन्य क्षेत्रों में विद्यालय के पूर्व छात्र अपनी सफलता की कहानी लिख रहे हैं।
 शिक्षा के साथ संस्कार: यह संस्थान सिर्फ अकादमिक उत्कृष्टता तक सीमित नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण और समाज सेवा में भी अग्रणी रहा है।
  नवाचार के अग्रदूत  हैं फादर ए. क्रिस्टु सवरिराजन
फादर ए. क्रिस्टु सवरिराजन, एस.जे. का मानना है कि
“एक शिक्षक केवल ज्ञान नहीं देता, बल्कि छात्रों के भीतर आत्मविश्वास और नेतृत्व क्षमता का निर्माण करता है।”
बच्चों से विशेष स्नेह
उन्होंने शिक्षा को तकनीक और आधुनिक आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनके नेतृत्व में किए गए प्रमुख नवाचार की बात करें तो
🔹 स्मार्ट क्लासरूम और डिजिटल लर्निंग का समावेश
🔹 स्पोर्ट्स और एक्स्ट्रा करिकुलर एक्टिविटीज को बढ़ावा
🔹 वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम
🔹 सामाजिक कार्यों में छात्रों की भागीदारी सुनिश्चित
फादर सवरिराजन का सपना है कि हर छात्र न केवल शिक्षित हो, बल्कि एक जिम्मेदार नागरिक भी बने।
 विद्यालय की उपलब्धियाँ और विकास में महत्वपूर्ण योगदान 
फादर सवरिराजन के कुशल नेतृत्व में सेंट माइकल्स हाई स्कूल ने कई उपलब्धियाँ हासिल की हैं:
🏅 सीबीएसई बोर्ड परीक्षाओं में बेहतरीन प्रदर्शन
🏅 राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में छात्रों की सफलता
🏅 आधुनिक प्रयोगशालाएँ, पुस्तकालय, स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स और डिजिटल संसाधनों का विस्तार
🏅 असहाय और आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों को शिक्षा में सहायता
जैसी पहल शामिल है  यह पहल आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत होगी।
क्यों है यह बिहार के युवाओं के लिए प्रेरणादायक?
 यह छात्रों को सिर्फ परीक्षा पास करने के लिए नहीं, बल्कि जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए तैयार करता है।
नैतिकता, अनुशासन और आत्मनिर्भरता का विकास करता है।यहाँ शिक्षा के साथ-साथ समाज सेवा, खेलकूद, कला और संस्कृति को भी महत्व दिया जाता है।
 ऐसा है विद्यालय का ऐतिहासिक सफर
1858 में डॉ. एनेस्टेसियस हार्टमैन द्वारा स्थापित यह विद्यालय शुरू में कुर्जी क्षेत्र में अनाथ एवं निर्धन बच्चों के लिए बोर्डिंग स्कूल के रूप में कार्यरत था।
1894 में, आयरिश क्रिश्चियन ब्रदर्स को इसकी जिम्मेदारी सौंपी गई, जिन्होंने इसे उच्च विद्यालय का दर्जा दिलाया और 1896 में पहला बैच हाई स्कूल परीक्षा में शामिल हुआ।
1958 में, विद्यालय ने अपनी शताब्दी (100 वर्ष) पूरी की और शिक्षा एवं सह-पाठ्यक्रम गतिविधियों में बिहार का अग्रणी संस्थान बन गया।
जेसुइट सोसाइटी को जानें
1968 से संत माइकल विद्यालय का प्रबंधन पटना जेसुइट सोसाइटी द्वारा किया जा रहा है। यह सोसाइटी 1540 में संत  इग्नेशियस लोयोला द्वारा स्थापित की गई थी । यह समाज सेवा के कार्य करता है। खासतौर से शिक्षा के क्षेत्र में इसने काफी कार्य किया है।
 वर्तमान में भारत में 418 से अधिक स्कूलों,   5 विश्वविद्यालय , प्रबंधन संस्थान, इंटर कॉलेजों और  डिग्री कॉलेजों का संचालन कर रही है। 4000 येसु समाजी विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत हैं।
अपनी माताजी के सानिध्य में फादर ए. क्रिस्टु सवरिराजन एस.जे
मिलती है मां की ममता की छांव 
फादर ए. क्रिस्टु सवरिराजन कहते हैं मैं अपनी मां की ममता से उर्जा प्राप्त करता हूं। मां मुझसे बहुत दूर गांव रहती है पर उसे मेरी चिंता हर वक्त लगी रहती है। वो मुझसे फोन पर अब भी यह पूछती है कि मैंने खाना खाया या नहीं। मां का संबल मुझे मजबूत करता है। मेरी मां ही नहीं  दुनिया की हर मां की ममता और दुआओं का असर जादूई होता है।
 लोगों को प्रभू का संदेश
फादर  फादर ए. क्रिस्टु सवरिराजन  कहते हैं कि प्रभु ईसा मसीह ने बाइबल में इस प्रेम और इस सेवा की बात कही है।
आज  एकता और भाईचारे की जगह कटूता बढ़ती जा रही है। लोगों को जोड़ने की जगह लोगों को बांटने का काम हो रहा है। हम एक दूसरे का सम्मान करना तक भूल रहे। जरुरत जन्म ,भाषा, क्षेत्र के नाम पर बटने या बांटने की नहीं। एकता के साथ मानव प्रेम और मानव सेवा के लिए समर्पित होने की है।
चुनौतियां तो जीवन में आती रहेगी। प्रभु यीशु के जीवन में भी आई । हमें साहस रखकर आगे बढ़ना है और बनाना है ऐसा समाज जहां मन का हर कोना प्रेम , शांति और सद्भाव से रौशन हो । मैं अंत में रविन्द्र नाथ टैगोर की अमर कृति गीतांजलि की इन पंक्तियों के साकार होने की कामना परमपिता परमेश्वर से करना चाहता हूं।

जहां मन भय से मुक्त हो, और मस्तक ऊंचा रहे

जहां ज्ञान स्वतंत्र हो;
जहां संसार संकीर्ण दीवारों से खंड-खंड न हुआ हो;
जहां वाणी सत्य की गहराइयों से निकलती हो;
जहां परिश्रम की अविराम धारा पूर्णता की ओर बढ़ती हो;
जहां तर्क की स्वच्छ धारा जड़ परंपराओं की मरुभूमि में न खो जाए;
जहां मन तुम्हारे द्वारा सतत विस्तार पाते विचार और क्रिया की ओर अग्रसर हो—
हे पिता! मेरे देश को उस स्वतंत्र स्वर्ग में जागृत कर।

( यह सिर्फ एक कहानी नहीं, एक उम्मीद है।आलेख: विवेक चंद्र का है । आप आर्थिक मदद कर इस मुहिम को मजबूत कर सकते हैं ।आपकी आर्थिक मदद हमारी सकारात्मक मुहिम को जीवन देती है। 📞 संपर्क: 748843830)

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असमिया वाद्य यंत्रों को पुनर्जीवित करने की सुरीली पहल करने वाले माधव कृष्ण दास की कहानी

ब्रह्मपुत्र के उन्मुक्त बहते जल तरंगों में  ‘बरगीत’ की पावन धुन हो या फिर चाय बागानों के पत्तों की सरसराहट में ‘रंगाली’ का मधुर राग, या दूर पहाड़ी पर बसे गांव की पगडंडी तक फिजा में मचलता ‘पेपा’ का मद्धिम -मद्धिम स्वर ।असम की आत्मा लोक धुनों के इन्हीं कोरस में बसती रही है , रचती रही है।
बदलते समय के साथ यहां भी जब लोक धुनों के स्वर की जगह पश्चिम के संगीत का शोर गूंजने लगा । संस्कृतियों की तान पर बाजार सीना तानकर खड़ा हो गया, तब यहां के एक  शख्स में  परिवर्तन का बीड़ा उठाया। उन्होंने न सिर्फ लोक धुनों को सहजने सवारने का जतन शुरू किया बल्कि असम के लुप्त हो रहे वाद्य यंत्रों को ढूंढ ,उन्हें फिर से नवीनता और मौलिकता के मेल के साथ आम लोगों के लिए उपलब्ध कराने की नायाब पहल शुरू की। बचपन में ही संगीत की संगत कर संगीत विशारद की डिग्री पाने वाले और असमिया गीत संगीत को पुनर्जीवित कर उसे दुनिया भर से परिचित करवाने की सुरीली कोशिश करने वाले गायक, संगीतकार, लेखक और वरिष्ठ सिनेमैटोग्राफर , लोकसंगीत रत्न माधव कृष्ण दास की यह कहानी जरूर पढ़िए…

मेरे घर में बचपन से ही संगीत का माहौल था। मां डॉ. डॉली दास लोक संगीत की गायिका थीं। घर का हर कोना मां के रियाज की आवाज और साजों के संगीत से गुलजार रहता। ऐसा कहूं की मैं बचपन में मां के गीत सुनते हुए ही नींद के आगोश में जाता और सुबह जब जागता तो देखता मां ने उगते सूरज के साथ ही अपनी संगीत की संगत शुरू कर दी है।

माधव कृष्ण दास की माताजी डॉ डॉली दास

“सच कहूं तो वो घर के संगीत का माहौल ही था जिसने अब तक मेरी आत्मा के अंदर मनुष्यता को बचा कर रखा है, जीवन को सजा कर रखा है कहते हैं माधव कृष्ण दास”

माधव कृष्ण दास असमिया लोक संगीत को पुनर्जीवित करने के लिए कई अभियान चला रहे हैं। इन अभियानों में लोक गीतों को सहेज कर उनका प्रकाशन से लेकर गुम हो रहे वाद्य यंत्रों की खोज और उनका निर्माण तक शामिल हैं।
माधव कृष्ण दास कहते हैं घर में संगीत की संगत का असर मुझ पर बचपन से ही होने लगा। मैंने कक्षा सात की उम्र में ही डिब्रूगढ़ संगीत महाविद्यालय से संगीत विशारद  की डिग्री पा ली थी। इतनी कम उम्र में यह डिग्री पाने  वाला मैं पहला बच्चा था। वैसे तो मेरी रूचि तबला वादन में सबसे अधिक थी पर मैं धीरे-धीरे कर अन्य वाद्य यंत्र भी बजाता और उसे सीखता था। कहते हैं श्री दास। आज  वे 22 से अधिक वाद्ययंत्र को बड़ी आसानी से बजा सकते हैं।

माताजी और भजन गायक अनूप जलोटा जी के साथ मुंबई स्टूडियो में

ऐसे सीखा इतने वाद्य यंत्र बजाना

माधव कृष्ण दास बड़े ही उत्साह से 22 से अधिक वाद्ययंत्र को सीखने और बजाने किस्सा सुनाते हुए कहते हैं कि मेरी मां परफॉर्मेंस के लिए लोक गीतों की तैयारी करती और कई बार ऐसा होता कि कोई म्यूजिशियन अनुपस्थित हो जाता तो फिर मैं उस वाद्य यंत्र को बजाने बैठ जाता। ऐसा करते करते मुझे, तबला के साथ, पेपा, बांसुरी, ढ़ोल, हारमोनियम समेत अनेक वाद्य यंत्र बजाने आ गए। इसके साथ ही अब किसी म्यूजिशियन की अनुपस्थिति में होने वाली कठिनाई भी समाप्त हो गई। अब मैं मां के साथ बाहर मंचों पर भी परफॉर्म करने जाने लगा।

मां डॉ .डॉली दास जी ने लोक संगीत के क्षेत्र में उल्लेखनीय  उपलब्धियां हासिल की थीं । वर्ष 2011 में  वें बुल्गेरिया  में आयोजित वर्ल्ड फोक फेस्टिवल में स्वर्ण पदक विजेता रहीं। इसके बाद,वर्ष 2014 में वियतनाम विश्वविद्यालय ने उन्हें लोक संगीत में डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया। उनकी इसी साधना और समर्पण के लिए वर्ष 2017 में उन्हें राष्ट्रपति पुरस्कार से भी नवाजा गया।

फिल्म में अकेले बजाए सभी वाद्य यंत्र

माधव कृष्ण दास ने 2009 में महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव के जीवन पर आधारित फीचर फिल्म में  अकेले बैकग्राउंड म्यूजिक दिया। इसके उन्होंने अकेले ही 22 वाद्य यंत्रों को बजाया और फिर म्यूजिक कंपोज किया। यह अपने आप में एक रिकॉर्ड है। फिल्म आने के बाद लोगों के इसके संगीत की भी सराहना की।

लोकसंगीत का तैयार किया सिलेबस

माधव कृष्ण दास बताते हैं कि हमारे असम में लोग परंपरागत गीत तो गाते थे। इनकी पढ़ाई भी शुरू हो चुकी थी पर कोई व्यवस्थित सिलेबस नहीं था। मुझे लगा कि लोक संगीत को पुनर्जीवित करने और मजबूती देने के लिए एक व्यवस्थित सिलेबस की जरूरत है जिसमें असम के लोक संगीत के सभी आयाम मौजूद हों। फिर मैंने इसकी पहल शुरू की और कई माह के मेहनत के बाद लोक संगीत का सिलेबस तैयार किया।
सर्वभारतीय संगीत -ओ- संस्कृति परिषद कोलकाता ने भी इसे मान्यता प्रदान की।‌आज असम के कई संगीत महाविद्यालय में इस सिलेबस से पढ़ाई हो रही है।

वाद्य यंत्र को नया रूप देते हुए

माधव बांसुरी एक सुरीली पहल

माधव कृष्ण दास बताते हैं कि असम के जीवन में बांस का हमेशा से एक महत्वपूर्ण स्थान रहा है ‌ । चाहे वह यहां का लोक जीवन हो या फिर लोक संगीत।

लोक संगीत में प्रयोग आने वाले वाद्ययंत्र में भी बांस का ज्यादातर प्रयोग होता है और बांसुरी तो यहां के लोकसंगीत की आत्मा है।

मैं एक बांसुरी वादक भी हूं। वादन के क्रम में मैंने यह महसूस किया कि  हमारे पारंपरिक बांसुरी में सभी   स्केल की बांसुरी एक साथ नहीं उपलब्ध हो पाती थी। मैंने इस पर रिसर्च शुरू किया और फिर  सभी स्केल की बांसुरी  का सेट ईजाद किया  ।  मैंने इसे माधव बांसुरी नाम दिया है। माधव बांसुरी के तहत 25 बांसुरी का एक सेट है जिसमें हर स्केल की बांसुरी मौजूद रहती है।

लुप्त हो रहे वाद्य यंत्रो को किया पुनर्जीवित

माधव कृष्ण आगे बताते हैं कि हमारे प्रदेश असम में कई आदिवासी जनजातियां हैं। इन सभी जन जातियों के अपने अपने त्योहार है, गीत है और वाद्ययंत्र भी।

“मैंने यह महसूस किया की बदलते ज़माने में हमारे वाद्य यंत्र को भूलकर वेस्टर्न म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट  अपनी जगह बना रहे हैं। मुझे यह काफी नागवार लगा। मैं यह मानता रहा हूं कि हमारे परंपरागत वाद्य यंत्र लोकसंगीत की सांस हैं। हां आज के समय के साथ उनकी डिजाइन को और आकर्षक बनाया जा सकता है, पर उनकी मौलिकता को संरक्षित रखते हुए”

फिर छुट्टियों में मैं गांव – गांव जाता , बुजुर्ग संगीतकारों से मिलता है और पुराने फोक म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट के बारे में जानकारी इकट्ठा करता ।

वैसे मैं अगर असम के म्यूजिक इंस्ट्रूमेंट की बात करूं तो वहां के सबसे खास म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट में ये वाद्य यंत्र शामिल होते हैं

ढोल, पेपा, गगना ,ताल , बान्ही खोल , नेगेरा शंख , हारमोनियम, बीन , सेरजा , शिफून , खराम आदि। 

जब तक नई पीढ़ी इन्हें नहीं अपनाती तब तक इनका संरक्षण और प्रयोग काफी मुश्किल जान पड़ता था। फिर मैंने खुद से ही इंस्ट्रूमेंट को बनाने की पहल शुरू की ।

इनके डिजाइन को थोड़ा आधुनिक रूप दिया और इनका निर्माण कार्य शुरू किया। इस काम में वहां के स्थानीय जानकार लोगों की मदद भी ली। परिणाम चमत्कारी थे। मेरे पास एसे परंपरागत वाद्य यंत्र नए रूप में मौजूद थे जो देखने में काफी खूबसूरत और आकर्षक तो थे उनकी मूल धुन ओर स्वर भी वैसे कायम था।

“संगीत जगत में इस पहल की काफी प्रशंसा हुई, और मुझे मिल एक आत्मिक संतोष। मुझे लगता है मैं रहूं न रहूं मेरे बनाएं इन वाद्य यंत्रों के स्वर फिजा में सुरीला रस भर इंसानियत का राग बचाएं रखेंगे”

माधव कृष्ण दास के पिता हितेश दास जी

पिताजी का योगदान अहम

माधव कृष्ण दास अपनी संगीत यात्रा का श्रेय अपने पिता हितेश दास जी को देते हैं। वे कहते हैं कि इस यात्रा में पिताजी का सहयोग काफी अहम रहा। पिताजी मां को हमेशा लोकसंगीत के लिए प्रेरित करते रहे। मेरे पिता वैसे तो टेलिकॉम डिपार्टमेंट में नौकरी करते थे पर उनकी रूचि लोक संगीत और लोक जीवन में काफी ज्यादा थी। उन्हें गांव, खेती, किसानी और कला से विशेष लगाव था। वे चाहते थे कि असम की कलाएं संरक्षित हो सके। मुझे संगीत की शिक्षा दिलवाने में भी उनका योगदान रहा। मैं जो कुछ भी हूं उनकी ही प्रेरणा से हूं।

जब ग्रामोफोन पर रिकॉर्ड हुआ गीत

माधव कृष्ण दास अपने पुराने दिनों को याद करते हुए कहते हैं। 1982 में मेरे गीत का ग्रामोफोन रिकार्ड आया था। इसे रिकॉर्ड करने के लिए हम एच एम वी कंपनी के मुख्यालय कोलकाता गए थे। उस वक्त इतनी दूर का पहला सफर था। इसके बाद 150 से अधिक ऑडियो कैसेट , सीडी कैसेट और डीवीडी  रिलीज हुए।  इसमें  आसामी,  हिंदी,  नेपाली,  बोडो, तीवा, नागामीज , मिसिंग, देउडी , उड़िया ,तमिल भाषा के  गीत शामिल हैं। आज इंटरनेट का युग है। सोचता हूं,इन सालों में तकनीक कितनी बदल गई। अब हर मोबाइल में या यूं कहें हर हाथ में रिकॉर्डर है, इंटरनेट है और है मुट्ठी में एक पूरी दुनिया।

इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में नाम

श्री दास बताते हैं कि उनका नाम दो बार “इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स “ में दर्ज हो चुका है। उन्होंने मेमोरी कार्ड में पहली बार गाना डालकर उसका प्रसार शुरू किया था। इसके साथ दूसरा  दिहानम में सर्वाधिक गीत गाने पर ।‌


मिल चुके हैं कई पुरस्कार

माधव कृष्ण दास को संगीत और कला के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए की पुरस्कार और सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। उन्हें चित्रकला के लिए 10 साल की उम्र में ही साल1979 में सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार प्रदान किया गया‌। 1987 में सांस्कृतिक कार्य विभाग, असम सरकार द्वारा आयोजित शास्त्रीय बांसुरी में द्वितीय स्थान और खोल वादन में तृतीय स्थान प्राप्त हुआ।

1987 में भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा युवा सांस्कृतिक कर्मियों के लिए उत्तर-पूर्व से प्रथम CCRT छात्रवृत्ति प्राप्त हुई।

1993 में कर्नाटक राज्य में सिनेमैटोग्राफी के अंतिम परीक्षा में 1st class तृतीय स्थान प्राप्त होने पर सम्मानित किया गया।

साल 1991मे ऑल इंडिया टेलीकॉम सांस्कृतिक सम्मेलन में कोलकाता (पश्चिम बंगाल) में शास्त्रीय बांसुरी में प्रथम स्थान प्राप्त हुआ।1990 में ऑल इंडिया टेलीकॉम सांस्कृतिक सम्मेलन अहमदाबाद (गुजरात) में लोकगीत में तृतीय पुरस्कार प्राप्त हुआ।वहीं साल 1978 में ऑल असम म्यूजिक एंड ड्रामा फेस्टिवल, तिनसुकिया में बिहूनाम  में द्वितीय पुरस्कार प्रदान किया गया। 1984 में ऑल असम चिल्ड्रन्स फेस्टिवल, सिबसागर में पर्बती प्रसाद गीत में द्वितीय पुरस्कार मिला।

पल सम्मान के..

1985 ऑल इंडिया चिल्ड्रन्स वन-एक्ट प्ले प्रतियोगिता, डिब्रूगढ़ में नाटक में द्वितीय सर्वश्रेष्ठ अभिनय पुरस्कार प्राप्त हुआ, 1987 में दोबारा सांस्कृतिक कार्य विभाग, असम सरकार द्वारा आयोजित अखिल असम सांस्कृतिक महोत्सव में शास्त्रीय बांसुरी में द्वितीय स्थान और खोल में तृतीय स्थान प्राप्त हुआ।सर्वभारतीय संगीत -ओ- संस्कृति परिषद कोलकाता  द्वारा 2013 में लोकसंगीत रत्न की उपाधि से नवाजा गया। साल 2025 में माधव कृष्ण दास को महानायक महाराज महावीर पृथु सम्मान  से नवाजा गया ।

चित्रकला प्रदर्शनी में माधव कृष्ण दास

राग के साथ रंग से भी रिश्ता

माधव कृष्ण दास का रिश्ता राग के साथ रंगों से भी है वे सुरों के साधक तो हैं हीं एक बेहतर पेंटर भी हैं। उन्होंने श्रीमंत शंकरदेव एवं माधवदेव की रचनाओं में आए पात्रों को अपनी कूची से कैनवास पर उतारा है। इसमें राधा -कृष्ण लीला, कृष्ण की बाल लीलाओं समेत लोक जीवन के चित्र भी शामिल हैं। माधव कृष्ण दास कहते हैं कि मैं अपनी पेंटिंग में ज्यादातर फूल – पत्ते हैंगूल , हाईताल,  से बने प्राकृतिक रंगों का प्रयोग करता हूं।

पत्नी ‘माया’ भी कला साधक

माधव कृष्ण दास की पत्नी माया सेनजी  दास भी एक कला साधक हैं। श्री दास कहते हैं कि मैं मानता हूं कि हम सब के जीवन की प्रोग्रामिंग ईश्वर ने सेट कर रखी है। हम सब भगवान के प्री प्लान पर ही चल रहे होते हैं। मेरी कला यात्रा को गति देने में पत्नी ‘माया’ का बड़ा योगदान है। वो मुझे हमेशा इन चीजों के लिए प्रेरित करती है। उसकी खुद की दिलचस्पी भी लोक कला और साहित्य में है।   उन्होंने   चेन्नई फिल्म इंस्टीट्यूट में  पढ़ाई के दौरान एडिटिंग में गोल्ड मेडल प्रदान किया गया था। वे दक्षिण भारतीय परिवेश में पली पढ़ी और मैं पूर्वोत्तर में पर हमारे बीच एक बेहतर तालमेल है ‌।

पत्नी माया सेनजी दास के साथ

वे आगे बताते हैं कि माया सेनजी दास ने  श्रीश्री माधव देव द्वारा रचित नामघोषा का तमिल में अनुवाद किया है। इसके साथ हीं दूरदर्शन के राष्ट्रीय चैनल के लिए उन्होंने महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव पर आधारित 13 एपिसोड का एक मेगा धारावाहिक का निर्देश भी किया है। उन्होंने असम राज्य गीत समेत कई असमिया गीतों का तमिलभषा में अनुवाद किया।

वे फिलवक्त गुवाहाटी के एक  न्यूज चैनल में  प्रोग्राम एडमनिस्ट्रेटर हैं। श्री दास कहते हैं कि हम असम के लोक गीतों को दुनिया भर में पहुंचाना चाहते हैं। इसके लिए हम उन्हें किताबों के तौर पर प्रकाशित के  पहल भी  कर रहे हैं साथ हीं हम इनके अन्य भाषाओं में अनुवाद पर भी ध्यान दें रहे हैं, ताकि अन्य भाषा के लोग भी हमारी विरासत को समझ पाएं, खास तौर पर महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव एवं माधवदेव के दिव्य रचनाओं को।

माधव कृष्ण दास के पुत्र जय कृष्ण दास और विजय कृष्ण दास एमसीए की पढ़ाई कर चुके हैं। जयकृष्ण को cotton विश्वविद्यालय में एमसीए की परीक्षा में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने के लिए गोल्ड मेडलप्रदान किया  था। विजय कृष्ण भी एमसीए करने के बाद फिल्म में ग्राफिक डिजाइनर के रूप में कार्य कर रहे हैं।

दिल्ली में गणतंत्र दिवस समारोह में कवरेज के दौरान

कलाकार से  सिनेमैटोग्राफर का  सफर
श्री दास बताते हैं कि संगीत की शिक्षा तो बचपन से ही मिलती रही। मैं उस वक्त गुवाहाटी कटन कॉलेज से जियोलॉजी में स्नातक कर रहा था। पढ़ाई के दौरान हीं में तबला वादन हेतु गुवाहाटी दूरदर्शन केन्द्र जाया करता था। वहां के एक तात्कालिक कैमरामैन ने मुझे सिनेमोटोग्राफी की पढ़ाई करने की सलाह दी।
मैंने उनकी सलाह मानते हुए 1990में बैंगलोर में इस कोर्स में दाखिला ले लिया। कोर्स पूरा होने पर मुझे उड़ीसा फिल्म इंस्टीट्यूट में लेक्चरर की नौकरी मिल गई।

यहीं माया सेनजी भी पढ़ाने आई थीं। हम एक दूसरे के करीब आएं  हमारे विचार विचार काफी मिलते थे, और फिर विवाह  के पवित्र बंधन में बंधने का फैसला लिया


इसके बाद मैंने चेन्नई में हीं कैमरामैन के तौर पर कार्य किया। फिर असम के ज्योति चित्रवन फिल्म इंस्टीट्यूट में कैमरा पढ़ाना शुरू किया। इसके बाद यूपीएससी के जरिए में दूरदर्शन में आ गया। मेरी पहली पोस्टिंग बिहार के मुजफ्फरपुर  दूरदर्शन केन्द्र में हुई फिर पटना।

दूरदर्शन परिवार का सदस्य होने का गर्व 

दूरदर्शन ने मुझे एक बड़ा फलक दिया। मुझे इस राष्ट्रीय परिवार का हिस्सा बनने पर गर्व है। यहां मैंने कई बातें सीखीं देश के अलग-अलग हिस्सों में जाने और संस्कृतियों को समझने का मौका भी मिला। यहां सभी सहयोगियों का भी भरपूर प्यार मिलता रहता है।

बिहारी लोकसंगीत के लिए काम करने की चाहत

माधव दास कहते हैं, मैंने बिहार में लम्बा वक्त बिताया है। बिहार ने काफी कुछ मुझे दिया भी है यही मेरा प्रमोशन भी हुआ। बिहार के लोगों का हर कदम पर सहयोग मिला है।

मेरी चाहत बिहार के गुम हो रहे लोग गीतों के संग्रह की है। मैं अपने छुट्टी के दिन का उपयोग बिहार के लोकसंगीत के संरक्षण और गुम हो रहे गीतों की खोज में करता हूं। 

मैं यहां के परंपरागत गीतों को एकत्र कर एक किताब की शक्ल देना चाहता हूं। ऐसे में वें संरक्षित हो सकेगी। मैं बिहार के प्राचीन वाद्य यंत्रों की खोज भी करने में जुटा हूं।

वे कहते हैं कि हमारे लोग गीतों को आज के परिवेश के अनुसार बनाकर उसे युवाओं से जोड़ने की जरूरत है। ध्यान यह रहें कि परंपरागत गीतों की मूल भावना और उसकी गहराई पर कोई खरोंच न आए। वे आगे कहते हैं संगीत तो हर जगह मौजूद हैं। हमारे हर क्रियाकलाप  में। लोकजीवन में, साइकिल की घंटी से लेकर  रेलगाड़ी की छुक छुक  तक‌ । हवाओं के झोंकों से लेकर सांसों के प्रवाह और दिल की धड़कन तक संगीत ही तो हैं। नन्हे से बच्चे की हंसी हो, या फिर बाल मन का क्रंदन संगीत ही हमें हर पहर , हर लम्हा बांधे रहता है।

एक संगीत साधक होने के नाते अगर मैं लोग संगीत के थोड़े से सुर -ताल भी अगली पीढ़ी के लिए संजो पाया तो मैं समझूंगा की मैंने अपने जीवन का उद्देश्य पूरा कर लिया। आज के इस एआई और वर्चुअल रियलिटी की दुनिया में संगीत ही है जो हमें इंसान बने रहने का स्वर देता है, मनुष्यता को बचाए रखने का स्वर देता है और इन्हीं स्वरों से मिलकर बनता है वह अलौकिक नाद जिसमें डूबकर शंकर देव कह उठते हैं ‘ मन मेरि राम चरणहि लागु। और कबीर गा उठते हैं ‘ मन लागो मेरा यार फकीरी में ‘
मेरे मन में भी बस एक छोटी सी ख्वाहिश है कि जब तक रहूं एक सच्चे संगीत साधक की तरह बचाए रखूं अपने दिल का वह साज जो हमें मशीन नहीं मनुष्य बनाएं रखता है।

 

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