समाज की के स्याह – सफेद कहानियों को लिखते, पढ़ते फिल्माते, पता ही नहीं चला है कि मैं इनसे कोई अलग किरदार हूं। हर स्टोरी के पीटीसी करते वक्त लगता है यह मेरी ही तो कहानी है। भूख, पीड़ा, दर्द, घटना, दुर्घटना, और इन सब के बीच हिम्मत भरी अनगिनत कहानियां। सब कुछ ख़त्म हो जाने के बाद भी , हिम्मत समेट फिर से जीने का जुनू। मेरी खुद की कहानी भी तो ऐसी ही है। चकाचौंध से भरे दफ्तर में बैठकर भी मैं उस काले पल को नहीं भूला पाता जब नीयती के क्रुर पंजों ने मां- पिताजी दोनों को छीन लिया था। बाबूजी के बेजान पड़े बदन से लिपट भींगी आंखों से एक बार फिर उनसे लौटा लाने की प्रार्थना ईश्वर से करते रहे , तो आईसीयू में मौत से जंग लड़ रही मां की सलामती की दुआ मांगते रहे। पहले पिताजी फिर मां दोनों को काल ने अपना ग्रास बना लिया। हमारी हंसती -खिलखिलाती दुनिया लूट चुकी थी। हम अनाथ हो चुके थे।
जिंदगी ने दामन में दर्द भरा तो जख्म पर मरहम भी लगाया। सुख दुख की इस पगडंडी पर कुछ ऐसे लोग मिले जिनके उपकारों का बदला, जिसके सहयोग का बदला ताउम्र मैं नहीं चुका पाऊंगा। उनके लिए न मेरे पास शब्द हैं, न लिपि, न भाषा, बस हैं तो दिल में वो अपार श्रद्धा जो आंसू बन टपक कर मेरे अंतश को हर पल गंगा कर देती है। हिन्दुस्तान टाइम्स के दफ्तरसे एनडीटीवी, सी एन एन आईबीएन, नेटवर्क 18, और फिर एनडीटीवी तमाम यादें, तमाम लोग , तमाम प्यार और तमाम मौसम सब कुछ लगता है बस अभी तो बीता या। इस बीते वक्त के बीच कुछ बच बचा सा लगता है, ऐसा कि मैं भागकर जिंदगी की कोई स्कूप खबर ले आऊं और खुशियों के स्क्रीन पर मोटे मोटे ग्राफिक्स के साथ ये लिखा हो कि इस वक्त की बड़ी अब किसी भी शख्स के आंखों में आसूं नहीं होंगे, सबके चेहरे पर मुस्कान होगी सच्ची वाली। वाकई उसी खबर की तलाश तो कर रहा हूं मैं, माइक आइडी , कैमरा, और ट्राइपॉड लेकर सालों से दर दर की खाक छानता हुआ। क्या पता कब सुपर प्रोड्यूसर कह दे की अब जिंदगी की बुलेटिन यही तक। …. बस तब तक जी लेना चाहता हूं जिंदगी….थोड़ी सी हंसी वाली, थोड़ी सी खुशी वाली, थोड़ी सी उम्मीद वाली । इस भरोसे के साथ कि दुनिया का थोड़ा भला कर सकूं। समाज के अंधेरे में जला सकूं आशाओं का दीप बस…! यही ख्वाहिशहै, यही अरमान है। बाकी सब तो लाइफ के रनडाउन पर लिखा ही जा रहा है, हर रोज नई खबरें , कभी शोर, कभी शांति कभी तमाशा, पर बचा वही रहेगा जो किसी की मुस्कुराहटों पे निसार होकर, किसी का दर्द उधार लेकर , जीना इसी का नाम है गा उठेगा।
मैं बालपोथी में ‘क’ से ‘कलम’ की रट लगाता
हर शख्स के जीवन में बचपन एक सुनहरा दौर लेकर आता है। मेरा भी बचपन बेफ्रिक्री और मां- पिताजी के स्नेह- दुलार में परवान चढ़ा। मेरा जन्म पटना के कुर्जी होली फैमिली अस्पताल में 29 अक्टूबर को हुआ था।
नन्हें पांवों ने जब गिरते, संभलते चलना सीख लिया, और दिलोदिमाग की बातें होंठों पर शब्द की शक्ल लेने लगे तो घर वालों ने अक्षरों की दुनिया से नाता जोड़ दिया।
वो दिन बचपन वाले
मैं बालपोथी में लिखे ‘क’ से कलम की रट लगाता। तब कौन जानता था कि ‘क’ से यही कलम जीवन और करियर दोनों बन जाएगा।
अक्षरों से जान पहचान गहरी हो गई तो फिर मेरा नामांकन पटना के St. Cairens School करवाया गया। सुबह सवेरे यूनिफॉर्म पहन, कांधे पर बस्ता लादे मैं स्कूल आने जाने लगा। अब घर के साथ स्कूल भी घर जैसा लगने लगा। कुछ यारियां हुई। दोस्त बने। फिर भी कभी कभार स्कूल न जाने की ज़िद कर ही बैठता और तब मां बाबूजी, दोनों बड़े ही दुलार से मुझे समझा घर की दहलीज पार करा स्कूल की दहलीज में दाखिल करवा ही देते। मेरा भोला मन भी उनकी बातों में आ जाता। बचपन के उस दौर की इन बातों को आप अच्छी तरह से तब महसूस सकते हैं जब आप खुद अभिभावक बनाते हैं और आपका बच्चा तुलती सी हंसी के साथ स्कूल न जाने का बहाना बना रहा होता है। वाकई असली राजा वाली फीलिंग तो बचपन में हीं आती है। खैर, मैं कक्षा 2 तक सेंट कैरेंस स्कूल में ही पढ़ा।
इसके बाद फिर मेरा दाखिल बनारस के राजधाट बेसेंट स्कूल में करवाया गया।
राजधाट बेसेंट स्कूल एक बोर्डिंग स्कूल है।राजघाट बेसेंट स्कूल को कृष्णमूर्ति फ़ाउंडेशन इंडिया (KFI) चलाती है। यह संस्था दार्शनिक जिद्दू कृष्णमूर्ति के शिक्षा-दर्शन पर आधारित स्कूलों का संचालन करती है। KFI भारत में कुल छह स्कूल संचालित करती है, जिनमें राजघाट बेसेंट स्कूल बनारस भी शामिल है।
स्कूल की यादें
हमारा स्कूल और हॉस्टल गंगा के ठीक किनारे पर बना था। शुरू शुरू मुझे घर की याद आती, पर धीरे-धीरे मन यहां रह गया। आज मैं अपने अंदर के इंसान और संवेदनाओ को अगर थोड़ा – बहुत भी बचा और रचा रखा है तो इसमें मेरे इस स्कूल के वातावरण और वहां के शिक्षकों का योगदान है। इस स्कूल ने मुझे किताबी ज्ञान के साथ ही मानवीय बोध भी सीखाए।
दर्शन और जीवन की जो बातें मैंने इस स्कूल से सीखी वह आज हिम्मत बन हर विकट लम्हों में मुझे डटे रहने का जज्बा देता है।
दस साल तक इस स्कूल में पढ़ाई की फिर आगे की पढ़ाई के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय चला गया। डीयू से स्नातक किया। फिर गाजियाबाद से MBA।
लौट आया पटना
पटना लौटा और बजाज इलेक्ट्रिकल्स, और गोदरेज कंपनियों में नौकरी कर ली। पिताजी विरेंद्र कुमार इलेक्ट्रिक इंजीनियर थे। माता रंजना सिंह जी गृहिणी थीं। पिताजी का एक बिजनेस भी था। पटना के कंकड़बाग में हमारा Electronic showroom: Heavens के नाम से था।
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पटना में शुरुआती काम के दौरान ही समाचार पत्रों को देखकर मन में एक आकर्षण होता। लगता काश मैं भी यहां कुछ लिख पाता। तब के जमाने में अखबारों का जबर्दस्त क्रेज था। लोग सुबह का काम तब तक शुरू न करते जबतक अखबार की हेडलाइन पर नजर न जमा लें। घर, दफ्तर, दुकान हर जगह अखबारों की दस्तक रहती।
अखबार के समाचार, कहानियां मुझे प्रभावित करने लगी। बाइलाइन खबरें देख सोचता काश मेरे नाम से भी खबरें छपती।
तब घर में हिन्दूस्तान टाइम्स आता था। मैं मन ही मन खबरें बनाता, हेडलाइन गढ़ता।
इन सब के कुछ दिनों बाद मैं फ्रीलांसर के तौर पर हिन्दूस्तान टाइम्स से जुड़ गया। मार्केटिंग के काम से जो समय बजता उसमें कुछ स्थानीय इवेंट की खबरें लिख भेजता। ये छपने भी लगी। खुद की लिखी खबरें जब अखबार में पहली बार छपकर आई तो यकीन ही नहीं हुआ। मैं बार बार उस पन्नें को पढ़ता, उसे देखता, उसे छूता। मैंने वह पेज भी सुरक्षित रख लिया था। खैर मार्केटिंग वाली नौकरी भी चलती रही और इस तरह से लिखना – छपना भी चलता रहा।
एचटी का सप्लीमेंट और मेरी अखबार की नौकरी
बात सन 99 की है। हिन्दुस्तान टाइम्स ने पटना से अखबार का एक नया सप्लीमेंट पेज शुरू करने की योजना बनाई। नाम रखा गया पटना टाइम्स। इसमें विशेष कर कला और संस्कृति की खबरें प्रमुखता से छपनी थी। इसके लिए नियुक्ति होने लगी। पटना हिन्दुस्तान टाइम्स में उस वक्त चीफ रिपोर्टर रहे मैमन मैथ्यू जी ने मुझे कहा तुम इसमें अप्लाई कर दो। तुम्हारा सलेक्शन संभव है हो जाएगा ।
मैमन मैथ्यू जी मुझे काफी मानते भी रहे थे। मैं उन्हें पत्रकारिता का गुरू भी मानता हूं। उन्होंने मेरी लेखनी को निखारा। मेरी कापी दुरूस्त की। बाद के दौर में मैमन साहब एडिटर भी बनें
खैर, अब फैसला मुझे लेना था। दिल तो अखबार की नौकरी के लिए बेताब बना बैठा था पर दिमाग इस गणित में उलझा था कि मैं जिस जगह नौकरी कर रहा था। वहां से यहां की तनख्वाह आधी थी।
फिर मां -पिताजी से ली सलाह
मन से लगता अखबार की नौकरी कर लूं। यहां अलग सम्मान दिखता। समाज से जुड़ाव दिखता।
फिर कम तनख्वाह का हिसाब लगाता। दिल और दिमाग के इस उधेड़बुन में काफी परेशान रहा फिर सोचा पिताजी से राय ले लूं। मां से यह बात बताई तो उन्होंने कहा आधी सैलरी पर क्यों यहां ज्वाइन करना। फिर हिम्मत कर पिताजी के पास गया। उनसे यह बात बताई। पिताजी ने कहा ‘आप अपना मन बताएं ‘
मैंने कहा मन तो अखबार जाने का है भले तन्खवाह कम है लेकिन प्रतिष्ठा ज्यादा है। फिर अपना फेमिली बिजनेस तो है हीं। पिताजी ने सहमति दे दी।
वो H T का दौर
मुझे हिन्दूस्तान टाइम्स में नौकरी मिल गई। पटना टाइम्स के फीचर पेज से शुरू हुआ सफर स्कूप खबरों तक पहुंच गया। मैं कई विभागों की खबरें कवर करने लगा। हिन्दुस्तान टाइम्स के पांच साल के सफर में पत्रकारिता में काफी कुछ सीखा, समझा। संपादक चंद्रकांत नायडू, संपादक एन . आर मोहंती, और मैथ्यू सर ने मुझे तराशा। मैंने यहां कई महत्वपूर्ण खबरें निकालीं। खुब बाइलाइन भी मिलें। सहकर्मियों का सहयोग मिला । पत्रकारिता के लिहाज से हिन्दूस्तान टाइम्स मेरे लिए स्कूल भी रहा और यूनिवर्सिटी भी।
कुत्तों का भय , हाथ में ईंटें लेकर घर लौटना
अखबार की रिपोर्टिंग में दिन के साथ रात को भी काम करना पड़ता। दफ्तर जाकर खबरें लिखनी होती। तब संचार के साधन भी इतने सुगम नहीं थे। न सोशल मीडिया न व्हाट्सएप ग्रुप। मुझे काम कर लौटने में देर रात हो जाती। सड़कें भी अमूमन खाली ।
ऐसे में मुझे सड़क के कुत्ते अपना घोर दुश्मन मान लेते। उन्हें पूरे विश्वास से लगता इस देर रात्रि में लौटने वाला अच्छा आदमी तो हरगिज़ नहीं हो सकता।
भाउ -भाउ के राग के साथ, वे आसपास के कुत्तों को भी सजग कर मोर्चा बना लेते और मुझे खदेड़ने का उपक्रम शुरू कर देते।
भाई रविकर के साथ प्रभाकर कुमार
मैं भी इन कुत्तों के इलाका प्रारंभ होने से पहले संभावित युद्ध के लिए ईंट – पत्थर के टुकड़ों से लैस हो जाता। फिर कुछ दूर बढ़ते ही युद्ध शुरू।
मैं दौड़ा रहे कुत्तों पर निशाना साध ऐसे ईंट के टुकड़े फेंकता मानो , देश की सरहद से दुश्मन देश पर बम के गोले फेंक रहा हूं।
ज्यादातर बार अपने भाई रविकर कुमार को भी बुला लेता। कुत्तों को पराजित कर हम दोनों भाई सीना चौड़ा कर अर्ध रात्रि में घर पहुंचते।
Suzuki Samurai खरीदने के लिए सत्याग्रह
मैं पापा के बजाज क्लासिक स्कूटर से हिन्दुस्तान टाइम्स के दफ्तर जाता। उन दिनों स्कूटर की सवारी संभ्रांत लोगों की सवारी मानी जाती थी। बाइक के तौर पर बुलेट और राजदूत भी सड़कों पर जलवा बिखेरती होंडा के साथ हीरो होंडा के हीरो होंडा CD100 आगमन हो चुका था। यामाहा RX100,बजाज बॉक्सर
उसी वक्त सुजुकी ने Samurai नामक बाइक उतारी थी। मेरा मन बाइक लेने का था मैं यामाहा RX100 लेना चाहता था।
मेरे मन में भी इस बाइक को अपना बनाने की चाहत थी। स्कूटर की सवारी युवा अवस्था में बोझिल सी लगती। मैंने तन्खवाह से पैसे जोड़े, पर घर में स्कूटर के साथ बाइक के शुभ प्रवेश के लिए पिताजी की अनुमति जरूरी थी। उनसे डरते डरते निवेदन किया कि मुझे बाइक खरीदनी है। पिताजी ने एक ही झटके में नकार दिया। उन्होंने कहा स्कूटर में क्या दिक्कत है। मैं भारी मन से अपने कमरे में लौटा।
अदद बाइक के लिए मैंने गांधी जी का मार्ग अपनाया । मैं आन्न जल का त्याग कर , मुंह फुलाए बाबूजी के निर्णय का विरोध अपने भोजन छोड़ सत्याग्रह से करने लगा।
मां के माध्यम से मेरे इस भूख हड़ताल की खबर बाबूजी तक पहुंची। पहले वे ना पर कायम रहे । वे मेरे पास आए और कहा कि बाइक तो हरगिज़ नहीं खरीदी जाएगी। मैं अपनी भूख हड़ताल पर डटा रहा।
तब घर में मैराथन बैठकों के दौर के उपरांत यह नतीजा निकला कि यमाहा और होंडा में खतरा ज्यादा है, उन दिनों बाइक लूट की वारदातें होती थी, पिताजी ने बाइक खरीदने की सहमति तो दी पर बाइक Suzuki Samurai ख़रीदनी थी क्योंकि यह टू स्ट्रोक इंजन पर आधारित था और इसकी लूट नहीं होती थी। मैंने भी बीच का रास्ता निकलता देख अपनी सहमति दे दी।
मैंने अपने सपनों की बाइक खरीदी, फूलों की माला पहना इसका स्वागत किया गया। अब यह मेरी नई सवारी थी जो स्टाइल के साथ मेरे सफर का साथ निभा रही थी। अभी बाइक की दस्तक घर में हुई ही थी कि पिताजी ने उसका निरीक्षण किया और मुझे इसमें डिक्की लगावाने का हुक्म दिया। मुझे बाइक में डिक्की तनिक भी पसंद नहीं थी । इससे मुझे लगता कि बाइक स्टाइलिश नहीं लगेगी। जब पिताजी की ज़िद तेज हो गई तो फिर मैंने डिक्की का विकल्प तलाश एक बैग बाइक में लटकवा लिया।
हिन्दुस्तान टाइम्स का दफ्तर
और कार से दफ्तर जाने लगा
कुत्तों से हर रात युद्ध करते करते मन तक सा गया था। रोज रात दफ्तर से घर लौटते से पहले भौंकते आवारा कुत्तों की तस्वीरें दिमाग पर छाने लगती। एक रोज पिताजी से मैंने कुत्तों के आतंक की चर्चा की तब उन्होंने कहा कि तुम कार लेकर जाया करो। उन दिनों पापा के पास फिएट कार थी। मैं फिएट कार लेकर दफ्तर जाने लगा। उस वक्त कार की भीड़ इतनी नहीं बढ़ी थी। हिन्दुस्तान टाइम्स के पार्किंग एरिया में तब दो ही कार लगती थी। एक वाई सी अग्रवाल जो युनिट हेड थे दूसरे गिरीश मिश्रा जो संपादक थे। अब उस पार्किंग एरिया में तीसरी कार भी लगने लगी थी, वह मेरी थी।
मुझे कार से गए दो दिन रोज ही हुए होंगे कि मुझे संपादक महोदय का संदेशा मिला कि सर बुला रहे। मैं उनके चेम्बर में दाखिल हुआ तो उन्होंने कहा अच्छा तो तुम ही हो जो कार से दफ्तर आते हो और तुम्हारी गाड़ी हीं बाहर लगी रहती है। मैंने सर झुका कर हामी भरते हुए कहा कि सर बाइक या पैदल कुत्ते दौड़ाते हैं। कार में सुरक्षा रहती है। उन्होंने कहा हां ये तो ठीक बात है।
वो काले दिन : मां बाबूजी की सड़क दुर्घटना
बात 22 नवंबर 2003 की है। शाम में मैं हिन्दुस्तान टाइम्स के दफ्तर में बैठा खबरें लिख रहा था। तभी वहां खबर आई की पटना के ए एन कालेज के पास एक सड़क दुर्घटना हुई है और उसमें दंपति घायल हैं। मेरे दूसरे सहयोगी ने खबर नोट किया। मैं अपने काम में था, मुझे इस काले वक्त का तनिक भी आभास नहीं था। उन दिनों मैं अपना मोबाइल फोन भी दफ्तर में पहुंच कर स्विचऑफ कर देता था।
पापा को कहीं जाना होता था तो वे कार से जाते थे। मुझे यह भी ध्यान नहीं रहा कि मैं आज हीं कार को गैरेज में देकर आया हूं। थोड़ी देर बात थाना से फोन आया कि दुर्घटनाग्रस्त स्कूटर पर हिन्दूस्तान टाइम्स का स्टीकर लगा है और उसका यह नंबर है।
अब मौजूद सभी लोगों से पूछा गया कि ये नंबर किसके स्कूटर का है। तब मैंने ध्यान दिया अरे यह तो मेरा स्कूटर है..।
उधर भाई के मोबाइल फोन पर भी पिताजी के जेब से मिले कागज़ पर छोटे भाई का नंबर लिखा था। एक राहगीर ने उन्हें फोन कर सूचना दी। पहले तो अनजान फोन को भाई ने रिसीव नहीं किया। फिर दुबारा फोन आने पर बात पता चली। भाई ने दफ्तर के बेस फोन पर फोन कर मुझे सूचित किया। मेरे पांव तले जमीन हीं खिसक चुकी थी।
पहले पिताजी और माताजी को पाटलिपुत्र के पास सहयोग अस्पताल ले जाया गया। फिर पीएमसीएच के इमरजेंसी में ।
हम अस्पताल पहुंचे। मां- पिताजी वहां भर्ती थे। स्थिति नाजूक थी। हम उन्हें पीएमसीएच वहां से लेकर मगध अस्पताल पहुंचे। जैसे जैसे यह बात पत्रकारों को पता चली अस्पताल में भीड़ जुटने लगी। डॉ दीपक प्रसाद जो उस वक्त पटना के डीएम थे वे पहुंचे। डॉ दीपक प्रसाद दो दिनों तक अस्पताल में ही रूक मुझे हौसला देते रहे ।
पत्रकार मित्रों का आना जाना लगा रहा। डॉ दीपक प्रसाद जी के इस एहसान का बदला मैं कभी नहीं चुका पाऊंगा। वो उस बुरे वक्त में ढाल बनकर खड़े रहे।
तमाम कोशिशों के बाद भी हम मां पापा को बचा नहीं सकें। नियति के सामने हम सब सब बौने हैं। यह जीवन की सबसे दुखद घड़ी थीं। पहले पिताजी हमें अकेला छोड़ गए फिर तीन दिन बाद मां की सांसें थम गयी।
पिताजी जीवन में परंपरागत तरह के लकड़ी वाले शवदाह की बात कहते थे।
होनी देखिए न चाहते हुए भी हमें पिताजी का अंतिम संस्कार बिजली वाले शवदाह गृह में करना पड़ा। वजह मां आईसीयू में जिंदगी और मौत से पर पर जुझ रही थी और हम मां को बचाने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते थे।
हम दोनों भाई चुपचाप मां पिताजी की मृत शरीर के पास खड़े उन्हें देखते रहे और आंखों से आंसूओं का शैलाव बहता रहता। फिर पापा के निधन के तीसरे दिन मां परलोक चलीं गईं। फिर उनके अंतिम संस्कार की प्रक्रिया हुई। इस दुःख की घड़ी में कई लोग हिम्मत बन डटे रहे। कुमार अरूणोदय ने अपने स्कूल के कर्मियों का ब्लड ग्रुप चेक करवा रक्त दान के लिए अस्पताल भिजवाया। वे पटना आने के बाद श्राद्ध कर्म में खुद डटे रहे।
हम अनाथ हो चुके थे
मैं मौन हुआ नीयती के इस क्रुर खेल को देख रहा था। अंतिम संस्कार और श्राद्ध की प्रक्रिया के उपरांत, नाते रिश्तेदारों भी धीरे-धीरे घर से जाने लगे। हमारे घर अब कोई चूल्हा जलाने वाला भी नहीं बचा था।
बहनों का प्यार
बहनों का योगदान
ऐसे में हमारी चचेरी और मौसेरी बहनें आगे आई। मेरी मौसेरी बहन एक साल हमारे घर में रहीं। हमें मां का प्यार दिया। हमारा ख्याल रखा।
सिंगापुर में परिवार के सदस्यों के साथ
मैं उनके प्रति कृतघ्न हूं। यह ऐसा उपकार है जिसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है कहा नहीं जा सकता। अब हम चार लोग घर में थे दो बहनें, हम दो भाई और एक छोटा नौकर रामू।
राजदीप सरदेसाई से अनोखी मुलाकात
हिन्दुस्तान टाइम्स में मैंने खबरों से अपनी पहचान बनाई थी। कई बाइलाइन खबरें दिल्ली एडिशन में भी छपती थी। एक दिन राजदीप सरदेसाई जी का फोन आया। उन्होंने कहा मैं एक हफ्ते बाद पटना आ रहा हूं तुम आकर मुझसे मिलो। राजदीप के पटना आने पर मैं उनसे मिलने मोर्या होटल गया। बातचीत हुई। वे चाहते थे कि मैं एनडीटीवी ज्वाइन कर लूं । मेरे लिए भी यह बेहतर मौका था।
यह इंटरव्यू इस मायने में भी दिलचस्प था कि जब मैं राजदीप सरदेसाई जी से मिलने होटल के कमरे में गया तो वो तुरंत नहाकर निकले थे और बदन पर सिर्फ तौलिया लपेटे थे।तौलिया लपेटे ही उन्होंने मेरा इंटरव्यू लिया।
उन्होंने मुझे दिल्ली बुलाया। कहा एक बार आपको डॉक्टर राय ( प्रणव रॉय ) से मिलना होगा।
दिल्ली में ट्रेनिंग वाले दिन
मैं दिल्ली आया। प्रणव राय और राधिका राय जी से मुलाकात हुई। उन्होंने कहा तुम ज्वाइन कर लो। मुझे बिहार के लिए नियुक्त कर लिया गया। पटना मेरा दफ्तर था। इससे पहले मुझे ट्रेनिंग के लिए एनडीटीवी के गेस्ट हाउस में ठहराया गया। मेरी ट्रेनिंग शुरू हो गई। मैं टीम के साथ जाता। ज्यादातर वक्त राजदीप सरदेसाई होते वे संसद भवन चले जाते, मैं विजय चौक पर , जहां सारे चैनलों की ओवी वैन लगती वहां प्रेक्टिस करता। कैमरा मैन को मुझे कैमरे की प्रेक्टिस कराने की जिम्मेदारी दी गई थी। वहां बाकी चैनलों के कैमरा मैन भी मुझे कैमरे में बोलने और पीटीसी का अभ्यास कराते। मैं कक्षा के सबसे आज्ञाकारी छात्र की तरह सबकी बातें मानते हुए खुब प्रेक्टिस तो करता पर रिजल्ट कभी पास मार्क्स तक नहीं पहुंच पाता।
तुमसे न हो पाएगा
मैं विजय की कामना के साथ विजय चौक पर कैमरे को देख देख, प्रेक्टिस करता। लंच ब्रेक में राजदीप आते और मुझे आंध्र भवन ले जाते हम वहां लंच में मछली चावल खाते। शाम में न्यूज रुम में मेरी अग्नि परीक्षा होती। दिन भर की पीटीसी का टेप वीटीआर में लगा राजदीप देखते और चेहरा बिदका कर कहते नो, नो, तुमसे न हो पाएगा।
निधि कुलपति की टिप्स का जादू
मैं लगभग हर रोज न्यूज रूम में राजदीप सरदेसाई जी से डांट सुनता। एक रोज नियत रूटिन की तरह मेरा टेप देखकर राजदीप सरदेसाई मुझे फटकार लगा रहे थे। तभी पीछे से एक महिला ने मुझे बुलाया। वह निधि कुलपति थीं।
वो मुझसे बोलीं मैं तीन दिन से देख रही हूं तुम रोज डांट सुनते हो। मैं तुम्हें एक ट्रीक बताती हूं
हम सब ने शुरू में यही किया है। तुम जहां भी रह रहे हो। कमरा बंद कर सीसे के सामने पीटीसी करने की प्रेक्टिस करो। इससे पीटीसी ठीक हो जाएगी। मैंने गेस्टहाऊस पहुंच कर यह शुरू कर दिया। अगले दो चार दिनों में मेरी पीटीसी को सराहा जाने लगा।
NDTV और बिहार में रिपोर्टिंग
डेढ़ महीने की ट्रेनिंग के बाद मैं पटना आ गया और यहां काम करना शुरू कर दिया। मेहनत की और कई अहम खबरों को ब्रेक किया। अच्छी सॉफ्ट स्टोरी भी की। इसके कुछ साल बाद CNN- IBN को लांच करने की तैयारी में राजदीप सरदेसाई जुड़े। उन्होंने मुझे वहां बुलाया। दिल्ली में फिर से ट्रेनिंग हुई। उस दौरान चैनल की काफी चीजें तय हो रही थी। वैसे में मुझे काफी कुछ सीखने को मिला।
Ibn खबरों के लिहाज से काफी बेहतर रहा। उस वक्त साफ्ट स्टोरी पर काफी जोर दिया जाता। हम बिहार झारखंड जाते और ग्राउंड रिपोर्ट करते। बाद में आईबीएन न्यूज 18 का हिस्सा हो गया। इस वक्त मुझे इसके बिहार -झारखंड चैनल की भी जिम्मेदारी दी गई। इसके बाद फिर से एक बार एनडीटीवी से जुड़कर काम करने का मौका मिला है। यह दुबारा पुराने घर लौटने जैसा है।
देश के चर्चित पत्रकार Rahul Kanwal के साथ
Rahul Kanwal के साथ काम करना दिलचस्प
एनडीटीवी की दूसरी पारी में जाने जाने प्रत्रकार Rahul Kanwal जी के साथ काम करने का अनुभव काफी उम्दा और दिलचस्प है।राहुल कँवल टीवी के दुनिया के जाने माने चेहरे है और अभी NDTV की कमान उनके हाथ में है । इनके नेतृत्व में एनडीटीवी प्रगति की नई परिभाषा लिख रहा है।
राहुल जी के शो में संतुलित और तथ्य आधारित चर्चा की शैली शो को खास बनाती है।
युवा पत्रकारों के लिए उनकी ग्राउंड रिपोर्ट का अंदाज और उनका सरल व्यवहार सीखने योग्य है।
जब लालू ने कर दी राजदीप से शिकायत
एक बार मैं राजदीप सरदेसाई जी के साथ लालू जी के पास गया। लालू ने राजदीप सरदेसाई से मेरी शिकायत करते हुए कहा कि ये हमारी निगेटिव खबरें खोज खोज कर चलाते हैं। फिर हम नीतीश कुमार जी के यहां गए उनकी भी शिकायत यह रही कि मैं उनके विरोधी खबरें ज्यादा चलाता हूं। बाहर आने पर राजदीप सरदेसाई ने मुझे शाबाशी देते हुए कहा तुम सही पत्रकारिता कर रहे हों।
पत्नी का हर कदम पर साथ
जीवन के हर उतार चढ़ाव में मेरी जीवन साथी…ने मेरा साथ दिया। मैं ऐसे पेशे में हूं कि घर के लिए समय देना मुश्किल होता है ऐसे में घर को संभालने, बच्चों की परवरिश और पढाई के ख्याल के साथ साथ उसने मुझे भी संभाले रखा है।
साथ जीवन साथी का
वह हर कमजोर लम्हों में मुझे हौसला देती रहीं हैं। चाहे वो जायका हो या फिर जिंदगी सब में स्वाद भरना …. को अच्छे से आता है। मैं ईश्वर का शुक्रिया अदा करता हूं कि मुझे ऐसी जीवन साथी मिली। वो घर के साथ साथ एक रेस्तरां का व्यवसाय भी संभालती है।
बच्चों ने फिर लौटाया बचपन
मेरे बच्चों में मुझे अपना बचपन लौटा हुआ दिखता है।
बेटा Suryaansh singh और बेटी Manashwani singh पढ़ाई कर रहे हैं।
मैं चाहता हूं मेरे बच्चे नेकी और इंसानियत के रास्ते पर चले। खुद की आत्मा की आवाज हमेशा सुनें और सब लोगों की परवाह करें।
तमन्ना अंदर के आदमी को बचाएं रखने की
आज वक्त तेजी से बदल रहा है। हम एआई के जमाने में आ गए हैं.
ऐसे में बीतते वक्त और जीवन के गुजरते बसंत के बीच, एक ही तम्मन्ना है कि मैं अपने अंदर के आदमी को बचाएं रखूं।
आज भी हर रोज मदद के लिए मेरे पास बहुत सारे फोन आते हैं जहां तक संभव होता है मैं मदद करने की कोशिश करता हूं।
जिस पेशे में हूं उससे आम लोगों का जितना भला हो पाएं करने की कोशिश करता हूं।
यह तो कठोर सच है कि एक न एक दिन जाना सभी को है जाने से पहले समाज के लिए कुछ कर के जाने की चाहत है। चाहत वैसे समाज के निर्माण में योगदान की है जो धर्म जाति से इतर सबकी खुशी चाहता हो । कवि नीरज के शब्दों में कहूं तो
अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए, जिस में इंसान को इंसान बनाया जाए”
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