मृत्यु के शोक और मसान में जलती चिता के पास एक साधक सालों से अपनी साधना में लीन हैं।यह कोई तंत्र साधक नहीं, न तंत्र साधना हो रही है। यह ज्ञान की साधना है। विद्या की साधना और यह साधक है युवा सुमित कुमार।
सुमित यहां चला रहे हैं उन बच्चों के लिए अनोखा स्कूल जो कभी मसान से फल और पैसा चुनते थे।आज कहानी अप्पन पाठशाला की….
शाम का वक्त है, हम बिहार की स्मार्ट सिटी मुजफ्फरपुर के सिकंदरपुर स्थित चमचमाते मरीन ड्राइव से गुजर रहे हैं। थोड़ा आगे बढ़ने पर मुक्तिधाम का गेट दिखाई दिखता है।शहर का सबसे प्रमुख श्मशान घाट। हमारे कानों में घंटे की आवाज के साथ’राम नाम सत्य है ‘का एक स्वर सुनाई देता है । जीवन की नश्वरता और ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार करने का स्वर, जो शायद अंतिम यात्रा और मुक्तिधाम जैसी जगहों पर ही स्वीकार्य होता है। हम मुक्तिधाम पहुंच चुके हैं थोड़ी दूर पर ढलते सूरज की परछाई में चिंता की लपटें उठ रहीं हैं, आसमान में धूंए का गुब्बारा। मेरे मन में कबीर की पंक्ति अनायास उभरने लगती है
“सांस सांस सब सांस है,सांस बिना सब सून,
कबीर सांस न कीजिए, सांस जाएगा तीन “
जीवन की इस अंतिम पड़ाव वाले स्थल पर एक और आवाज हमें सुनाई दे रही है ‘क’ से कलम ‘ख’ से खरगोश। बच्चों का एक झुंड और उन्हें पढ़ाते युवा। यह मुक्ति धाम में चलने वाली पाठशाला है। अप्पन पाठशाला। ‘अप्पन’ बज्जिका का एक शब्द है जिसका मतलब ‘अपना’ होता है।

हम थोड़ी देर यही खड़े हो पढ़ाई में रहें बच्चों को देखते हैं। बच्चे’ ग ‘ से ‘गमला’ ‘ घ’ से घर पढ़ रहे हैं । पास फैले मृत्यु के शोक के इन बच्चों की आंखों में जीवन के सपने हैं। सृजन के सपने हैं।
हमारी मुलाकात इस पाठशाला के संस्थापक सुमित कुमार से होती है।
सुमित बताते हैं कि मैं एक दिन परिचित की अंतिम यात्रा में यहां आया था। इस दौरान कुछ बच्चों पर नजर पड़ी जो यहां से मिठाई, पैसा, कपड़े आदि चुन रहे थे। मुझे यह दृश्य बड़ा विचलित कर गया। सोचा यह कैसी विडम्बना है कि आज भी हमारे बच्चे इस तरह से जीने को मजबूर हैं। फिर कुछ दिन तक इन बच्चों की दिनचर्या देखी और फिर शुरू की एक कोशिश इन्हें पढ़ाने की 8 बच्चों के साथ शुरू हुआ हमारे इस अप्पन पाठशाला में अब 140 बच्चे हैं। इनमें से 110 नियमित आते हैं। शाम ढलती जा रही थी, चिंता की लपटें और तेज हो आई थी, इधर हमारे मन में इस अनोखे स्कूल को लेकर जिज्ञासा भी बढ़ रही थी। हमने वहां कुछ बच्चों से बातचीत की।

नन्ही आंखें में हैं बड़े-बड़े सपने
सबमें अनूठा आत्मविश्वास। सबके अपने सपने । कोई डॉक्टर बनना चाहता है तो कोई जज। किसी को फिल्मी दुनिया में जा नाम कमाना है तो कोई शिक्षक बन शिक्षा की रौशनी बटना चाहता है।हम सुमित कुमार से फिर मुखातिब होते हैं। सुमित कहते हैं। यह सब आसान नहीं था।
पहले न बच्चे पढ़ने के लिए तैयार थे न उनके अभिभावक इन्हें भेजने के लिए। वो कहते पढ़कर क्या होगा?
ऐसे तो मेरा बच्चा दो पैसा कमाकर लाएगा। मैं और मेरे दोस्त ने इन लोगों को बहुत समझाया। फिर किसी तरह ये तैयार हुए।
इस पाठशाला की शुरुआत मार्च 2017 में की। तब से लगातार यह चल रहा है।पाठशाला का नाम अप्पन इसलिए रखा गया ताकि बच्चों को अपना लगे।

जब पाठशाला की शुरुआत हुई तब धीरे-धीरे बच्चों को बैठने का आदत लगाई ,फिर पढ़ना शुरू किया। जब पाठशाला में बच्चे नियमित आने लगे तो फिर चिंता यह हुई कि इनका नामांकन कहां हो। मैंने पहल कर बगल के सरकारी स्कूल में नामांकन कराने के लिए बच्चों और बच्चों के अभिभावकों को मैंने प्रेरित किया। अब हर साल लगभग 35- 40 बच्चों का बगल के सरकारी प्राथमिक विद्यालय ,मध्य विद्यालय और उच्च विद्यालय में नामांकन हम लोग कराते हैं। इन 8 सालों में लगभग 300 से अधिक बच्चों का नामांकन बगल के सरकारी के विद्यालयों में कराया गया है।

कक्षा एक से ग्यारहवीं तक के बच्चे
सुमित आगे बताते हैं कि अप्पन पाठशाला में
कक्षा एक से लेकर 11वीं तक के छात्र-छात्राएं पढ़ते हैं। उन्होंने यहां पढ़ने वाले बच्चों को उनके माता-पिता के कार्य शैली के आधार पर चार वर्गों में बांटा गया है
1. वह बच्चे जो पहले मुक्तिधाम में पार्थिव शरीर से फल पैसा या अन्य वस्तुएं उठाते हैं
2. वैसे बच्चे जिनकी मां घरों में चौक बर्तन की काम करती है
3. वह बच्चे जो कचरा चुनने का काम करते थे
4. आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े बच्चे ।
खुद की कमाई का एक हिस्सा यहां खर्च
इन सभी बच्चों के लिए ड्रेस, बैग ,कॉपी ,किताब ,पेंसिल ,रबर कटर, बैठने के लिए आसनी और ठंड में स्वेटर ,कंबल का व्यवस्था सुमित खुद करते हैं। जब हमने उनसे यह पूछा कि इसके लिए पैसे कहां से आते हैं तो सुमित कहते हैं, मैं इसके लिए अलग काम करता हूं। मेरा कंसल्टेंसी का काम है इससे हुई आमदनी का 90 फीसदी हिस्सा मैं यहां खर्च करता हूं। कभी कभी कुछ लोग आर्थिक मदद करते हैं।

वुशु का प्रशिक्षण भी ले रहे यहां के बच्चे
इस अप्पन पाठशाला के बच्चे आत्मरक्षा के लिए वुशु( मार्शल आर्ट ) का प्रशिक्षण ले रहे हैं । इनमें ज्यादातर लड़कियां शामिल हैं।सुमित कहते हैं कि इस प्रशिक्षण का उद्देश्य महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराधों को ध्यान में रखते हुए किया गया है, वे स्वयं की रक्षा में समर्थ हो सकें तथा वे शारीरिक एवं मानसिक रूप से सशक्त बनें और दूसरे को जागरूक करें और सिखाएं ।
एक छात्र अपने घर के आस-पास कम से कम 10-10 बच्चों यह को सिखाएंगे और यह प्रक्रिया लगातार चलती रहेगी। यह प्रशिक्षण फिलहाल सप्ताह में दो दिन पाठशाला चल रहा है इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में दो मुख्य शिक्षक सुनील कुमार और अजीत सिंह के
सहयोग किया जा रहा है।

ऑर्गेनिक फॉर्मिंग भी यहां सीख रहे
सुमित कुमार कहते हैं कि अप्पन पाठशाला में पढ़ने वाले बच्चों को पढ़ाई के साथ-साथ ऑर्गेनिक फॉर्मिंग भी सिखाई जा रही है. बच्चे पढ़ाई के साथ-साथ जैविक खेती का व्यवहारिक ज्ञान सीख रहे हैं.
जिससे आने वाले भविष्य में ये स्वावलंबी बन सके । ये बच्चे आने वाले समय में किसानों को जैविक खेती के लिए भी जागरूक करेंगे।
सुंदर होगा समाज
सुमित का मानना है कि ये बच्चे हम यहां इन्हें बस किताबी ज्ञान ही नहीं देते, इन्हें बेहतर इंसान बनने की प्रेरणा भी देते है। इनमें से कई वैसे बच्चे थे जो शुरू में नशे की चपेट में थे। अब वो नशामुक्ति का अलख जगा रहे हैं। पढ़-लिखकर ये खुद की किस्मत तो रौशन करेंगे ही अपने समाज को भी उजियारा प्रदान करेंगे। इससे हमारा समाज सबल होगा।

इस यात्रा में इनका मिला सहयोग
सुमित बताते हैं कि पाठशाला की इस यात्रा में कई लोगों का सहयोग मिला। मेरे माता-पिता ने मुझे हिम्मत दी। मेरे भाई और मेरे मित्र का भी इसमें बड़ा योगदान है। मैं अपने भाई अमित कुमार अपने मित्रों का, मुजफ्फरपुर के पूर्व सांसद अजय निषाद का, मुक्तिधाम प्रबंधन कार्यकारी समिति का और समाज के कुछ प्रबुद्ध लोगों का इस कार्य में सहयोग के लिए शुक्रगुजार हूं।
आर्थिक सहयोग की जरूरत
सुमित आगे कहते हैं कि काफी लोग हमारे प्रयास की सराहना तो करते हैं पर आर्थिक मदद काफी कम लोग करते हैं। मैं खुद की मेहनत से इसे चला तो यह हूं पर इस पाठशाला को और मजबूत करने के लिए हमें आर्थिक सहयोग की जरूरत है। अगर हमें आर्थिक सहयोग मिलेगा तो हम इसे और भी बेहतर ढंग से चला पाएंगे।

शाम ढलती जा रही है। बच्चे पढ़ाई के बाद घर लौट रहे हैं।
बाहर लगा स्ट्रीट लाइट जल उठता है। हम कांधे पर बस्ता लिए धीरे धीरे अपने घर की और लौटते इन बच्चों को निहार रहे हैं।

हम सुमित से विदा लेते हैं। रात हो आई है, पर इस अंधेरे में भी अप्पन पाठशाला की रौशनी, सितारों सा इस मसान में फैली लगती है। रौशनी हमारे मन में भी फ़ैल रही है। हम अप्पन पाठशाला की कहानी, सुमित और बच्चों के विश्वास भरी यादों को समेटे निकल पड़ते हैं। गाड़ी के रेडियो में मुकेश की आवाज में गीत बज रहा है।
“इक दिन बिक जाएगा, माटी के मोल
जग में रह जाएँगे, प्यारे तेरे बोल
दूजे के होंठों को, देकर अपने गीत,
कोई निशानी छोड़, फिर दुनिया से डोल।”
( नोट: thebigpost.com समाज की प्रेरक कहानियों को सामने लाने की पहल है। इस मिशन को मजबूत करने के लिए हमें आपके सहयोग की ज़रूरत है। 📞 आर्थिक मदद के लिए संपर्क करें: 7488413830)



