स्कूल के दौरान ही उस शख्स ने ‘कैमरे ‘ से आशिक़ी कर ली। फोटोग्राफी से मुहब्बत इस कदर कि मतवारे बन उसपर फ़ना हो गए। स्कूल में पढ़ने के साथ स्कूली बच्चों को यूनिफॉर्म में ट्यूशन पढ़ाने लगे। घर छोड़ा। इश्क वाले कैमरे को अपना बनाने के लिए भूखे रह, पैसे जोड़े।
स्ट्रीट फोटोग्राफी कर जिंदगी की चटख तस्वीरें खींची।
खुद डिफोकस कैमरे का फोकस लोगों का जीवन बदलने में लगाया। समाज की रंगीन तस्वीर खिंचने वाले कर्नल सिंह के खुद के जीवन की तस्वीर में हमेशा दर्द फिल्टर चिपकता रहा पर , इस युवा ने हिम्मत नहीं हारी।
सड़क दुर्घटना में पिता का निधन हो गया , घर लौट आए परिवार की जिम्मेदारी संभाली।
आज खुद के स्टूडियो के मालिक हैं, एक शानदार रेस्तरां भी है। वक्त निकाल जरूर पढ़िए जुनूनी ‘फोटोग्राफर ‘ कर्नल सिंह की यह जुनूनी कहानी।
मुझे जीवन अपनी और खींचता है, हमरा ट्रेडिशन हमरा कल्चर, हमारे शहर गांव, और हर एक चेहरा जो आंखों में उम्मीद भर इस कोशिश में जुटा है कि खुशियों के दिन आएंगे जरूर। यह उम्मीद ही तो है जो हमारी सांसों को ताक़त देता है, धड़कनों को आल इज वेल कहना सिखाता है।
मेरी कहानी भी उम्मीद के इसी समंदर में डुबती है, उबरती है, गोते लगाती है। कभी नमकीन आंसू बनकर तो कभी किसी के मुस्कुराहट पर निसार होकर।
इसी उम्र में हीं मैंने बहुत उतार चढ़ाव देखे। लोगों को बदलते देखा, खुद को टूटते , समेटते, संभलते देखा। इन सब के बावजूद मैं आज कह सकता हूं जिंदगी बहुत खुबसूरत है बिल्कुल आपकी मुस्कुराती हुई प्यारी तस्वीरों जैसी।
फोटोग्राफी से मुहब्बत सी हो गई
मेरा पेशा और पैशन दोनों हीं फोटोग्राफी है। बचपन से ही फोटोग्राफी से मुहब्बत सी हो गई थी। फिर मैं फोटोग्राफी पर फना होता गया।
घर के लोगों के तमाम विरोधों के बावजूद फोटोग्राफी मेरे लिए सबकुछ बन गई। खुशी भी , उम्मीद भी, रोजी भी, रोटी भी।
हां इस तमाम संघर्ष के दौर में कई लोग ऐसे मिले जिन्होंने मुझे हिम्मत दी , मुझे टूटने से बचाया। सबका शुक्रगुजार हूं मैं। मेरी दोस्त जो आज मेरी जीवन संगिनी है, क्या कहूं मैं उनके बारे में शब्द ही नही, उन दिनों को याद करता हूं तो है होठ खामोश हो जाते हैं, आंखें चुपचाप बरस पड़ती है…।
खैर, मैं भी कहां भावनाओं के भंवर में फंस जाता हूं। यह जानते हुए कि इमोशनल की आज की दुनिया में कद्र कहां है। सब कुछ जानते समझते हुए भी इमोशन को नहीं छोड़ पाया। न छोड़ पाउंगा कभी। तस्वीरें भी तो इसी लिए खिंचता रहा कि दिल में इमोशन धड़कता रहे।
वो बचपन वाले दिन थे
मेरा जन्म एक साधारण से परिवार में हुआ। पिताजी वकील थे, मां हाउस वाइफ। मैं बचपन में मां को बड़े गौर से खाना बनाते देखता। मैं सातवीं क्लास में था तो मुझे कुकिंग का शौक हो गया। मां से आटा गूंथना सीखता, सब्जियां पकाना सीखता। 9वीं आते आते मैंने खाना बनाना अच्छे से सीख लिया। इतनी की सारे डिश मैं बना लेता था। परिवार के लोगों को भी मेरा बनाया पसंद आता था। इसी वक्त एक और शौक धीरे धीरे मेरे अंदर परवाह चढ़ रहा था। वो था फोटोग्राफी। मैं जब भी कोई दृश्य देखता तो दिमाग में फोटो के रूप में उसकी छवि कैद करने की कोशिश करता। जब दसवीं में था तो अपने जन्मदिन पर मां से गिफ्ट के तौर पर एक कैमरे वाला मोबाइल फोन लिया। कोई 2000 रुपए के आस पास की। फोन सिर्फ इसलिए की उसमें मुझे कैमरा मिल गया। फिर मैं अपनी कल्पनाओं की तस्वीरें आस- पास ढूंढ कर उसे कमरे में कैद कर लेता। मुझे यह अजीब सा सुकून देता था।
जब टीचर तक पहुंची यह बात
मेरे स्कूल में अंग्रेजी के एक शिक्षक थे रंजय सेन गुप्ता। मैं उन्हें अपनी खींची तस्वीरें दिखाता, वो देखते और मुझमें हौसला भरते।
धीरे -धीरे यह बात मेरे घर वालों को भी पता चल गई कि मेरी संगत किताबों से ज्यादा इन दिनों फोटोग्राफी से हो गई है। फिर डांट के साथ हिदायत दी गई की इन सब को छोड़ पढ़ाई में मन लगाओ। मैं इन हिदायतों को दिल से लगाए बिना ही कान से निकाल, मोबाइल कैमरे के साथ तस्वीरें लेने निकल जाता। धीरे धीरे सख्ती बढ़ने लगी।
पिताजी को लगता फालतू काम
पिताजी को मेरे इस फोटोग्राफी का जुनून तनिक भी नहीं भाता। अब हम दोनों पिता- पुत्र फोटोग्राफी के मसले पर आर-पार के मुड़ में चल रहे थे। पिताजी को यह सब फालतू का काम लगता, वो चाहते मैं एकेडमिक मजबूत रहूं। मुझे किताबों से ज्यादा तस्वीरों की पढ़ाई में मजा आता। मुझे लगता इसमें भी तो भविष्य की बुलंदी गढ़ी जा सकती है। बात इतनी बढ़ी की घर की चारदीवारी से निकल मेरे स्कूल के शिक्षक रंजय सर तक शिकायत बन पहुंच गई।
उनसे कहा गया कि यह बच्चा किताबों के साथ दोस्ती करने की जगह कैमरे के साथ मटरगश्ती कर रहा है। मेरी तो मानों शामत आने वाली थी।
लगा रंजय सर की डांट तो तय है साथ ही यह फोटो – वोटों का भूत भी आज वे उतार ही देंगे। मैं मन ही मन डरा सहमा ईश्वर से प्रार्थना कर रहा था, सब ठीक रहें और भगवान जी ने सब ठीक कर दिया। रंजय सर ने मेरी तारीफ की और कहा यह लड़का ग़लत रास्ते पर नहीं, सही रास्ते पर है। अब मेरा फोटोग्राफर मन और मजबूत हो गया। मैं आस-पास जा लोक जीवन के रंग अपने कैमरे में कैद करता रहता। यह सब मुझे सुकून देता था।
स्कूल की यूनिफॉर्म पहन ट्यूशन देने जाते
कर्नल सिंह कहते हैं कि मैं उस वक्त 11 वीं में पढ़ाई कर रहा था। मन पढ़ाई में कम फोटोग्राफी में ज्यादा लग गया था। मैंने एक कैमरा खरीदने का मन बनाया। कैमरे की कीमत साथ हजार रुपए थी। मुझे मालूम था कि इतने पैसे मुझे घर से नहीं मिलने वाले। मैंने छोटे बच्चों को होम ट्यूशन देना शुरू किया। मैं घर से स्कूल यूनिफॉर्म में निकलता स्कूल के बाद उसी यूनिफॉर्म में बच्चों को ट्यूशन पढाता। ऐसा करके मैं कुछ पैसे कमाने लगा।
कर्नल सिंह की खींची एक तस्वीर
घर पर जब यह बात पता चली तो काफी विरोध हुआ। पिताजी से मार भी पड़ी। मैं भी गुस्से में था। खुद से खुद की तलाश करता। अपना कैमरा अब भी सपना था। मैंने घर में कहा मुझे ‘दिल्ली कॉलेज ऑफ़ फोटोग्राफी ‘ से फोटोग्राफी का कोर्स करना है। घर में लोगों ने समझाया कि अभी दिल्ली नहीं जाना है। मैंने कहा मैं ठीक है मैं पटना में रहूंगा पर फोटोग्राफी नहीं छोड़ूंगा।
ऐसे आया खुद का कैमरा
इसी दौरान एक फोटोग्राफी एजेंसी में मुझे काम मिल गया। मैं उस आफिस में काम करने लगा। घर में जब यह बात पता चली तो फिर हंगामा खड़ा हो गया। मैंने घर छोड़ दिया।
दिन भर उस दफ्तर में काम करता और रात को वहीं बेंच जोड़कर हो जाता। मुझे यहां 6 हजार रुपए पगार मिलने लगी।
दो माह में उसी दफ्तर से पुराना कैमरा खरीदा। मैं दफ्तर में ही रहता। इस एवज में मुझे रोज दफ्तर की सफाई करनी होती। इस दफ्तर में मैंने खुब मेहनत की। पैसे बचाएं और एक पुराना कैमरा इसी आफिस का खरीद लिया। अब मेरे पास खुद का कैमरा था।
इधर मैं मन से काम कर रहा था पर कभी कभी ज्यादा काम करना भी अच्छा नहीं होता। मेरे कुछ सिनियर को मेरा ज्यादा काम करना पसंद नहीं था। ऐसा इसलिए कि उनपर भी काम का दबाव बढ़ता था और मेरा बढ़ता ग्रोथ उन्हें अच्छा नहीं लगता। ऐसे एक रात मेरे एक सिनियर ने मुझे फोन किया कहा तुम काम छोड़ दो। यह सुनकर मेरी आंखों के आगे अंधेरा छा गया। मन को मजबूत किया और काम छोड़ दिया।
शुरू की कंपनी
मैं काफी परेशान था। इसी दौरान 12 वीं का इम्तिहान दिया। फिर सोचा कुछ अपना किया जाए। कई लोग जिनके लिए मैंने फोटोग्राफी की थी उनका फोन आता था। एक स्टूडियो के साथ मिलकर काम शुरू किया। मेहनत यहां भी की। होटलों में घुमा ,काम मांगा। कुछ समय बाद हमारे पास काम था। अब काम तो आ रहा था पैसा भी पर जिनके साथ काम शुरू किया था वो लगातार दबाव बनाने लगे। वे ज्यादा हिस्सा चाहते थे। मैं काफी आहत हुआ। अंत में उन्हें हीं कंपनी दे दी।
दुःख बार बार मेरे हिस्से आता
मैं फिर सब कुछ हार चुका था। सपने टूट चुके थे, मन बोझिल, आंखों के सामने था तो बस अंधेरा। मैंने हिम्मत की पिताजी को फोन किया कहा मुझे दिल्ली जाना है। टिकट कटवा दें। पिताजी ने टिकट करवा दी। मैं दिल्ली आ गया। यहां मून लाइट स्टूडियो में फोटोग्राफी सीखता। रात को देवी जागरण में इवेंट फोटोग्राफी करता। इस दौरान हीं महेश भट्ट जी से मुलाकात हुई। काफी प्रेरक रही यह मुलाकात। बाद में मून लाइट स्टूडियो में मैं पढ़ाने भी लगा। कुछ पैसे जोड़े और फिर ड्रीम आर्ट स्टूडियो शुरू किया।
मन बनारसी होने को बेताब
मेरा मन बार बार बनारस की ओर चला जाता। वह बनारस के रंगों में डूबना चाहता था। मुझे बनारस काफी पसंद था। संकट यह कि बनारस में उस वक्त वेडिंग फोटोग्राफी के लिए मार्केट नहीं था। इन सब के बाद भी मैं बनारस आया। जौनपुर में एक डाक्यूमेंट्री फिल्म की शूटिंग की। 15 दिन जौनपुर में बीता।
मैं वहां एक खाली बिल्डिंग में रहता था। यह बिल्डिंग हॉरर फिल्म की तरह दिखती थी।
किसी तरह 15 दिन बीते। मैं फोटोग्राफी के लिए बनारस रहना चाहता था। यहां जीवन के रंगों को कैमरे के कैनवास पर उतारना चाहता था। अस्सी घाट से लेकर मणिकर्णिका घाट तक, जीवन और मोक्ष के रंग एक साथ आपको बनारस में ही तो दिखते हैं।
पुराने लोगों ने पटना से भेजा बुलावा
इधर पटना के सिनियर लोगों ने मुझसे संपर्क किया। वे चाहते थे कि मैं वापस पटना लौट जाऊं । मैंने उनकी बात मान ली। फिर मैं पटना आ गया। यहां बहुत मेहनत की। DREAM ART STUDIO कंपनी को एक करोड़ के टर्नओवर तक पहुंचाया। 2020 में जन्मदिन पर खुद की कमाई से पहली बाइक ‘ बुलेट ‘ खरीदी।
और मिल गई हमसफर
मेरे सुख दुख से भरी कहानी में मेरी हमसफ़र का जिक्र बेहद जरूरी है। मैं आज जो भी हूं इन सब में उसका योगदान अहम है।
उनसे न सिर्फ मेरे अंदर के की कला को पहचाना बल्कि हर अंधेरे वक्त में मुझे हिम्मत देते हुए मेरे साथ खड़ी रही। जब मेरी आंखें नम होती वो मुझे हंसाती। चुपचाप मेरी खामोश आंखों में रंगीन सपने रख जाती।
वह मुझे यकीन दिलाती कि मैं एक न एक दिन सपनों की दहलीज पर चलते हुए मुकाम जरूर पाऊंगा। हां …अंशिका.नाम है उसका। आज वह मेरी जीवनसाथी है, मेरी पत्नी है। हमारा रिश्ता दोस्ती से शुरू हुआ था। फिर धीरे-धीरे वह प्यार में बदला फिर शादी के रिश्ते में। एक इवेंट में मुलाकात हुई थी उससे। उसे मेरी फोटोग्राफी काफी पसंद आती थी। फोटो पसंद करते करते मुझे भी पसंद करने लगी।
मुझे लगता है वह बिना कहे मुझे जानती थी। समझती थी। मानो मेरी जिंदगी की किताब पढ़ रखी हो उसने।
उस वक्त आंशिक सरकारी नौकरी करती थी और मैं स्ट्रगल। धीरे धीरे मैंने 12 लोगों की टीम बनाई। पहली कार खरीदी। 2023 में हम शादी के बंधन में बंध गए।
फुर्सत के पल: पत्नी और बच्चे के साथ
खींचते तो फोटो ही हो
हमारी शादी में कई अड़चनें आई। अंशिका के घर वाले इस रिश्ते के लिए तैयार नहीं थे। काफी मान मनौव्वल करनी पड़ी। मुझे बार बार सुनाया जाता कि पैसा चाहे जो क्या वो। खींचते तो फोटो ही हों।
कर्नल सिंह की नजर से रेलवे स्टेशन
इधर मैंने पाटर्नरशिप में एक रेस्तरां भी शुरू कर दिया। यहां भी बाद में समस्या आई। मुझे लगता मेरे पार्टनर को इसमें जितना समय देना है वह नहीं दे पाते। फिर हमने बात कि वे अलग हो गए। इधर अब कैफे की जिम्मेदारी भी आ गई। आर्थिक बोझ बढ़ गया। ऐसे में दोस्त संदीप ने मदद की।
सड़क दुर्घटना में पिताजी का निधन
मैं पटना में पैतृक घर से अलग रहता था। पिताजी अब भी नाराज़ थे। उनका सपना था कि मैं सरकारी नौकरी करूं। 2020 में एक रोज पिताजी का निधन हो गया। परिवार के लिए यह बड़ा संकट था। इसी बीच चोरी भी हुई घर में। मेरी जिंदगी एक दिन में बदल गई। मेरे कंधे पर अब परिवार की जिम्मेदारी थी। मां की जिम्मेदारी थी। इधर रेस्तरां बिजनेस से पार्टनर भी हट चुके थे। सब कुछ एक साथ। लगा जिम्मेदारी और आर्थिक बोझ पहाड़ बनकर आ खड़ा हुआ। ऐसे में आंशिक, मैं और भाई अंगद मुस्तैदी से खुद को फौलाद बना डटे रहे।
KOSMICKO CAFA में प्रकृति के पास
Kosmicko कैफे और रेस्तरां को मैंने दिल से बनाया है। यह पटना के पाटलिपुत्र में है। यहां आकर आप इसे महसूस कर सकते हैं। इसे जी सकते हैं।इसका इंटीरियर भी मैंने खुद से डिज़ाइन किया है। यहां आप शांति पा सकते हैं। यह प्रकृति के पास होने का एहसास कराता है। खाने का स्वाद भी आपको लाजबाव मिलेगा और सबकुछ बजट फ्रेंडली भी।
हमने इसका स्लोगन Made With Love दिया है।
अपने परिवार के बाद मैं सबसे ज्यादा प्यार इस रेस्तरां को ही करता हूं।
DREAM ARTS STUDIO में अनोखा सब्सक्रिप्शन मॉडल
कर्नल सिंह कहते हैं। मैं अपने स्टूडियो में सब्सक्रिप्शन मॉडल लाना चाहता हूं । यह बिहार के लिए पहला होगा। इसमें एक बार मेंबर बनकर आप साल में चार सेवाएं मुफ्त ले पाएंगे। वे आगे कहते हैं कि वेडिंग इडस्ट्री आज काफी तेजी से फ़ैल फूल रही है। वेडिंग फोटोग्राफी का क्रेज काफी बढ़ा है। आज हम दिल्ली, लखनऊ, जयपुर , कोलकाता जैसे शहरों में वेडिंग फोटोग्राफी का काम कर रहे। हम अपनी फोटोग्राफी में एक खास ह्यूमन टच देते हैं। यह हमें बाकी से अलग बनाता है।
काम के दबाव में परिवार को कम वक्त
कर्नल सिंह कहते हैं काम के दबाव की वजह से मैं परिवार को काफी कम समय दें पाता हूं। मेरी पत्नी काफी तालमेल बैठाती है। अपने छोटे से बच्चे… से भी कई बार मिले कई दिन गुजर जाते हैं। मैं बस ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि सभी खुश रहें सलामत रहे । मैं दिन रात मेहनत इस लिए कर रहा कि कुछ अच्छा कर सकूं। यह अच्छा मेरे परिवार के लिए, समाज के लिए और देश के लिए हो। मैं उन सब का आभारी भी हूं जो मेरे बुरे दौर में हमेशा मुझे हौसला देते रहे हैं। मैं उनका कर्ज कभी नहीं भूल सकता।
मैं खुब मेहनत कर एक ऐसी तस्वीर बनाना चाहता हूं जिसमें मेरे देश का हर नागरिक तमाम उंच – नीच , जात- पात, अमीरी -गरीबी से बेफिक्र हो खिलखिला हुआ हंस सकें प्यारी सी उन्मुक्त हंसी…।