वह अपने नन्हे-नन्हे कदमों से सितारों को छू लेना चाहती थी। नन्ही हथेलियों में जुगनू की चमक समेट मन को रोशन कर लेना चाहती थी। वह अरावली की पहाड़ियों से आई हुई ठंडी हवा के झोंकों के साथ रेस लगाना चाहती थी। तब उसे कहाँ पता था कि बचपन की उस गुड़िया के होश संभालते ही उसकी उम्मीद की रेखा से बड़ी लोहे की कंटीली रेखाएँ लगा दी गई हैं, ताकि उसके सपनों को नियति की क्रूरता और रस्म मानकर कुर्बान किया जा सके। इन सबके बाद भी उसने अपने सपनों को “लव यू” कहा, मन में हौसलों का चट्टान भरा, आँखों में उम्मीद की चमक और आशाओं के पंख पहनकर राजस्थान के अपने गाँव में ‘मैदान मार ‘लड़कियों की किस्मत बदली। इन सब के बावजूद खुद की किस्मत भी उससे आँख-मिचौली खेलती रही। हाथ पीले कर मुंबई आयी तो ससुराल में भी दुनिया रसोई घर तक ही सिमटी रही। उसकी आँखें भीगती रहीं, पर सपनों को आँसुओं के सैलाब में बहने न दिया। वह मुंबई लोकल की राह पकड़ ज़िंदगी को ढूँढने निकल पड़ी। जनरल डब्बों की खाक छानते, तजुर्बों के पन्ने समेटते, रुकते-चलते हुए एक मुकाम बनाया। जलवा ऐसा कि सासू माँ भी बेस्ट फ्रेंड बन चाय की प्यालियाँ खनका कर गप्पों की शाम बिताने लगी। बाल विवाह, पर्दा प्रथा और लड़कियों पर लगी तमाम बंदिशों के खिलाफ मुखर आवाज़ बन स्त्री मुक्ति का अलख जगाने वाली इस स्त्री के मन में एक कथाकार भी बसता है और एक उद्यमी भी। इनकी किताब ‘मुंबई लोकल’ जल्द आने वाली है। इनके ब्रांड Mohi Pure के स्वाद के दीवाने पंकज त्रिपाठी तक हैं।
आज पढ़ेंकहानी — दर्द से भरे दामन को उम्मीद के उजास से रौशन कर जिंदादिली की इंद्रधनुषी रेखाएँ खींचने वाली रेखा सुथार की–
प्रकृति के बीच महलों वाला गाँव
मेरा जन्म राजस्थान के अरावली की पहाड़ियों से घिरे एक छोटे से गाँव ‘घाणेराव’ में हुआ था। गाँव छोटा तो था पर बेहद खूबसूरत। नक्काशीदार मंदिरों की दीवारें, ऊँचे-ऊँचे खूबसूरत महल और राजवाड़े। विदेशी मेहमानों का आना-जाना, उनके कैमरे में कैद होती गाँव की कहानियाँ — सब कुछ था मेरे इस गाँव घाणेराव में।
बचपन में पढ़ाई-लिखाई के लिए मेरा दाखिला गाँव के ही स्कूल में कराया गया। हम बच्चों की टोली हरे-भरे जंगलों के बीच से पेड़ों को निहारते हुए स्कूल आती- जाती। यहाँ तक तो सब खूबसूरत था, पर मेरे गाँव की इस खूबसूरती के साथ ही एक स्याह पक्ष भी था। परंपरा के नाम पर रूढ़ियों की जड़ें मज़बूत थीं।
एक उम्र के बाद लड़कियों को पाबंदियों की परिधि में बाँध दिया जाता। वह अपने गाँव से बाहर कभी अकेली कदम नहीं निकाल सकतीं। बचपन में ही लड़की ब्याह दी जाती। बहुओं को चेहरे के आगे लंबा घूँघट ताने रखने का फरमान था। अगर कोई गुस्ताख़ी हो गई तो सज़ा भी डरावनी।
यह बताते हुए रेखा सुथार का गला भर आता है। वह खुद को सँभालते हुए हिम्मत की मुस्कान होंठों पर भरती हैं और हमें आगे का वाकया बताती हैं। साहित्यिक मिजाज रखने वाली रेखा सुथार Mohi Pure की फाउंडर हैं और जी-जान से देशभर में शुद्ध तेल और घी मुहैया कराने की पहल कर रही हैं।
माता पिता और खेल ने मुझे संवारा
रेखा आगे बताती हैं कि आज जो कुछ भी वे हैं उसमें उनके माता-पिता और खेल में उनकी रुचि का बड़ा योगदान है। वह कहती हैं कि पग-पग रूढ़िवादी विचारों से लैस इस गाँव में उनके माता-पिता ने उन्हें खुद के पंख फैला उड़ने की आज़ादी दी। गाँववालों के ताने मिले, पर इसकी परवाह न करते हुए वे उन्हें खुद का आकाश गढ़ने का हौसला देते रहे। पिता नरेंद्र प्रसाद परिहार जीवन बीमा कंपनी में कार्यरत थे। माँ कमला परिहार गृहणी थीं। माँ भले कम पढ़ी-लिखी थीं, पर ज़िंदगी के तजुर्बे ने उन्हें काफी व्यवहारिक बना दिया था। रेखा कहती हैं कि उनके माता-पिता ने उन्हें बंदिशों वाले गाँव में खुलकर जीने की आज़ादी दी। वह स्कूल में सॉफ्टबॉल खेलती थीं। उनका यह खेलना स्कूल के कई शिक्षकों को पसंद नहीं आता था। तब इसमें है। हमारे दूसरे पीटी टीचर भी शामिल थे। वह थोड़ी ज़िद्दी थीं — खेलना है तो खेलना है। काफ़ी समझाने पर स्कूल के प्रिंसिपल ने स्कूल में लड़कों के साथ लड़कियों की टीम शुरू की। धीरे-धीरे वे बाहर भी खेलने जाने लगीं।
अपने पिता के साथ रेखा सुथार
जब पीटी टीचर चुपचाप मेरी क्लास में आ गए
रेखा हमें स्कूल का एक खूबसूरत वाकया बताते हुए कहती हैं — “एक बार हमारी क्लास चल रही थी। हम सभी बच्चे पढ़ाई कर रहे थे। अचानक पीटी सर आए और मेरा नाम लेकर पुकारने लगे। मेरी धड़कनें तेज़ हो गईं। मुझे लगा कोई ग़लती हो गई। फिर उन्होंने सबके सामने मेरी पीठ थपथपाते हुए कहा कि इस लड़की ने स्कूल का मान बढ़ाया है। यह खरा सोना है, ठोक-पीटकर आगे निकली है।” उनका चयन तब नेशनल लेवल पर सॉफ्टबॉल के लिए हुआ था। इससे पहले वह स्टेट लेवल पर सॉफ्टबॉल जीत चुकी थीं।
नेशनल ट्रेनिंग कैंप, पीरियड का पेन और माँ की वो बात
रेखा सुथार कहती हैं कि उनकी किस्मत की रेखाएँ हर वक्त उनका इम्तिहान लेती रही हैं। ऐसा ही एक वाकया नेशनल ट्रेनिंग कैंप के दौरान हुआ। दरअसल फाइनल चयन के लिए इस कैंप से 45 लड़कियों में से 16 लड़कियों को चुनना था। जिस दिन उनका परफॉर्मेंस था, उसी दिन उन्हें पीरियड आ गया। उनका पीरियड काफी पेनफुल होता था। उन्हें लगा कि ऐसी हालत में वे परफॉर्मेंस नहीं दे पाएँगी। नेशनल का फाइनल सिलेक्शन आज के ही टेस्ट के बाद होना था। उन्होंने सोच लिया कि वे नहीं कर पाएँगी। दर्द काफी तेज़ था। उन्होंने मम्मी को फोन कर यह बात कही। मम्मी ने कहा —
“पीरियड तो हमेशा आएँगे, यह टाइम वापस नहीं आएगा।”
फिर माँ 30 किलोमीटर दूर अस्पताल गईं, डॉक्टर से दवा पूछी और फोन पर लिखवाया। रेखा ने दवा मँगाई, खुद को मज़बूत किया और सबसे बढ़िया परफॉर्मेंस देकर सेलेक्ट हो गईं।
स्कूटर आएगी, ब्याह कर लो
रेखा बताती हैं कि मैं बारहवीं में थी. इसी वक्त मेरा ब्याह कर दिया गया. हमारे गांव में बड़ी बहन के साथ छोटी बहन का भी ब्याह कर दिया जाता था. हाँ, शादी के काफी सालों बाद गौना होता, तब लड़की अपने ससुराल जाती. मेरी शादी भी बहन की शादी के वक्त कर दी गई. मैंने मना किया तो फिर मुझे स्कूटर खरीद कर देने की बात मेरे भाई ने बताई. मैंने सोचा, चलो शादी करने से स्कूटर चलाने की आजादी मुझे मिल जाएगी, तो ठीक है, कर लेते हैं शादी.
स्कूटर तो नहीं आई, हाँ मैंने पापा का बुलेट बाइक चलाना सीख लिया. गांव और आसपास में बुलेट चलाया करती. मेरे बुलेट मोटरसाइकिल चलाने देख गांव के कुछ रूढ़िवादी लोग ताने भी देते, पर मुझे तो रफ्तार चाहिए थी. खुलकर जीना था, खुद की जिंदगी. शादी के बाद मैंने CAT का एग्जाम दिया. फिर MBA कर ली. मैंने अंग्रेजी साहित्य से स्नातक किया है।
ससुराल की बंदिशें मुझे नहीं आयी रास
रेखा बताती हैं कि मैं मायके में खूब आजादी के साथ रहती. दूसरी लड़कियों को भी पाबंदियों से निकाल, पढ़ाई-लिखाई की ओर बढ़ने में मदद करती. मेरी किस्मत ने मेरा खूब इम्तिहान लिया है. आखिर वह दिन भी आया जब गौना के बाद मेरे कदम ससुराल की दहलीज पर पड़े. हर लड़की की तरह मेरे आंखों में भी ससूराल और शादीशुदा जिंदगी को लेकर ढेरों ख्वाब बसे थे. मेरे ससूराल वाले मुंबई में रहते थे. मुझे लगा था कि इस महानगर में और पंख फैला उड़ सकूँगी, पर हुआ इसका उल्टा.
“मुझे उस वक्त मेरा ससूराल वैसा नहीं लगा जैसा मैं सोचकर आयी थी। हर आम परिवार की तरह यहां भी बहू के लिए वो बंदिशें थी जो उस वक्त चला करती थीं।
मुंबई शहर में तो था, पर मुझे घर से निकलने की आजादी नहीं थी. यह सब मुझे बेचैन करता”
मुझे हमेशा साड़ी का पल्लू ताने रहना होता था. किसी जरूरी काम के लिए भी मैं नीचे चौराहे की दुकान पर नहीं जा सकती थी. घर का सारा काम तो मुझे करना था ही, वह भी साड़ी में रह कर. मैं सलवार सूट भी नहीं पहन सकती थी. आप सोचिए, जो लड़की एक खिलाड़ी रही, खूब आजादी से, उसे आज के जमाने में इतनी बंदिशें अचानक आ जाए तो उसके मन पर क्या बीतेगी. मैं अपने पति से इन सबको लेकर बात करती. पति सपोर्ट भी करना चाहते पर इससे बहुत कुछ बदला नहीं ।
“उस वक्त मेरी आंखें बार-बार गंगा-यमुना होतीं। मन समंदर सा नमकीन और देह जलती असहाय ताप की पीड़ा से। “
मैं मन ही मन ईश्वर से सवाल करती, ये मेरे साथ क्या हो रहा है।
‘मुंबई लोकल ‘वाले दिन
हिम्मती दिल और मुंबई लोकल का सफर
मैं ससूराल में काफी तनाव में रहती. फिर मैंने सोचा, इस अंधेरे को मुझे ही दूर करना होगा, कोई मेरे लिए नहीं आएगा. फिर एक दिन मैंने कह दिया कि मुझे जॉब करने जाना है.
“इतना सुनते ही प्रतिरोध पर प्रतिरोध. ये लड़की जॉब करेगी? हमारी प्रतिष्ठा का क्या? क्या जरूरत है जॉब करने की? इस तरह के हजारों सवाल. मैंने गांधी जी की तरह सत्याग्रह वाला रास्ता चुना.”
मैं उनका विरोध तो करती, पर इसका तरीका अहिंसक होता. मैं कोई अपशब्द या हिंसा अपनी बात को मनवाने के लिए नहीं कहती—करती. बड़ी मुश्किल से मुझे नौकरी करने की इजाज़त मिली, पर इसके साथ ही घर का सारा काम निपटा कर मुझे जाना था और आकर फिर सारा काम करना था. मैंने यह चुनौती स्वीकार की.
जॉब करने निकली, पर जॉब ढूंढनी थी
मैं घर से नौकरी करने तो निकल गई, पर सच यह था कि मुझे नौकरी ढूंढनी थी। मैंने सोचा पहले मुंबई को जान लूं। नौकरी तो मिल ही जाएगी। . स्टेशन पहुंची, लोकल टिकट लिया और लोकल ट्रेन में चल निकली—आठ घंटे अलग-अलग जगहों पर बिताए. ।मुंबई लोकल में समय बिताना.
“सच कहूँ तो मुंबई लोकल का समय मेरे जीवन का वह अनुभव था जिसमें मैं कितने ही लोगों के जीवन को करीब से देख पाती थी. उनके सपने, उनकी उदासी, उनका संघर्ष—सब कुछ मैंने जाना समझा. एक आम आदमी के हिस्से की खालिस जिंदगी से मुझे मुंबई लोकल ने रूबरू कराया.”
वह आगे बताती है कि मुंबई लोकल ट्रेन यात्रा के दौरान की कहानियों को मैंने आकार दिया, और अब यह जल्द ही ‘मुंबई लोकल’ के नाम से छप कर आने वाली है.
...और नौकरी मिल गई
रेखा सुथार आगे बताती हैं कि मुंबई लोकल के राह में हीं मुझे मेरी पहली नौकरी भी मिली. इस दौरान मेरी मुलाकात एक ऐसी महिला से हुई जिन्हें अपने ब्लॉग के लेखों के अनुवाद के लिए एक व्यक्ति की जरूरत थी. मैंने उनके प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया. इस दौरान मुझे 7,500 रुपये मिलते. इसके बाद ICICI बैंक में मेरी नौकरी लग गई।
सोशल मीडिया ने मुझे लेखक बना दिया
रेखा आगे कहती हैं कि सोशल मीडिया का भी मेरे जीवन में काफी योगदान है. मैं अपने जीवन के घटनाक्रम को कभी-कभार कुछ पंक्तियों में लिखकर सोशल मीडिया पर डाल देती. इन पर अच्छी प्रतिक्रिया आती. फिर सोशल मीडिया फ्रेंड लोग कहने लगे, आप लिखती क्यों नहीं? ऐसे में धीरे-धीरे मैंने लिखना शुरू कर दिया—साहित्य की छात्रा होने का फायदा भी मिला. मैं इसके लिए सोशल मीडिया के अपने मित्रों का आभार व्यक्त करती हूँ. इन सब ने मेरा हौसला बढ़ाया.
साहित्य जगत की उभरती रेखा
रेखा सुथार अपने ब्लॉग लेखन और कथा कहानियों के सृजन में खूब डूबी रहती हैं. वो कहती हैं, मेरी रचना मेरी जीवन की दृष्टि है. यह हर आम लड़की और महिला की कहानी होती है. इसमें गम की दहलीज पर खुशियों को पाने की चाहत छुपी हुई है. रेखा साहित्यिक गोष्ठियों और संवादों में एक जाना-पहचाना नाम बन चुकी हैं. उनके कई पॉडकास्ट इंटरव्यू भी प्रसारित हो चुके हैं.
सफर हीं तो जिंदगी है
दुनिया को समझने के लिए सोलो ट्रैवल
रेखा को दुनिया को नजदीक से जानना बहुत पसंद है। वो प्रकृति से भी खूब प्यार करती हैं वें बतातीं हैं कि
शादी के बाद मैंने सोलो ट्रैवल करना भी शुरू किया और कई सारे ट्रैक पूरे किए। घूमने फिरने का शौक हमेशा से रहा। पहले परिवार के साथ जाती थी फिर धीरे धीरे अकेले घूमने नए लोगों से मिलने और उनके जीवन को समझने की कोशिश करने लगी।
इन्ही अनुभवों की एक किताब जल्द लाने वाली हूं।
अनमोल यादें: जब बीस साल बाद मिलीं लक्ष्मी मैम
जब मिलने मुंबई आ गई लक्ष्मी मैम
रेखा सुथार कहती हैं कि हमारे स्कूल के शुरुआती दिनों में लक्ष्मी मैम हमारी पीटी टीचर हुआ करती थी। वे बहुत ही अनुशासित थी। हमसे भी अनुशासन की उम्मीद रखती। मुझे खेल की बारिकियों को सीखने में लक्ष्मी मैम का बहुत योगदान रहा है।
रेखा, लक्ष्मी मैम से जुडा एक ताजा वाक्या बड़े ही उत्साह से सुनाने लगती हैं। हमारे स्कूल के वक्त ही लक्ष्मी मैम का तबादला हो गया था।
बीस साल बाद मुझे एक कॉल आया – एक पुरानी मगर बेहद करीबी आवाज़ सुनाई पड़ी सामने से – “हैलो,रेखा बात कर रही हो क्या ?”
मुझे आवाज़ पहचानने में ज़्यादा देर नहीं लगी मैंने तुरंत चहकते हुए कहा – “लक्ष्मी मैम”
खूब देर बातचीत के बाद वो बोली – “मैं मुंबई में हूं और आज रात की ट्रेन से शिरडी जा रही अगर तुम्हारे पास टाइम हो तो स्टेशन पर मिलने आना”
मैं उनके बताए वक्त से पहले पहुची स्टेशन।
मैं देर तक उनसे गले लगी रही..
आँखों में हम दोनों के पानी था,और चेहरे पे मुस्कान हम दोनों के थी।
मैंने स्कूल में मेरे साथ पढ़ी कई लड़कियों के नाम बताए की वो भी मुंबई में ही रहती है,लेकिन ये जानकर हैरानी हुई मुझे की उन्हें उनमें से कोई याद नहीं आ रही थी।
मैंने पूछा उनसे कि “फिर मैं कैसे याद रह गई आपको?”
वो बोली “तू भुलाने वालों में से नहीं है बेटा तेरी बातें तो मैं आज भी जिस स्कूल में पढ़ाती हूं वहा के बच्चों से करती रहती हूं।मैं नहीं जानती मेरी वो कौनसी बात थी जिसने मैम को आज भी मुझसे जोड़े रखा बस इतना जानती हूं की
मुझे जब भी अपनी कमाई के बारे में पूछा जाएगा तो मैं इन किस्सों का खजाना सामने रख दूंगी।
दादी की बीमारी और गाड़ी चला उन्होंने अस्पताल पहुँचाना
रेखा एक गुजरा हुआ लम्हा याद कर कहती हैं, मेरी दादी सास काफी रूढ़िवादी विचारों की हैं. वो मुझे हमेशा घूंघट में ही देखना चाहती थीं. एक बार मैं दादा, ससुर और दादी सास के साथ गांव में थी. अचानक दादी की तबीयत बिगड़ गई. तबीयत काफी ज्यादा खराब होने लगी. हमारे पास गाड़ी तो थी, पर ड्राइवर नहीं था. काफी खोज करने पर भी कोई ड्राइवर नहीं मिला. ऐसे में मैंने सोचा कि जान बचाना अभी सबसे जरूरी है—यह घूंघट नहीं. मुझे गाड़ी चलानी आती थी. मैंने गैरेज से कार निकाली, दादीजी को गोद में उठाकर सीट पर रखा और अस्पताल लेकर गई. दादी का इलाज हुआ और दादी की तबीयत ठीक हो गई. दादी ने तब मुझे खूब आशीर्वाद दिया.
खुशियों के पल: सासू मां के साथ रेखा सुथार
सास बन गई अच्छी दोस्त
रेखा आगे बताती हैं कि नौकरी के बाद धीरे-धीरे सब कुछ बदलने लगा. ससूराल वाली परंपरा भी बदल गयी।. मेरी सास जो कभी परंपराओं को मानने को कहतीं, आज वो मेरी अच्छी दोस्त हैं. हम हर शाम साथ साथ चाय की चुस्की लेते हुए गप्पों वाली शाम बिताते हैं.
साथ जीवन साथी का: अपने पति भरत सुथार के साथ रेखा
पति का योगदान अहम
रेखा कहती हैं कि मेरी इस संघर्ष यात्रा में मेरे पति भरत सुथार का अहम योगदान रहा है. उन्होंने मेरे हौसले को हमेशा मजबूत बनाए रखने में मदद की. आज भी वो मेरे हर फैसले का स्वागत करते हैं.
पहल शुद्ध देशी घी और तेल उपलब्ध करवाने की
रेखा आज अपने स्टार्टअप Mohi Pure से देश भर में शुद्ध देसी घी और सरसों तेल उपलब्ध करवाने की नायाब पहल कर रही हैं. रेखा कहती हैं कि राजस्थान में तेलहन की फसल काफी अच्छी होती है. हमारे गांव में भी काफी अच्छी सरसों की उपज होती थी. संकट यह था कि हमारे गांव में तेल निकालने की मशीन नहीं थी. लोगों को दूर दूसरे गांव इस काम के लिए जाना पड़ता था. मेरे दादाजी को यह बात काफी नागवार लगती. फिर उन्होंने तेल मिल लगाया. अब गांव वालों को तेल निकलवाने दूर नहीं जाना पड़ता था. दादाजी की विरासत को मेरे पिताजी ने आगे बढ़ाया. अब पिताजी इसे चलना नहीं चाहते थे. मील चलाने वाले केयरटेकर ने भी नौकरी छोड़ दी. ऐसे में यह मील बंद होने के कगार पर आ गया.
इन मशीनों के बीच यादों वाला बचपन
वह आगे बताती हैं कि मेरे दादाजी काफी कम उम्र में परलोक चले गए.मेरे दादाजी के सपने को मेरे पापा ने करीब 40 साल पहले पूरा किया—जब उन्होंने लोहे की घाणी लगाकर सरसों का तेल निकालना शुरू किया. मैंने अपना पूरा बचपन गेहूँ पीसने, मसाले कूटने और तेल निकालने वाली उन्हीं मशीनों के बीच बिताया. तब के समय में शुद्ध अनाज, मसाले और तेल बहुत आसानी से मिल जाते थे, इसलिए उनकी उतनी अहमियत महसूस ही नहीं होती थी. पर धीरे-धीरे जैसे-जैसे वक्त बदला, ये परंपराएँ और कारोबार बंद होने लगे, और हम बड़ी कंपनियों के रेडीमेड खाने-पीने के सामान की ओर खिंचते चले गए. कंपनियों ने अपनी ज़रूरतें पूरी करने के लिए न जाने कितने केमिकल्स मिलाए, और हम जानते-बूझते भी उन्हें अपनाते गए—क्योंकि वो सस्ते थे. लेकिन उस सस्तेपन ने हमें बहुत महँगी बीमारियों के हवाले कर दिया.
कभी सोचा नहीं था कि तेल की घाणी चलाऊंगी
रेखा कहती हैं कि सच कहूँ तो मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि मैं ये काम शुरू करूँगी. मैं शहर में अपनी नौकरी में खुश थी. लेकिन एक दिन अचानक पापा ने बताया कि वो सारी मशीनें बेचकर वहाँ कंस्ट्रक्शन का काम शुरू करने वाले हैं. ये सुनते ही मेरा मन भारी हो गया. मेरे मन में कोई ठोस वजह नहीं थी, लेकिन इतना जरूर महसूस हुआ कि ये परंपरा बंद नहीं होनी चाहिए.
मैंने इस बारे में अपने दोस्तों से बात की, खुद बहुत सोचा, और धीरे-धीरे मन में एक निर्णय आकार लेने लगा. तब तक मैंने अपनी नौकरी भी छोड़ दी थी. एक दिन पापा से लंबी बातचीत हुई. उन्होंने बताया कि कैसे उन्होंने रात-दिन मेहनत करके ये घाणी लगाई थी, कैसे कठिन समय में यही घाणी हमारे परिवार का सहारा बनी. और अब जब वो और मेरे भाई अपनी-अपनी नौकरी में व्यस्त हो गए हैं, तो इस कारोबार को संभालने वाला कोई नहीं है. इसलिए उन्हें यही सही लगा कि इसे बंद कर दिया जाए.
उस रात मैं सो नहीं पाई. अगली सुबह मैंने पापा से कहा— “मुझे नहीं पता ये कितना प्रैक्टिकल है… लेकिन पापा, ये घाणी आप बंद नहीं करेंगे. ये वैसे ही चलेगी जैसे हमेशा से चलती आई है.”
पापा चौंके और बोले— “लेकिन इसे चलाएगा कौन?”
मेरी आँखों में थोड़ी देर की खामोशी थी, फिर मैंने बिना हिचकिचाए कहा— “मैं.”
कुछ पल की खामोशी के बाद उन्होंने मेरी आँखों में देखा और पूछा— “मैनेज कर लेगी?”
“मेरी आँखें भर आईं, मैंने बस इतना ही कहा— पता नहीं… लेकिन जिस उम्र में आपने कर लिया था, उसी खून की बेटी हूँ मैं… कोशिश जरूर करूँगी.”
उस वक्त पापा चुप हो गए. और फिर धीमे से बोले— “ठीक है रेखा. अगर तूने इरादा कर लिया है तो मैं तुझे रोकूँगा नहीं. लेकिन एक बात हमेशा याद रखना—शुद्धता और मिलावट के बीच सिर्फ़ एक अंतर है—विश्वास का. लोगों का विश्वास कभी टूटने मत देना.”
अच्छा चल रहा बिजनेस
आज उस बात को करीब 6-7 महीने हो गए हैं. हमारी घाणी के साथ बगल के गाँव में मामाजी की और दो घाणी होने की वजह से अच्छी खपत हो जाती है. तेल के साथ ही मैंने अपने गाँव और आसपास के गाँवों में परंपरागत तरीके से बने बिलोना घी को भी इस मुहिम से जोड़ा है. पिछले कुछ महीनों में मैंने कई लोगों तक ये उत्पाद पहुँचाए हैं. पंकज सर और कई सेलिब्रिटीज़ को ये घी और तेल सिर्फ़ इसलिए दे पायी हूँ, क्योंकि मुझे मेरे प्रोडक्ट पर पूरा भरोसा है कि वे एक बार इसे खाएँगे तो अगली बार फिर से ज़रूर माँगेंगे.
ब्रांड नहीं विश्वास
रेखा सुथार कहती हैं कि मेरे लिए कोई “अमीर” या “साधारण” ग्राहक नहीं है—सभी के लिए दाम और गुणवत्ता एक समान है. मेरा उद्देश्य सिर्फ़ इतना है कि अधिक से अधिक लोग शुद्धता से जुड़ें और उस भरोसे को महसूस करें, जो हमारी पीढ़ियों ने बनाया है. आज Mohi Pure सिर्फ़ एक ब्रांड नहीं है—ये मेरे दादाजी के सपने, मेरे पापा की मेहनत और मेरे अपने संकल्प की कहानी है.
ये सिर्फ़ सरसों का तेल नहीं है—ये पीढ़ियों की विरासत है, जो मैंने सिर्फ़ एक मकसद से आगे बढ़ाई है— “खुद को खुद से बेहतर करना.”
इसलिए Mohi Pure में आपको वही शुद्धता मिलेगी जो पहले हमारे घरों की रसोई में मिलती थी—बिना किसी मिलावट, बिना किसी समझौते के.
ऐसे रखा ब्रांड नेम
रेखा आगे कहती हैं कि जब मैंने तेल मिल को चालू करने और इसे एक ब्रांड नेम देने की पहल शुरू की तो सबसे पहले हमें एक नाम चाहिए था. ऐसे में एक रोज मैं और मेरी सास नाम पर दिमाग लगा रहे थे. फिर मैंने सासू मां से कहा, क्यों न आपके ही नाम पर इसका नाम रखा जाए. उनका नाम मोहिनी है. मोहिनी नाम से हमें डोमेन नहीं मिला, तो फिर इसे मैं ने उनके ही नाम से मोही कर दिया और शुद्धता की गारंटी के लिए पीयोर जोड़ दिया. ऐसे हमें मिला हमारे ब्रांड का नाम.
सेलिब्रिटी की बना पसंद
रेखा के ब्रांड Mohi Pure के स्वाद के दीवाने मुंबई में फिल्मी हस्तियां भी हैं. पंकज त्रिपाठी भी इनके शुद्ध देसी घी का स्वाद ले चुके हैं. रेखा कहती हैं कि हमारे प्रोडक्ट में शुद्धता के साथ प्यार भी शामिल होता है. यह हमारा टैगलाइन भी है.
रेखा सुथार नयी पीढ़ी से कहतीं हैं –
‘बदलाव ‘के लिए हिंसा की जरूरत नहीं. मैं लोगों से खास तौर पर लड़कियों से यह कहना चाहूँगी कि आप खुद पर विश्वास रखो, हालात खुद बदल जाएंगे. आप खूब उड़ो, पर गलत राहों में नहीं. बदलाव के लिए झगड़ों और हिंसा की जरूरत नहीं है. अहिंसक तरीके से भी क्रांति लायी जा सकती है. आप खुद पर यकीन करेंगे तो दुनिया आप पर यकीन करेगी. चलते रहिए, बढ़ते रहिए—अपनी राह।”
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