असमिया वाद्य यंत्रों को पुनर्जीवित करने की सुरीली पहल करने वाले माधव कृष्ण दास की कहानी

ब्रह्मपुत्र के उन्मुक्त बहते जल तरंगों में  ‘बरगीत’ की पावन धुन हो या फिर चाय बागानों के पत्तों की सरसराहट में ‘रंगाली’ का मधुर राग, या दूर पहाड़ी पर बसे गांव की पगडंडी तक फिजा में मचलता ‘पेपा’ का मद्धिम -मद्धिम स्वर ।असम की आत्मा लोक धुनों के इन्हीं कोरस में बसती रही है , रचती रही है।
बदलते समय के साथ यहां भी जब लोक धुनों के स्वर की जगह पश्चिम के संगीत का शोर गूंजने लगा । संस्कृतियों की तान पर बाजार सीना तानकर खड़ा हो गया, तब यहां के एक  शख्स में  परिवर्तन का बीड़ा उठाया। उन्होंने न सिर्फ लोक धुनों को सहजने सवारने का जतन शुरू किया बल्कि असम के लुप्त हो रहे वाद्य यंत्रों को ढूंढ ,उन्हें फिर से नवीनता और मौलिकता के मेल के साथ आम लोगों के लिए उपलब्ध कराने की नायाब पहल शुरू की। बचपन में ही संगीत की संगत कर संगीत विशारद की डिग्री पाने वाले और असमिया गीत संगीत को पुनर्जीवित कर उसे दुनिया भर से परिचित करवाने की सुरीली कोशिश करने वाले गायक, संगीतकार, लेखक और वरिष्ठ सिनेमैटोग्राफर , लोकसंगीत रत्न माधव कृष्ण दास की यह कहानी जरूर पढ़िए…

मेरे घर में बचपन से ही संगीत का माहौल था। मां डॉ. डॉली दास लोक संगीत की गायिका थीं। घर का हर कोना मां के रियाज की आवाज और साजों के संगीत से गुलजार रहता। ऐसा कहूं की मैं बचपन में मां के गीत सुनते हुए ही नींद के आगोश में जाता और सुबह जब जागता तो देखता मां ने उगते सूरज के साथ ही अपनी संगीत की संगत शुरू कर दी है।

माधव कृष्ण दास की माताजी डॉ डॉली दास

“सच कहूं तो वो घर के संगीत का माहौल ही था जिसने अब तक मेरी आत्मा के अंदर मनुष्यता को बचा कर रखा है, जीवन को सजा कर रखा है कहते हैं माधव कृष्ण दास”

माधव कृष्ण दास असमिया लोक संगीत को पुनर्जीवित करने के लिए कई अभियान चला रहे हैं। इन अभियानों में लोक गीतों को सहेज कर उनका प्रकाशन से लेकर गुम हो रहे वाद्य यंत्रों की खोज और उनका निर्माण तक शामिल हैं।
माधव कृष्ण दास कहते हैं घर में संगीत की संगत का असर मुझ पर बचपन से ही होने लगा। मैंने कक्षा सात की उम्र में ही डिब्रूगढ़ संगीत महाविद्यालय से संगीत विशारद  की डिग्री पा ली थी। इतनी कम उम्र में यह डिग्री पाने  वाला मैं पहला बच्चा था। वैसे तो मेरी रूचि तबला वादन में सबसे अधिक थी पर मैं धीरे-धीरे कर अन्य वाद्य यंत्र भी बजाता और उसे सीखता था। कहते हैं श्री दास। आज  वे 22 से अधिक वाद्ययंत्र को बड़ी आसानी से बजा सकते हैं।

माताजी और भजन गायक अनूप जलोटा जी के साथ मुंबई स्टूडियो में

ऐसे सीखा इतने वाद्य यंत्र बजाना

माधव कृष्ण दास बड़े ही उत्साह से 22 से अधिक वाद्ययंत्र को सीखने और बजाने किस्सा सुनाते हुए कहते हैं कि मेरी मां परफॉर्मेंस के लिए लोक गीतों की तैयारी करती और कई बार ऐसा होता कि कोई म्यूजिशियन अनुपस्थित हो जाता तो फिर मैं उस वाद्य यंत्र को बजाने बैठ जाता। ऐसा करते करते मुझे, तबला के साथ, पेपा, बांसुरी, ढ़ोल, हारमोनियम समेत अनेक वाद्य यंत्र बजाने आ गए। इसके साथ ही अब किसी म्यूजिशियन की अनुपस्थिति में होने वाली कठिनाई भी समाप्त हो गई। अब मैं मां के साथ बाहर मंचों पर भी परफॉर्म करने जाने लगा।

मां डॉ .डॉली दास जी ने लोक संगीत के क्षेत्र में उल्लेखनीय  उपलब्धियां हासिल की थीं । वर्ष 2011 में  वें बुल्गेरिया  में आयोजित वर्ल्ड फोक फेस्टिवल में स्वर्ण पदक विजेता रहीं। इसके बाद,वर्ष 2014 में वियतनाम विश्वविद्यालय ने उन्हें लोक संगीत में डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया। उनकी इसी साधना और समर्पण के लिए वर्ष 2017 में उन्हें राष्ट्रपति पुरस्कार से भी नवाजा गया।

फिल्म में अकेले बजाए सभी वाद्य यंत्र

माधव कृष्ण दास ने 2009 में महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव के जीवन पर आधारित फीचर फिल्म में  अकेले बैकग्राउंड म्यूजिक दिया। इसके उन्होंने अकेले ही 22 वाद्य यंत्रों को बजाया और फिर म्यूजिक कंपोज किया। यह अपने आप में एक रिकॉर्ड है। फिल्म आने के बाद लोगों के इसके संगीत की भी सराहना की।

लोकसंगीत का तैयार किया सिलेबस

माधव कृष्ण दास बताते हैं कि हमारे असम में लोग परंपरागत गीत तो गाते थे। इनकी पढ़ाई भी शुरू हो चुकी थी पर कोई व्यवस्थित सिलेबस नहीं था। मुझे लगा कि लोक संगीत को पुनर्जीवित करने और मजबूती देने के लिए एक व्यवस्थित सिलेबस की जरूरत है जिसमें असम के लोक संगीत के सभी आयाम मौजूद हों। फिर मैंने इसकी पहल शुरू की और कई माह के मेहनत के बाद लोक संगीत का सिलेबस तैयार किया।
सर्वभारतीय संगीत -ओ- संस्कृति परिषद कोलकाता ने भी इसे मान्यता प्रदान की।‌आज असम के कई संगीत महाविद्यालय में इस सिलेबस से पढ़ाई हो रही है।

वाद्य यंत्र को नया रूप देते हुए

माधव बांसुरी एक सुरीली पहल

माधव कृष्ण दास बताते हैं कि असम के जीवन में बांस का हमेशा से एक महत्वपूर्ण स्थान रहा है ‌ । चाहे वह यहां का लोक जीवन हो या फिर लोक संगीत।

लोक संगीत में प्रयोग आने वाले वाद्ययंत्र में भी बांस का ज्यादातर प्रयोग होता है और बांसुरी तो यहां के लोकसंगीत की आत्मा है।

मैं एक बांसुरी वादक भी हूं। वादन के क्रम में मैंने यह महसूस किया कि  हमारे पारंपरिक बांसुरी में सभी   स्केल की बांसुरी एक साथ नहीं उपलब्ध हो पाती थी। मैंने इस पर रिसर्च शुरू किया और फिर  सभी स्केल की बांसुरी  का सेट ईजाद किया  ।  मैंने इसे माधव बांसुरी नाम दिया है। माधव बांसुरी के तहत 25 बांसुरी का एक सेट है जिसमें हर स्केल की बांसुरी मौजूद रहती है।

लुप्त हो रहे वाद्य यंत्रो को किया पुनर्जीवित

माधव कृष्ण आगे बताते हैं कि हमारे प्रदेश असम में कई आदिवासी जनजातियां हैं। इन सभी जन जातियों के अपने अपने त्योहार है, गीत है और वाद्ययंत्र भी।

“मैंने यह महसूस किया की बदलते ज़माने में हमारे वाद्य यंत्र को भूलकर वेस्टर्न म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट  अपनी जगह बना रहे हैं। मुझे यह काफी नागवार लगा। मैं यह मानता रहा हूं कि हमारे परंपरागत वाद्य यंत्र लोकसंगीत की सांस हैं। हां आज के समय के साथ उनकी डिजाइन को और आकर्षक बनाया जा सकता है, पर उनकी मौलिकता को संरक्षित रखते हुए”

फिर छुट्टियों में मैं गांव – गांव जाता , बुजुर्ग संगीतकारों से मिलता है और पुराने फोक म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट के बारे में जानकारी इकट्ठा करता ।

वैसे मैं अगर असम के म्यूजिक इंस्ट्रूमेंट की बात करूं तो वहां के सबसे खास म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट में ये वाद्य यंत्र शामिल होते हैं

ढोल, पेपा, गगना ,ताल , बान्ही खोल , नेगेरा शंख , हारमोनियम, बीन , सेरजा , शिफून , खराम आदि। 

जब तक नई पीढ़ी इन्हें नहीं अपनाती तब तक इनका संरक्षण और प्रयोग काफी मुश्किल जान पड़ता था। फिर मैंने खुद से ही इंस्ट्रूमेंट को बनाने की पहल शुरू की ।

इनके डिजाइन को थोड़ा आधुनिक रूप दिया और इनका निर्माण कार्य शुरू किया। इस काम में वहां के स्थानीय जानकार लोगों की मदद भी ली। परिणाम चमत्कारी थे। मेरे पास एसे परंपरागत वाद्य यंत्र नए रूप में मौजूद थे जो देखने में काफी खूबसूरत और आकर्षक तो थे उनकी मूल धुन ओर स्वर भी वैसे कायम था।

“संगीत जगत में इस पहल की काफी प्रशंसा हुई, और मुझे मिल एक आत्मिक संतोष। मुझे लगता है मैं रहूं न रहूं मेरे बनाएं इन वाद्य यंत्रों के स्वर फिजा में सुरीला रस भर इंसानियत का राग बचाएं रखेंगे”

माधव कृष्ण दास के पिता हितेश दास जी

पिताजी का योगदान अहम

माधव कृष्ण दास अपनी संगीत यात्रा का श्रेय अपने पिता हितेश दास जी को देते हैं। वे कहते हैं कि इस यात्रा में पिताजी का सहयोग काफी अहम रहा। पिताजी मां को हमेशा लोकसंगीत के लिए प्रेरित करते रहे। मेरे पिता वैसे तो टेलिकॉम डिपार्टमेंट में नौकरी करते थे पर उनकी रूचि लोक संगीत और लोक जीवन में काफी ज्यादा थी। उन्हें गांव, खेती, किसानी और कला से विशेष लगाव था। वे चाहते थे कि असम की कलाएं संरक्षित हो सके। मुझे संगीत की शिक्षा दिलवाने में भी उनका योगदान रहा। मैं जो कुछ भी हूं उनकी ही प्रेरणा से हूं।

जब ग्रामोफोन पर रिकॉर्ड हुआ गीत

माधव कृष्ण दास अपने पुराने दिनों को याद करते हुए कहते हैं। 1982 में मेरे गीत का ग्रामोफोन रिकार्ड आया था। इसे रिकॉर्ड करने के लिए हम एच एम वी कंपनी के मुख्यालय कोलकाता गए थे। उस वक्त इतनी दूर का पहला सफर था। इसके बाद 150 से अधिक ऑडियो कैसेट , सीडी कैसेट और डीवीडी  रिलीज हुए।  इसमें  आसामी,  हिंदी,  नेपाली,  बोडो, तीवा, नागामीज , मिसिंग, देउडी , उड़िया ,तमिल भाषा के  गीत शामिल हैं। आज इंटरनेट का युग है। सोचता हूं,इन सालों में तकनीक कितनी बदल गई। अब हर मोबाइल में या यूं कहें हर हाथ में रिकॉर्डर है, इंटरनेट है और है मुट्ठी में एक पूरी दुनिया।

इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में नाम

श्री दास बताते हैं कि उनका नाम दो बार “इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स “ में दर्ज हो चुका है। उन्होंने मेमोरी कार्ड में पहली बार गाना डालकर उसका प्रसार शुरू किया था। इसके साथ दूसरा  दिहानम में सर्वाधिक गीत गाने पर ।‌


मिल चुके हैं कई पुरस्कार

माधव कृष्ण दास को संगीत और कला के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए की पुरस्कार और सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। उन्हें चित्रकला के लिए 10 साल की उम्र में ही साल1979 में सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार प्रदान किया गया‌। 1987 में सांस्कृतिक कार्य विभाग, असम सरकार द्वारा आयोजित शास्त्रीय बांसुरी में द्वितीय स्थान और खोल वादन में तृतीय स्थान प्राप्त हुआ।

1987 में भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा युवा सांस्कृतिक कर्मियों के लिए उत्तर-पूर्व से प्रथम CCRT छात्रवृत्ति प्राप्त हुई।

1993 में कर्नाटक राज्य में सिनेमैटोग्राफी के अंतिम परीक्षा में 1st class तृतीय स्थान प्राप्त होने पर सम्मानित किया गया।

साल 1991मे ऑल इंडिया टेलीकॉम सांस्कृतिक सम्मेलन में कोलकाता (पश्चिम बंगाल) में शास्त्रीय बांसुरी में प्रथम स्थान प्राप्त हुआ।1990 में ऑल इंडिया टेलीकॉम सांस्कृतिक सम्मेलन अहमदाबाद (गुजरात) में लोकगीत में तृतीय पुरस्कार प्राप्त हुआ।वहीं साल 1978 में ऑल असम म्यूजिक एंड ड्रामा फेस्टिवल, तिनसुकिया में बिहूनाम  में द्वितीय पुरस्कार प्रदान किया गया। 1984 में ऑल असम चिल्ड्रन्स फेस्टिवल, सिबसागर में पर्बती प्रसाद गीत में द्वितीय पुरस्कार मिला।

पल सम्मान के..

1985 ऑल इंडिया चिल्ड्रन्स वन-एक्ट प्ले प्रतियोगिता, डिब्रूगढ़ में नाटक में द्वितीय सर्वश्रेष्ठ अभिनय पुरस्कार प्राप्त हुआ, 1987 में दोबारा सांस्कृतिक कार्य विभाग, असम सरकार द्वारा आयोजित अखिल असम सांस्कृतिक महोत्सव में शास्त्रीय बांसुरी में द्वितीय स्थान और खोल में तृतीय स्थान प्राप्त हुआ।सर्वभारतीय संगीत -ओ- संस्कृति परिषद कोलकाता  द्वारा 2013 में लोकसंगीत रत्न की उपाधि से नवाजा गया। साल 2025 में माधव कृष्ण दास को महानायक महाराज महावीर पृथु सम्मान  से नवाजा गया ।

चित्रकला प्रदर्शनी में माधव कृष्ण दास

राग के साथ रंग से भी रिश्ता

माधव कृष्ण दास का रिश्ता राग के साथ रंगों से भी है वे सुरों के साधक तो हैं हीं एक बेहतर पेंटर भी हैं। उन्होंने श्रीमंत शंकरदेव एवं माधवदेव की रचनाओं में आए पात्रों को अपनी कूची से कैनवास पर उतारा है। इसमें राधा -कृष्ण लीला, कृष्ण की बाल लीलाओं समेत लोक जीवन के चित्र भी शामिल हैं। माधव कृष्ण दास कहते हैं कि मैं अपनी पेंटिंग में ज्यादातर फूल – पत्ते हैंगूल , हाईताल,  से बने प्राकृतिक रंगों का प्रयोग करता हूं।

पत्नी ‘माया’ भी कला साधक

माधव कृष्ण दास की पत्नी माया सेनजी  दास भी एक कला साधक हैं। श्री दास कहते हैं कि मैं मानता हूं कि हम सब के जीवन की प्रोग्रामिंग ईश्वर ने सेट कर रखी है। हम सब भगवान के प्री प्लान पर ही चल रहे होते हैं। मेरी कला यात्रा को गति देने में पत्नी ‘माया’ का बड़ा योगदान है। वो मुझे हमेशा इन चीजों के लिए प्रेरित करती है। उसकी खुद की दिलचस्पी भी लोक कला और साहित्य में है।   उन्होंने   चेन्नई फिल्म इंस्टीट्यूट में  पढ़ाई के दौरान एडिटिंग में गोल्ड मेडल प्रदान किया गया था। वे दक्षिण भारतीय परिवेश में पली पढ़ी और मैं पूर्वोत्तर में पर हमारे बीच एक बेहतर तालमेल है ‌।

पत्नी माया सेनजी दास के साथ

वे आगे बताते हैं कि माया सेनजी दास ने  श्रीश्री माधव देव द्वारा रचित नामघोषा का तमिल में अनुवाद किया है। इसके साथ हीं दूरदर्शन के राष्ट्रीय चैनल के लिए उन्होंने महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव पर आधारित 13 एपिसोड का एक मेगा धारावाहिक का निर्देश भी किया है। उन्होंने असम राज्य गीत समेत कई असमिया गीतों का तमिलभषा में अनुवाद किया।

वे फिलवक्त गुवाहाटी के एक  न्यूज चैनल में  प्रोग्राम एडमनिस्ट्रेटर हैं। श्री दास कहते हैं कि हम असम के लोक गीतों को दुनिया भर में पहुंचाना चाहते हैं। इसके लिए हम उन्हें किताबों के तौर पर प्रकाशित के  पहल भी  कर रहे हैं साथ हीं हम इनके अन्य भाषाओं में अनुवाद पर भी ध्यान दें रहे हैं, ताकि अन्य भाषा के लोग भी हमारी विरासत को समझ पाएं, खास तौर पर महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव एवं माधवदेव के दिव्य रचनाओं को।

माधव कृष्ण दास के पुत्र जय कृष्ण दास और विजय कृष्ण दास एमसीए की पढ़ाई कर चुके हैं। जयकृष्ण को cotton विश्वविद्यालय में एमसीए की परीक्षा में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने के लिए गोल्ड मेडलप्रदान किया  था। विजय कृष्ण भी एमसीए करने के बाद फिल्म में ग्राफिक डिजाइनर के रूप में कार्य कर रहे हैं।

दिल्ली में गणतंत्र दिवस समारोह में कवरेज के दौरान

कलाकार से  सिनेमैटोग्राफर का  सफर
श्री दास बताते हैं कि संगीत की शिक्षा तो बचपन से ही मिलती रही। मैं उस वक्त गुवाहाटी कटन कॉलेज से जियोलॉजी में स्नातक कर रहा था। पढ़ाई के दौरान हीं में तबला वादन हेतु गुवाहाटी दूरदर्शन केन्द्र जाया करता था। वहां के एक तात्कालिक कैमरामैन ने मुझे सिनेमोटोग्राफी की पढ़ाई करने की सलाह दी।
मैंने उनकी सलाह मानते हुए 1990में बैंगलोर में इस कोर्स में दाखिला ले लिया। कोर्स पूरा होने पर मुझे उड़ीसा फिल्म इंस्टीट्यूट में लेक्चरर की नौकरी मिल गई।

यहीं माया सेनजी भी पढ़ाने आई थीं। हम एक दूसरे के करीब आएं  हमारे विचार विचार काफी मिलते थे, और फिर विवाह  के पवित्र बंधन में बंधने का फैसला लिया


इसके बाद मैंने चेन्नई में हीं कैमरामैन के तौर पर कार्य किया। फिर असम के ज्योति चित्रवन फिल्म इंस्टीट्यूट में कैमरा पढ़ाना शुरू किया। इसके बाद यूपीएससी के जरिए में दूरदर्शन में आ गया। मेरी पहली पोस्टिंग बिहार के मुजफ्फरपुर  दूरदर्शन केन्द्र में हुई फिर पटना।

दूरदर्शन परिवार का सदस्य होने का गर्व 

दूरदर्शन ने मुझे एक बड़ा फलक दिया। मुझे इस राष्ट्रीय परिवार का हिस्सा बनने पर गर्व है। यहां मैंने कई बातें सीखीं देश के अलग-अलग हिस्सों में जाने और संस्कृतियों को समझने का मौका भी मिला। यहां सभी सहयोगियों का भी भरपूर प्यार मिलता रहता है।

बिहारी लोकसंगीत के लिए काम करने की चाहत

माधव दास कहते हैं, मैंने बिहार में लम्बा वक्त बिताया है। बिहार ने काफी कुछ मुझे दिया भी है यही मेरा प्रमोशन भी हुआ। बिहार के लोगों का हर कदम पर सहयोग मिला है।

मेरी चाहत बिहार के गुम हो रहे लोग गीतों के संग्रह की है। मैं अपने छुट्टी के दिन का उपयोग बिहार के लोकसंगीत के संरक्षण और गुम हो रहे गीतों की खोज में करता हूं। 

मैं यहां के परंपरागत गीतों को एकत्र कर एक किताब की शक्ल देना चाहता हूं। ऐसे में वें संरक्षित हो सकेगी। मैं बिहार के प्राचीन वाद्य यंत्रों की खोज भी करने में जुटा हूं।

वे कहते हैं कि हमारे लोग गीतों को आज के परिवेश के अनुसार बनाकर उसे युवाओं से जोड़ने की जरूरत है। ध्यान यह रहें कि परंपरागत गीतों की मूल भावना और उसकी गहराई पर कोई खरोंच न आए। वे आगे कहते हैं संगीत तो हर जगह मौजूद हैं। हमारे हर क्रियाकलाप  में। लोकजीवन में, साइकिल की घंटी से लेकर  रेलगाड़ी की छुक छुक  तक‌ । हवाओं के झोंकों से लेकर सांसों के प्रवाह और दिल की धड़कन तक संगीत ही तो हैं। नन्हे से बच्चे की हंसी हो, या फिर बाल मन का क्रंदन संगीत ही हमें हर पहर , हर लम्हा बांधे रहता है।

एक संगीत साधक होने के नाते अगर मैं लोग संगीत के थोड़े से सुर -ताल भी अगली पीढ़ी के लिए संजो पाया तो मैं समझूंगा की मैंने अपने जीवन का उद्देश्य पूरा कर लिया। आज के इस एआई और वर्चुअल रियलिटी की दुनिया में संगीत ही है जो हमें इंसान बने रहने का स्वर देता है, मनुष्यता को बचाए रखने का स्वर देता है और इन्हीं स्वरों से मिलकर बनता है वह अलौकिक नाद जिसमें डूबकर शंकर देव कह उठते हैं ‘ मन मेरि राम चरणहि लागु। और कबीर गा उठते हैं ‘ मन लागो मेरा यार फकीरी में ‘
मेरे मन में भी बस एक छोटी सी ख्वाहिश है कि जब तक रहूं एक सच्चे संगीत साधक की तरह बचाए रखूं अपने दिल का वह साज जो हमें मशीन नहीं मनुष्य बनाएं रखता है।

 

( निवेदन: हम समाज की सकारात्मक कहानियों को सामने लाने की कोशिश कर रहे हैं।यह आपके सहयोग के बिना असंभव है। अगर आपके पास भी है ऐसी कोई कहानी तो हमसे साझा करें। आप हमारी आर्थिक मदद कर भी इस मुहिम को मजबूती दे सकते हैं। आपकी छोटी सी राशि हमें बड़ा संबल देगी। हमारा संपर्क सूत्र है 7488413830)

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