वेलोगों की हंसी खुबसूरत बना रहे। आत्मविश्वास के मोती भर चेहरे को नूरानी।
कोशिश कि लोग जिंदगी और जायका दोनों का चटखदार स्वाद ताउम्र बेफिक्री से ले सकें। ताउम्र स्वस्थ और सेहतमंद बने रहे। आज कहानी एक ऐसे युवा दंत चिकित्सक कि जिन्होंने पटना जैसे शहर में अत्याधुनिक दंत चिकित्सक तो शुरू की हीं दांतों के ट्रांस्प्लांट के महारथी बन अब तक हजारों लोगों का सफल ट्रांस्प्लांट किया। वे दुनिया घूमते है और सीखते हैं नई तकनीक।
खास यह भी कि अत्याधुनिक मशीनों से लैस इनका अस्पताल सीनियर सिटीजन के लिए होता है बिल्कुल मुफ्त। बदलते परिवेश में भी पेशे में इमानदारी और दिल में इंसानियत सजाए और बचाए रखने वाले डॉ रोहित सिंह की कहानी पढ़ें, अच्छा लगेगा।
पटना के ए एन कालेज के निकट Dental Comfort Zone में बड़े ही क़रीने से सजाएं गए वेटिंग लाउंज में अलग अलग उम्र के लोग अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं। सामने कुछ पत्रिकाएं रखीं हैं। वेटिंग लाउंज का शांत और सुकून देने वाला माहौल में दक्ष कर्मचारी आपसे स्नेह के साथ आपकी तकलीफ के बारे में पूछ रहे हैं। यहां ज्यादातर वैसे लोग हैं जिन्होंने पहले से अपना अप्वाइंटमेंट बुक करा रखा है। बारी आने पर उन्हें अंदर बुलाया जा रहा है। अंदर बड़े से हॉल नुमा चमाचम कमरे में अलग-अलग सेक्शन बनें हैं। यहां अत्याधुनिक कुर्सियां और दंत चिकित्सा के उपकरण लगे हैं। यहां डॉक्टर रोहित सिंह बड़े ही सहज और स्नेहिल व्यवहार के साथ मरीज़ से उसकी समस्या जान उसका इलाज करने में लगे हैं।
डॉक्टर रोहित की मीठी बातें और बल्व की हल्की पीली रौशनी यहां के माहौल को और खुबसूरत बना रही है। आपको यहां यह एहसास नहीं होता कि आप किसी अस्पताल में इलाज के लिए आए हैं।
न कोई शोर, न तनाव, न दवाइयों की बिखरी तेज गंध, और न ही बेरूखा व्यवहार।
सब कुछ ऐसा जैसे आप किसी महानगर के सितारा अस्पताल में आएं हों। डॉक्टर रोहित हमें मुस्कुराते हुए पास बने अपने डॉक्टर चेंबर की ओर ले जाते हैं। उन्होंने हमसे बातचीत के लिए अपने व्यस्ततम दिनचर्या से समय निकाला है। हम उनसे उनकी जिंदगी की किताब के तमाम बीते पन्नों की कहानियां जानना चाहते हैं। यह भी कि पटना जैसे शहर में इतना व्यवस्थित डेंटल क्लिनिक खोलने और इसे कुशलता के चलाने का ख्याल जमीन पर कैसे उतरा।
डॉक्टर रोहित कहते हैं।
हमारे पास जो भी लोग आते हैं वो तकलीफ और दर्द में होते हैं। वे हम पर भरोसा कर आते हैं ऐसे में हमारा फर्ज है कि हम उनकी परेशानियों को दूर करें और इसकी शुरुआत एक अच्छे माहौल, एक अच्छा व्यवहार और एक अच्छी चिकित्सा से होनी चाहिए।
हाइजिन और बेहतर माहौल आपको सुरक्षित तो करता ही है आपके दिल को खुशी भी देता है और यह एक बेहतर इलाज के लिए काफी फायदेमंद साबित होता है। डॉक्टर रोहित सिंह आगे कहते हैं
इन दिनों हम अपने चेहरे को आकर्षक बनाने के लिए महंगे ब्रांडेड क्रीम और फेसिएल तो करवाते हैं पर मुंह के अंदर की साफ सफाई और दांतों के ख्याल में कंजूस बन जाते हैं। दांत का ख्याल हमें तब आता है जब दांत में दर्द होता है।
जैसे ब्यूटी पार्लर जाना अपने रूटिन में शामिल कर लिया है वैसे ही समय समय पर एक कुशल डेंटिस्ट से मिलना भी जरूरी है।
आपकी सेहत का रास्ता आपके मुंह से जाता है और आपके मुंह का आवश्यक अंग आपके दांत है। आपके दांत और मुंह दोनों सुरक्षित है तो समझिए आपका शरीर और मन दोनों सुरक्षित है।
इन दिनों सबसे चौकाने वाली बात यह है कि ओरल कैंसर के आंकड़े लगातार बढ़ते जा रहे हैं। महानगरों के साथ छोटे शहरों और गांवों तक के लोगों में यह कैंसर तेजी से फ़ैल रहा है।
इसकी वजह हमारी बदलती जीवनशैली और खानपान है। हम इन दिनों फास्ट-फूड की तरफ़ खुब मेहरबान हैं। हम भारतीय परंपरागत खानों की जगह विदेशी खासतौर से चाइनीज फास्ट-फूड को दिनचर्या में शामिल कर लिया है। ऐसे में इसका असर हमारे दांतों पर भी हो रहा है। तंबाकू और नशे की लत से भी ओरल कैंसर की संभावना काफी बढ़ जाती है। ऐसे में मसूड़ों और दांतों का ख्याल रखना बेहद जरूरी है।
नया सीखने के लिए ट्रेवलिंग
डॉक्टर रोहित सिंह बताते हैं कि मेडिकल साइंस की तकनीक रोज बदल रही है। ऐसे में अपडेट रहना बहुत जरूरी है मैं और मेरी पत्नी… दोनों इसके लिए ट्रेवलिंग करते हैं। हम दुनिया घूमते है, दंत चिकित्सा पर हो रहे वर्कशॉप और सेमिनार अटेंड करते हैं और नई तकनीकी बदलाव की जानकारी प्राप्त करते हैं
इसके अतिरिक्त हम लगातार नए नए रिसर्च पेपर भी पढ़ते रहते हैं
यादों वाला बचपन
डॉक्टर रोहित बताते हैं कि मेरा जन्म 1982 में गया में हुआ। फिर कुछ दिनों बाद हम रांची आ गए। फिर हजारीबाग। पिताजी वहीं पदस्थापित थे। तब हजारीबाग भी बिहार का हीं हिस्सा था। मेरी शुरूआती पढ़ाई हजारीबाग सेंट जेवियर्स स्कूल से हुई। पिताजी लेबर कमिश्नर के पद पर थे। उनका तबादला होता रहता। 1988 में हम पटना आ गए।
यहां मेरा नामांकन संत माइकल हाईस्कूल में हो गया। मेरी 12 वीं तक की पढ़ाई इसी स्कूल से हुई। मैं आज जो भी हूं उसमें मेरे परिवार के साथ इस स्कूल की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इस स्कूल ने मुझे गढ़ा है।
बचपन की यादों में हजारीबाग शहर, वहां ऊंचे-ऊंचे साल के पेड़, कैनेरी पहाड़ी और संत जेवियर्स स्कूल का शानदार भवन आज भी किसी एल्बम सा महफूज है। तब पटना भी इतनी भीड़ वाला कहां था। पटना में उन दिनों ऊंची बिल्डिंगों की लाइनें नहीं थी न गाड़ियों की इतनी कतार।
हमारे स्कूल के पास से ही गंगा की धार कल- कल कर बहती दिखती और उसमें चलते नाव देख ऐसा लगता मानो जीवन मस्ती की धुन पर हिलोरें भरता चला जा रहा हो। गांधी मैदान के पास गोलघर शान से सीना तानकर खड़ा रहता। तब मोबाइल का ज़माना नहीं था। बेस फोन की घंटी बजती। कुशल क्षेम पूछती चिट्ठियां आती जाती। शहर में बदलाव दबे पांव आ रहा था पर इन सब के बीच एक अपनापन था । लगता पूरा शहर हीं बाहें फैलाकर स्वागत कर रहा हो। स्कूल में पढ़ाई के साथ साथ काफी एक्टीविटी भी होती। खेल और बौद्धिक चर्चाएं मुझे काफी पसंद थी।
परिवार का साथ-संग
माताजी का दुलार, पिताजी का स्नेह
बचपन से ही माता-पिता का स्नेह दुलार मुझे मिलता रहा। पिताजी डॉ अमरकांत सिंह के विचार काफी उच्च थे। वे मुझे हमेशा बेहतरी के लिए प्रेरित करते। मां डॉ उषा सिंह , पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय में हिंदी की उपाध्यक्ष थीं। मां के सानिध्य ने मुझे साहित्य किताबों से दोस्ती सिखाई। मां खुब दुलार देती साथ हीं नेक इंसान बनने की सीख भी।
दादाजी के कार्यों से मिली नई दृष्टि
मेरे जीवन में दादा जी के कार्यों का योगदान भी शामिल है। उनके जिक्र के बिना मेरी जिंदगी की कहानी कुछ अधुरी सी है। दादाजी इलाके के काफी प्रतिष्ठित व्यक्ति थे। हमारे गांव रामगढ़ जो मोहनिया ब्लाक और कैमूर जिले में है, वहां दादाजी की खासी प्रतिष्ठा रही। दादाजी वहां के हाईस्कूल के फाउंडर और उसके सेक्रेटरी भी रहे। दादाजी से जुड़ा एक और किस्सा साझा करना चाहूंगा। मेरे दादाजी और नानाजी पहले मित्र थे, फिर यह मित्रता रिश्तेदारी में बदल गई।
पढ़ाई के दौरान दोस्तों के संग डॉ रोहित
एक बायोग्राफी ने बदली जीवन की दिशा
स्कूल के दिनों से ही मन में ऐसा काम करने की चाहत थी जिससे जीविका के साथ समाज की भलाई भी जुड़ी हो। एक दिन एक पत्रिका में डॉ नरेश त्रेहन की बायोग्राफी छपी थी। मैंने वह बायोग्राफी पढ़ी। उस बायोग्राफी ने मेरे मन में यह सपना भर दिया कि मुझे भी डॉक्टर बनना है। तब यह नहीं सोचा था कि दंत चिकित्सक बनूंगा। नरेश त्रेहान आज भी मुझे प्रेरित करते हैं और सच कहूं तो उनकी प्रेरणा से ही मैं इस पेशे में आया।
तीन दिन इंजीनियरिंग की पढ़ाई, फिर डॉक्टर बने
डॉक्टर रोहित बताते हैं कि 1988 में पटना से बीडीएस किया। फिर पीजी दिल्ली से किया। दो दो बार इंट्रेंस निकाला। पहली बार में ट्रेक करने के बाद एडमिशन नहीं लिया। वे कहते हैं कि मैंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई भी मणिपाल यूनिवर्सिटी से की , पर यह पढ़ाई बस तीन दिनों की थी। वे आगे कहते हैं कि मैं स्कूल की पढ़ाई में भी एक अच्छा बच्चा था पर मेरा गणित काफी कमजोर था। वैसे भी मुझे चिकित्सक का पेशा काफी लुभाता था। यह एक ऐसा पेशा है जो लोगों के भरोसे और उनकी जिंदगी से जुड़ा हुआ है।
बिहार के अग्रणी डेंटल विशेषज्ञों में शामिल
डॉक्टर रोहित सिंह एक उच्च-शिक्षित और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रशिक्षित दंत चिकित्सक हैं। उन्होंने BDS (बैचलर ऑफ डेंटल सर्जरी) की मूल डिग्री के बाद MDS (मास्टर ऑफ डेंटल सर्जरी) के माध्यम से विशेषज्ञता हासिल की, जिससे वे सुपर-स्पेशलिस्ट स्तर के डेंटिस्ट बन गए। इसके साथ हीं उन्होंने एडवांस इम्प्लांटोलॉजी में पीजी डिप्लोमा, जर्मनी और अमेरिका से इंटरनेशनल क्लिनिकल ट्रेनिंग, तथा FICOI (USA) जैसी प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय फेलोशिप प्राप्त की है। डॉक्टर रोहित डेंटल इम्प्लांट, फुल माउथ रिहैबिलिटेशन, मसूड़ा रोग उपचार और कॉस्मेटिक डेंटिस्ट्री के विशेषज्ञ माने जाते हैं, यह आधुनिक डिजिटल डेंटिस्ट्री और लेजर तकनीक के क्षेत्र में डॉक्टर रोहित को बिहार के अग्रणी दंत चिकित्सकों में शामिल करता है।
पत्नी के सहयोग से सपनों को मिला आकार
डॉक्टर रोहित आगे बताते हैं कि 2013 में वे शादी के बंधन में बंध गए और बनारस की डॉ नेहा सिंह जीवन संगिनी बनीं।
डॉक्टर नेहा एक अच्छी पत्नी, एक अच्छी डाक्टर और अच्छी बहू और अब एक अच्छी मां की भूमिका बखूबी निभाती रही है। यह नेहा के प्रयासों का नतीजा ही है कि हम इस क्लीनिक को आकार दे पाए।
उसने निराशा भरे संघर्ष के दौर में मुझे हिम्मत दी है। तब मैं आर्थिक मजबूती के लिए कालेज में पढ़ाया भी। करता था और सिर्फ दो दिन ही यहां अस्पताल में देता था। डॉ नेहा ही यहां सातों दिन काम संभालती थी। वे कहती थीं कि जब हमारे पास हुनर है तो हमरा प्रयास जरूर रंग लाएगा। हमने शुरू के दिनों में ही तय किया था कि अपने इस नए वेंचर के लिए घर से पैसे नहीं लेंगे और ऐसा ही किया। नेहा एक अच्छी बहू भी है वो परिवार में सभी का ख्याल रखती है। बच्चों के परवरिश से लेकर मां, पिताजी की सेवा तक । मैं एक बात और कहना चाहूंगा कि डॉ नेहा ने निजी जीवन में कभी किसी चीज की डिमांड मुझसे नहीं की। पीजी के बाद तुरंत अस्पताल शुरू करना भी उन्हीं का निर्णय था।
गांव में खोला चेरिटेबल हॉस्पिटल
डॉक्टर रोहित ने अपने गांव रामगढ़ में दादा जी की याद में एक अत्याधुनिक डेंटल हॉस्पिटल भी शुरू किया है। इस अस्पताल में दंत चिकित्सक की तमाम आधुनिक मशीनें उपलब्ध है साथ ही इसमें मरीजों को एक अच्छा वातावरण देने की कोशिश की गई है। यहां की फीस काफी कम है। वें कहते हैं कि ऐसा इसलिए कि गांव के लोगों को भी गुणवत्ता पूर्वक दंत चिकित्सा उपलब्ध हो सके ।
समाजिक बदलाव के लिए भी कार्य
डॉक्टर रोहित और डाक्टर नेहा समाजिक बदलाव के कार्यों से भी जुड़े हैं। डॉक्टर रोहित कहते हैं कि हम पटना के एक मूक बधिर बच्चों के विद्यालय में समय -समय पर निःशुल्क डेंटल चेकअप कैंप लगाते हैं। वहां शुद्ध पानी के लिए वाटर प्यूरिफायर भी लगवाया है। इसके साथ बच्चों के लिए टेलिविजन भी इनके प्रयास से इस स्कूल में लगा है। डॉक्टर रोहित लायंस क्लब से जुड़े हुए हैं। इसके माध्यम से वे समाजसेवी गतिविधियों में लगातार शामिल होते रहे हैं।
डॉक्टर मतलब भरोसा
डॉक्टर रोहित बातचीत में यह कहते हैं कि डॉक्टर का मतलब भरोसा होता है। लोग आप पर विश्वास करते हैं ऐसे में हमारा काम इस विश्वास को बनाए रखना है।मुंह शरीर का दर्पण है । आज मुंह की बीमारियां तेजी से बढ़ रही है। मुंह के कैंसर के आंकड़े डराने वाले हैं। ऐसे में आपको मुंह के प्रति जागरूक रहना होगा। आप कोई भी समस्या आने पर अपने दंत चिकित्सक से संपर्क करें, और उनके बताए मार्गदर्शन पर कार्य करें।
नन्हें बेटे RIANN से मिलती उर्जा
डॉक्टर रोहित बताते हैं कि हमारा काम काफी जटिल होता है। यह एक थका देने वाला काम जैसा है। ऐसे में अपने नन्हे बेटे RIANN से हमें ऊर्जा मिलती है। मैं उसे लंबा समय तो नहीं दे पाता पर घर लौटने पर बेटे के साथ समय बिताना अच्छा लगता है। डॉक्टर नेहा बच्चे को समय देने के लिए हफ्ते में दो दिनों का पूरा वक्त निकालतीं है। हम चाहते हैं कि वह भी बड़ा होकर दंत चिकित्सा के क्षेत्र में आए। उसे अभी से इसमें रूचि भी है। फिलवक्त उसकी भोली बातें, मासूम सवाल और ढ़ेर सारा उत्साह हमें एक सुखद एहसास देती है।
इनमें खास रूचि
वे कहते हैं कि मेरी रूचि फिटनेस को लेकर हमेशा से रही है। मैं रोज जिम जाता हूं। मुझे पुरानी फिल्में देखना पसंद है। गाइड तीसरी कसम जैसी फिल्में अच्छी लगती है। मोहम्मद रफी मेरे प्रिय गायक हैं। मुझे उनका गीत गाना भी पसंद है। मैं खाली वक्त में रफी साहब के गीत गुनगुनाता रहता हूं।
इसके साथ साथ मुझे बायोग्राफी पढ़ना काफी अच्छा लगता है। स्टीव जॉब्स, एलन मस्क, की आटो बायोग्राफी मेरे मन को छू गई।
बच्चों की दांतों का ख्याल रखना जरूरी
डॉक्टर रोहित कहते हैं बच्चे हीं हमारे भविष्य हैं ऐसे में बच्चों की दांतों का ख्याल जरूरी है। हम दूध के दांत के खराब होने पर यह सोचकर केयर नहीं करते की यह दूध का दांत है पर यही दांत आने वाले नए दांत को भी प्रभावित करता है। एक साल बच्चे की उम्र होते ही एक डेंटिस्ट का चुनाव आपको कर लेना चाहिए। इसके साथ हीं चाकलेट, जंक फूड की आदत बच्चों में न लगने दें यह दांतों को कमजोर करता है।
चाहत मल्टीस्पेशलिटी डेन्टल हॉस्पिटल के निर्माण की
डॉक्टर रोहित बताते हैं कि चिकित्सक में काफी तकनीकी परिवर्तन हो रहे हैं।AI के आने के बाद यह क्षेत्र और भी बदल रहा है। ऐसे में मेरी कोशिश मल्टीस्पेशलिटी डेन्टल हॉस्पिटल के निर्माण की है जहां एक साथ कई सुविधाएं उपलब्ध हो सके। इस अस्पताल में हर आधुनिक संसाधन उपलब्ध हो।
हम पटना के साथ साथ जल्द ही झारखंड की राजधानी रांची में भी अस्पताल शुरू करने की कोशिश में हैं। झारखंड से मेरा खास लगाव भी रहा है ऐसे में मुझे लगता है कि वहां के लोगों को भी बेहतर सेवा प्रदान करना मेरा फर्ज है।
डॉक्टरी पेशा नहीं, जीने का तरीका
डॉक्टर रोहित कहते हैं मैं यह मानता हूं कि डॉक्टर बनना एक पेशा नहीं है, यह जीने का तरीका है।
हम कष्ट निवारण के कार्य से जुड़े हुए हैं। कष्ट देना हमारा मकसद नहीं होना चाहिए, चाहे यह कष्ट आर्थिक या मानसिक रूप में हो।यह पेशा काफी धैर्य वाला पेशा है। जीवन का मतलब कुछ ऐसा करें जिससे आने वाली पीढ़ी हम पर नाज करें।
बहरहाल Dental Comfort Zone के साथ डॉ रोहित सिंह न सिर्फ लोगों के दांतों में चमक भर रहे हैं बल्कि सेहत और मन को भी चमका दे रहे हैं नई उम्मीद और नया जज्बा।