‘डॉक्टर हृदय’ में पिता की स्मृतियां: पढ़ें डॉ. अरुण शाह के मनोभाव

डॉ. अरुण शाह प्रसिद्ध बाल रोग विशेषज्ञ हैं। इसके साथ ही वे समाजसेवा का अलख भी जगा रहे हैं। उम्र की थकान को हमेशा पीछे छोड़ जिंदगी के गीत गाने वाले डॉ. शाह ने अपने दिवंगत पिता स्वर्गीय हरिराम शाह जी की यादों को अपनी भावनाओं में कुछ यूं समेटा है कि हर एक पुत्र को उसे जरूर पढ़ना – सुनना और गुनना चाहिए – यह आलेख पढ़िए….

पिताजी, माताजी और भाई के साथ डॉक्टर अरूण शाह

आपकी बहुत याद आती है बाबूजी! प्रतिपल – प्रतिक्षण। जी करता है आपके कमरे के बाहर जा जोर-जोर से आपको पुकारूं, और आप कहें – अरे क्यों इतना शोर मचा रहे हो, आ रहा हूं न!  फिर बाहर आ, ठीक उसी तरह आप मेरे सर पर प्यार से हाथ फेरें, जैसे बचपन में फेरते थे और मैं आपके इस उन्मुक्त स्नेह की बरखा में चुपचाप भींगता रहूं। बाबूजी, हर सुबह ऐसा लगता है कि आप  पूजा कर रहे हों और आपके गाए भजन हमारे कानों को पावन । मैं झट से उठ बैठता हूं और हाथ जोड़ आपके भजन के स्वर में अपना स्वर मिलाने लगता हूं।

मैं वक्त-बेवक्त आपके ठौर पर आपकी राह देखता हूं। यह जानते हुए भी कि आप अब सदेह हमसे दूर चले गए हैं। बहुत दूर।,

चार पीढ़ियों को आशीर्वाद

आपकी दी हुई हिम्मत, उम्मीद और स्नेह को हम सब ने बड़े करीने से संभाल रखा है। आपकी यादें घर के हर कमरे – हर दर-ओ-दीवार पर मुस्कराहट बन चस्पा हैं। हम सब आपको बहुत याद करते हैं बाबूजी, आपकी नटखट परपोती अब भी अपनी तुतली आवाज में आपको पुकार लेती है। जानते हैं, अब वो स्कूल भी जाने लगी है।

हम सब पल-पल आपको याद करते हैं। बेटे, पोते, पोतियां सब के लिए आप ही तो हिम्मत थे बाबूजी। मां भी बहुत याद करती है आपको। आपके बिना अजीब सा एक खालीपन लगता है। एक ऐसा सुनापन जिसकी भरपाई कभी नहीं हो सकती।

वो उमंग भरे दिन: जन्मदिन पर बाबूजी

र जाता हूं तो देर तक आपकी उस कुर्सी के पास बैठ उसे निहारता रहता हूं जिस पर आप बैठा करते थे। वो कुर्सी अब खाली पड़ी है। आपका चश्मा… आपकी कलम… आपका नोटबुक सब वैसे ही रखे हैं करीने से, बस आप नहीं हो बाबूजी…!

बचपन की यादों की लंबी फेहरिस्त है। कैसे बचपन में मेरी छोटी-सी परेशानी भी आपके लिए बड़ी चिंता बन जाती थी और आप उसका समाधान ढूंढते। मुझे अब भी याद है, वही सात साल की उम्र रही होगी मेरी, जब मुझे चोट लगी और पैर में प्लास्टर लगने के बाद इंफेक्शन हो गया था। आप मुझे बेहतर इलाज के लिए तब पहलेजा घाट से पटना स्टीमर से ले जाते। मैं चल नहीं पाता तो मुझे कांधे पर बिठाकर आप ले चलते।तब डॉक्टर ने यह कह दिया था कि पांव काटने होंगे। आप बिना विचलित हुए इलाज में लगे रहे और मेरे दोनों पांव को सलामत रहे।

जमाना बचपन का: बाबूजी के साथ हम भाई-बहन

सच में, आप एक योद्धा थे बाबूजी…। कितनी बहादुरी से आपने जीवन के अंधेरे वक्त से लड़ाई लड़ी।

जीवन के हर उतार-चढ़ाव में आप स्थिर भाव से भरे रहते। ग़म में मुस्कुराते रहते। अंदर से मोम होकर भी बाहर फौलाद सा सख़्त बने रहते आप बाबूजी। मेरी खुशी में आप हर वक्त अपनी खुशी ढूंढते।

खुशियों बांटते चलें

स्कूल के वक्त आपने मेरे लिए कितनी प्यारी-सी साइकिल खरीदी थी। जब मैं घंटी बजाता हुआ साइकिल चलाता तो आप मुझे देख मुस्कुरा उठते।

बचपन में मैं रूठने का नाटक करता और आप मुझे मनाते। सोचता हूं, मैं फिर रूठने का नाटक करूं और आप फिर मुझे मनाने आ जाओ बाबूजी। जब मेरा दाखिला दरभंगा मेडिकल कॉलेज में हुआ तो आपने मेरे लिए एक स्कूटर खरीदा था। मैं उस स्कूटर से हर छुट्टी वाले दिन आपसे मिलने आता। जाते वक्त जरूरी सामानों की गठरी बांधते हुए आप मां से कहते – पूछ लो कि कुछ और जरूरी तो नहीं। जब मैं डॉक्टर बन गया तो आपने ही मेरी पहली कार खरीदी। जब आप शहर के काम से जाते और वापस लौटते तो आप हम सब बच्चों के लिए कुछ न कुछ चीजें लाना कभी नहीं भूलते।

समाज सेवा में भागीदारी

संत पुरुष थे आप बाबूजी

सादा जीवन, सुंदर विचार, ईमानदारी और खूब मेहनत – यही आपके जीवन का मंत्र था। आपसे हमने भी जीवन का यह मंत्र सीखा। खाने में भी सादा खाना, बस दाल-रोटी आपको पसंद आती। न कोई घमंड, न कोई दिखावा – बस अपनी धुन में मगन। अपने काम में खूब मेहनत, खूब ईमानदारी। यही वजह रही जिससे आपका प्रतिष्ठान उत्तर बिहार का सबसे प्रतिष्ठित और भरोसे वाला प्रतिष्ठान बन गया। 

मां के जन्मदिन पर बाबूजी का उत्साह

सब परिवार के लिए

अपने लिए आपने कभी कोई चाहत नहीं रखी बाबूजी। अंतिम दिन तक परिवार के लिए ही जुटे रहे। खुद सादा लिबास पहनते और हम सब के लिए ब्रांडेड कपड़े सिलवाते। खुद के सपनों को छोड़ हमारे सपनों में रंग भरते। हमारी छोटी-छोटी खुशियां पूरी करते। आप थे तो लगता कि हम सब महफूज हैं। हर परेशानी में लगता – बाबूजी हैं न, रास्ता निकाल लेंगे। लगता कोई है जो हमारा ख्याल रखता है।

आशीर्वाद बना रहे

आशीर्वाद साथ हमारे 

आज मैं जो कुछ भी हूं बाबूजी, सब आपके आशीर्वाद से ही संभव हुआ है। आपके ही मार्गदर्शन से हम सबने मंजिल पाई है। आपके पोते-पोतियां सब आपके बताए रास्ते पर चलते-बढ़ते हुए देश और दुनिया में अपनी पहचान बना रहे हैं। हम सब आपके आदर्श पर चल रहे हैं। आप लंबे वक्त तक हमारे साथ रहें, हमारी छांव बने रहें। मैंने सुना था कि कैसे बचपन में जब आप ढाई साल के थे, उस वक्त ही आपके सर से पिताजी का साया उठ गया था। पिता के बिना जीवन कितना कठिन होता है।

आप कठिनाई से लड़ते हुए बड़े हुए थे बाबूजी। कभी आपने हौसला नहीं खोया।

तब भी जब मैं हमेशा बीमार रहा करता था, और तब भी जब मेरी 15वीं सर्जरी का ऑपरेशन होना था। डॉक्टर ने काफी खतरा बताया, आप मुझमें हिम्मत भरते रहे। खुद चिंतित होकर भी परेशानी की लकीरें चेहरे पर न आने दीं। इसी विश्वास की वजह से मेरी सर्जरी कामयाब रही। आपकी संयमित जीवन शैली आपको स्वस्थ रखती थी, यदा-कदा कभी बुखार हो जाता और मैं आपकी तबीयत के बारे में पूछता तो आप कहते – अच्छा हूं, सब ठीक है। वो तो मां कह देती कि दो दिन से बुखार में हैं और तब मैं आपको गोलियां खिलाता। हजारों यादें जुड़ी हुई हैं आपसे बाबूजी।

आपने सीखाया स्वाद जिंदगी का 

आपसे मैंने हमेशा सीखा है कि जीवन का स्वाद कैसे लेकर जीना है – यह आपने ही मुझे सिखाया। समाज की सेवा को ईश्वर की सेवा मानना। यही धर्म कहा था आपने।

मुझे वो बातें भी याद हैं जब परिवार में लोगों की संख्या बढ़ने पर मैंने एक अलग घर की चाहत की थी और आपने न सिर्फ इसकी सहमति दी बल्कि मुझे मकान खरीदने में आर्थिक मदद भी की। आपको पुराने गीत कितने पसंद थे। हमेशा मुकेश, लता, किशोर के गाने आप सुनते-गुनगुनाते रहते थे। बाद में आपकी बेटियों ने आपको एक सारेगामा कारवां दिया था कि आपको मन का संगीत सुनने में आसानी हो।

आज मैं जब भी गीत गाता-गुनगुनाता हूं तो लगता है आप पास बैठे मेरा यह गीत सुन तालियां बजा रहे हैं।

बाबूजी, जब आप 80 की दहलीज पार कर गए, तब मैं हर हफ्ते जब भी मिलने आता कोशिश यही रहती कि आपको नन्हा सा बच्चा बना वैसे हंसा पाऊं, जैसे बचपन में आपने हमें हंसाया था। आपसे खूब बातें होती हम सब की। शाम की वो चाय और गप्पों की महफ़िल। आप सिर्फ एक पिता नहीं थे, आप मित्र भी थे, एक मार्गदर्शक भी, एक शिक्षक भी।

वो बेरहम वक्त

अभी तो आप एकदम स्वस्थ थे। आराम से खुद का सारा काम खुद करते। अचानक आप बीमार हुए और हम सब को छोड़ गए। 19 तारीख तक आप कर्मयोगी की तरह कार्य करते रहे। 20 तारीख को आपकी तबियत बिगड़ी हम सब ने आपको अस्पताल में भर्ती कराया और 21 तारीख को आप हमें छोड़ परलोक प्रस्थान कर गए। 

इस माया लोक से सबको विदा तो होना ही है। आप भी इस दुनिया से विदा हो गए।  सुकून यही कि हम सब हमेशा आपके बताए रास्ते पर चल रहे हैं। आपने तीन-तीन पीढ़ियों को गोद में खिलाया, उन्हें आशीष दिया। आप हमारी बगिया के बागवान बने रहे। बाबूजी, आपको टहलना खूब भाता था। सुबह-सबेरे हरी दूब पर चलकर मैं आपके पदचिन्हों को महसूस करना चाहता हूं।

गीता कहती है आत्मा अमर है, वह मरती नहीं। आप भी अमर हैं बाबूजी। हमारे पास ही तो हैं। घर के मंदिर के दीप की उजास बनकर, पलाश के ढेर सारे खिलते हुए फूल में मुस्कान बनकर, बारिश की नन्हीं बूंद में शीत बनकर, सूरज की पहली किरण में चमक बनकर। नीले-नीले अंबर में तारों की टिमटिमाहट बनकर आप हमें आज भी रास्ता बता रहे हैं।

जब भी कभी मन थकान से विचलित होता है, मैं आपकी ढेरों यादों को समेट गले लगा लेता हूं।
पावन हो उठता है मन। सांसें पुराण का मंत्र गा उठतीं हैं-

पिता स्वर्गः पिता धर्मः पिता हि परमं तपः।

पितरि प्रीतिमापन्ने सर्वा हि प्रीयते प्रजा॥”

यादें साथ हैं

मेरी आंखों के कोर से कुछ बूंदें टपक पड़ती हैं..। मैं आपकी ऊर्जा खुद में महसूस करता हूं, कदमों में हौसला भर आता है  , मैं चल पड़ता हूं उस मार्ग पर जिसे आपने अपने जीवन का मार्ग कहा था – सत्य का मार्ग कहा था। मोक्ष का मार्ग कहा था।

कोटि-कोटि प्रणाम बाबूजी!!!

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