‘रोजी रोटी मिलना’ ,’रोटी कमाना’, ‘रोटी सेंकना ‘और ‘रोटी तोड़ना’, ये सब मुहावरे है। जब ‘रोजी- रोटी’ कार्पोरेट सेक्टर की हो तो ‘रोटी कमाने’ में हीं सारा वक्त जाया हो जाता है। भागदौड़ ने ‘रोटी तोड़ने’ वाली परंपरा भी खत्म कर दी। ऐसे में घर लौट आटा गूंथ कर गोलू- मोलू रोटी बेलना और रोटी सेंकना किसी किसी जंग जीतने से कम नहीं होता। हड़बड़ी में कभी रोटी बनाओ भी तो उसके नैन नक्श गोल न होकर आड़े तिरछे हो जाते हैं । फिर अधपकी रोटी खाने और लंच बॉक्स में संभालने की जहमत कौन उठाए,
पर रोटी तो रोटी है। न मिले तो जिंदगी का स्वाद और सेहत दोनों के बिगड़ते देर नहीं लगती।
भागदौड़ वाली लाइफ और कारपोरेट नौकरियों के इस दौर में भी आपको स्वादिष्ट और सेहतमंद गोल गोल रोटियां बिना सेंके, बैठे बिठाए मिलती रहे तो थाली और जिंदगी दोनों चटखदार तो हो हीं जाएगी।
जी हां इसी सोच के साथ महाराष्ट्र के मुंबई की युवती Srushti zope ने शुरू किया है एक अनोखा स्टार्टअप। रोटी अब मोबाइल स्क्रीन के एक टच पर हो जाएगी अवेलेबल। सृष्टि ने इस स्टार्टअप को नाम दिया है
‘ आटा पिटा ‘
क्या है ‘आटा पीटा ‘का कांसेप्ट और यह हमारे सेहत और जेब के लिए कितना अनुकूल है पढ़ें इस आलेख में…
मैंने पढ़ाई के बाद कॉरपोरेट सेक्टर म जॉब किया पैसा पोजिशन सब अच्छा था। नहीं था तो बस समय , घंटों अपनी सीट पर बैठ काम करना ।
भूख मिटाने के लिए मैं फास्ट फूड्स की आदि होती चली गई। धीरे धीरे इस आदत से मेरा वजन बढ़ता चला गया। थकान ,नींद की कमी और चिड़चिड़ापन की दस्तक दबे पांव होने लगी। एक समय ऐसा आया जब मुझे बीमारी ने अपने आगोश में ले लिया और फिर काम की जगह अस्पताल, डॉक्टर और दवाइयां जीवन में दाखिल हो गई।
ऐसे में मेरे मन में ख्याल आता कि मेरी तरह काफी युवक- युवतियां होंगी जो भोजन में पोषक तत्व कमी से जूझ रहे होंगे। कहती हैं Srushti zope। वह आगे कहती हैं मैंने देखा की रोटी हमारे देश में भोजन का मुख्य हिस्सा है। इन दिनों रोटी ही हमसे दूर होती जा रही है। परिवार न्यूक्लियर है। पति- पत्नी दोनों नौकरी पेशा , उनकी तादाद ज्यादा है। हजारों लोग अकेले रह रहे। ऐसे में मुझे लगा कि क्यों न ऐसा कोई कंसेप्ट बनाया जाए जिससे रोटी लोगों को उनके घरों तक उपलब्ध कराई जा सके और वह सेहतमंद भी हो। इसी ने जन्म दिया हमारे स्टार्टअप आटा पिटा को।
याद आई बात दादी मां की
मेरी दादी एक कुशल गृहिणी तो थीं ही एक अग्रसोची भी थी। मेरा लगाव मेरी दादी से काफी ज्यादा था। दादा कभी कभी आटे में पालक डालकर रोटी भी बनाती कभी रोटी में स्ट्रफ कर उसे पकाती। इन सब का स्वाद काफी बेहतर होता और इसमें पोषक तत्व भी मौजूद होते थे। 25 अगस्त 2015 में दादी का निधन हो गया। दादी की बनाई वो रोटी और उसका स्वाद मुझे हमेशा प्रेरित करता रहा। दादी मुझसे सामाजिक बदलाव की बात भी कहा करती थी।
जब मैं बीमार हुई और मुझे दिन- रात काली- पीली बेस्वाद कैप्सूल लेने पड़ते तो दादी की पकाई रोटी का ख्याल आता जिसमें पोषण भी था। विटामिन , कर्बोहाइड्रेट, वहां, प्रोटीन सब कुछ। तब मैं सोचती क्यों न रोटियों को ही पोषक तत्वों से भरपूर बनाया जाए !जिसमें कभी हमें इनके लिए कैप्सूल न गटकना पड़े।
इन सब विचारों का मेल से ही आगे चलकर आटा पिटा ने आकार लिया। आप सोचिए शरीर में प्रोटीन की कमी को दूर करने के लिए प्रोटीन पाउडर खाना बेहतर विकल्प है या सिर्फ हमारी रोटी।
फिर छोड़ दी नौकरी
आटा पिटा की फाउंडर सृष्टि झोपे कहती हैं कि मैंने कॉमर्स से ग्रेजुएशन किया फिर डाटा साइंस और इकोनॉमिक्स में मास्टर्स की डिग्री ली। वह आगे कहती है कि मेरी पहली नौकरी रिलायंस इंडस्ट्री में
एनालिटिक्स एक्सपर्ट के तौर पर लगी, फिर उन्होंने प्रोडक्शन की ओर अपना रुख किया
साइबर सिक्योरिटी। लॉजिस्टिक्स, लीड जनरेशन, एआई में कई महत्वपूर्ण कार्य किए। वे आगे बतातीं हैं कि मुझे नाम , पैसा और शोहरत तीनों चीजें मिल रही थी पर कमजोर हो रही थी सेहत। फिर जब मैं बीमार पड़ी तो मुझे लगा कि मेरे जैसे लोगों को सेहतमंद बनाने और उन्हें रोटी उपलब्ध कराने के लिए मुझे काम करना चाहिए। फिर मैंने अपनी नौकरी छोड़ दी और शुरू हो गया आटा पिटा।
चुनौतियों के बीच मिला ‘आटा पिटा’ को रास्ता
सृष्टि झोपे कहती हैं कि मैंने जो दादी से सीखा था और हमारे परंपरागत रसोई में जिस तरह की रोटियां बनती है उसे पोषण से भरपूर बनाना चाहती थी। इसके लिए हमने रोटी बनाने की प्रक्रिया में पालक, चुकंदर जैसे पोषक तत्वों को मिलाना शुरू किया। यह प्रयोग काफी बेहतर रहा।
अब हमारे पास सबसे बड़ी चुनौती इसे संरक्षित रखने की थी। इसके लिए हम किसी तरह का कैमिकल प्रयोग नहीं करना चाहते थे।
संरक्षित रखने के लिए कैमिकल का प्रयोग काफी हानिकारक होता है। ऐसे में काफी रिसर्च करने के बाद मैंने पाश्चराइजेशन का फार्मूला अपनाया। हम रोटियों को गर्म करने के बाद इसे काफी ठंडा करते हैं। इससे इसके पोषक तत्वों को कोई नुक्सान नहीं पहुंचता और हानिकारक बैक्टीरिया मर जाते हैं। सृष्टि कहती हैं कि हम आपको जो रोटियां देते हैं उसे 45 दिनों तक उपयोग में लाया जा सकता है।
कई फ्लेवर की रोटियां उपलब्ध
सृष्टि झोपे आगे बताती हैं कि हमने रोटियों के कई फ्लेवर उपलब्ध कराएं हैं। इसके लिए भी हम किसी आर्टिफिशियल फ्लेवर का इस्तेमाल नहीं करते। अभी हमारे पास चार वेराइटी प्रमुख रूप से उपलब्ध है। इनमें Palak,Beetroot,Pumpkin,Carrot,High protein फ्लेवर वाली रोटियां लोगों को खुब पसंद आ रही है। वह कहती हैं कि रोटी के टुकड़े को हम चम्मच की तरह सब्जी में प्रयोग करते हैं यह मुलायम रहे हमने इसका भी ध्यान रखा है।
आगे हम इसमें और भी नया प्रयोग करने वाले हैं।
जेब का भी रखा ख्याल
सृष्टि झोपे कहती हैं की हमारे देश में हर आम वर्ग के लोग रहते हैं और रोटी सबकी आवश्यकताओं में शामिल है। इसलिए हमने रोटी – पिटा की रोटियों को पॉकेट फ्रेंडली रखा है। हम होम डिलीवरी के साथ 12 रुपये में चपाती उपलब्ध करवा रहे हैं।
लोगों का बेहतर रूझान
सृष्टि झोपे बतातीं हैं कि हमें बाजार से बेहतर रूझान मिल रहा है। अभी आटा पिटा की रोटियां मुंबई, पुणे अहमदाबाद में उपलब्ध हैं। जल्द ही हम इसका दायरा और बड़ा करने की पहल में जुटे हैं।हम इसे ई- कॉमर्स प्लेटफार्म पर लांच करने जा रहे हैं।
माता पिता के साथ सृष्टि
माता- पिता का मिला साथ
सृष्टि कहती हैं कि नौकरी छोड़कर खुद का स्टार्टअप करना आसान नहीं था। कई लोगों की प्रतिक्रिया थी कि यह बड़ा रिस्क है। पर मेरे परिवार के लोगों ने मेरा साथ दिया। पिताजी prashant zepe और माताजी sheetal zope ने मेरा हौसला बढ़ाया। मेरे पिताजी बिजनेस बैकग्राउंड से हैं और मां शिक्षा के क्षेत्र से दोनों ने हर कदम पर मेरा साथ दिया।
कायम रहे देश की संस्कृति और स्वाद
सृष्टि झेपे कहती हैं कि हमारे देश में अलग अलग संस्कृतियां हैं। सबकी अपनी-अपनी विशेषताएं भी। ऐसे ही व्यंजनों के साथ भी है। हमारे देश के परंपरागत व्यंजनों में सेहत का राज छुपा है।
मैं देश की संस्कृति और स्वाद को बचाने और इसे दुनिया भर में फैलाने की पहल करना चाहती हूं। आजके वक्त में हमारे परंपरागत जायकों को फिर से अपनाकर ही हम स्वस्थ रह सकते हैं। सृष्टि होंठ पर मुस्कान भरते हुए कहती हैं तो क्यों हम अपने
दादी -नानी के जायकों को फिर से अपनाएं और अपनी थाली को स्वादिष्ट बनाने के साथ ही देश को सबल और स्वस्थ भी बनाएं।
( thebigpost.com समाज की प्रेरक कहानियों को समाज के सामने लाता है। इस कड़ी को मजबूत रखने के लिए आप आर्थिक सहयोग कर सकते हैं। आपका छोटा सा सहयोग हमें बड़ा संबल प्रदान करेगा)