“मैं जब छोटी थी, तो बगीचे में मधुमक्खियों के पीछे दौड़ती ,उन्हें फूलों से रस निकालते देखती थी। धुन में मगन हो छत्ते बनाते देखती थी।सच कहूं तो मेहनत और लगन मैंने इन्हीं से सीखी है।”
कहती हैं बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के पटियासा गांव की रहने वाली अनीता कुशवाहा । अनीता ने गरीबी से लड़कर न सिर्फ खुद को शिक्षित किया बल्कि मधुमक्खी पालन कर आज एक सफल उद्यमी में शुमार भी हो चुकी हैं।

कहानी मधु से मिठास भरने वाली हनी गर्ल अनीता कुशवाहा की।
वो मुफ़लिस वाले दिन और मेरी जिद
thebigpost.com के मॉडरेटर vivek chandra से बातचीत करते हुए अनीता पुराने दिनों को याद कर भावुक हो जाती हैं। वें कहती हैं वो बहुत बुरा दौर था। तब हमारा परिवार बेहद गरीब परिवार में शामिल हुआ करता था। मेरे माता और पिताजी खेतीहर
मजदूर थे। काम भी हमेशा नहीं मिलता। ज्यादातर काम के बदले भी अनाज हीं मिला करता था तब उसी से हम सब की जीविका चलती थी।

मेरे गांव पटियासा का माहौल ऐसा था कि लड़कियों को स्कूल भेजना जरूरी नहीं माना जाता था। मुझे भी शुरुआती दिनों में स्कूल जाने से रोका गया। कहा जाता वहां जाकर क्या करोगी। “पता है तब मैं क्या करती थी !
मैं चुपके से स्कूल जाकर बच्चों के पीछे बैठ जाती थीं, और स्कूल की पढ़ाई का हिस्सा बन जाती।”
यह क्रम कुछ दिनों तक चला।
...और मान गए पिताजी
एक दिन ज़िद करके अपने माता-पिता को पढ़ाई के लिए मनाया। वें मान गए और मैं स्कूल अधिकार के साथ जाने लगी। अब मैं बहुत खुश थी। कागज पर सपनों के अक्षर सजाती, जोर जोर से कविताएं गाती। यह सब चलता रहा।
“जानते हैं मुफलिसी आपके सपनों को जीने नहीं देती। वह बार बार अड़ंगा डाल उसे रोकती है।”
मेरी पढ़ाई शुरू तो हुई पर आगे चलकर पढ़ाई जारी रखने के लिए पैसों की दिक्कत आने लगी। पिताजी की कमाई न निश्चित थी न उतनी की मुझे पढ़ा पाते। बचपन से ही मैं थोड़ी ज़िद्दी रही हूं तो मैंने भी जिद की पढ़ाई तो छोड़ना नहीं है। खुद से निचली कक्षा के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने का काम सोचा और शुरू कर दिया। काम चल निकला। अब मुझे पढ़ाई और खुद के खर्च के पैसों के लिए पिताजी पर बोझ नहीं बनना पड़ता।

मधुमक्खियां ने दिखाया रास्ता
अनीता कुशवाहा आगे कहती हैं हम मुजफ्फरपुर जिले से हैं और आपको मालूम होगा कि यह दुनिया भर में शाही लीची के लिए प्रसिद्ध है। मेरे गांव में भी लीची के खुब पेड़ हैं। वो लीची का सीजन था।इसी दौरान मेरा ध्यान मधुमक्खियों की ओर गया। लीची के पेड़ों पर मधुमक्खियां अपना राग गाते हुए मंडरा रही थीं। वह फूलों से रस निकालतीं।

मैंने सोचा क्यों न इन मधुमक्खियों से कमाई का रास्ता ढूंढा जाएं। क्यों न इन्हें पालकर शहद निकाला जाए। मैंने घर में इसकी चर्चा की पर किसी ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। उल्टे मुझे समझाने लगे, पर कहा न मैं हूं जिद्दी। ट्यूशन की कमाई से कुछ पैसे इकट्ठा किया और पहलापहला बी बॉक्स (Bee Box) खरीदा।शुरुआत में काफी परेशानी आई।
“मधुमक्खियों के डंक से चेहरा सूज जाता।
गांव के लोग देखकर मेरा मजाक उड़ाते । “सब कहते बेवकूफ यह काम लड़कियों का नहीं है, “काबिल मत बनो”
छोटा काम बना बड़ा कारोबार
अनीता आगे कहती हैं कि सब कुछ अनसुना कर मैं अपने काम में लगी रही। धीरे धीरे अनुभव भी बढ़ा और बक्से भी।
पहले ही साल मुझे लगभग 10,000 रुपये का मुनाफा हुआ, अब मेरा मनोबल बढ़ा चुका था।एक-दो बॉक्स से बढ़कर 100 बॉक्स और फिर 200 से ज्यादा मधुमक्खी बॉक्स हो गए।
मेरा सालाना उत्पादन 100 क्विंटल तक पहुंचा। परिवार वालों की आर्थिक स्थिति भी सुधरने लगी। वें कहती हैं आज मेरी साल में लाखों रुपये की कमाई है।

NCERT के किताब तक कहानी
अनीता की कहानी जानकर UNICEF ने उन्हें अपनी “Girl Stars” मुहिम के लिए चुना और अनीता दुनिया भर में हनी गर्ल के रूप में प्रसिद्ध हो गई।अनीता के संघर्ष और सफलता की कहानी पर फिल्म और किताबें बनीं। यही नहीं अनीता कुशवाहा की कहानी को स्कूलों में पढाएं जाने वालेNCERT की किताब (कक्षा 4) के चैप्टर में शामिल किया गया।
अनीता कहती हैं…
“आज कभी कभी जब मैं पीछे मुड़कर देखती हूं तो लगता है क्या मैं वहीं लड़की हूं जिसने इतना संघर्ष किया है।”
वाकई बहुत संघर्ष के दिन थे वह और उसी संघर्ष ने मुझे तराशा है। एक ग्लोबल पहचान दी है।
शुरुआत में जहां अनीता के परिवार वालों ने इस काम का विरोध किया था , वहीं बाद में उनके पिता भी इस काम में उनके साथ जुड़ गए।आज अनीता न सिर्फ अपने परिवार को बेहतर जीवन दे रही हैं, बल्कि अपने बच्चों की पढ़ाई पर भी खास ध्यान दे रही हैं।
उनका सपना है कि उनके बच्चे बिना संघर्ष के अच्छी शिक्षा पा सकें।

बनाया अपना ब्रांड
आज अनीता ने अपना ब्रांड Anita’s honey बनाया है।अनिता कुशवाहा कहती है कि Anita’s honey आज एक भरोसे का नाम बन चुका है। हम शुद्ध शहद उपलब्ध करवा कर इस भरोसे को हमेशा कायम रखना चाहते हैं। हम गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं करते।
अनीता ने मुजफ्फरपुर के मिठनपुरा में अपना शो रूम भी खोला है। अनीता कहती हैं कि हम लीची के शहर से हैं तो लीची का शहद तो हम उपलब्ध करवाते ही हैं इसके साथ साथ और कई वेराइटी के शहद भी हमारे यहां मिल जाएंगे ।

इसमें मस्टर्ड हनी, तुलसी हनी, जामून, शहजन आदि के हनी भी हमारे ब्रांड में शामिल है। सबके अपने अपने फायदे हैं। आज सोशल मीडिया की वजह से मेरा बिजनेस देश के साथ विदेशों तक भी फ़ैल गया है।
मेरा खास लगाव मुजफ्फरपुर शहर से हैं। मैं यहीं रहकर अपने प्रोडक्ट को दुनिया में और मशहूर करना चाहती हूं।
“मुजफ्फरपुर शहर ,लीची की तरह हीं मिठास से भरा है । हमें यहां बाबा गरीबनाथ का आशिर्वाद मिलता है तो बूढ़ी गंडक मैया का आशीष भी। यहां के लोग अच्छे हैं, मीठे है। मैं अपने ब्रांड से न सिर्फ खुद को बल्कि अन्य किसानों और मधुमक्खी पालकों को साथ लेकर आगे बढ़ना चाहती हूं। युवाओं से यहीं कहुंगी कि संघर्ष ही सफलता का द्वार है।”
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