याद है आपको वो चिट्ठियों का जमाना। वो पोस्टकार्ड, अंतर्देशी और लिफाफे में खत भेजना और वो चटख लाल अपना प्यारा ‘letter box’। लेटर बाक्स से जुड़ी कुछ यादों को हमने इस खत में संजोने की कोशिश की है। आप पढ़ें और कमेंट में अपनी यादों को भी करें साझा….

प्रिय, लेटर बॉक्स,
यह पहला और शायद अंतिम खत तुम्हारे नाम। अब हम तुमसे कितने दूर हो गए हैं। फास्ट टेक्नोलॉजी के दौर में तुम पर हुए जुल्म भी मालूम है, पर चिट्ठी की अपनी मर्यादा है सो सर्वप्रथम कुशलता की कामना करता हूं। यह जानते हुए कि तकनीकी क्रांति और फास्ट लाइफ की परिभाषा में हम तुम अब बहुत दूर हो गए हैं।

ख़त लिखते आंखें नम हो गई
जानते हो, आज तुम्हें याद करते-करते जी भर आया। आंखें नम हो गई। तो सोचा क्यों न खत ही लिख दूं। फिर लिखने से जी घबराने लगा। कैसे लिखूं। क्या लिखूं। उसे जिसने अपने जीवन में न जाने कितने लाखों-लाख खतों की संवेदनाओं को सहेजा है। भावनाओं की कद्र की है। अक्षरों को महसूस किया है। उनकी खुशी में झूमा है और ग़म में दिलासा दी है। वो हर खत को अपने जिस्म में समेट ठिठुरती सर्दी में गर्माहट दी है। बारिश में खुद भीग, खतों को महफूज किया है। गर्मी में लू के थपेड़ों से उन्हें बचाए रखा है ताकि वो कुशल मंगल पते पर लिखने वाले का पता बताती हुई हाज़िर हो सके।

…कि पाती पते पर पहुंचेगी जरूर
भरोसा इतना मजबूत कि तुम्हारे पेटी में हर कोई चिट्ठी डाल निश्चित हो जाए कि पाती पते पर पहुंचेगी जरूर। आज की तरह न इंटरनेट के गायब होने की बैचैनी, न नेटवर्क कमजोर होने की शिकायत, और न ही 399 के रिचार्ज की चिंता। एक बच्ची भी खत उसी निश्चिंतता से तुममें डालती जिस निश्चिंतता से दादाजी। हम इसे चिट्ठी गिराना कहते थे।

हर आंखों में बसता था तुम्हारा ख्याल
तुम्हारा वो सुर्ख़ लाल रंग और श्याम होठ। हर आंखों में तब तुम्हारा ख्याल बसता था। चाहे मुहल्ले के पहलवान जी हों या फिर शर्मा जी की नई नवेली दुल्हन। लिफाफा, अंतर्देशीय, और पोस्टकार्ड की रंग-बिरंगी दुनिया के हीरो बन हर चौराहे पर तुम सीना तान खड़े रहते। शहरों की भागम-भाग हो या गांवों का चौक एक ही अंदाज़ में खड़े मिलते थे तुम। कहीं-कहीं तुम्हारा बाल रूप लटका रहता। उस पर सफेद अक्षरों से पिनकोड और चिट्ठी निकालने का समय दर्ज होता।

गुलाबी लिफाफे में कितनी उम्मीदें सुर्ख़ गुलाब होती
कोई दूर शहर से बेटा अपने पिता को खत लिखता, तो कोई प्रेमी अपनी प्रेमिका को। याद है न नए साल पर रंग-बिरंगे ग्रीटिंग कार्ड्स के वो गुलाबी लिफाफे जिनमें न जाने कितनी उम्मीदें सुर्ख़ गुलाब होती थीं। कितनी रूह, चंपा-चमेली। बहुत याद आते हो तुम ‘लेटर बॉक्स’! बहुत याद आता है वो ज़माना। जगजीत सिंह की ग़ज़ल ‘चिट्ठी न कोई संदेश…’ में जा तुझे महसूस करता हूं तो कभी गुलज़ार की नज़्म में। शहर-दर-शहर जा तुम्हें ढूंढाता हूं। तुम मिले पर मौन।गांव की पगडंडियों की खाक छानी वहां भी मायूसी मिली। बहुत मन करता है कि तुम मिलो उसी उमंग से और मैं रंगीन लिफाफे में पांच रुपए का टिकट साटकर एक रूमानी सा खत गिराऊं।

यादों की चिट्ठियां, रूह में महफूज
बचपन की ढेर सारी यादें हैं तुम्हारे साथ ‘लेटर बॉक्स’। इन यादों की चिट्ठियों को रूह में महफूज रखा है मैंने तुम्हारी तरह। बहुत कुछ कहना है तुमसे – बहुत कुछ लिखना भी, पर शब्द कम पड़ रहे।
कम लिखे को ज्यादा समझना। पता भी तो नहीं तुम्हारा। बस बेपते का यह खत भेजा रहा हूं। तुम्हारे नाम। इस उम्मीद के साथ कि तुम्हारा जवाबी खत जरूर मिलेगा और मैं गा उठूंगा
“बड़े दिनों के बाद हम बेवतनो को याद, वतन की मिट्टी आई है, चिट्ठी आई है, चिट्ठी आई है….।”
इसी उम्मीदों के साथ,
तुम्हारा, विवेक।


