दादाजी ने समोसे का लालच दे business सीखाया , आज हैं BIA प्रेसिडेंट, राम लाल खेतान के सफलता की कहानी पढ़िए

वें पिछले पांच टर्म से वे BIA के अध्यक्ष हैं। बिहार के सबसे बड़े मार्केट कॉम्प्लेक्स खेतान मार्केट के निर्माता हैं। बिहार के बड़े व्यवसायियों में शामिल हैं और इन सब से बढ़कर हैं एक मुकम्मल इंसान, जिन्होंने इस घोर बाज़ारवादी समय में भी अपनी संवेदनाओं को हानि-लाभ के पलड़ों से बचाए रखा है। आज कहानी श्री राम को अपना आदर्श मानने और उस  पर चलने-बढ़ने वाले राम लाल खेतान की।

हां से शुरू करूं? बहुत सी बोसीदा यादें हैं, बचपन की भी और इस शहर पटना की भी। नन्हीं उम्र में पटना से जो रिश्ता जुड़ा, वह अब तक कायम है।

दादाजी, पिताजी और माताजी के परलोकवासी हो जाने के बाद पटना ही तो है, जिसकी गोद में बैठकर अब भी मैं बालपन वाली ज़िद कर बैठता हूं। यह शहर मुझे अपनों का एहसास दिलाता है, अपनेपन का एहसास दिलाता है और एहसास दिलाता है उस वजूद का, जिसे हम ज़िंदगी कहा करते हैं।

ग़म में इस शहर ने  हीं ढाढ़स बंधाया है, सुख-दुख में एक जैसा बने रहना सिखाता है। सच कहूं तो मुझे मेरी ज़िंदगी की यात्रा इस शहर की यात्रा जैसी लगती है।

वो बचपन के दिन

मेरा जन्म 5 अप्रैल 1960 को हुआ था। जन्म के दिन रामनवमी थी। तब हमारा परिवार पटना सिटी के हीरा नंद साह गली में रहता था। जन्म के दिन रामनवमी होने के कारण मेरा नाम भी प्रभु राम से जुड़ गया—रामलाल। परिवार धर्म-कर्म में खूब आस्था रखता था। जन्म के बाद हर जन्मदिन पर घर में रामायण पाठ होता रहा।मैं भी हमेशा श्री राम का नन्हा बालक बनकर उनके बताए रास्ते पर चलने की कोशिश करता हूं।

ऐसा रहा बचपन 

मेरे पिताजी मोतीलाल खेतान व्यवसायी थे। माताजी सरला देवी खेतान गृहिणी और सामाजिक महिला थीं। माताजी-पिताजी के प्यार के साथ मुझे दादाजी का भी खूब दुलार मिला। दादाजी लाड़-प्यार में ही ज़िंदगी की सीख भी सिखा देते थे। बचपन के नन्हें कदम गिरते-संभलते हुए जब थोड़े मजबूत हुए और मैं शब्दों की भाषा में संवाद करने लगा, तो मेरी शिक्षा-दीक्षा की चिंता परिवार में शुरू हुई। फिर क, ख, ग के प्रारंभिक ज्ञान के बाद मेरा दाखिला पटना सिटी के सेंट जॉन एकेडमी में कराया गया। यह पादरी की हवेली में चला करता था।

अब घर से निकलकर स्कूल जाना अब मेरी दिनचर्या में शामिल हो गया। स्कूल में मेरे कई बाल सखा बने।

हम अपने दोस्तों के साथ भोलेपन में दुनिया की अचरज भरी बातें किया करते—कभी रेडियो की, कभी टमटम की, तो कभी गोलघर की ऊंचाइयों पर हम सभी दोस्त एक-दूसरे का ज्ञानवर्धन करते रहते।

सभी जल्दी बड़े होना चाहते थे, जिससे पढ़ाई-लिखाई से मुक्ति और मस्ती की शुरुआत हो सके। कभी-कभी हम टीचर के गुस्से से बचने के लिए मन ही मन भगवान जी से गुहार भी लगा लेते।

उस वक्त स्कूलों में ब्लैकबोर्ड और चॉक से टीचर पढ़ाते थे। हम बच्चों के पास टीन और मिट्टी के बने स्लेट होते थे। तब स्कूलों में बस्ता-बैग के साथ टीन की छोटी पेटियां ले जाने का प्रचलन था।

रांची स्थित विकास विद्यालय

यादें विकास विद्यालय की 

पांचवीं के बाद मेरा दाखिला रांची के विकास विद्यालय में कराया गया। यह एक बोर्डिंग स्कूल है। इसके विशाल कैंपस में मुझे अपने घर, शहर और मोहल्ले की गलियां खूब याद आतीं। इस स्कूल की तब काफी साख थी। हमें पढ़ाई के साथ-साथ खेल और कलात्मक गतिविधियां भी सिखाई जाती थीं। दिन भर तो कट जाता, पर रात का पहर साह गली की यादों में बीतता। मां की भी खूब याद आती।

विकास विद्यालय में मेरी आठवीं तक की पढ़ाई हुई। फिर स्वास्थ्य समस्या की वजह से मैं पटना लौट आया।
उस वक्त 1971 की जंग चल रही थी। पेट में कुछ समस्या आई थी। पीएमसीएच में मेरी सर्जरी हुई।तबीयत ठीक होने के बाद मेरा दाखिला पटना के बुद्ध मूर्ति के पास एक स्कूल में कर दिया गया।
फिर से अपनी गलियां, अपना शहर और अपने लोग।
हीरानंद साह गली में हम सब बच्चे चोर-सिपाही जैसे खेल खेलते। मेरे भाई श्याम लाल खेतान, बहन विनीता, सुनीता, अनीता—सब परिवार में एक-दूसरे का ख्याल रखते थे।

मैं रिक्शे पर साइकिल लाद ले गया 

उन दिनों पटना शहर में मोटरसाइकिल और मोटरगाड़ियों की भीड़ नहीं थी। मैं घर से स्कूल पैदल ही जाया करता। फिर कुछ दिनों बाद दोस्तों की साइकिल देख, मैंने भी मां से साइकिल खरीदने की ज़िद कर डाली। मां ने पिताजी से आग्रह किया और फिर मेरी खूबसूरत बीएसए एसएलआर साइकिल खरीदी गई। उस वक्त मैं ठीक से साइकिल चलाना भी नहीं जानता था। मैं साइकिल रिक्शे पर लेकर घर गया था।

पटना के राजेंद्र नगर की पुरानी तस्वीर, तब वह कुछ ऐसा दिखता था

 दिल में बसी है हीरानंद साह गली 

उस वक्त पटना सिटी से पटना जाने के लिए टमटम चला करता था। फटफटिया गाड़ी भी चलती थी। पटना सिटी के हीरानंद साह गली की बहुत सी यादें हैं। यह गली इतनी संकरी थी कि जब पिताजी ने कार खरीदी तो वह घर तक नहीं आ पाती थी। हमारे घर में तब एक रेडियो भी था। जब यह बजता तो हम सब भाई-बहन बड़े ध्यान से इसकी ओर देखते। हमें बड़ा आश्चर्य लगता कि इस डब्बे से आवाज कैसे आती है। हमें लगता जरूर इसके अंदर कोई आदमी बैठा होगा।

तब समाज में सादगी के साथ अपनापन भी था। मुहल्ले के एक-दो घरों के फोन और फ्रिज से पूरे मुहल्ले का काम चलता ही नहीं, दौड़ता था।

फोन आने पर लोगों को सम्मान के साथ बुलावा भेजा जाता, तब फोन पर बातों के साथ आने वाला व्यक्ति चाय, शर्बत का आनंद भी उठाता। इसी तरह अगर कोई अतिथि बाहर से आता तो फ्रिज वाले घर से बेहिचक लोग ठंडा पानी और बर्फ मांग लेते। तब न मांगने वाले में हिचक होती, न देने वाले में घमंड। छोटी से बड़ी जरूरतें इस सामाजिक समरसता से आराम से पूरी हो जाती थीं। तब किसी परिवार की समस्या उसकी समस्या न होकर पूरे मुहल्ले या समाज की समस्या होती थी। अब हम सोशल मीडिया पर तो हैं, पर व्यक्तिगत जीवन में अनसोशल होते जा रहे हैं। आज समाज की छोड़िए, परिवार का हर सदस्य अपने फोन में मगन दिखता है। अब परिवार के सदस्यों के बीच खुलकर बातें होती हैं, न ही रिश्तेदारों का आना-जाना। वह मीठा अपनापन गुम हो चुका है।

वो पुराने दिन: तब कुछ ऐसा था पटना

मैं एक और किस्सा सुनाता हूं। पिताजी ने जब कार खरीदी और वे उससे पटना सिटी से पटना जाते, तो हमारे पड़ोस के लोग अधिकार के साथ उस पर सवार हो जाते। उन्हें पिताजी भी पूरा सम्मान देते। आज हम किसी की गाड़ी में लिफ्ट मांगने से पहले हजार बार सोचेंगे, न जाने गाड़ी वाला कैसा व्यवहार करे।

एक थान से बनता सब भाई -बहन का कपड़ा 

हम पांचों भाई-बहनों को जब कपड़े की जरूरत पड़ती, तो एक रंग के थान से ही सबका कपड़ा लिया जाता और हम टेलर के पास जाकर उसका नाप दे आते। कपड़ा बनने पर हम सभी एक बैंड पार्टी के सदस्य लगते।

बाबूजी ने लिया नया मकान 

1975 में हम पटना सिटी  के मकान को छोड़कर पटना के राजेंद्र नगर आ गए। यहां पिताजी ने डॉ. शिव नारायण सिंह जी का मकान खरीदा। आज तक हम उसी मकान में रह रहे हैं। मुझे याद है, इसी साल पटना में बाढ़ आई थी और राजेंद्र नगर डूब गया था। तब मुहल्ले में नाव चल रही थी।
1978 में मैट्रिक पास करने के बाद मेरा एडमिशन वाणिज्य महाविद्यालय, पटना में हुआ। यहां से 1978 में मैं छात्र संघ चुनाव में वाइस प्रेसिडेंट के पद के लिए चुनावी मैदान में भी उतरा, पर जीत हासिल नहीं हो पाई। सन 1980 में मैंने स्नातक की पढ़ाई पूरी की।से

बिहार कै पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी के साथ रामलाल खेतान

बिजनेस सीखाने के लिए समोसे का लालच

पिताजी का सीमेंट से  बिजली के खंभे बनाने का बिजनेस था। फतुहा में इसकी फैक्ट्री थी। साथ ही स्टेशन रोड पर एक मशीनरी पार्ट की दुकान थी। यह दुकान ही उस वक्त सीमेंट खंभे वाले बिजनेस का दफ्तर भी बना हुआ था।
वें बताते हैं कि मेरे दादाजी और पिताजी चाहते थे कि मैं बिजनेस की बारीकियां सीखूं। उन दिनों इसके लिए पिताजी ने नायाब तरीका निकाला। उन्होंने मुझसे कहा कि अगर तुम फैक्ट्री जाओगे तो एक रुपए रोज मिला करेंगे। इसके साथ स्कूटर और तेल का खर्च भी मिलेगा।
मुझे लगा यह जेब खर्च निकालने के लिए अच्छा अवसर है और मैंने हामी भर दी। मैं रोज फैक्ट्री जाने लगा। मुझे पिताजी एक रुपए भी दे देते।


इधर दादाजी ने भी मुझे लालच दिया। उन्होंने यह शर्त रखी कि अगर फैक्ट्री के बाद तुम दुकान पर भी शाम में आ जाया करोगे तो मैं रोज एक समोसा तुम्हें खिलाऊंगा।
दादाजी की चाल भी कामयाब हो गई और मैं समोसे के लिए शाम को दुकान पर भी बैठने लगा। मुझे बाद में समझ आया कि पिताजी और दादाजी की यह चालबाजी मुझे बिजनेस की बारीकियां सिखाने के लिए थी।
बाद में मुझे इससे काफी फायदा मिला और मैं बिजनेस अच्छे से संभाल पाया।

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन जी के साथ चर्चा के दौरान

स्टील फैक्ट्री का संभाला काम 

1982 में पिताजी ने स्टील की एक फैक्ट्री खरीदी। इस फैक्ट्री का पूरा काम मैं देखता था। 90 के दशक में स्टील निर्माण में बड़ी कंपनियां आने लगीं। इस कारण हमें घाटा लगने लगा और वह फैक्ट्री बंद हो गई।
बाद में हमने बिहार की पहली प्लास्टिक हाउसहोल्ड की फैक्ट्री लगाई। इसके बाद 2005 में पहली प्लास्टिक फर्नीचर यूनिट भी लगाई। इसका नाम हाईटेक प्लास्टिक है।

जीवन साथी का साथ

वे आगे बताते हैं कि 1984 में मैं विवाह के बंधन में बंधा और कोलकाता की संगीता खेतान जीवन संगिनी बनीं। मेरे जीवन के तमाम उतार-चढ़ाव, सुख-दुख में उनका अनमोल सहयोग मिला।
खास तौर से तब भी जब मैं 1987 से बुरी तरह से बीमार हो गया था। तब उन्होंने मेरी पूरी देखभाल का जिम्मा खुद उठाया था। इसी तरह 2000 में भी जब मेरी सर्जरी हैदराबाद में हुई।मां के निधन के बाद सारे घर का कामकाज संगीता ने अच्छे से संभाल लिया।

बच्चो के प्यार से मिट जाती सारी थकान

बच्चों के बारे में बताते हुए राम लाल खेतान कहते हैं कि हमारी दो बेटियां और एक बेटा है। बड़ी बेटी डॉ. नेहा, छोटी डॉ. नूपुर और बेटा नितीश हैं। सभी अपने करियर में अच्छा कर रहे हैं, यह देखकर मुझे खुशी होती है।

पटना का खेतान मार्केट

ऐसे तैयार हुआ अनोखा खेतान मार्केट

हमने पटना में एक बेहतर आधुनिक मार्केट कॉम्प्लेक्स बनाने की सोची, जो अपनी डिजाइन और गुणवत्ता में देश में स्थान रखता हो। इसके लिए हमने भारत के तमाम बड़े मार्केट कॉम्प्लेक्स का मुआयना किया, उनकी वास्तुकला देखी और इसके बाद खेतान मार्केट का डिजाइन तैयार हुआ।
खेतान मार्केट के निर्माण में तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव जी का अमूल्य सहयोग हमें मिला। आज भी यह मार्केट कॉम्प्लेक्स बिहार का सबसे बड़ा मार्केट है। इसमें कुल 1208 दुकानें हैं।

जब हमारी फैक्ट्री में आईं इंदिरा गांधी

राम लाल खेतान पुरानी तस्वीर दिखाते हुए कहते हैं कि हमारे फतुहा वाली फैक्ट्री में इंदिरा गांधी जी आई थीं, तब वह प्रधानमंत्री थीं। वे आगे कहते हैं कि उस पद पर रहते हुए भी उनमें गजब की सादगी और व्यवहार कुशलता दिखती थी।
मुझे याद है कि वह अपना छाता खुद हाथ में पकड़े थीं। हमारी बहन को भी उन्होंने गोद में लेकर काफी देर तक दुलारा। आज छोटे से पद पर जाकर लोग अहंकार से भर जाते हैं। तब और अब लोगों की सोच में काफी परिवर्तन आ गया है। राजनीति का मिजाज भी इतने सालों में काफी बदल गया।

प्रसिद्ध कथावाचक मोरारी बापू के सानिध्य में

धार्मिक कार्यों में रम गए पिताजी

पिताजी कभी राजनीति में नहीं रहे, लेकिन राजनेताओं से उनके संबंध काफी मधुर हुआ करते थे। हमारे घर तब बड़े-बड़े राजनेताओं का आना-जाना लगा रहता था। पिताजी वनबंधु परिषद के अध्यक्ष रहे। इस संस्था को उन्होंने काफी ऊंचाई दी।
इसके साथ ही वे बिहार चेंबर ऑफ कॉमर्स के अध्यक्ष पद पर भी रहे।
पिताजी की रुचि प्रारंभ से ही धार्मिक कार्यों में काफी ज्यादा रहा करती थी। वे सामाजिक कामों में भी पूरा समय देते थे।
माताजी के देहांत के बाद पिताजी पूरी तरह से धार्मिक कार्यों में रम गए। पिताजी ने पटना में नामी संतों को बुलाकर उनका कार्यक्रम करवाया। इसमें मोरारी बापू, किरीट भाईबाबा रामदेव आदि शामिल हैं।
उन्होंने मां के देहावसान के बाद पटना सिटी के अपने भवन को तुड़वाकर वहां पर स्कूल खोला। इस स्कूल में बच्चों को मुफ्त शिक्षा दी जाती थी।
वे आगे बताते हैं कि पिताजी को बाबा भूतनाथ नामक तांत्रिक में गहरी आस्था थी। वे उनके आध्यात्मिक गुरु भी थे। पिताजी ने बाबा को मंदिर बनाने के लिए जमीन दी थी। आज का भूतनाथ रोड उन्हीं के नाम पर है।


लालू जी से पारिवारिक रिश्ते

राम लाल खेतान बताते हैं कि लालू जी से मेरे पारिवारिक रिश्ते रहे हैं। मेरी बेटी उनकी बेटी के साथ पढ़ाई किया करती थीं। उनके परिवार से काफी पुराना संबंध रहा है, पर यह संबंध राजनीतिक नहीं है।
व्यक्तिगत तौर पर लालू प्रसाद जी नरम दिल के आदमी हैं।

व्यवसायी भाइयों की परेशानी दूर करना मेरा कर्तव्य 

राम लाल खेतान कहते हैं कि BIA से मेरा काफी पुराना रिश्ता रहा है। मैं यहां शुरू में ट्रेजरर बनाया गया था। इसके बाद सेक्रेटरी और फिर वाइस प्रेसिडेंट और पांच टर्म से प्रेसिडेंट हूं।
मेरी कोशिश रहती है कि बिहार में उद्योग-धंधों का विकास हो। इसके साथ ही हमारे व्यवसायी भाइयों को बिजनेस में जो दिक्कतें आ रही हैं, उनका समाधान निकाल सकूं।
मैं BIA को बिजनेसमैन और सरकार के बीच का सेतु बनाए रखना चाहता हूं।

देखिए, बिहार के लोग काफी मेहनती हैं। यहां बाजार भी उपलब्ध है। बिजनेस यहां काफी आगे बढ़ सकता है, पर सरकार को भी इसके लिए हम सब की समस्याओं से अवगत होना पड़ेगा।

बिहार में बिजनेस को बढ़ावा देने की सरकारी योजना बनाने से पहले जमीन पर उसका अवलोकन भी जरूरी है।
नीतीश जी के शासनकाल में सड़क और बिजली दोनों की हालत काफी बदली है। बिहार की नई सरकार से भी हमें काफी उम्मीदें हैं।

52 बार देखी फिल्म शोले 

राम लाल खेतान बताते हैं कि मुझे ग़ज़ल सुनने के साथ ही फिल्मों का शौक भी रहा है। मैंने शोले फिल्म 50 बार देखी।
एक बार हम दोस्तों के साथ फिल्म देखने पटना से मुजफ्फरपुर चले गए थे। मुझे मुगले आजम फिल्म का एक-एक संवाद अब भी याद है।

युवाओं को संदेश

बिजनेस में धैर्य की जरूरत पड़ती है। जो युवा इस क्षेत्र में आना चाहते हैं, उन्हें आइडिया के साथ धैर्यवान भी होना चाहिए। अगर कहीं कोई गड़बड़ी हो तो हमें लोगों से शिकायतों की जगह मिलकर व्यवस्था को ठीक करने की जरूरत है।
ग़ज़ल सुनने का शौक रखने वाले राम लाल खेतान हमें जगजीत सिंह की ग़ज़ल की लाइनें सुनाते हैं—

“इस पुरानी बेवफ़ा दुनिया का रोना कब तलक
आइए मिल-जुल के इक दुनिया नई पैदा करें।”
वे कहते हैं हमें मिल-जुल कर एक नई दुनिया बनाने की जरूरत है, जो लालच, भय, भूख और ईर्ष्या से दूर सबकी मुस्कुराहटों को साथ लेकर खिलखिलाता हो।

Share Article:
5 1 vote
Article Rating
Subscribe
Notify of
0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments