‘सत्य’ की राह, हौसलों से ‘जीत ’ पटना के डॉक्टर सत्यजीत की यह कहानी पढिए… 

मेरी कहानी में सुख का राग भी है तो दुःख के करूण स्वर भी, जिम्मेदारियों का एहसास भी और उन्मुक्त होकर जीवन के रंगों को मुट्ठियां भींच भर लेने के पल भी। देश की माटी से परदेश की जमीं तक यादों के सतरंगी सुर अब भी जेहन में  यूं  ताजा हैं जैसे कल की बात हो। शांति सेना के कैंप से लेकर ब्रिटेन की सरजमीं और खाड़ी युद्ध तक की। अब भी याद है मुझे ।

बाबूजी की वो सीख जिसने मुझे आदमी बनाए रखा,  स्वामी सहजानंद सरस्वती जी का वह जीवन मंत्र  संघर्ष: एवं जीवनस्य सार: ( संघर्ष ही जीवन का सार है) भी , जिसने मेरे हौसले को फौलाद बना दिया। 

यूं तो संघर्ष बचपन से ही मेरे हिस्से आया था। जन्म के बाद से ही बार- बार पीएमसीएच अस्पताल का बिस्तर ही ठिकाना  बनता रहा।
तब से अब तक लड़ता ही तो आ रहा हूं। कभी नियति से, कभी वक्त से, तो कभी खुद से, एक योद्धा की तरह। सोचता हूं जो भी कमाया, बनाया, बचाया वह मनुष्यता के काम आएं। मैं रहूं न रहूं मेरे कर्म एक बहादुर सिपाही की तरह निडरता के साथ फिजा में घुलते हुए हर अंतिम आदमी के चेहरे पर मुस्कान बिखेर सकें। बचा सकें बच्चों की खिलखिलाहट ,   बन सकें दादी मां के झुर्रिदार चेहरों की बीच तैरती हुई प्यारी सी हंसी। बस इतनी सी ही ख्वाहिश है मेरी। यह संभव हो सका तो मैं समझूंगा की मैंने वो वादा पूरा कर दिया जो मैंने बाबूजी से किया था। स्वामी जी से किया था और किया था खुद की आत्मा से। बस इसी कोशिश में चरैवेति -चरैवेति का मंत्र लिए इस उम्र में भी चलता जा रहा हूं मनुष्यता के पथ का एक  पथिक बन। कहते हैं रूबन मेमोरियल अस्पताल के संस्थापक  डॉ. सत्यजीत कुमार सिंह।
स्वामी जी के विचारों की संगत ने मुझे गढ़ा 
  डॉक्टर सत्यजीत पुराने दिनों की याद ताजा कर कहते हैं मेरा जन्म पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल में हुआ। पिताजी वकील थे। माता जी गृहणी। हमारा पुस्तैनी गांव पटना जिले के बिहटा का अमहारा रहा है।
यहां स्वामी सहजानंद सरस्वती जी ने अपना आश्रम बनाया था। यहीं से वे समाज-सुधार और किसान आंदोलन की दिशा तय करते थे। गांव की संगत में स्वामी सहजानंद सरस्वती के विचारों से संगत हो गई।
स्वामी सहजानंद सरस्वती
मुझे लगता है कि मुझे गढ़ने और आत्मबल मजबूत करने में इन विचारों का अनमोल योगदान रहा है।
बचपन से लेकर अब तक की अनगिनत  यादें हैं,  अनगिनत किस्से हैं। किसे साझा करूं, किसे छोड़ दूं।  इन यादों में दादाजी की कहानी भी है।
दादाजी के हौसले से प्रेरणा 
मैं मानता हूं कि मेरे दादाजी  श्री वासुदेव नारायण सिंह मेरे लिए प्रेरणा स्त्रोत रहें हैं। जब जीवन में अंधेरा गहराने लगे तब भी उम्मीद का दामन थाम उसे रौशन किया जा सकता है। यह मैंने दादाजी से सीखा है। दरअसल किस्सा यूं है कि हमारे गांव अमहारा में भयानक महामारी फैली। इस महामारी में हमारे परिवार के कई सदस्यों की मौत हो गई। एक तरह से कहें तो दादाजी और  उनके बड़े भाई का लड़का बचा था बस। काफी दर्दनाक था सब कुछ।
दादाजी गांव छोड़ पटना आ गए। पटना में खड़क विलास प्रेस में काम सीखा। यह उन दिनों काफी प्रसिद्ध प्रेस था।
आजादी के आंदोलन में भी इस प्रेस की महत्वपूर्ण भूमिका रही।यहां से बिहार बंधु नामक अखबार निकलता था।
दादाजी ने यहां छपाई और प्रेस के काम से जुड़ी बारिकियां सीखीं। फिर वे शिलांग चले गए। कुछ समय तक वहां काम किया फिर पूर्णिया आएं और यहां काम किया। दादाजी ने चालिस साल तक शादी नहीं की। इसलिए की उन्हें  भतीजे की परवरिश करनी थी। वे मानते की अगर शादी के बाद मेरी पत्नी इसे ठीक से नहीं रखेगी तो मेरे भाई की आत्मा को चोट पहुंचेगी। पूर्णिया में दादाजी अर्जुन लाल प्रेस में काम करते थे। यहां कमाकर दादाजी ने सौ बीघा जमीन खरीदी।
गहरी थी पिताजी की सोच 
मेरे पिताजी पेशे से वकील थे पर उनकी सोच काफी गहरी थी। पिताजी की शुरूआती पढ़ाई बिहटा स्कूल से हुई। यहीं वें स्वामी जी के संपर्क में आए। इसका उनपर काफी प्रभाव पड़ा। अपने जीवन काल में पिताजी समाजिक कार्यों से जुड़े रहे। उनकी राजनीतिक चेतना भी काफी मजबूत थी। वे पटना विश्वविद्यालय सिनेट के मेंबर और कालेज के सेक्रेटरी रहे। कम्यूनिस्ट मूवमेंट के भी पिताजी सेक्रेटरी थे।
घर आते विदेशी मेहमान
पिताजी के सामाजिक और राजनीतिक सरोकार
और विचारधारा के कारण उन दिनों हमारे घर में विदेशी डेलिगेट भी मेहमान के तौर पर आते रहते। हम बच्चों को भी कभी कभार इनसे बात करने का मौका मिल जाता। पटना में रहकर हमारा परिवार दुनिया  के विचारों और संस्कृतियों से ताल्लुक रखता था। मुझे यह अच्छी तरह याद है कि पिताजी के समय में हमारे घर में कभी किसी दूसरे परिवार की शिकायत या किसी कमी की चर्चा हुई हो। हम उन दिनों घर में विदेशी नीति, भारतीय दर्शन, कार्ल मार्क्स के सिद्धांत की चर्चा खाने की मेज पर करते।
बीमारी वाला बचपन और पीएमसीएच का बेड 
आपको लगता होगा आज मैं डॉक्टर हूं, और मेरा नाता अस्पताल से है। ऐसा नहीं है। अस्पताल से मेरा नाता बचपन से ही जुड़ा रहा है। उन दिनों हम बाकरगंज के दलदली में रहा करते थे। मैं बचपन में काफी बीमार रहता था। इस कारण 9 साल की उम्र तक मैं स्कूल भी नहीं है जा पाया था। मुझे बार-बार टाइफाइड होता। पीएम सीएच के बच्चा वार्ड से उन दिनों मेरा अस्थाई घर ही बन गया था और अस्पताल का बिस्तर दुनिया। डॉक्टर आते मेरी जांच करते।वार्ड की सिस्टर कभी मुझे उबला अंडा खिलाती तो कभी संतरा देती। इलाज के दौरान ही मेरे शरीर में खून बनना बंद हो गया। वहां के डॉक्टर और नर्स मुझे रक्त देते। इन सब को देखकर डॉक्टर का पेशा बचपन से प्रभावित करने लगा था। संयोग ऐसा कि बचपन में जिस पीएमसीएच में भर्ती होता वही से डॉक्टरी की पढ़ाई भी की।
पुनपुन नदी
पुनपुन नदी और बाढ़ में राहत कार्य 
डॉ .सत्यजीत कुमार आगे कहते हैं कि पिता को समाजिक कार्यों को करना खुब भाता। वे हमें भी बचपन से ही समाजिक कार्यों में भागीदारी के लिए प्रेरित करते।  मेरे गांव के थोड़ी दूर पर पुनपुन नदी बहती है। तब लगभग हर साल पुनपुन नदी में बाढ़ आ जाती। नदी के पास के  बाशिंदे इससे प्रभावित होते। मुझे याद है कि मेरी उम्र लगभग 13 साल तब रही होगी। मैं भी उस दौरान राहत कार्य में जुड़ा था। बाद में हर साल में इस कार्य में जुड़ा रहता था। 1967 में उत्तर बिहार में भयानक बाढ़ आयी थी। उस वक्त हम लोगों से  अनाज और कपड़े इक्ट्ठा करते और फिर पीड़ितों के बीच बांटते। यह सब पिताजी की ट्रेनिंग थी। वे कहते लोगों के दुःख में काम आना ही जिंदगी है। मैं भी मानता हूं जीना इसी का नाम है। हम इंसान हैं और हमारे अंदर की करूणा ही हमें इंसान बनाती है। दुःख इस बात का है कि इन दिनों तेजी से मानवीय मूल्यों का हरास हो रहा है,  संवेदना मर रही हैं। इसे बचाए रखना जरूरी है।
डॉक्टर बनने का सपना और पिता का वो आदेश 
डॉ सत्यजीत कहते हैं कि मैंने बचपन से ही सोच रखा था डॉक्टर का पेशा अपनाना है। पिताजी की गिनती पटना के बेहतर वकील के रूप में होती थी। मैं वकालत करता तो कई सहुलियते मिल जाती पर मैंने ऐसा नहीं किया। पिताजी से कहा कि मुझे डॉक्टरी का पेशा अपनाना है। उन्होंने इजाजत तो दी पर एक शर्त रख दी। शर्त यह कि मैं अपने गांव के मरीजों को सही दवा और बेहतर इलाज में हमेशा मददगार रहूंगा और इस पेशे की गरिमा बरकरार रखूंगा। मैंने पिताजी का आदेश स्वीकार किया और इस पेशे में आया।
जंग के दौरान मुक्ति वाहिनी की सेवा 
मैं पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल में पढ़ाई कर रहा था। जुनियर डॉक्टर के रूप में समाजिक कार्यों में भी मदद करता था। हमारा थर्ड इयर रहा होगा। 1971 में   मुक्तिवाहिनी और पाकिस्तान के बीच लड़ाई शुरू हो गई। भारत मुक्ति वाहिनी का साथ दे रहा था। बिहार की लंबी सीमा बंगलादेश ( तब के पूर्वी पाकिस्तान) से मिलती थी। यहां भी इसका असर दिख रहा था। सीमा से सटे इलाकों में जंग का  असर था।
ऐसे में जब मुझे इस बात की जानकारी हुई तो मैंने कॉलेज के साथियों के सीमा पर जा  वहां जाकर मेडिकल कैम्प लगाकर सेवा करने की योजना बनाई।
इसके लिए मैं सबसे पहले तात्कालिक प्राचार्य डॉ. गोविंदाचार्य से मिला और आग्रह किया कि हमें जाने की आज्ञा प्रदान करें। मैंने उनसे कहा लड़ाई चल रही है ऐसे में जो रिफ्यूजी बीमार या घायल होंगे हम उनके लिए कैंप लगाएंगे। सैनिकों की मदद भी करेंगे। डॉ. गोविंदाचार्य मेरी बातों से काफी प्रभावित हुए। मुझे शाम को बुलाया और बिहार के तात्कालिक गवर्नर डीके बरूआ के यहां ले गए। हमारे प्राचार्य ने गवर्नर साहब से मेरा परिचय कराते हुए कहा कि इनकी योजना युद्ध के दौरान मेडिकल कैंप लगाने की है।
फिर गवर्नर साहब ने मुझसे पुछा कैसे और क्या करना है। मैंने योजना बतलाया उन्होंने तत्काल अपने एडीसी को बुलवा कर मुझे दो सौ रूपए दिलवाएं और कहा डॉक्टर कल सुबह आकर आप चिट्ठी ले जाना। मेरी खुशी का ठीकाना नहीं रहा। मैंने दोनों को धन्यवाद दिया और आगे की तैयारी में जुट गया।
जब बस हो गई चार घंटे लेट 
हम जरूरत के सामान और  तैयारियों के साथ लेटर लेकर लेकर  किसनगंज के लिए बस पकड़ने निकले ।पता चला बस चार घंटे लेट है। टीम में हम 6  लोग थे। अब हमें लंबा इंतजार करना था। कहते हैं न अच्छा काम करो तो ईश्वर आपकी मदद करते हैं तभी वहां हमें मैडम सूरी जो हमारे कॉलेज की प्रोफेसर थीं उनके पति मिल गए।वे BSF में कमांडेंट थे, फिर क्या था हम सभी BSF के वैन में बैठकर सिल्लीगुड़ी पहुंचे। वहां डीएम से मिलकर राज्यपाल का लेटर दिया। उन्होंने हमारी सराहना करते हुए मदद करने की बात कही। हमें रेडक्रास की ओर से काफी मदद मिली, बीएमपी का  ट्रक, दो ड्राइवर, दो खलासी और हम छह दोस्त कैंप लगाने निकल गए।
कैंप में डॉ. गोपाल प्रसाद हमारे सिनियर थे। दिसंबर 71 तक यह कैम्प चला। अलग अलग प्लाटून का बैच आता रहता, हम उनका इलाज करते, उन्हें जरूरी दवाइयां देते।
वापस लौटने पर हमने गवर्नर साहब को सब कुछ बताया वह काफी खुश हुए। हम तीन माह वहां रहे थे। कालेज में इस काम के लिए हम सबों की खुब तारिफ हुई। कॉलेज क ओर से  मुझे एक उपाधि और स्पेशल ब्लेजर दिया गया।
 पिताजी का खत और भविष्य की चिंता 
मुक्तिवाहिनी की सेवा के बाद मन खुब उत्साहित था। पिताजी भी खुश थे पर उन्होंने इसे जताया नहीं। एक रोज घर में मेरे नाम एक चिट्ठी लिख छोड़ी। मैंने खत पढ़ा। उसमें उन्होंने लिखा था कि आप अच्छा काम कर रहे, लेकिन पढाई करोगे तभी अच्छा करोगे। अभी इस काम की जिम्मेदारी किसी को दे दो। पिताजी के ख़त में मेरे भविष्य को लेकर चिंता साफ दिख रही थी फिर मैंने भी ज्यादा वक्त पढ़ाई पर लगाना शुरू कर दिया।
रांची में पहली नौकरी 
MS करने के बाद मेरी नौकरी बिहार सरकार के स्वास्थ्य विभाग में लग गई। मेरी नियुक्ति  रांची के निकट बुरमू प्रखंड में हुई।
पत्नी पास के मार्डन मिशन अस्पताल में काम करने लगी। मुझे ms किए दो साल हो चुके थे, मैं सर्जन बनना चाहता था। इसके लिए जुलाई 1978 को मैं इंग्लैंड चला गया।
इंग्लैंड में पढ़ाई भी, नौकरी भी
यहां इंग्लैंड में मैंने रेजिडेंट डॉक्टर के तौर पर नौकरी कर ली। इसके साथ ही लंदन यूनिवर्सिटी से FRCS किया और यूरोलॉजी में डिप्लोमा किया। frcs करने के बाद रेजिडेंट डॉक्टर की नौकरी छोड़ दी। पढ़ाई के दौरान मैं दिन में पढ़ाई करता और नाइट सिफ्ट में नौकरी करता।
डॉ सत्यजीत बताते हैं कि साउथ पॉल में हम एक सिख परिवार के किरदार के रूप में रहते थे। मुझे जहां frcc की ट्रेनिंग के लिए भेजा गया वहीं मुझे नौकरी भी मिल गई यूरोलॉजी रजिस्टार की।
प्रतिकात्मक तस्वीर
स्कॉटलैंड का शांत टापू और “मेरी मैक्डोनल्ड ‘
मैंने स्कार्ट लैंड के एक टापू में रजिस्टार का काम कुछ दिनों के लिए किया था।यह शांत टापू समंदर के बीच में स्थित है यह एक धार्मिक जगह भी है।वे हमें वहां का वाकया सुनाते हैं।
मेरे पास इस टापू पर एक 70 साल की महिला इलाज के लिए आई। मैंने उनका इलाज किया, दवा दी और उन्हें सोमवार को जांच के लिए बुलाया। उन्होंने मुझसे हिंदी में पूछा आप कहां से आए हो भारत से?
मैंने आश्चर्य से उनकी ओर देखते हुए कहा, हां लेकिन! आप हिंदी कैसे जानती हैं।
फिर उन्होने बताया कि जबलपुर में उन्होंने आदिवासी बच्चों के साथ काम किया है। उन्होंने अपनी कहानी बताई। फिर उनसे हमारे परिवार का गहरा संबंध हो गया। मैं उस टापू से ग्लास्को वापस आया , फिर लंदन आ गया। पर मेरी मैक्डोनल्ड मैम से हम जुड़े रहे। वो हमारे बच्चों के जन्मदिन पर स्पेशल केक भेजती रहती। चार साल बाद मेरे कंसल्टेंट ने बताया की मेरी मैम बीमार हैं। पता चला उन्हें कैंसर हो गया। हमने सीधे गाड़ी निकाली और खुद ड्राइव किया। फिर जहाज पकड़ पांच घंटे में मेरी मैम के घर तक पहुंचें।
पता चला कि वें तीन माह से बिस्तर से नहीं उठीं थीं।
हमें देख वो मुस्कुरा कर उठ बैठी और पत्नी से कहा कि मुझे चपाती सब्जी बना कर दो। मेरी पत्नी ने उन्हें चपाती बनाकर खिलाया। इसके बाद मेरी ने दुनिया को अलविदा कह दिया।
यह वाक्या बताते बताते डॉ सत्यजीत की आंखें नम हो जाती है, खुद को संभालते हुए वें आगे कहते हैं।
 उनसे मुझे और मेरे परिवार को विदेशी धरती पर इतना स्नेह मिला की शब्दों में बयां करना मुश्किल है। उन्होंने भारत में आदिवासी समाज के लिए काफी काम किया था।
भारत से उन्हें खूब लगाव  था। वो हमारे परिवार की सदस्य की तरह हो गई थीं। एक अभिभावक की तरह परिवार के हर सदस्य की खोज खबर लेती। उन्हें स्नेह देतीं। सच कहूं तो मेरी इंसानियत की मिसाल थीं। ताउम्र वो दूसरों की खुशी के लिए जीती रहीं।  मैंने तय किया है कि अपने नर्सिंग कालेज का नाम उनके नाम पर रखूंगा। यह उनके प्रति मेरी श्रद्धांजलि होगी।
लंदन में मकान खरीदा , दिल बिहार
लौटने को बेचैन
डॉ.सत्यजीत बताते हैं कि मैं अपने काम में आगे बढ़ रहा था। 1990 में मैं कंसल्टेंट के तौर पर काम करने लगा। नार्थ लंदन में कलीनिक  खोल   प्राइवेट  प्रैक्टिस भी करता। पैसे अच्छे आने लगे। लंदन में मकान भी ले लिया। बच्चे अच्छे स्कूल में पढ़ने लगे।
लेकिन पिताजी के मोटिवेशन से वापस लौटने की इच्छा मजबूत होने लगी। सोचा भारत लौट जाता हूं, पर जिस सम्मान और गर्व से हम वहां जीवन जीते थे उसमें पैसे बहुत बच नहीं पाते। सोचा पहले कुछ पैसे बचाएं जाएं। 1992 में पत्नी और बच्चे लौट आएं। मैंने सउदी अरबिया के अमेरिकन हॉस्पिटल में नौकरी कर ली। इसके पीछे सोच यह रही कि वहां की सैलरी बहुत ज्यादा थी, और मुझे पैसों की जरूरत भी।  मैंने सोचा था कि दो साल बाद बिहार लौट आऊंगा पर यह हो नहीं सका। माता जी भी एक साल स्कार्ट लैंड में रहीं। पिताजी मुझे वापस आने को प्रेरित करने रहे।  मां वहां के स्थानीय लोगों से मिलती-जुलती और बातें करतीं। हालांकि भाषा संबंधी कुछ मुश्किलें आतीं पर जब दिल जुड़ता है तो बाक़ी बाधाएं खुद बौनी हो जातीं हैं।
पटना से संदेशा जाता’ बिहार लौट आओ’
इधर पत्नी डॉ विभा ने त्रिपोलिया अस्पताल में गाइनोकोलॉजिस्ट का काम शुरू कर लिया था। पटना के डॉक्टर एके सेन और पी .गुप्ता मुझसे जब भी बात करते, कहते पटना आ जाओ। एक दिन मेरी पत्नी ने मुझसे कहा “आप पटना आ जाएं, यहां आप ज्यादा खुश रहेंगे। ” दिल को यह बात छू गई।
खाड़ी युद्ध, प्रतिकात्मक तस्वीर
सउदी अरब की जंग और मेरा फैसला 
मैंने नौकरी छोड़ी, पटना आया, तब कुवैत और इराक के बीच लड़ाई शुरू हो चुकी थी। मुझे लगा कि कुवैत के अमेरिकन अस्पताल में कुछ दिन नौकरी कर पैसा जमा करना जरूरी है। इधर अखबार और टीवी में जंग की खबरें सुर्खियों में रहती। दुविधा का समय था मेरे लिए। मैं लंदन गया, मकान किराए पर था। टीवी पर कुवैत में जंग की भयावह तस्वीरें आ रही थीं, न्यूक्लियर बम की चर्चा काफी तेजी से होने लगी थी।
ऐसे में हर किसी ने मुझे सलाह दी कि वापस न जाओ। लोग भाग रहे थे। मेरे मन में तूफान सा उमड़ रहा था। लोन बहुत सारे थे, उन्हें चुकाना था। मैंने सोचा इसे चुकाने में पांच साल इंग्लैंड में काम करने पर लग जाएंगे। मैं अगले दिन किसी से बिना कुछ कहे चुपचाप सउदी एम्बेसी गया और सऊदी जाने का वीजा लिया। फिर टिकट। टिकट देने वाली लड़की ने कहा आप बहुत बहादुर हो। लंदन से जेद्दा के इस एयरबस में सिर्फ 15 लोग थे। मैंने मन की हिम्मत को और बलवान बनाया और कहा ‘ करना है तो करना है ‘
बेटा मां से कहता  ‘पापा सलामत लौट आएंगे ‘
मैंने सउदी के अमेरिकन अस्पताल में नौकरी ज्वाइन कर ली। जंग गहराता जा रहा था। बम के धमाके सुनाई देते। हमें बम से बचने के लिए मौके ड्रील कराया जाता। भारत जाने के लिए तब फ्लाइट भी बंद थी। पत्नी काफी घबराती थी। बेटा उसे समझाता था। मां परेशान मत हो पापा सलामत लौट आएंगे।
पटना लौटना और रतन क्लीनिक की शुरुआत 
मैं यह मानता हूं कि जो लोग बड़े सपने देखते हैं उन्हें भय नहीं रोकता है। मैं 1996 के अगस्त में पटना लौटा। हमने पटना के कंकड़बाग में माता जी के नाम पर रतन स्टोन क्लीनिक खोला।  तब हर कोई मुझे सलाह देता था कि यह नहीं चलेगा पटना में। मैंने इसमें नई तकनीक का इस्तेमाल किया था।  मुझे लगता कि मैं जब पटना आया हूं तो कुछ अलग करना है। लोगों के नकारात्मक बातों से पिताजी भी काफी घबरा गए थे। बैंक कर्ज देने को तैयार नहीं था। पत्नी ने जेंडर गिरवी रखा। धीरे धीरे जब  सालों बाद आर्थिक हालात ठीक हुए तो मैं जेवर छुड़वा पाया। तब वही लोग मेरी सराहना करने लगे जो मुझे नसीहत देते थे।
 फ़िर बना रुबन मेमोरियल हॉस्पिटल 
तीन साल बाद बड़े भाई के बेटे रुबन का निधन हो गया। मैंने भाई कर्नल एके सिंह के साथ मिलकर रुबन की याद में गांधी मैदान के पास रुबन मेमोरियल हॉस्पिटल शुरू किया।
यहां यहां यूरोलॉजी के साथ-साथ अन्य बीमारियों का इलाज भी शुरू हुआ।
हमने शुरू में तीन बेड से रत्न स्टोन क्लीनिक की शुरुआत की थी जो बाद में 45 बेड का हुआ और2014 में पाटलिपुत्र कालोनी स्थित हमारे अस्पताल में 214 बेड के हो गए।
आज यहां सभी स्पेशलिटी मौजूद हैं। ट्रामा, इमरजेंसी, सब कुछ।
पहला लेजर सर्जरी का रिकॉर्ड 
रूबन अस्पताल ने कई रिकॉर्ड कायम किए हैं। हमने बिहार में पहला लेजर सर्जरी किया। रोबोटिक सर्जरी से पहला सफल किडनी ट्रांसप्लांट भी रूबन अस्पताल में ही हुआ। कभी मैं रत्न स्टोन क्लीनिक में अकेला डॉक्टर था आज हमारे अस्पताल में 150 चिकित्सक कार्य कर रहे हैं जिसमें 50 सुपर स्पेशलिस्ट हैं। इस अस्पताल में एक छत के नीचे सभी जांच उपलब्ध हैं।
इस बिजनेस को अच्छे नजरिए से देखने की जरूरत 
समाज के हर क्षेत्र के कार्य का अपना महत्व है। चिकित्सा कार्य लोगों की भावनाओं से सीधा जुड़ा हुआ है। एक अस्पताल के संचालक के लिए पूंजी की जरूरत होती है। यह एक बिजनेस है। हम भारत में अस्पताल के बिजनेस को लूट की तरह देखते हैं यह ग़लत हैं। हम बिजनेस शब्द को हेय दृष्टि से देखेंगे तो देश आगे नहीं बढ़ेगा। डॉक्टरी एक संवेदनशील पेशा है जिसे इस पेशे पर गर्व होगा वह बेइमानी नहीं करेगा। मैं 1996 में अपने सुखद जीवन को छोड़कर बिहार इस लिए नहीं आया कि बहुत आमदनी होगी। मैं यहां के लोगों को स्वस्थ बनाने और उनके साथ आगे बढ़ने के लिए आया। मैं यह कतई नहीं कहता कि मैं दया कर रहा हूं। मैं इलाज कर पैसा कमा रहा हूं और इसे अस्पताल को बढ़ाने में लगा रहा हूं।मेरा शौक मेरा शान सब मेरा अस्पताल है। मेरा जीवन मेरे सपने और मेरी अमीरी सब मेरा अस्पताल ही है। मैं ईमानदारी से अपने पेशे को जीना चाहता हूं।
स्वामी सहजानंद सरस्वती आश्रम में अनोखा विद्यालय 
मैं स्वामी सहजानंद सरस्वती आश्रम बिहटा का सेक्रेट्री भी हूं। यह आश्रम 1927 में स्वामी जी ने शुरू किया था। तब वे किसान आंदोलन चला रहे थे। आज इस आश्रम में हम एक अनोखा विद्यालय भी संचालित कर रहे हैं। स्वामी सहजानंद सरस्वती जी के आदर्श पर चलने वाले इस विद्यालय में 150 छात्र है। यहां शिक्षा बिल्कुल मुफ्त है। इसके साथ ही सप्ताह में दो दिन आयुर्वेद चिकित्सा की सेवा भी आश्रम में दी जाती है।
कई सामाजिक संगठनों से जुड़े 
मैं कई सामाजिक संगठनों से भी जुड़ा हुआ हूं। यह मुझे बेहतर करने की प्रेरणा देता है। मैं IPPNW, ICAN से जुड़ा हूं। हमने जादूगोड़ा में खनन मजदूरों के बच्चों पर अध्ययन किया और यूरेनियम से हो रहे उनके सेहत के दुष्प्रभाव को वैश्विक पटल पर रखा। परमाणु वार के खिलाफ हमने हिरोशिमा में भी कार्यक्रम किए। पटना इफ्टा का अध्यक्ष रहा हूं , पटना लिटरेरी फेस्टिवल का भी में अध्यक्ष हूं। कई अन्य सांस्कृतिक संस्थाओं को मैं मदद करता रहा हूं।
स्वामी सहजानंद सरस्वती मेडिकल कॉलेज जल्द
बिहार में अब भी डॉक्टर और नर्स की कमी है यहां डॉक्टर और  नर्स की और अधिक जरुरत है।‌
हम पटना के नौबतपुर में स्वामी सहजानंद सरस्वती मेडिकल कॉलेज स्थापित करने की मुहिम में जुटे हैं यहां 700 बेड का अत्याधुनिक अस्पताल होगा। विकासशील देश में शिक्षित लोगों की यह जिम्मेदारी है कि वे ईमानदारी से सत्य के साथ समाज के रचनात्मक काम में भागीदार बनें।
नौजवान डॉक्टरों से अपील 
वे नौजवान डॉक्टर को सलाह देते हुए कहते हैं कि आप अपने डॉक्टर मित्रों के साथ मिलकर मल्टीस्पेशलिटी अस्पताल खुद बनाएं और मैनेज करें। हम जिस समाज में है उसी के औसत आमदनी के अनुरूप सेवा का पैसा लें। हर देश के लोगों की औसत आमदनी अलग-अलग है पर हर देश को एक ही तरह की बेहतर स्वास्थ्य सेवा की जरूरत है।
रूबन कारपोरेट नहीं अपना ब्रांड 
रूबन कार्पोरेट हॉस्पिटल नहीं है यह बिहार का अपना ब्रांड है। हमने अब तक हजारों लोगों को सेवाएं दी है। उनका विश्वास कायम किया है। आने वाले दिनों में हम इसे और भी प्रभावशाली बनाएंगे। हम हमेशा तकनीक, सहानुभूति और सेवा को साथ लेकर चलते हैं।
वहीं व्यक्ति दूसरों को खुशी दे सकता है जो पहले खुद को खुश करे। बदलाव प्रकृति का नियम है। हमें परंपरा और संस्कृति को साथ लेकर चलना होगा। इस विचार को बल देने की जरूरत है कि आप खुद की उन्नति के साथ सबकी उन्नति के वाहक भी है। मन में सबकी प्रगति का भाव रचा – बसा रहना चाहिए। 
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