सूई धागे से महिलाएं गढ़ रही किस्मत, ‘किशनगंज’ से ‘सिंगापुर’  पहुंचा इनके हाथों बनाया खेता आर्ट , 

बिहार के सीमांचल का जिला किशनगंज, इसकी पहचान चाय बागानों से तो है हीं, यह कई संस्कृतियों की संगम भूमि भी है । संस्कृतियों के इस संगम को और चटखदार करती है यहां के शेरशाहबादी समूदाय के महिलाओं की अनोखी कढ़ाई ‘ खेता कला ‘ । पीढ़ियों के संजोए खेता कला के हुनर से अब किशनगंज को एक कलात्मक पहचान मिलने लगी है। खेता कढ़ाई से बनी सामग्रियों
की मांग कैसे दुनिया भर में होने लगी  और कैसे इससे संवर रहा है इन महिलाओं का जीवन, पढ़ें यह कहानी 

हम किशनगंज  शहर से  अर्राबाड़ी  गांव जा रहे। यह गांव यहां से करीब 18 किलोमीटर की दूरी पर है। कुछ दूर बढ़ते ही हमें हरे- हरे चाय के बागान दिखने लगे। जाड़े की सुनहरी धूप में चाय की पत्तियां खिलखिला रहीं थीं। बड़े चाय बागानों में बीच- बीच में कसैली के पेड़ सीना ताने खड़े हैं। किनारे बहती नदी की जलधारा इस इलाके को और उर्वर करती है। कुछ ही देर में हम अर्राबाड़ी  गांव पहुंच गए।

आंखों में चमक और  तेज चलते हाथ 

पक्की सड़क के ठीक बगल में बसे इस गांव के मुहाने पर एक छोटे से टीन के खुले शेड में झुर्रिदार हथेलियां सूई धागे- थाम फुर्ती और संजीदगी से कपड़ों के तह पर बारिक खुबसूरत डिजाइन गढ़ रही हैं।  53 साल की सलमा खातून  हैं।   इन्हें खेता आर्ट के द्वारा एक चादर तैयार करने का आर्डर मिला है।  सलमा की बूढ़ी आंखें चमक रही हैं और  हाथ मशीन से भी तेज चल, कपड़े की परतों पर डिजाइन गढ़ रहे हैं।

 सलमा यहां अकेली नहीं हैं ।आसपास के गांव की लगभग तीस  शेरशाहबादी समूदाय की महिलाएं यहां अपने- अपने असाइनमेंट  बनाने में मगन है। सभी अलग -अलग उम्र की हैं।
किसी ने लाल और कत्थई रंग के धागों से बर्फीकार डिजाइन उकेरा है तो किसी ने गहरे हरे धागे से कोणीय पैटर्न।
पहली नजर में ही ये डिजाइन हमारी आंखों को  इतने भा जाते हैं कि हम इसकी कीमत पूछते हैं।   उत्तर मिलता है 15 हजार कम से कम।
एक चादर की कीमत 15 हजार! यह कीमत हमें थोड़ी चौकाती है! पास खड़े असराफुल बताते है कि यह कीमत हमें आसानी से मिल जाती है। निर्यातक इससे भी महंगे दामों पर इसे बेचते हैं।
अब इस आर्ट को समझने- जानने की हमारी बैचैनी और बढ़ गई है। हम खेता कढ़ाई कला का इतिहास और इसके वैश्विक मंच तक पहुंचने की कहानी जानना चाहते थे।
मैंने पति को मक्के की खेती के लिए पैसे दिए 
हम गांव के अंदर एक घर में दाखिल होते हैं। फूस और कच्ची मिट्टी से बने घर के आंगन में  बैठी  हाजरा खातून दोनों हाथों  से खेता कढ़ाई में लगी है। हमें  देख वे रूकती हैं। पास रखें मचिया हमारी और बढ़ाते हुए वो हमें बैठने का इशारा करती है।  टूटी -फूटी हिंदी में बात करते हुए वह गर्व से बताती है कि
इस बार मक्के की खेती के लिए जब पति के पैसे कम पड़ गए तो उसने इस आर्ट से कमाए पैसे पति को दिए। वे आगे कहती हैं कि मैं इस कढ़ाई से हर माह लगभग पांच से सात हजार तक कमा ले रही हूं।
मेरे पति खेती करते हैं। पहले सिर्फ उनकी कमाई से परिवार चलता था अब मैं भी कमा रही, वह भी घर का काम निपटाने के बाद। मैं हर रोज सुबह और शाम दो घंटे खेता कढ़ाई करती हूं, वह भी अपने घर में ही बैठकर।
क्या है खेता कढ़ाई कला ?
खेता कला बिहार के   किशनगंज जिले में शेरशाहबादी समुदाय की महिलाओं द्वारा की जाने वाली एक प्राचीन कढ़ाई कला है। इसमें मुख्य रूप से कपड़ों की परतों पर विशिष्ट शैली में ग्रामीण जीवन से संबंधित चित्र सूई -धागों की कढ़ाई द्वारा बनाए जाते हैं। इस कला में  पहले कपड़ों को एक के उपर रख परतें बनाई जाती है, फिर इन परतों  पर  हाथ से  बारिक सिलाई की जाती है। ये सिलाई इस तरह से होती है कि इनपर खास पैटर्न की डिजाइन उभर आती है।
खेता कला में खास ज्यामितीय पैटर्न
खेता कढ़ाई कला द्वारा एक साथ सिलकर बनाई जाने वाली चादरें और रिवर्सिबल रजाई भी शामिल है। इन सब में  एक खास  ज्यामितीय पैटर्न देखने को मिलता है। यह पैटर्न   इसकी खुबसूरती ओर मजबूती को बढ़ा देता है।
इस कला में मुख्य रूप से खेत, नदी, पक्षी, मछली, पत्ते आदि के डिज़ाइन होते हैं। डिजाइन के लिए लगे टांकों की खासियत है कि वे बहुत महीन और दोहराव आधारित होते हैं।  एक छोटा  टेबल क्लॉथ  बनाने में भी कई दिनों के वक्त और एकाग्रता की जरूरत पड़ती है।
असराफुल हक
सौ साल पुरानी चादर, जस की तस 
 खेता कला के व्यवसाय से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले असराफुल हक  हमें अपनी मां के बक्से से एक पुराना चादर लाकर हमें दिखाते हैं। इसे वे कई बड़े एक्जीबिशन में भी दिखा चुके हैं। वे बताते हैं कि इसे मेरी मां को उनकी मां (मेरी नानी) ने दिया था और  नानी को उनकी मां ने। इससे ही इसकी अंदाजा लग जाएगा कि यह सौ साल से ज्यादा पुराना है। इस चादर की चमक अब भी बरकरार है। वे इसके दूसरी तरफ का हिस्सा दिखाते हुए कहते हैं कि इसमें सामने की ओर दूसरा कपड़ा लगा है और पीछे दूसरा। सामने की ओर एक पैच जिसे भी सिलकर डिजाइन में बदला गया है को दिखाकर  असराफुल  हक हमें बताते हैं कि दरअसल इसे पहले घर के पुराने, बचे कपड़ों को जोड़कर बनाया जाता था।
कहीं कपड़ा फटा हो तो उसके उपर पैच लगा सिलाई कर उसे भी डिजाइन में बदल दिया जाता था। इसे विरासत के तौर पर एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी को सौंपती थी। दूल्हन के शादी के वक्त मां अपने मिले चादर को अपनी बेटी को सौंपती है। इसे हमारे समाज में एक मूल्यवान संपत्ति की तरह देखते हैं।
मान्यता यह है कि इससे घर में समृद्ध आती है। वे हमसे कहते हैं कि अब तक जो रिसर्च हुए हैं उनमें यही अनुमान लगता है कि यह  कला लगभग 150 वर्ष से पुरानी  है।
यह सिर्फ हमारे समुदाय की महिलाएं ही बनाती हैं।
जानकार बताते हैं कि किशनगंज पहले अविभाजित बंगाल का हिस्सा था। इसलिए इस कला पर बंगाल की कांथा कढ़ाई का  प्रभाव भी  है।  इसमें असम की ज्यामितीय कढ़ाई की झलक भी मिलती है।  बिहार की सुजनी  कला से भी इसे छोड़कर देखा जा सकता है वहां भी कपड़े की परतों का इस्तेमाल होता है।
सीखने का कोई औपचारिक तरीका नहीं
कला की सबसे खास बात यह है कि इसे सीखने का कोई औपचारिक तरीका नहीं है। न कोई किताब, न कोई स्कूल। मां अपनी बेटी को सिखाती है, दादी अपनी पोती को। शादी-ब्याह, पर्व-त्योहार और पारिवारिक आयोजनों के लिए बनाए जाने वाले कपड़ों के साथ-साथ यह कला पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती रही है।
विदेशों तक बनी पहुंच 
आज खेता कला द्वारा उत्पादित वस्तुएं देश ही नहीं विदेशों तक पहुंच रही हैं।  असराफुल कहते हैं कि हमने देश के साथ विदेशों के एग्जीबिशन में खेता कला की प्रदर्शनी लगाई है। आज हमारे साथ कई निर्यातक जुड़े हैं। वे हमसे उत्पाद खरीदते हैं और उसे विदेशों में बेचते हैं। हाल ही में यहां की महिलाओं ने  सिंगापुर के लिए एक रजाई बनाई थी।
ऐसी मिली पहचान 
इस कला को पहचान देने की अहम कड़ी में तजगारा खातून   का नाम भी जुड़ा है। आज वह मास्टर ट्रेनर के तौर पर महिलाओं को इस कला के से जुड़ने लिए उत्साहित करती हैं। दरअसल किस्सा यूं है कि असराफुल  एक स्वयंसेवी संगठन द्वारा एक स्कूल का संचालन किया करते थे। एक रोज संस्था के अधिकारी स्कूल की जांच करने आए। पास ही उनकी मां तजगारा खेता आर्ट की चादर बना रही थी। उन अधिकारी की नजर उस पर गई। उन्हें इसमें संभावना नजर आई। कुछ सेंपल लेने के बाद वे दिल्ली लौट गए। फिर वहां अपने एक दोस्त से इसका जिक्र किया जिनकी  संस्था वस्त्र मंत्रालय के साथ काम करती थी। फिर मंत्रालय में यह सेंपल दिखाया गया। मंत्रालय ने मदद की और गैर-सरकारी संगठन के सहयोग से दिल्ली के एग्जीबिशन में खेता आर्ट को मिल गई जगह। यही से शुरू हो गई इस आर्ट के गुमनामी से निकल पहचान बनाने की कहानी।
आसान नहीं रहा सफर 
तजगारा बताती हैं कि महिलाओं को जोड़कर समूह बनाना आसान नहीं था। शुरू में किसी को यकीन ही नहीं होता था कि इससे पैसे भी कमाएं जा सकते हैं। जब मेरे बेटे ने इसकी पहल शुरू की तो काफी विरोध  हुआ। उसके पिता ने भी जमकर विरोध किया। दरअसल सब  इसे महिलाओं का काम मानते थे और मेरे पति को लगता कि बेटा इन सब के फेर में पड़कर अपना भविष्य चौपट कर रहा। मैंने उसका साथ दिया आज हमरा समाज उसकी तारीफ करता है।
जिला प्रशासन चाहता है इसे ब्रांड बनाना
हम खेता आर्ट के बारे में अब  बहुत कुछ जान समझ चुके थे। अब हम इसे लेकर जिला प्रशासन का पक्ष जानना चाहते थे, इसके लिए हमने  किसनगंज के जिला पदाधिकारी विशाल राज से बातचीत की। वे इस कला को लेकर काफी सकारात्मक और उत्साहित दिखे। जिला पदाधिकारी विशाल राज  कहते हैं कि
“हम पूरी ऊर्जा से कोशिश कर रहे हैं कि खेता कला को मजबूत वैश्विक पहचान मिले। इसके लिए मार्केटिंग एक अहम हिस्सा है, हमने इसके लिए योजनाएं बनाई हैं, हमारा यह प्रयास है कि इसे ब्रांड के तौर पर उभारा जाए।”
विशाल राज, जिला पदाधिकारी, किशनगंज thebigpost.com से बात करते हुए
वे आगे कहते हैं कि जो लोग इस खेता कढ़ाई कला से जुड़े हुए हैं जिला प्रशासन की कोशिश रहेगी कि उन्हें इसका बेहतर आर्थिक लाभ मिल सके।
“आज ऑनलाइन  बाजार का जमाना काफी तेजी से बढ़ रहा है इस आर्ट को आनलाइन बाजारों से जोड़ने पर भी काम चल रहा है।हम नई पीढ़ी को इस कला से जोड़ने की पहल भी जल्द शुरू करने वाले हैं। हम चाहते हैं कि आने वाले समय में खेता आर्ट को लेकर नई पीढ़ी में गर्व का भाव हो।”
बांटी गई सिलाई मशीन 
  किशनगंज के उद्योग केन्द्र के महाप्रबंधक अनिल कुमार मंडल   thebigpost.com से कहते हैं कि हमने इस कला से जुड़ी महिलाओं के बीच सिलाई मशीनें बांटीं है। वैसे तो यह कला हाथों से की जाती है पर सिलाई मशीन से कपड़े को जोड़ने का काम कम वक्त में किया जा सकता है। इस कला को उद्योग के रूप में विकसित होने की पूरी संभावना है।
अनिल कुमार मंडल, महाप्रबंधक, उद्योग केन्द्र, किशनगंज
जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी प्रहलाद कुमार    कहते हैं “हमारे जिला पदाधिकारी भी इस कला व्यापक पहचान दिलाने में काफी रूचि ले रहे हैं।
प्रहलाद कुमार, जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी
कला संस्कृति विभाग की तरफ से हम इसके प्रचार हेतु कुछ खास आयोजन करने पर विचार कर रहे हैं। इस आयोजन में कलाकारों का सम्मान और इस कला को आम लोगों के बीच प्रचारित करने की कोशिश होगी।”
कुंदन कुमार सिंह, जिला सूचना जनसंपर्क अधिकारी, किशनगंज
डिजिटल और अन्य समाचार माध्यमों द्वारा इस कला का प्रचार प्रसार के बारे में जिले के सूचना जनसंपर्क अधिकारी कुंदन  सिंह कहते हैं हम समय समय पर डिजिटल माध्यमों पर इस आर्ट को प्रचारित करने का कार्य कर रहें हैं। इस कला को लेकर लोगों के बीच काफी जागरूकता आई है।
बहरहाल जिंदगी तमाम  गिले- शिकवे से बेपरवाह रंग बिरंगे तागों से रंग बिरंगे कपड़ों के टूकडों पर कभी  नदी – तो कभी पंछियों को  धागों से आकार देती इन शेरशाहबादी महिलाओं के आंखों में उम्मीद का रंग साफ दिखता है, इन्हें हौसला है कि  इनके इस हुनर को एक दिन दुनिया भर में मजबूत पहचान जरूर मिलेगी।  
( इस कहानी को वरिष्ठ फिल्म निर्माता राजेश राज के साथ विवेक चंद्र ने कवर किया है। thebigpost.com की कोशिश समाज की सकारात्मक कहानियों को सामने लाने की है। आप हमें आर्थिक सहयोग कर इस मुहिम को मजबूती दे सकते हैं।  हमारा संपर्क सूत्र: 7488413830 )
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