चटखदार ‘अचार’ की मजेदार कहानी ,आज जान ही लीजिए

सुबह के नाश्ते का गर्मागर्म पराठा हो या फिर लंच के चावल दाल की थाली, जबतक अचार का चटखारा न हो सभी जायकों का स्वाद फीका- फीका लगता है। अचार आ जाए तो भूख और खाने की स्पीड दोनों बढ़ जाती है।
हर भारतीय रसोई में एक कोना होता है — जहाँ धूप में सूखते हुए अचार के जार चमकते हैं। उनके भीतर सिर्फ मसाले नहीं, बल्कि पीढ़ियों की यादें, परंपराएँ और ममता सिमटी होती है। अचार, यानी स्वाद का वो खजाना जो भोजन को बनाता है संपूर्ण। तो चलिए आज इस चटखदार अचार की कहानी जानते हैं। यह पहली बार  कहां बना और कैसे यह हम भारतीय की थाली से लेकर दिल तक को चटखदार बना, कर रहा है उसपर राज…

सबसे पहली बार अचार यहां बना था

अचार बनाने की परंपरा लगभग चार से पाँच हज़ार साल पुरानी  है। इतिहासकार मानते हैं कि इसका आरंभ  मेसोपोटामिया (आज का इराक क्षेत्र)  में हुआ, जब लोगों ने पहली बार सब्ज़ियों और फलों को नमक में डालकर लंबे समय तक सुरक्षित रखने की कला खोजी। वहीं से यह ज्ञान मिस्र, यूनान और फिर भारत तक पहुँचा।

भारत में अचार की कहानी

भारत में अचार का ज़िक्र  वैदिक ग्रंथों  में मिलता है। संस्कृत में इसे “आचार्यक”  कहा गया, और आयुर्वेद ने इसे पाचनशक्ति बढ़ाने वाला औषधीय आहार  बताया। नींबू, अदरक, आम और लहसुन के अचार को औषधियों में गिना गया। अचार सिर्फ भोजन का साथी नहीं था, बल्कि स्वास्थ्य और स्वाद का मेल था।

मुगल दरबार से आम घरों तक

मुगल काल में अचार ने शाही व्यंजन  का रूप लिया। अकबर, जहाँगीर और शाहजहाँ के दौर में  केसर, सिरका और मसालों से बने विदेशी अचार महलों की थालियों में परोसे जाते थे। धीरे-धीरे यह कला आम लोगों तक पहुँची, और हर प्रांत ने अपने मौसम और स्वाद के अनुसार अचार को नया रूप दिया। बिहार और उत्तर प्रदेश के गाँवों में आज भी गर्मी के दिनों में आम के अचार की खुशबू घर-आँगन में फैलती है।

मौसम, माँ और मिट्टी के बर्तन

भारतीय परिवारों में अचार बनाना एक संस्कार जैसा काम रहा है। मिट्टी के घड़ों में अचार डालकर धूप में पकाया जाता — हर दिन उसे उलट-पुलट कर धूप दिखाना एक अनुष्ठान बन जाता था। गर्मियों में आम का अचार, सर्दियों में गाजर-गोभी-शलगम का, और बरसात में नींबू या हरी मिर्च का — हर मौसम का अपना स्वाद।

दुनिया के अचार भी रोचक हैं 

– जापान में “त्सुकेमोनो

– चीन में “पाओकाई

– यूरोप में “gherkin pickle”

– और अमेरिका में “dill pickle” हर देश ने अपने तरीके से अचार को अपनाया — ताकि मौसम बदलने पर भी स्वाद बरकरार रहे।

अचार का आधुनिक रूप

आज अचार सिर्फ घरों में नहीं, बल्कि बड़े उद्योगों और निर्यात का हिस्सा बन चुका है। भारतीय अचार — खासकर आम, नींबू और लहसुन — अब अमेरिका, यूरोप और मध्यपूर्व में भी भारतीय स्वाद का दूत बन चुके हैं।


अचार की सीख भी सीख लीजिए 

अचार सिर्फ स्वाद नहीं, समय और संवेदना का प्रतीक है। यह सिखाता है कि —

“हर चीज़ को समय के साथ बदलने दो, बस उसमें थोड़ा धैर्य का नमक,  और बहुत सारा प्यार डाल दो — वही जिंदगी का असली स्वाद है।”

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