रेत सी फिसलती जिंदगी में ‘मन की उलझन’ सुलझा, ‘All Is Well’ का तराना भरने वाली डॉ. बिन्दा की कहानी

वे खामोश  होंठों को मुस्कुराना सिखातीं है, नम आंखों में भरतीं हैं जिंदगी के ख्वाब। टूटे हुए दिल में सजा देतीं हैं उम्मीद। अब तक जीवन से मायूस हजारों लोगों को निराशा के भंवर से निकला आशा का उजास भर, जीवन से प्यार करने का हुनर सिखलाया है। कहानी, उम्र की बंदिशों को bye  कह , समय और समाज के दिल में Love you zindagi का सुर और साज सजाने वाली। जानी-मानी क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट

डॉ. बिन्दा सिंह की…

हम  पटना में हैं, पटना एक ऐतिहासिक शहर जो इन दिनों महानगर बनने दौड़ लगा रहा है। शाम का वक्त है। ट्रेफिक के शोर के बीच हम शहर के प्रसिद्ध बोरिंग रोड स्थित डॉ. बिन्दा सिंह के आवास की ओर बढ़ते हैं। बड़े से गेट के बाहर नेम प्लेट लगा है। इतने में गार्ड गेट खोलता है और हम अंदर दाखिल होते हैं। यह डॉक्टर बिन्दा सिंह का घर है और क्लीनिक भी। हम अपनी नजरें इधर उधर दौड़ाने की कोशिश करें इससे पहले ही दरवाजा खुलता है और दो मरीज (शायद वे पति-पत्नी) हों बाहर आते हैं। डॉ.बिन्दा खुद उन्हें छोड़ने बाहर तक आती है। फिर मुस्कुराते हुए हमें अंदर क्लीनिक में आने का इशारा करती है। क्लीनिक बडे़ ही क़रीने से सजा है। सूर्यमुखी के बड़े बड़े फूल खिलखिला रहे हैं। समाने समारोहों में मिलीं ढेरों स्मृति चिन्ह रखें हुए हैं।
डॉक्टर बिन्दा बड़े ही आदरभाव से हमारा सत्कार करतीं हैं।

सूरज मुखी के फ़ूल की तरह उनके चेहरे पर आत्मविश्वास की ताजगी खिलखिला रही हैं। बढती उम्र की सीढ़ियां चढ़ कर भी कोई थकान नहीं, कोई बोझिल पन नहीं, किसी तरूण सा उत्साह उनमें दिखता है।

हमरी बातचीत शुरू होती है। हम उनके बचपन के किस्से जानना चाहते थे। वो हमें बताती हैं

मेरा जन्म बिहार में हुआ। पिताजी श्री लक्ष्मण सिंह  सेना में अधिकारी थे। उनका बराबर तबादला होता रहता। पिताजी के तबादले के साथ ही हम सब भी अपना बोरिया – बिस्तर ले एक शहर से दूसरे शहर शिफ्ट होते रहते। इसी क्रम में देश के कई शहरों को देखने -जानने का मौका मिला।

हम जब तक शहर के मिजाज में अपना मिजाज घोलने की कोशिश करते तब तक पिताजी तबादले का पैगाम ले आते और हम उस शहर के शरबती मिजाज को टाटा -बाय- बाय कह फिर नए शहर से फ्रेंडशिप करने चल पड़ते।

शहर -दर -शहर की आपाधापी के बीच पटना ने मुझे अपना बनाया। कॉलेज की पढ़ाई, से लेकर कॉलेज में पढाना , शादी और करियर सब इसी शहर की आबोहवा में घुल -मिल आकार पाते रहे।

अब तो पटना शहर मेरी हर सांस में उस तरह घुल गया है जैसे बगिया से आती हवा में फूलों की खुशबू।

पिताजी सेना में थे तो घर में सेना वाला अनुशासन शुरू से ही था। सबको हर काम अनुशासन और समय पर करना होता। मां  होरीला सिंह  भी अनुशासन में विश्वास रखती। हम सभी भाई बहन बचपन से ही फौजी परिवार के इस गुण से गुणी हो गए थे। पिताजी और माताजी लड़कियों के आजादी की पक्षधर रहे। हम बहनों और भाइयों के बीच कोई भेदभाव नहीं होता। हमें पूरी आजादी मिली। पढ़ाई लिखाई से लेकर खेलकूद तक।

अपनी बनाई पेंटिंग के साथ डॉ.बिन्दा सिंह

पेंटिंग का शौक

डॉ बिन्दा हमें कुछ पेंटिंग दिखाते हुए बताती है कि मुझे पेंटिंग का शौक बचपन से ही रहा। बचपन में कागज पर चित्र बनाती और उसमें पेंसिल से लाल-पीली -नीले रंग भरती। बढ़ती उम्र के साथ, इस शौक ने कैनवास पर जगह बनायी। मेरी पेंटिंग में अक्सर जिंदगी के रंग आपको देखने को मिलेंगे। अब भी जब वक्त मिलता है मैं रंगों की इस दुनिया में डूब जाती हूं।,

सच कहूं तो रंग ही तो हैं, जो जीवन को चटखदार बनाए रखता है। आप जब भी मायूस हो प्रकृति को निहारिए, हरे भरे पेड़, खुबसूरत फूल और रंग बिरंगी तितलियां और भंवरों का क्रंदन आपमें एक नई उर्जा भर देंगे।

यहां से हुई पढ़ाईं 

वे आगे बताती है कि कॉलेज की मेरी पढ़ाई पटना वूमेंस कॉलेज से हुई। उन दिनों भी यह कॉलेज बिहार का सबसे महत्वपूर्ण कालेजों में से एक था। यहां नामांकन होना और पढ़ना एक गर्व की अनुभूति देता था। मैंने स्नातक के बाद पीजी क्लीनिक साइकोलॉजी में की। फिर पीएचडी किया। पीएचडी के दौरान  पति का काफी सहयोग मिला।

कॉलेज की छात्र राजनीति में इंट्री

पढ़ाई के दौरान हीं कॉलेज की राजनीति में मेरा मन लगने लगा। लीडरशिप क्वालिटी मुझमें बचपन से थी। उसका उपयोग मैंने यहां किया। मैं कॉलेज में कैबिनेट की मेंबर चुनी गईं थीं।

मन में डॉक्टर बनने की चाहत

डॉक्टर बिंदा सिंह कहती हैं कि मन में हमेशा डॉक्टर बनने की चाहत थी। दिक्कत यह कि मेरा मन साइंस सब्जेक्ट में थोड़ा भी नहीं लगता था। मैं जो भी करती उसे दिल से करती। साइंस में मन रमता नहीं था तो आर्ट लेना पड़ा। फिर आगे चलकर मुझे लगा की साइकोलॉजी में मैं अच्छा कर सकती हूं और इससे लोगों की सेवा भी की जा सकेगी। मैंने अपने शोध के दौरान काफी मेहनत किया। मैं मेंटल डिसऑर्डर लोगों के पास जा उनकी केस स्टडी करती। झुग्गियों और मलिन बस्तियों में जा वहां के लोगों का मेंटल हेल्थ देखती। इन सब से मुझे काफी जानकारी मिली ‌ ।

जब बदमाशों ने किया हमला

डॉक्टर बिन्दा हमें एक पुराना वाक्या बताते हुए कहती हैं। पढ़ाई खत्म होने के बाद मैंने पढ़ाना शुरू किया था। उस वक्त पटना के एक नामी कॉलेज में मैं क्लास लेती थी। क्लास में कुछ बदमाश लड़के, क्लास की लड़कियों को परेशान करते। वो उनसे बदतमीजी से पेश आते। जब मुझे यह बात पता चली तो मैंने इसका विरोध किया। इसके बाद क्लास में उनकी गुंडागर्दी बंद हो गई। फिर प्लान बना उन सब ने मुझ पर हमला कर दिया। मुझे चोट आई। यह मामला उन दिनों काफी सुर्खियां में रहा। मैंने अगर हिम्मत दिखा उनका विरोध नहीं किया होता तो उनकी क्लास में उन बदमाशों की मनमर्जी चलती रहती और लड़कियां प्रताड़ित होती रहती।

सम्मान के पल

बाढ़ से मिली सीख 

डॉ बिन्दा सिंह कहती हैं कि हमें पढ़ाई के दौरान पटना  में आयी बाढ़ का मंजर आज भी उसी तरह याद है। तब पटना शहर में बाढ़ का पानी प्रवेश कर गया था। हमारे मकान में भी पानी अंदर चला गया। इससे हम लोगों के कितने ही सामान खराब हो गए। फिर बाढ़ का पानी थमने पर हमने सोफ़ा को धूप में सुखाया। कितनी ही फोटो फ्रेम पानी के कारण खराब हो गई। हम इन्हें धूप में सुखाते और शीशा से भींगा पेपर हटा दूसरा चिपकाते।

इस बाढ़ ने भी हमें काफी कुछ सिखाया। विपदा के बाद आप फिर कैसे श्रृजन करते हैं मैंने बाढ़ से यह सीखा।

मैं यह मानतीं हूं कि बुरा से बुरा लम्हा भी आपको कुछ अच्छी सीख देकर जाता है।

लोग कहते हैं मैं मां पर गई

मैं पढ़ाई के बाद खुद से पैसे भी कमाने लगी थी और इन सब में मेरी मां का काफी अहम योगदान है। मेरी मां काफी प्रोग्रेसिव विचारों वाली महिला थी। मां ने मुझे आगे बढ़ने का खुब हौसला दिया। पीएचडी के दौरान भी मां का समर्थन मिला।

मेरे रिश्तेदार कहते हैं कि मैं मां पर गई हूं। यह मुझे गर्व से भर देता है। मेरे आत्मविश्वास को और मजबूत करता है।

मां ने मुझे हिम्मत न हारने और जमीन से जुड़े रहने की सीख दी। एक मध्यमवर्गीय परिवार के कारण मुझे हर छोटी-छोटी चीजें भी बचपन के दौरान मां ने सीखाया। आज इन सब का असर मेरी कार्यकुशलता पर पड़ता है।

याद खुबसूरत पुराने दिनों की

विशिष्ट बना शादी समारोह

डॉ. बिन्दा सिंह कहती हैं, बचपन बीता, स्कूल लाईफ बीता, फिर कालेज की पढ़ाई पूरी हुई। इन सब के बाद वह वक्त भी आया जो हर लड़की के जीवन में बेहद खास होता है। शादी की बेला। तब की शादियों में आज की तरह प्री-वेडिंग का न तो प्रचलन था, न शादी से पहले आप दुल्हे से दिन रात बतिया सकते थे। व्हाट्सएप्प, सोशल मीडिया तो सोच में भी नहीं था।

फिर एक सामान्य लड़की की तरह मेरी भी शादी तय  हुई। मेरे भी मन में विवाह के सतरंगी सपने आकार ले रहे थे।

मेरी शादी इन्द्र कुमार सिंह, जी के साथ हुई ।वें शासकीय अधिवक्ता थे। मेरे ससुर जी उन दिनों बिहार के अहम राजनीतिक चेहरे थे। इस कारण मेरी शादी बेहद भव्य रही। तात्कालिक मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर, उनके मंत्रिमंडल के सदस्य, जगन्नाथ मिश्रा जी समेत तमाम राजनीतिक हस्तियां मेरी शादी में मौजूद थे। ससुराल भी नौकर चाकरों से भरा। कुछ ही दिनों में मैंने ससुराल में सबका दिल जीत लिया। ससुर जी के कई पार्टी सम्मेलन और चुनाव के दौरान मैंने कई काम भी संभाले। खास तौर पर जब भी हेलिपैड बनाने की जरूरत होती थी तो मुझे इसकी जिम्मेदारी दी जाती। उन दिनों यह सब काफी मुश्किल था। तब मोबाइल का जमाना नहीं था। उस वक्त हमारे घर बिहार के की राजनीतिक हस्तियों का आना- जाना हुआ करता था।

बिता लम्हा : पति स्वर्गीय इन्द्र कुमार सिंह के साथ डॉ. बिन्दा सिंह

जब ससुराल में खोला क्लीनिक

मेरा ससुराल काफी सम्पन्न था , खासतौर पर आर्थिक और सामाजिक रूप से। मेरी नौकरी उन दिनों लेक्चर के रूप में सुंदरवती महिला कालेज भागलपुर में हुई, पर मेरी बेटी काफी छोटी थी, सो मैंने वहां नौकरी छोड़ दी। फिर घर में ही क्लीनिक खोला। शुरू में इक्का-दुक्का पेशेंट आते थे फिर तादाद बढ़ती चली गई।

यादें साथ हैं…

पति के सहयोग रहा अनमोल

जब मैंने अपना क्लीनिक खोलने की बात की तो परिवार में इसके लिए सहमति बना पाना काफी मुश्किल था। पहले तो छोटी बच्ची होने का हवाला दिया गया। फिर कहा गया कि इसकी जरूरत क्या है। पैसे की ऐसी कोई दिक्कत तो है नहीं! इन सब बातों के वावजूद मैंने संकल्प कर लिया था कि मुझे क्लीनिक खोलना है। यह बात मैंने अपने पति को बतायी। उनसे काफी समर्थन मिला। मेरे पति इन्द्र कुमार सिंह वकालत के साथ साथ वें व्यवसाय से भी जुड़े थे। वैसे मैं कहूं तो मैंने आज जो भी काम किया, समाजसेवा कर पायी, इसमें मेरे पति का योगदान काफी अहम रहा है। उन्होंने मेरा हमेशा समर्थन किया, मेरा हौसला बढ़ाया।

कुछ वर्षो पहले उनका निधन हो गया। हमें उनकी कमी हमेशा खलती है। वे मुझे मजबूती देते थे। मेरा उत्साह वर्धन करते थे। जब मेरा कालम अखबारों में छपने लगा तो मुझसे ज्यादा मेरे पति को उसका इंतजार होता। अखबार आते ही वे झट से पन्ना पलट मेरा आलेख पढ़ते फिर मुझे दिखाते। अब इस उत्साह की कमी लगती है।

पति के साथ जीवन के तमाम उतार – चढ़ाव का साथ रहता है। वे बच्चों सा हमेशा उत्साह से भरे रहते थें।
बेटे- बेटियों की पढ़ाई, उनकी शादी सब उन्होंने उसी उत्साह के साथ किया। हर वक्त उनकी यादें मेरे दिल में धड़कती हैं, पर जीवन तो जीना पड़ता है न, भावनाओं को दबा, मन को मजबूत कर।

वो बीते दिन

मीडिया की भूमिका अहम 

वो अखबारों का दौर था। अखबार प्रायः हर घर में सुबह- सबेरे दस्तक देते। खबरिया चैनल उन दिनों धीरे धीरे बढ़ रहे थे। अखबार का तब एक अलग ही सम्मान होता।

सन् 2000 में दैनिक हिन्दुस्तान में मेरा एक कालम शुरू हुआ। नाम था मन की उलझन। यह कालम काफी लोकप्रिय हो गया। इसमें मैं लोगों के सवालों का जबाब देती। बिहार, बंगाल, झारखंड, उड़िसा तमाम जगहों से खत आते। लोग अपने मन की उलझनों का जबाब चाहते थे।

मैं पूरी इमानदारी से इनका जबाब देती। यह कालम लंबे समय तक चला। इसने मुझे देश भर में एक मजबूत पहचान दी।
इसके बाद उस वक्त की प्रसिद्ध पत्रिकाओं में भी अलग-अलग नाम से मेरे कालम आने लगे। इनमें सरिता, सरस सलिल, मुक्ता आदि पत्रिकाएं शामिल थीं। इसके साथ हीं प्रभात खबर में भी मेरा कालम शुरू हुआ।


फिर दूरदर्शन, समाचार चैनल, एफ एम रेडियो पर मेरे ढेरों शो आने लग गए। दैनिक भास्कर जब पटना से प्रारंभ हुआ तो वहां भी मेरे लेख प्रकाशित होने लगे। मीडिया के जरिए लोगों को जागरूक करने की यह पहल अब भी चल रही है। इस
का असर भी दिखता है।

बस खुद से रखें उम्मीद

डॉ बिन्दा कहतीं हैं कि किसी दूसरे से उम्मीद रखना दुख का कारण बनता है। आप खुद अपने आप से उम्मीद रखें। दूसरों से नहीं। दूसरों से उम्मीद रखने पर अंत में निराशा ही हाथ आती है।

पूर्व केंद्रीय मंत्री अश्विनी चौबे और अन्य के साथ डॉ.बिन्दा सिंह

डर के आगे जीत है

डॉ. बिन्दा कहतीं हैं कि सफर रास्ते का हो या फिर जिंदगी का आपको खुद पर यकीन रखना सबसे जरूरी है। अपने अंदर के डर को निकाल फेंकिए। हो सकता है पहली बार सफलता नहीं मिले ऐसे में अपने काम की समीक्षा कर फिर से जुट जाएं। जीत पाने के लिए मन के डर को बाहर निकालना बहुत जरूरी है।

 

ओरिएंटेशन कार्यक्रम के दौरान

आत्मबल मजबूत रखें 

डॉ .बिन्दा सिंह बताती है कि अब तक 200 कॉलेज और 100स्कूलों में ओरियंटेशन कार्यक्रम अपने कार्यक्रम कर चुकी हैं। कई कार्पोरेट दफ्तरों में भी वे लोगों को जागरूक करने जाती रहती है। डॉ बिन्दा बताती है कि इन दिनों फास्ट लाइफ का प्रभाव काफी ज्यादा मेंटल हेल्थ पर पड़ रहा है। अवसाद की समस्या का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है। अब तो बच्चों में भी इसे लेकर परेशानियां बढ़ रही हैं। मेरी कोशिश लोगों को जागरूक करने की होती है। मैं उन्हें यह बताती हूं कि आपका मानसिक स्वास्थ्य बेहतर होना कितना ज़रूरी है, और इसे कैसे दुरूस्त रखा जाए।

कोविड के दौरान भी काउंसिल

डॉ. बिन्दा आगे कहती हैं कि हम सब ने कोरोना जैसी महामारी देखी। इस महामारी ने लोगों की शारीरिक के साथ मानसिक परेशानियां भी दी। मुझे लगा कि इस दौरान लोगों को मानसिक मजबूती की जरूरत है। मैं कोरोना में फ्री काउंसिल देती थी। मैं उस दौरान किसी भी वक्त काउंसिल करने के लिए तैयार रहती थी वह भी निशुल्क।

डॉ. बिन्दा सिंह को समाजिक योगदान के लिए कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों से सम्मानित किया जा चुका है।

मानसिक स्वास्थ्य पर किताबें प्रकाशित

डॉ बिन्दा सिंह के लेख जहां देश के नामी अखबारों में जगह बातें हैं वहीं उनकी कई किताब भी प्रकाशित हो चुकी है। मन की उलझन और डॉक्टर मैं क्या करूं काफी लोकप्रिय हैं। ये किताबें सरल भाषा में मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करती है। डॉ. बिन्दा बताती है कि ग्रामीण इलाकों में भी मेरे किताब के पाठक हैं, खासतौर पर महिलाएं।

थकान मिटा देती, ‘पंखुड़ी’ और ‘कोको’ की नन्ही हंसी

डॉ बिन्दा सिंह कहती हैं मेरे बच्चे मुझे खुब प्यार देते हैं। बेटी सुगंधा सिंह, पूजा सिंह और बेटे संदर्भ सिंह के साथ दामाद  प्रशांत रवि, दीपक,  बहू ऐश्वर्या   के साथ पारिवारिक दुनिया खुशियों के साथ चल रही है। नातिन पंखुड़ी और कोको की नन्हीं हंसी उम्र की सारी थकान मिटा देती है। इन बच्चों को भी मेरा संग- साथ अच्छा लगता है।

पल खुशियों के: परिवार के सदस्यों के साथ डॉ. बिन्दा

फिलवक्त डॉ. बिन्दा सिंह पूरी शिद्दत के साथ समाज में सकारात्मक ऊर्जा भरने की पहल में जुटी है। वो कहती हैं

मेरी कोशिश यह कि निराशा की निशा के बदले उम्मीद वाली भोर की मुलायम सी किरण लोगों के मन में जगह बनाए। लोग हंसते -मुस्कुराते,जिंदगी को गले लगाते हुए , प्यार से प्यारा सा ये गीत गुनगुनाता उठें…
” इत्ती सी हंसी
इत्ती सी खुशी
इत्ता सा टुकड़ा चाँद का,
ख्वाबों के तिनकों से
चल बनाएं आशियाँ!!

हमारी बातचीत खत्म हो चुकी है। हम उसने विदा लेते हैं, हमें एक अनमोल चीज यहां से तोहफे में मिल गई वह है जिंदगी को जीने, समझने और बांटने का खुबसूरत नजरिया….,

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