‘जीवन दीप ‘ बन शिक्षा का उजियारा फैला रहे फादर A. Christu Savarirajan, S.J_ की कहानी

यह कहानी ज्ञान , संस्कार और शिक्षा का अलख जगा रहे उस इंसान की है जिन्होंने  समाज सेवा के लिए अपना समस्त जीवन समर्पित कर दिया।वे  ज्ञान का दीप जला ,  मानव सेवा ,प्रेम और भाईचारे की भावना मजबूत कर एक ऐसी दुनिया के  निर्माण की पहल में जुटे हैं जो मनुष्य को मनुष्यता का मार्ग दिखाता हो। आज कहानी बिहार के प्रसिद्ध विद्यालय  संत माइकल हाई  स्कूल, पटना के प्राचार्य फादर ए. क्रिस्टु सवरिराजन, एस.जे की…

मेरी परवरिश छोटे से गांव में हुई। जहां खुब सारे पेड़ थे, नदी का उन्मुक्त बहाव था। और पहाड़, पक्षी, नीला आसमान और रिमझिम- रिमझिम   बारिश में माटी से आती सौंधी सी महक भी। मैं बचपन में नदी किनारे कभी  मछली पकड़ने की कोशिश करता तो कभी पास पास उड़ती तितलियों के साथ दौड़ लगाता। मिट्टी में खेलना, बारिश में झूमकर नहाना। एक अल्हड़ – मिजाजी बचपन जिया है मैंने जो प्रकृति के साथ, प्रकृति की गोद में बीता। …..और पढ़ाई कब की! शायद ये सवाल यह सवाल आपके  दिमाग में बिजली की तरह कौन रही होगी। वह सब बताता हूं आपको। अपने अब तक के जीवन की पूरी कहानी पूरी दास्तां। मैं फादर क्यों बना। कैसे बना। एक शिक्षक की भूमिका में कैसे आया। वो बस के छत पर बैठकर सफर करना । वो बिहार आने की कहानी। सब । अपने  पुराने दिनों को याद करते हुए किसी छोटे  बच्चे सा पावनता और उत्साह से लबरेज होकर  कहते हैं  फादर ए. क्रिस्टु सवरिराजन एस.जे

प्रकृति का सानिध्य : अपने गांव में
फादर ए. क्रिस्टु सवरिराजन, एस.जे    बताते हैं कि मेरा जन्म सन् 1975 में हुआ।  मेरे गांव का नाम है ओटन काडुवेंट्टी है । यह तमिलनाडु में पड़ता है।   परिवार में हमारे माता-पिता और हम नौ भाई बहन थे। गांव जैसा की मैंने पहले ही बताया प्रकृति की खुबसूरती से भरा पड़ा था। पिताजी वैसे तो सरकारी नौकरी में थे पर वो गांव की खेती किसानी से भी जुड़े थे। मां गृहणी थीं।
वो बचपन के दिन
यहां से मिली प्रारंभिक शिक्षा
प्रारंभिक शिक्षा के सवाल पर फादर क्रिस्टु कहते हैं
बात प्रारंभिक शिक्षा की करें तो मेरी प्रारंभिक शिक्षा गांव के स्कूल से ही शुरू हुई।
मैं एक छोटा सा बस्ता जिसमें स्लेट, पेंसिल और किताब होती को लेकर स्कूल जाता था। धीरे-धीरे वहां मेरे कई दोस्त भी बन गए और फिर स्कूल जाना अच्छा लगने लगा।
मैं अपने गांव में कक्षा तीन तक ही पढ़ पाया। इसके बाद पिताजी और परिवार की राय से मुझे अपने ननिहाल में भेज दिया गया। वहां के  गिरजाघर में  एक स्कूल का संचालन होता था । इसी स्कूल में मेरा दाखिला कराया गया। मैंने कक्षा 4 से आठवीं तक की पढ़ाई यहीं से की। इस विद्यालय में मुझे नई दिशा दी। यहां मेरा खुब मन लगता।
अध्यात्म की ओर बढ़ने लगा लगाव 
वे आगे बताते हैं कि  जब भी  गिरजाघर में फादर को सफेद लिबास पहने देखता तो एक अजीब सी खुशी और संतोष का भाव मेरे मन में आता। सफेद कपड़ों में फादर का मुस्कुराता हुआ चेहरा , और हम बच्चों के प्रति उनका प्यार इसे और मजबूत करता।
उस वक्त से ही मैं मन ही मन सोचने लगा था या यूं कहें एक संकल्प कर लिया था कि आगे जाकर मुझे भी फादर बनना है। इन दिनों पढ़ाई के साथ साथ में अध्यात्मिक जीवन की ओर भी आकर्षित होने लगा था।
वो बीते दिन..
मेरी रूचि इस आध्यात्मिक दुनिया में गहरी होती जा रही थी। मैं हर सुबह प्रभू ईसा मसीह से दुनिया की बेहतरीन की प्रार्थना करता और फिर दिन की शुरुआत करता। आपको यह जानकर थोड़ी हैरानी होगी कि यह क्रम तब से आज तक निरंतर चलता आ  रहा है।
कक्षा आठ के बाद मेरा नामांकन बोर्डिंग स्कूल में करा दिया गया। इस बोर्डिंग स्कूल में हमारे भाई समेत परिवार के तीन लोग थे। इस कारण मन लगा रहता था। मैं नियमित गिरजाघर जाता और फादर के साथ प्रार्थना सभाओं में सम्मिलित होता। मुझे ऐसा कर के अद्भुत शांति और  असीम ऊर्जा मिलती।
ऐसा रहा शैक्षणिक सफर 
फादर ए. क्रिस्टु सवरिराजन   के शैक्षणिक सफर की बात करें तो सन 2000 में  उन्होंने   बी.एससी ,भौतिकी सेंट जोसेफ कॉलेज, त्रिची से किया। वहीं एम.एससी भौतिकी 2005 में लोयोला कॉलेज, चेन्नई से किया।2006 में सेंट जेवियर्स कॉलेज ऑफ एजुकेशन, पटना से बीएड की डिग्री ली‌, इसके बाद एम.एड 2015 में बॉस्टन कॉलेज, अमेरिका से किया। इसके बाद

डॉन बॉस्को विश्वविद्यालय, गुवाहाटी से पीएच.डी कर रहा हूं।

कोशिश दुनिया को जानने की
मैं फादर क्यों बना?
  फादर ए. क्रिस्टु सवरिराजन   इस बारे में बताते हैं  कि  मुझे बचपन से ही ऐसा लगने लगा था कि मुझे फादर बनना है। जैसा की मैंने पहले भी बताया मुझे पहले तो फादर का लिबास, फिर उनके कार्य और समर्पण को देखकर ऐसा लगता था कि मैं भी फादर बनूंगा। आगे चलकर मुझे लगने लगा कि मैं अपने जीवन को प्रभू चरणों में समर्पित कर दूं और समाज के सकारात्मक बदलाव में योगदान  दूं। जीवन का उद्देश्य समाज सेवा और लोगों की भलाई होनी चाहिए।
बाढ़ पीड़ितों के बीच राहत सामग्री बांटते हुए
मेरे मामा जी भी पुरोहित हैं। कुछ प्रेरणा वहां से भी मिली। फिर मैंने घर में खुद के संकल्प को बताया कि मुझे फादर बनना है। घर के  सदस्यों का पूरा-पूरा समर्थन मिला। सभी ने खुशी जाहिर की। फादर बनने की राह आसान नहीं होता। आपको अपना जीवन समाज को समर्पित करना होता है।
मार्ग प्रेम का: फादर बनने की राह
वे आगे कहते हैं कि यह एक लंबी प्रक्रिया है। यहां कई तरह के प्रशिक्षण और परिक्षाओं से आपको गुजरना होगा। यह 17 साल की लंबी प्रक्रिया है। इस दौरान तीन व्रत लेने होते हैं । यह व्रत है निर्धनता, आज्ञापालन, और ब्रह्मचर्य जीवन।
 निर्धनता :   एक फादर को पैसों की माया से दूर रहना होता है। हमारे कार्य की तन्खवाह भी हमारे संस्थान को दान में चली जाती है और संस्था हमारी मूल जरूरतों का ख्याल रखती है। हमारा खुद का कोई भी बैंक बाइलेंस नहीं होता।
आज्ञापालन – हमें हर वक्त आज्ञापालन के लिए तैयार रहना पड़ता है जब जहां जिस कार्य में लगा दिया जाए उसमें उसी वक्त से जुट जाना होता है। आज मैं संत माइकल का प्राचार्य हूं हो सकता है इसी पल मुझे पश्चिम बंगाल के किसी छोटे से स्कूल या अस्पताल में सेवा के लिए भेज दिया जाए। यहां पद का मोह त्यागकर हमें जीना होता है । तर्क की जगह समर्पण के भाव को आत्मसात करना होता है।
ब्रह्मचर्य जीवन: एक फादर को जीवन भर ब्रह्मचर्य का पालन करना होता है। अविवाहित रहना होता है।
फादर बनने की प्रक्रिया के दौरान हमें अंग्रेजी के साथ ही स्थानीय भाषा का प्रशिक्षण दिया जाता है।
बाइबल के गहन अध्ययन के साथ ही अलग अलग धर्म और दर्शन का अध्ययन भी हम करते हैं। हमें भाषा साहित्य, अच्छे लेखकों की कहानियां और रचनाएं भी पढ़ने होते हैं। फिर हम ब्रदर बनते हैं और हमें दो साल तक किसी संस्था में प्रशिक्षण हेतु भेजा जाता है।
मुझे  बिहार के मधुबनी में भेजा गया था। यहां मूलभूत सुविधाओं का भी अभाव था। यह हमरे लिए कठिनाईयों में रास्ता खोजने जैसा होता है। वहां हम दालान पर सोते थे। उस वक्त गांव में शौचालय भी नहीं था हमें लोटा लेकर शौच के लिए जाना पड़ता था।
दिलचस्प रही बिहार की यात्रा
फादर ए. क्रिस्टु सवरिराजन एस.जे  बिहार आने का क्रम याद करते हुए कहते हैं, जब मुझे यह बताया गया कि मुझे सेवा के लिए बिहार जाना है तो मेरे परिवार के लोग थोड़ा चिंतित से हो गए थे। मैं खुद इससे पहले कभी बिहार नहीं आया था। स्थानीय भाषा तो छोड़िए मुझे ठीक से हिंदी भी नहीं आती थी। आदेश का पालन भी करना था सो मैं मैं बिहार आ गया। यहां आकर मुझे यह लगा कि बिहार के बारे में जिस तरह की छवि बनाई गई है बिहार वैसा नहीं है।  मैं ट्रेन से बिहार आया था।
कई बार ऐसे मौके भी आए जब मुझे बस की छत पर बैठकर यात्रा करनी पड़ी। यहां आने के बाद मैंने स्थानीय भाषा सीखी।  हम सब्जी मंडी जाते और स्थानीय भाषा में बातचीत करने की कोशिश करते
यहां के लोग काफी सहयोगी और मिलनसार हैं। मुझे हमेशा उनका सहयोग मिलता रहता है।
सम्मान के पल: बिहार के शिक्षा मंत्री द्वारा सम्मान ग्रहण करते हुए
 अपनी कुशलता से इन पदों है संभाला
 औरंगाबाद के सेंट इग्नेशियस हाई स्कूल में — 2002 से 2003 उन्होंने शिक्षक के रूप में सेवाएं दीं ।इसके बाद सेंट थॉमस हाई स्कूल, बगहा के रतनपुरवा में 2010 से 2013 तक शिक्षक रहे।
सेंट माइकल्स हाई स्कूल, पटना में — 2016 से 2017 तक उपप्राचार्य के पद पर रहें। इसके उपरांत
वें  सेंट जेवियर्स हाई स्कूल, पटना में 2017 से 2018 तक उप प्राचार्य रहें।
फिर सेंट जेवियर्स हाई स्कूल, पटना में 2018 से 2022 तक प्राचार्य रहें।
फिलहाल, सेंट माइकल्स हाई स्कूल, पटना में 2023 से वर्तमान तक प्राचार्य के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।
 एक चित्रकार और खिलाड़ी भी
फादर ए. क्रिस्टु सवरिराजन  एक बेहतर चित्रकारों का खिलाड़ी भी है। वें  बताते हैं  कि मैं एक खिलाड़ी और चित्रकार भी हूं। मुझे प्रकृति से जुड़े चित्र बनाना काफी माता है। इसके साथ ही मुझे गीत गाना भी काफी पसंद है।
  संत माइकल स्कूल की गौरवशाली यात्रा 
बात अगर सेंट माइकल्स हाई स्कूल  पटना, की करें तो यह स्कूल सन   1858 में स्थापित होने के बाद से ही गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और अनुशासन का पर्याय बना हुआ है। इस ऐतिहासिक संस्थान ने न केवल शैक्षणिक उत्कृष्टता की नई परिभाषा गढ़ी, बल्कि हजारों छात्रों को सफलता की ऊँचाइयों तक पहुँचाया है।
सेंट जेवियर हाई स्कूल, पटना में प्राचार्य के कार्यकाल की एक यादगार झलक
इस गौरवशाली यात्रा को और अधिक प्रभावशाली बनाने में विद्यालय के प्राचार्य फादर ए. क्रिस्टु सवरिराजन, एस.जे. की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। दूरदर्शी शिक्षाविद्, कुशल प्रशासक और आदर्श मार्गदर्शक के रूप में उन्होंने इस विद्यालय को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया और इसे आधुनिक शिक्षा प्रणाली के अनुरूप विकसित किया।
 167 वर्षों की गौरवशाली परंपरा
1858 में डॉ. एनेस्टेसियस हार्टमैन (फ्रांसिस्कन (कैपुचिन) मिशनरी सोसाइटी) द्वारा स्थापित, सेंट माइकल्स हाई स्कूल अपने अनुशासन, नैतिक मूल्यों और उच्च शैक्षणिक मानकों के कारण पूरे बिहार में शिक्षा का एक आदर्श केंद्र बन चुका है।
 क्या खास है इस विद्यालय में?
समग्र शिक्षा (Holistic Education): यहाँ सिर्फ किताबों से ज्ञान नहीं दिया जाता, बल्कि नैतिकता, नेतृत्व क्षमता और सामाजिक जिम्मेदारी का भी विकास किया जाता है।
सफल पूर्व छात्र: प्रशासन, राजनीति, कॉर्पोरेट जगत, चिकित्सा और अन्य क्षेत्रों में विद्यालय के पूर्व छात्र अपनी सफलता की कहानी लिख रहे हैं।
 शिक्षा के साथ संस्कार: यह संस्थान सिर्फ अकादमिक उत्कृष्टता तक सीमित नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण और समाज सेवा में भी अग्रणी रहा है।
  नवाचार के अग्रदूत  हैं फादर ए. क्रिस्टु सवरिराजन
फादर ए. क्रिस्टु सवरिराजन, एस.जे. का मानना है कि
“एक शिक्षक केवल ज्ञान नहीं देता, बल्कि छात्रों के भीतर आत्मविश्वास और नेतृत्व क्षमता का निर्माण करता है।”
बच्चों से विशेष स्नेह
उन्होंने शिक्षा को तकनीक और आधुनिक आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनके नेतृत्व में किए गए प्रमुख नवाचार की बात करें तो
🔹 स्मार्ट क्लासरूम और डिजिटल लर्निंग का समावेश
🔹 स्पोर्ट्स और एक्स्ट्रा करिकुलर एक्टिविटीज को बढ़ावा
🔹 वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम
🔹 सामाजिक कार्यों में छात्रों की भागीदारी सुनिश्चित
फादर सवरिराजन का सपना है कि हर छात्र न केवल शिक्षित हो, बल्कि एक जिम्मेदार नागरिक भी बने।
 विद्यालय की उपलब्धियाँ और विकास में महत्वपूर्ण योगदान 
फादर सवरिराजन के कुशल नेतृत्व में सेंट माइकल्स हाई स्कूल ने कई उपलब्धियाँ हासिल की हैं:
🏅 सीबीएसई बोर्ड परीक्षाओं में बेहतरीन प्रदर्शन
🏅 राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में छात्रों की सफलता
🏅 आधुनिक प्रयोगशालाएँ, पुस्तकालय, स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स और डिजिटल संसाधनों का विस्तार
🏅 असहाय और आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों को शिक्षा में सहायता
जैसी पहल शामिल है  यह पहल आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत होगी।
क्यों है यह बिहार के युवाओं के लिए प्रेरणादायक?
 यह छात्रों को सिर्फ परीक्षा पास करने के लिए नहीं, बल्कि जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए तैयार करता है।
नैतिकता, अनुशासन और आत्मनिर्भरता का विकास करता है।यहाँ शिक्षा के साथ-साथ समाज सेवा, खेलकूद, कला और संस्कृति को भी महत्व दिया जाता है।
 ऐसा है विद्यालय का ऐतिहासिक सफर
1858 में डॉ. एनेस्टेसियस हार्टमैन द्वारा स्थापित यह विद्यालय शुरू में कुर्जी क्षेत्र में अनाथ एवं निर्धन बच्चों के लिए बोर्डिंग स्कूल के रूप में कार्यरत था।
1894 में, आयरिश क्रिश्चियन ब्रदर्स को इसकी जिम्मेदारी सौंपी गई, जिन्होंने इसे उच्च विद्यालय का दर्जा दिलाया और 1896 में पहला बैच हाई स्कूल परीक्षा में शामिल हुआ।
1958 में, विद्यालय ने अपनी शताब्दी (100 वर्ष) पूरी की और शिक्षा एवं सह-पाठ्यक्रम गतिविधियों में बिहार का अग्रणी संस्थान बन गया।
जेसुइट सोसाइटी को जानें
1968 से संत माइकल विद्यालय का प्रबंधन पटना जेसुइट सोसाइटी द्वारा किया जा रहा है। यह सोसाइटी 1540 में संत  इग्नेशियस लोयोला द्वारा स्थापित की गई थी । यह समाज सेवा के कार्य करता है। खासतौर से शिक्षा के क्षेत्र में इसने काफी कार्य किया है।
 वर्तमान में भारत में 418 से अधिक स्कूलों,   5 विश्वविद्यालय , प्रबंधन संस्थान, इंटर कॉलेजों और  डिग्री कॉलेजों का संचालन कर रही है। 4000 येसु समाजी विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत हैं।
अपनी माताजी के सानिध्य में फादर ए. क्रिस्टु सवरिराजन एस.जे
मिलती है मां की ममता की छांव 
फादर ए. क्रिस्टु सवरिराजन कहते हैं मैं अपनी मां की ममता से उर्जा प्राप्त करता हूं। मां मुझसे बहुत दूर गांव रहती है पर उसे मेरी चिंता हर वक्त लगी रहती है। वो मुझसे फोन पर अब भी यह पूछती है कि मैंने खाना खाया या नहीं। मां का संबल मुझे मजबूत करता है। मेरी मां ही नहीं  दुनिया की हर मां की ममता और दुआओं का असर जादूई होता है।
 लोगों को प्रभू का संदेश
फादर  फादर ए. क्रिस्टु सवरिराजन  कहते हैं कि प्रभु ईसा मसीह ने बाइबल में इस प्रेम और इस सेवा की बात कही है।
आज  एकता और भाईचारे की जगह कटूता बढ़ती जा रही है। लोगों को जोड़ने की जगह लोगों को बांटने का काम हो रहा है। हम एक दूसरे का सम्मान करना तक भूल रहे। जरुरत जन्म ,भाषा, क्षेत्र के नाम पर बटने या बांटने की नहीं। एकता के साथ मानव प्रेम और मानव सेवा के लिए समर्पित होने की है।
चुनौतियां तो जीवन में आती रहेगी। प्रभु यीशु के जीवन में भी आई । हमें साहस रखकर आगे बढ़ना है और बनाना है ऐसा समाज जहां मन का हर कोना प्रेम , शांति और सद्भाव से रौशन हो । मैं अंत में रविन्द्र नाथ टैगोर की अमर कृति गीतांजलि की इन पंक्तियों के साकार होने की कामना परमपिता परमेश्वर से करना चाहता हूं।

जहां मन भय से मुक्त हो, और मस्तक ऊंचा रहे

जहां ज्ञान स्वतंत्र हो;
जहां संसार संकीर्ण दीवारों से खंड-खंड न हुआ हो;
जहां वाणी सत्य की गहराइयों से निकलती हो;
जहां परिश्रम की अविराम धारा पूर्णता की ओर बढ़ती हो;
जहां तर्क की स्वच्छ धारा जड़ परंपराओं की मरुभूमि में न खो जाए;
जहां मन तुम्हारे द्वारा सतत विस्तार पाते विचार और क्रिया की ओर अग्रसर हो—
हे पिता! मेरे देश को उस स्वतंत्र स्वर्ग में जागृत कर।

( यह सिर्फ एक कहानी नहीं, एक उम्मीद है।आलेख: विवेक चंद्र का है । आप आर्थिक मदद कर इस मुहिम को मजबूत कर सकते हैं ।आपकी आर्थिक मदद हमारी सकारात्मक मुहिम को जीवन देती है। 📞 संपर्क: 748843830)

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