यूं खत्म होता गया चिट्ठी-संदेश का चलन.. अब कहां आते हैं बैरन.. अंतर्देशी लिफाफा

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    अब कहां आती हैं चिट्ठियां कुशल मंगल का पैगाम लेकर. अब कहां रहता है इंतजार चिट्ठियों के जवाब का. अब घरों की दहलीज पर कहां खुलते हैं लिफाफे, एक पन्ने में न जाने कितनी यादों को झकझोरती हुई. अब कहां ढूंढती है बुढ़िया दादी किसी पढ़े लिखे नौजवान को, चिट्ठियां पढ़कर सुनाने के लिए. वो पोस्टकार्ड, वो अंतरदेसी, वो मनीआडर, वो लिफाफा, वो बैरन. अब आती है तो बस याद उस गुजरे जमाने का, जिसे हमने अपनी आंखों के सामने से गुजरते देखा है.

    1 सितंबर को विश्व पत्र लेखन दिवस मनाया जाता है. इस मौके पर द बिग पोस्ट आपको उस गुजरे जमाने को फिर से याद दिलाने की कोशिश कर रहा है. पहले संदेश भेजने का सबसे पहला साधन पत्र ही हुआ करता था. घर से दूर रहने वाले लोग अपने परिजनों को पत्र के माध्यम से अपनी कुशलता की जानकारी देते थे. उन्हें इंतजार रहता था कि उनके पत्र का जवाब उनके घर से कब आएगा. जैसे-जैसे आधुनिकता बढ़ती गई डिजिटल क्रांति मजबूत होती गई वैसे ही चिट्ठी का दौर खत्म होता गया. अब चिट्ठी सिर्फ सरकारी कार्यालयों तक सिमट कर रह गई है.

    हजारों साल पुराना है पत्र लिखने का चलन

    पत्र लिखने की परंपरा हजारों साल पहले शुरू हुई. हजारों सालों से इतिहास में पत्रों की अहम भूमिका रही है. प्राचीन इतिहासकार हेलेनिकस के अनुसार, माना जाता है कि पहला हस्तलिखित पत्र फारसी रानी अटोसा ने लगभग 500 ईसा पूर्व लिखा था.

    भारत में पत्राचार

    भारत में जब डाक विभाग द्वारा पत्राचार का दौर शुरू हुआ. लोगों के बीच संदेश का सबसे बड़ा माध्यम डाक ही था. पोस्टकार्ड, अंतर्देशीय पत्र, लिफाफा, बैरन पत्र, का स्वरूप बढ़ाते बढ़ाते स्पीड पोस्ट तक पहुंच गया. पहले पोस्टकार्ड, अंतर्देशीय पत्र या साधारण डाक द्वारा पत्र भेजने पर एक हफ्ता से 10 दिन तक लग जाता था लेकिन बाद में डाक विभाग में स्पीड पोस्ट सेवा की शुरुआत की ताकि लोगों को जल्द पत्र मिल सके.

    90 के दशक के बाद संचार क्रांति

    90 के दशक के बाद देश में संचार क्रांति में व्यापक परिवर्तन होने लगा. दूरसंचार के क्षेत्र में टेलीफोन का पदार्पण हुआ. गांव-गांव तक टेलीफोन की सुविधा बढ़ने लगी. जैसे-जैसे टेलीफोन का प्रभाव बढ़ने लगा वैसे-वैसे पत्र लिखने की परंपरा कम होने लगी. टेलीफोन के बाद 21वीं शताब्दी में मोबाइल आवश्यक आवश्यकता बन गई है. देश के हर दूसरे हाथ में मोबाइल है.

    चिट्ठी लिखने की कुछ यादें

    पटना विश्वविद्यालय के अवकाश प्राप्त प्राध्यापक प्रोफेसर नवल किशोर चौधरी पत्र लिखने के शौकीन थे. प्रोफेसर साहब किस्सा सुनाते हुए कहते हैं, 1964 में मैं पटना विश्वविद्यालय का छात्र था और जंक्शन हॉस्टल में रहता था. इस समय के हॉस्टल के पते से मुझे जापान और जर्मनी से हर रोज मेरे पास पत्र आते थे. हमारे साथी कहा करते थे कि आपको हर रोज कहां से पत्र आता है, क्यों आता है. इसका बड़ा कारण था कि मैं पत्र लिखता था.

    मैं अपने परिजनों को पत्र लिखता था, यह केवल परिवार तक ही सीमित नहीं था. हमारे अनेक मित्र भी थे जो देश के बाहर विदेशों तक फैले थे. एक ऐसे व्यक्ति थे जो उम्र में मुझसे 40 साल बड़े थे और वेस्ट जर्मनी के स्पेशल एडवाइजर थे. कई पत्र अभी भी उनके पास संकलित हैं, जिनमें उन्होंने लिखा है कि वह अभी इंडिया के ऊपर से उड़ रहे हैं और आपको पत्र लिख रहे हैं. पत्र लिखना एक पर्सनल एलिमेंट होता था यह लोगों से जुड़ी हुई भावनात्मक अभिव्यक्ति होती थी.“- नवल किशोर चौधरी, प्रोफेसर

    जब लिफाफा खुलते ही उमड़ती थी भावनाएं

    हल्दी में लिपटा लिफाफा. खुलते ही भावनाएं उमड़ पड़ती, आदरणीय माता जी. सादर प्रणाम. मैं यहां कुशल हूं. आप सभी की कुशलता की कामना शंकर भगवान से करता हूं. फलां-फलां.. आदि-आदि… आगे दुख दर्द, जरूरत, मशवरा, प्यार, आशीर्वाद, और फिर वापस खत पाने की उम्मीदें. यह ट्रेंड अब खत्म हो चुका है. बदलते दौर और विकसित होती तकनीक ने हमें संचार में इतना तेज तो किया कि जब चाहें हम दुनिया के किसी भी कोने में बैठे व्यक्ति से बात कर सकें. लेकिन इसके साथ ही वे स्वर्णिम दौर को भी हमने खो दिया है.

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