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बचपन में सर से पिता का साया उठ गया। खेल- खिलौने का वक्त मुफलिसी के बीच बीता। मां मजदूरी कर दो पैसे जोड़ती और उससे किसी तरह जलता घर में दो वक्त का चूल्हा। कभी एक शाम बस ग़म का निवाला खा पेट भर लेना होता। उम्र बढ़ी तो मां के कंघे से कंघा मिला घर की ग़रीबी से जंग लड़ा। किस्मत जगह जगह रास्ता रोकने को तैयार बैठी थी पर यहां रूकना कहां दौड़ना मंजूर था। पहले धावक बनी, फिर Mountaineer बन पहाड़ फतह किया अब साइकिल से देश नाप महिला सशक्तिकरण का संदेश फैला रही है। बुलंद हौसले के दम पर तमाम अवरोधों को दूर कर साइकिल से दुनिया की परिक्रमा करने का सपना जीने वाली आशा मालवीय की कहानी पढ़िए

देखिए मैं एमपी के राजगढ़ जिले के नाटाराम की रहने वाली हूं। मैंने बहुत संघर्ष किया है। मुझे मेरे हर संघर्ष ने ही हौसला भी दिया है और आगे की मंजिल भी दिखाई है। कभी ऐसा भी वक्त था कि हम खाना मांग कर खाते थे। मुझे थकना, रूकना , हारना पसंद नहीं मैं सशक्त भारत और सशक्त नारी के मैसेज को जन जन तक पहुंचाना चाहती हूं और इसके लिए हीं मैं साइक्लिंग कर रही हूं। मैं मध्य प्रदेश से इस यात्रा पर निकली हूं और अब तक मैंने 12 राज्यों की यात्रा की है। कहती हैं आशा मालवीय।

छात्राओं को दे रही हिम्मत

आशा बताती है कि अपनी यात्रा के दौरान मैं स्कूल -कालेजों में छात्राओं से मिलती हूं और उनका मनोबल बढ़ाती हूं। इसके साथ ही राज्यों के जिम्मेदार लोगों से भी मिलकर अपने अभियान के बारे में बताती हूं। इस अभियान के तहत अब तक मैंने 9 मुख्यमंत्री,8 राज्यपाल और 5 डीजीपी से मुलाकात की है। मेरा यह सफर रोमांच से भरा तो है हीं साथ ही इसका उद्देश्य बड़ा पावन है देश की महिलाओं को सशक्त बनने की हिम्मत देना। मुझे खुशी है कि मैं अपने उद्देश्य में सफल हो रही हूं।

न कोई प्रायोजक न कोई पूंजी

आशा बताती है कि इस साइकिल यात्रा के लिए उन्हें कोई प्रायोजक नहीं मिल पाया। उनके पास कोई बड़ी जमापूंजी भी नहीं है बस हौसलों के दम पर देश नापने निकल पड़ी। आशा आगे कहती हैं कि रास्ते में कोई 500 रुपए दिहाड़ी कमाने वाला मुझे सपोर्ट करते हुए कभी अपनी दो दिन की दिहाड़ी मुझे दे जाता है तो कभी कोई मुझे अपने लंच बॉक्स से दोपहर का खाना आफर देता है। यही तो भारतीयता है। देश के लोग काफी अच्छे हैं बस कुछ अपवादों को छोड़कर।

MP TOURISM ने दी साईकिल

आशा मालवीय बताती हैं कि जब मैंने साइक्लिंग का प्रपोजल बनाया तो कई संस्थाओं से बातचीत की। कुछ ने सराहा तो कहीं से उदासी मिली पर मैंने हिम्मत नहीं हारी एमपी टूरिज्म ने मुझे एक साइकिल और तीन जोड़े कपड़े दिए। ये साइकिल मेरा हमसफ़र है। मैं इन्हीं तीन जोड़े कपड़े से अब तक ट्रेवल के दौरान काम चला रही हूं।

खुद मजदूरी कर बनाया घर

आशा कहती हैं कि हमारे पास पक्का घर नहीं था प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत मिले पैसों से यह मुमकिन हुआ। मजदूरी बचाने के लिए मैंने खुद मजदूरी कर घर की एक एक ईंट जोड़ने का काम किया । मैं छह माह तक अहले सुबह से देर रात तक अपने घर को आकार देने के लिए मजदूरी करती रही।

अवार्ड के पैसों से बहन के हाथ किए पीले

आशा कहती हैं खेल के दौरान मिले पुरस्कार के पैसों को जोड़कर मैंने अपनी छोटी बहन की शादी भी करवाई। अब वह अपनी गृहस्थी बसा रही है। उसे खुश देखकर मुझे काफी संतुष्टी मिलती है। अब घर में मैं और मां बस दो ही सदस्य हैं। हमारी जरूरतें भी काफी सीमित है। हम कम में जीना जानते हैं। भौतिक जरूरतों की जगह सामाजिक उन्नति में मेरा लक्ष्य है।

देश के 99 फीसदी लोग काफी अच्छे

आशा बताती है कि इस साइकिल यात्रा के दौरान भारत को करीब से जानने का मौका मिल रहा है। महिलाओं के बारे में जितना अनसेफ इसे बताया जाता है वैसा नहीं है। पुरूष भी महिलाओं का आदर करते हैं। हां कुछ लोगो तो हर जगह बुरे मिल ही जाएंगे। वैसे मैं कहुं तो भारत के 99 प्रतिशत लोग बहुत अच्छे, बहुत प्यारे हैं।

चाहत साइकिल से दुनिया देखने की

मेरा सपना अब साइकिल के पहियों के साथ दुनिया नापने का है। मैं भारत की और से दुनिया भर में जाकर महिला सशक्तिकरण का संदेश बांटना चाहती हूं। इसके लिए मुझे सरकार का सहयोग और समर्थन चाहिए। बिना सरकार के सहयोग के मैं देश से बाहर साइकलिंग नहीं कर सकती। मुझे उम्मीद है कि मुझे सरकार इसकी इजाजत भी देगी और मदद भी करेगी।


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विवेक चंद्र

उम्मीदों के तानों पर जीवन रस के साज बजे आंखों भींगी हो, नम हो पर मन में पूरा आकाश बसे..