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ये कहानी उस शख्स की है जिसने अपने टूटते – जुड़ते सपनों से हताश होने की जगह उसे हथियार बना इतिहास रच डाला। जीवन के हर पहर संकटों से टकराहट होती रही। कभी पढ़ाई बीच में छूटी तो कभी
कलम वाले हाथ में बंदूक थामने की नौबत आ गई। सपने बनते बिखरते रहे पर नहीं बिखरा तो हौसला। इसी हौसले के दम पर आज इनका संस्थान गोल इंस्टीट्यूट राष्ट्रीय फलक पर अपनी मुकम्मल पहचान बना चुका है।
पढ़ें हजारों छात्रों को मेडिकल इंट्रेंस की सफल तैयारी करवाने वाली संस्था गोल इंस्टीट्यूट के संस्थापक विपिन कुमार के संघर्ष और सफलता की ये दास्तान


मेरे जीवन की कहानी में कई स्याह पन्ने हैं और इन पन्नों पर चस्पा दर्द की स्वेत श्याम तस्वीरें भी। मैं बिहार के गया जिले के एक पिछड़े गांव से आता हूं। पिछड़ेपन के साथ ही वहां वर्ग संघर्ष, नक्सलवाद, निजी सेना और नरसंहार जीवन का हिस्सा बन गए थे।कब किसे कहां मौत के घाट उतार दिया जाएगा कहना मुश्किल था। आज सब ठीक है पर इसका खौफ आज भी वहां की माटी में मौजूद हैं। । मैं इन सब से उदास तो होता था पर मैंने उस उदासी को लंबे समय तक खुद पर सवार नहीं रहने दिया। एक स्वप्न टूटता तो मैं दूसरा गढ़ लेता । बस रास्ते पर चलता रहा और क्या! कभी साईकिल से चलकर ट्यूशन पढ़ाने जाता था। आज देश के कई राज्यों में मेरे इंस्टिट्यूट की शाखाएं हैं। कभी दो नंबर से मेरा मेडिकल छूटा आज हमारे संस्थान से तैयारी कर हजारों छात्र डॉक्टर बन चुके हैं। जिंदगी आपका हर वक्त इम्तिहान लेती है आपको बस हौसला बनाए और बचाए रखना होता है। कहते हैं गोल इंस्टीट्यूट के संस्थापक और निदेशक बिपिन कुमार सिंह। विपिन कुमार आगे कहते हैं कि वक्त से अच्छा शिक्षक कोई नहीं होता।

बहुत काली थी वह रात

विपिन कुमार बताते हैं कि वह जीवन का काफी स्याह वक्त था। वह बहुत काली रात थी। हमारे गांव में तब ज़मीन को लेकर वर्ग संघर्ष चरम पर था। बिहार के कई इलाकों में नक्सली हमले बढ़ गए थे। नरसंहार का दौर शुरू हो गया था। हमारे गांव की भी यही हालत थी।। कोई शाम के बाद घर से बाहर नहीं निकलता। घर में भी हर वक्त चौकन्ना रहना होता था। ऐसे में दीपावली की रात हमारे घर भी हमला किया गया और मेरे चचेरे भाई को नक्सलियों ने गोली मार दी। उनकी मौत हो गई। हमारा सब कुछ उस रात तबाह हो गया। मेरी आंखों में खौफ का ये मंज़र रह रह कर तैरता रहता।

पढाई छोड़ थामा था बंदूक

बिपिन कुमार सिंह कहते हैं कि जब घर पर हमला हुआ तो उसके बाद हमारा पूरा परिवार काफी दहशत में जीने लगा। उस वक्त मैंने बोर्ड एग्जाम पास किया था और सपना पटना के साइंस कालेज में एडमिशन कराने का था। बोर्ड एग्जाम में मेरे नंबर काफी अच्छे आए थे। वे आगे बताते हैं कि भाई की हत्या ने हमारा सबकुछ बदल कर रख दिया। उम्र भी कम थी। पढ़ाई के सपने की जगह आंखों में खौफ और दिल में प्रतिशोध की भावना पनप गई। मैं पढ़ाई लगभग छोड़ गांव में ही रहने लगा।
गांव में लोग बंदूक ले टोलियां बना रात भर पहरेदारी करते। हमने भी पढ़ाई छोड़ बंदूक उठाया और रात- रात भर छत पर घूमकर पहरेदारी किया करते। पढ़ाई -लिखाई की कलम की जगह हाथों में थी तो अब बंदूक। यह भी पता नहीं था कि आगे क्या होना है। इसका अंजाम क्या होगा।

पिता बने मार्गदर्शक

बिपिन सिंह कहते हैं कि कुछ दिन तो ऐसा चलता रहा । बंदूक ले मैं पहरेदारी करता। पढ़ना- लिखना पुरानी बात बन गई थी। ऐसे में पिताजी ने एक बार पास बुलाया और बिठाकर पूछा कि इन सब से आगे क्या होगा? भविष्य क्या होगा? उन्होंने मुझे सलाह दी कि इनसे बाहर निकलो और अपने आगे का जीवन मजबूत बनाओ। हिंसा का ज़बाब हिंसा नहीं और इस तरह बंदूक से कोई बदलाव आने वाला नहीं। पिताजी की वह बात मेरे जीवन का टर्निंग प्वाइंट बना और फिर मैं पढ़ाई की और लौट गया।

नामांकन हो चुका था बंद

बिपिन कुमार सिंह बताते हैं जब मैं दुबारा से पढ़ाई की और लौटा तो काफी देर हो चुकी थी। कालेजों में एडमिशन हो चुके थे किसी तरह गया शहर के एक कालेज में मेरा नामांकन हुआ और मैं वहीं गया के एक लॉज में रहने लगा।

लॉज के सीनियर से मिली प्रेरणा

बिपिन कुमार आगे बताते हैं उसी लॉज में मेरे सीनियर रहते थे। काफी सौम्या, व्यवहारिक और हर वक्त पढ़ाई में मशगूल। उस समय तक मैंने कुछ नहीं सोचा था कि मुझे आगे क्या करना है बस मन में यह था कि अच्छे से पढ़ाई हो जाए और एक अदद नौकरी मिल जाए। मेरे सीनियर उस वक्त मेडिकल की तैयारी कर रहे थे और बाद में मुझे पता चला उन्होंने मेडिकल के एग्जाम में बिहार में सातवां स्थान लाया था। उनसे काफी प्रेरणा मिली और मैंने भी यह तय किया कि मैं भी मेडिकल की तैयारी करूंगा और डॉक्टर बनूंगा।

दो नंबर से छूटा मेडिकल

बिपिन कुमार सिंह कहते हैं कि फिर मैं मेडिकल की तैयारी करने के लिए पटना आ गया। एक साथ हम कई छात्र रहते। सब काफी मेहनत करते। हम सब मिलकर आपस में ही टेस्ट पेपर की प्रेक्टिस किया करते। सब कुछ ठीक चल रहा था। इस बीच बहन की तबीयत बिगड़ी और फिर मुझे अस्पतालों के चक्कर लगाने पड़े। बीच में प्रेक्टिस छूट गई। मैंने मेडिकल का एग्जाम दिया। जब रिजल्ट आया तो मैं सिर्फ दो नंबर से छट गया था। मुझे दो नंबर कम आए थे।

फिर साथ आया तनाव और अकेलापन

वे बताते हैं कि रिजल्ट के बाद मैं तनाव में था। पटना से गांव आया सोचा घर पर लोग दिलासा देंगे। कुछ सिंपैथी मिलेगी पर यहां हुआ उल्टा। नाकामयाबी का सारा ठीकरा मुझ पर ही फोड़ दिया गया। पिताजी ने कहा कि ठीक से पढ़ाई नहीं किए होगे। पढ़ते तो कैसे नहीं होता! अगर आपका ताल्लुक बिहार के गांवों से होगा तो वहां यह बात आम होती है। अब मुझे खुद से ही खुद को दिलासा भी देना था और आगे नए रास्ते भी ढूंढने थे। पिताजी ने कहा कि तुम अपने बारे में खुद सोचो और यही मेरा जीवन मंत्र बन गया।

जब चावल बेच दिया किराया

बिपिन कुमार सिंह कहते हैं कि एक वाक्या मुझे अब भी याद है। उस वक्त में किराए पर रह कर पढ़ाई करता था। मेरे पास पैसे खत्म हो चुके थे और मकान का किराया देना था। राशन आदि के लिए भी पैसे नहीं थे। पिताजी तब रिटायर कर चुके थे और गांव में रहते थे। मैं गांव आया और पिताजी से पैसा मांगा ‌। पिताजी ने कहा कि फिलहाल तो पैसे खत्म हो चुके हैं । तुम अगले माह ले लेना। फिर मैंने जब ज़िद की तो उन्होंने कहा कि पैसे तो है नहीं ऐसा करो ये धान रखा है ट्रैक्टर पर लादकर बाजार ले जाओ और फिर जो पैसे मिलेंगे उसे ले लेना। मैंने ट्रैक्टर पर धान लोड किया, बाजार गया उसे बेचा और फिर पैसे लिए। जो पैसे मुझे धान बेचकर मिले वह इतना कम था कि मेरे दो माह का रूम रेंट ही चल पाया। मुझे लगा कि पिताजी इतनी मेहनत करते हैं फिर भी अच्छी आमदनी नहीं हो पाती। मुझे इस हालत से निकलना है।

ऐसे आया संस्थान खोलने का आइडिया

मेडिकल प्रिपरेशन के कोचिंग खोलने के बारे में बताते हुए बिपिन कुमार कहते हैं मेरा मेडिकल का सपना टूट चुका था। इस दौरान मैंने जो तैयारी की थी , तैयारियों का जो पैटर्न और मॉडल बनाया था मैं उसके बारे में सोच रहा था। उस वक्त मेडिकल इंट्रेस्ट की प्रेक्टिस के लिए देश में कोई सेंटर नहीं था जो छात्रों को मार्गदर्शन दे सके। मैंने सोचा कि क्यों न एक ऐसा सेंटर बनाया जाए जिसमें मेडिकल के छात्रों की तैयारी कराई जाए। मैंने इस पर काफी मंथन शुरू किया और पाया कि बेहतर मार्गदर्शन के आभाव में एक-एक छात्र सालों साल तैयारियां करते हैं और फिर कईयों को निराशा हाथ लगती । फिर मैंने संकल्प लिया कि मुझे ऐसा एक सेंटर बनाना है।

सेंटर के लिए कहां से आए पैसा?

बिपिन कुमार आगे कहते हैं कि मैनै मन ही मन मैंने सेंटर खोलने की पूरी तैयारी कर ली। कई लोगों से बात भी किया पर उन लोगों ने मुझे डिमोटिवेट ही किया। पर इन सबकी बात अन्यथा ना ले मैंने तय किया कि मुझे एक ऐसा सेंटर बनाना है जहां मेडिकल एंट्रेंस एग्जाम के लिए प्रिपरेशन कराया जा सके। इन सबके लिए पैसे की जरूरत थी जो मेरे पास थे नहीं और मैं घर से मांग नहीं सकता था । घर से मांगता तो मिलता भी नहीं। मैंने किसी को कुछ नहीं बताया और ट्यूशन पढानी शुरू की । 30 से 40 किलोमीटर साइकिल से जाकर ट्यूशन पढ़ाने लगा और फिर पैसे इकट्ठे किए।

8×8 के कमरे से शुरुआत

बिपिन कहते हैं कि ट्यूशन पढ़ाकर मैंने जो पैसे इकट्ठे किए उसे एक छोटे से कमरे में मेडिकल की तैयारी के लिए कोचिंग शुरु किया। यह मेरे सपने के सच होने जैसा था। उस वक्त काफी लोगों ने मेरा मजाक उड़ाया कि छोटे से कमरे में कैसे मेडिकल एंट्रेंस की तैयारी होगी। आखिर पैसे देकर कौन टेस्ट सीरीज देना चाहेगा ? मुझे विश्वास था कि हो न हो कुछ बेहतर जरूर होगा। मैं लोगों की आलोचनाएं सुनता और दुगनी ताकत से इसे बेहतर बनाने पर पूरी उर्जा लगा देता। पहले ही साल में मेरे 80 में से 20 छात्र सेलेक्ट हो गए इसे मेरा उत्साह बढ़ा और फिर कारवां बनता गया।

आज देश भर में 18 ब्रांच

आज गोल इंस्टिट्यूट के देशभर में 18 से अधिक ब्रांच है। आज यह मेडिकल प्रिपरेशन का एक भरोसेमंद नाम बन चुका है।हमारे संस्थान से तैयारी कर हजारों छात्रों ने सफलता का परचम लहराया है। हम सैकड़ों लोगों संस्था से जोड़ कर रोजगार भी दे रहे हैं। साथी बिहार की राजधानी पटना में बहार 12 एकड़ का गोल विलेज भी कार्य कर रहा है या अपने आप में अनूठा शैक्षणिक गांव है। आज Goal संस्थान ने अपने सफलता का 25 वर्ष पूरे कर लिए है और इस 25 साल के सफर में 15 हजार से ज्यादा डॉक्टर हमने सोसाइटी को दिए हैं।कहते हैं बिपिन कुमार।

क्या है गोल विलेज

गोल विलेज हमारी प्राचीन गुरुकुल प्रणाली और आधुनिक टेक्नोलॉजी के साथ शांत और खुबसूरत प्राकृतिक वातावरण के बीच रचा- बसा एक आदर्श शैक्षणिक कैंपस है। यहां छात्रों के लिए एक ही जगह रहना- खाना, पढ़ाई, सेल्फ स्टडी, के साथ ही खेलकूद, व्यायाम और उनके व्यक्तित्व विकास की तमाम साधन – संसाधन उपलब्ध कराए गए हैं।

और नाराज हो गए पिताजी

वे बताते हैं कि कोचिंग खोलने के बाद पिताजी काफी नाराज हो गए थे। वे आगे बताते हैं कि यह वाक्य तब का है जब मेरी कोचिंग की शुरुआत हो चुकी थी और रिजल्ट भी काफी बढ़िया आया था। उस समय मैं गांव गया और दीदी ने पिताजी को बता दिया था कि मैं कोचिंग सेंटर चला रहा हूं। पिताजी तब मुझसे काफी नाराज हुए उन्हें लगा कि मैंने उनकी प्रतिष्ठा धूमिल कर दी है।

छोटा नहीं होता कोई काम

बिपिन कुमार सिंह कहते हैं कि कोई भी काम छोटा काम या बड़ा काम नहीं होता है अगर आप मन से उसे करते हैं तो उस काम में ऊंचाई जरूर मिलती है। जीवन में बाधाएं आती रहती हैं पर उन बाधाओं को हिम्मत बना आगे बढ़ जाने की जरूरत है।
फिलहाल विपिन कुमार सिंह अपनी निर्बाध लगन और उर्जा से ‘गोल’ को एक अंतरराष्ट्रीय फलक पर स्थापित करने की नई मुहिम में जुटे हैं।


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विवेक चंद्र

उम्मीदों के तानों पर जीवन रस के साज बजे आंखों भींगी हो, नम हो पर मन में पूरा आकाश बसे..