जिंदगी जिंदाबाद

हौसलों के “जुगनू “थाम बदनाम गलियों से मानव अधिकार आयोग के सलाहकार तक का सफर,

ये कहानी नसीमा की है। उन नसीमा की जो बदनाम तंग गलियों में पली बढ़ी और अपने हौसलों के दम पर न सिर्फ खुद की किस्मत बदली बल्कि सेक्स वर्करों की बेटियों के जीवन सुधारने की मुहिम भी चलाई। मुजफ्फरपुर के रेडलाइट इलाके चतुर्भुज स्थान से राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की सलाहकार तक का सफर तय करने वाली नसीमा की हिम्मत भरी कहानी आपको जरूर पढ़नी और समझनी चाहिए….

मेरी कहानी उन बदनाम उन बदनाम गलियों से शुरू होती है जिसका नाम जुबा पे लाना भी सभी सभ्य समाज में गुनाह है। मैं मुजफ्फरपुर के रेड लाइट इलाके चतुर्भुज स्थान में पली-बढ़ी। हमने बचपन से ही काफी कुछ झेला, देखा , सुना समझा। अपनी बड़ बड़ी आंखों में बीते वक्त की खामोशी भरते हुए नसीमा आगे कहती है। हम पांच भाई बहन हैं मेरे अब्बा ने किसी तरह हम बहनों को पढ़ने के लिए प्राइवेट स्कूल में दाखिला कराया , पर यह सख्त सख्त हिदायत भी दी कि कभी भी किसी से अपने घर का पता नहीं बताएंगे।
जब मुझसे मेरे सहपाठी घर का पता पूछते तो मुझे बड़ा अजीब सा लगता । मैं सोचती कि यह क्या है और ऐसा क्यों है ? मुझे समझ तो नहीं थी लेकिन ऐसा लगता था कि मैं हर दिन अपने साथ बस्ते में एक झूठ लेकर जाती हूं और एकझूठ लेकर लौटती हूं। मैं और मेरी दोस्त स्कूल से लौटते वक्त इसलिए रास्ता बदलती रहती थी कि कहीं सच बाहर ना जाए।

  यह कहती थी दादी

नसीमा हमसे आगे कहती है कि मेरी मां सेक्स वर्कर नहीं थी ।उन्हें पालने वाली इस पेशे में थी। मेरी परवरिश मेरी दादी ने की जो एक सेक्स वर्कर रही थी इसलिए मैं अपने आपको डॉटर ऑफ सेक्स वर्कर कहती हूं।

नसीमा बताती हैं कि क्योंकि इस पेशे में औरत अपनी बेटी को आगे बढ़ाती है ताकि उसका बुढ़ापा आराम से कट जाए । मेरी दादी भी चाहती तो हम बहनों को इसमें शामिल कर अपना बुढ़ापा आराम से बिता सकती थी लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। मेरी दादी हमेशा कहती थी मैंने अपने जीवन में जो किया वह इनके साथ नहीं होने दूंगी। मुझे अपनी दादी पर गर्व है। मैं अपनी दादी की वजह से इतने गर्व से खुद को डॉटर ऑफ सेक्स वर्कर कहना शुरू किया ।

समाज के तानों से पढ़ाई छूटी

नसीमा बताती हैं कि समाज के तानों के कारण कई बार पढ़ाई छूटी अभी फाइनल किया है रेड लाइट एरिया में घरों में छोटी-छोटी बेटियां रहती है शर्मिंदगी और समाज के ताने के कारण उनकी पढ़ाई छूट जाती है जो कोई स्कूल जाती भी है तो उनमें से ज्यादातर को मजबूरी के चलते अपनी पहचान छुपा करती है।

परचम ने दी उम्मीद

नसीमा कहती हैं कि मुझे बचपन से ही लगता है कि मैं इस मोहल्ले के लोगों की स्थिति कैसे बदलूं आगे चलकर मैं सेक्स वर्करों और उनकी की बेटियों के जीवन में सवेरा भरने की कोशिश में जुट गयी। हमने कुछ लड़कियों के साथ एक छोटा सा संगठन बनाया और उसे नाम दिया “परचम”। परचम में सबसे पहले तो हम यहां की बेटियों को मोटिवेट करते उन्हें पढ़ाई से जोड़ते और जो सेक्स वर्कर हैं इन्हें छोटे छोटे रोजगार से जोड़कर आमदनी का विकल्प देते।
शुरूआती दौर में तो काफी समस्या आई । हमारा काफी विरोध हुआ। यहां के लोगों ने ही हमारा विरोध किया पर हमने अपना काम जारी रखा। धीरे- धीरे माहौल बदलने लगा। इग्नू जैसी संस्थाओं ने चतुर्भुज स्थान में अपनी शाखाएं खोली यहां की लड़कियों की पढ़ाई के लिए। हमारी संस्था की अब चर्चा होने लगी।

जुगनू से आयी रौशनी

उस दौर में एंड्राइड मोबाइल फोन हाथों तक नहीं पहुंचे थे, सोशल मीडिया का दौर नहीं था। ऐसे में मुझे लगा कि एक ऐसा माध्यम हो जहां हम अपने मन की बात रख पाए। यहां के बच्चे अपनी कलाओं को उस पटल पर रख सकें । मैं आपको ये जरूर बता दूं कि यहां के बच्चों में प्रतिभा की कोई कभी नहीं है। तो हमने साल 2004 में एक हस्तलिखित पत्रिका शुरू की नाम रखा जुगनू । इस पत्रिका में हमारे समाज के बच्चे अपनी बात रखते। उनकी कहानियां इसमें छपती। उनकी रचनाओं को स्थान मिलता। जुगनू एक वैसा मंच बना जहां आपसी संवाद करने और मन की बात रखने की पूरी आजादी मिलती। जुगनू का प्रकाशन आज भी जारी है। अब जुगनू राष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित हो रहा है और इसमें चार राज्यों के बच्चे लिख रहे हैं।

जुगनू रेडीमेड गारमेंट भी

नसीमा खातून के प्रयास से चतुर्भुज स्थान की महिलाएं अब रेडीमेड गारमेंट भी बना रही हैं। इसकी बाजार में अच्छी मांग है इसके लेबल को जुगनू रेडीमेड गारमेंट का नाम दिया गया है।

राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ने बनाया सलाहकार

नसीमा को राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ने राष्ट्रीय सलाहकार कोर ग्रुप का सदस्य बनाया है। इस कोर ग्रुप में देश भर से 13 लोग शामिल होते हैं।

नसीमा कहती है कि आज भी अगर कोई अपराध होता है तो इन बदनाम गलियों में ही सबसे पहले पुलिस आती है। उन्हें लगता है कि अपराधी यही छुपा होगा। हमने यह सब देखा सुना है। मेरे लिए यह गर्व की बात है कि आज मुझे राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग में सलाहकार बनाया गया है।

मिल चुके हैं कई एवार्ड

नसीमा खातून को सेक्स वर्करों के बीच बेहतर कार्य करने के लिए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों से कई सम्मान मिल चुके हैं। इसमें प्रतिष्ठित मीडिया कंपनी cnn-ibn द्वारा “रियल हीरोज सम्मान” भी शामिल है। दुनिया भर की प्रतिष्ठित न्यूज़ एजेंसियों ने नसीमा खातून के ऊपर डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया है।, नसीमा नहीं यूएनडीपी के सहयोग से देश भर के रेड लाइट इलाका पर केंद्रित “सफर” नामक पुस्तक का संपादन भी किया है।

बात प्रोफेशन चेंज कि नहीं जनरेशन चेंज की

नसीमा कहती हैं कि हम प्रोफेशन चेंज कि नहीं जेनरेशन चेंज की बात करते हैं। मैं तीन मुख्य बिंदुओं पर यहां ध्यान दे रही हूं एक तो यह की योजनाएं सीधे तौर पर इस इलाके के लोगों तक पहुंच पाए। दूसरा जुगनू के जरिए बच्चों को बेहतर तालीम के लिए सरकार से मदद मिल सके और तीसरा की इस इलाके में एक वैसा कम्युनिटी सेंटर बनें जहां स्वास्थ्य परीक्षण की व्यवस्था से लेकर सरकार की योजनाओं की जानकारी तक एक जगह पर उपलब्ध हो।
फिलवक्त समाज के अंधेरे को अपने हौसलों का परचम लहरा जुगनू बन नसीमा उसमें उजास भरने की भरपूर कोशिश में जुटी है। नसीमा को भरोसा है कि कोशिशें कामयाब जरूर होती हैं ।

3 Replies to “हौसलों के “जुगनू “थाम बदनाम गलियों से मानव अधिकार आयोग के सलाहकार तक का सफर,

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *